Friday, May 24

"खेल"24मई 2019

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                                    ब्लॉग संख्या :-396

।। खेल ।।

कैसा यह जीवन का खेल 
कोई पास तो कोई फेल ।।

कोई बिना किये सब पाये 
किसी की कर्म किये भी रेल ।।

लगे ये जीवन सजा कभी
निकल न पाये ऐसी जेल ।।

आजीवन ही कहीं कहीं
लगी रही दुखों की सेल ।।

लगे कभी कोई खेल की
कड़ी हम जो रहे हैं झेल ।।

जीत हार को क्या गुनें 
दोनों की है ठेलमठेल ।।

आज हँसे कल रोऐ 'शिवम'
सुख दुख पर किसकी नकेल ।।

खेल अनोखा ऐसा है यह
कोई हँसा कोई रहा धकेल ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 24/05/2019

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक      खेल
विधा        लघुकविता
24 मई  2019,शुक्रवार

खेल कूदकर बड़े हुए हैं
भोगा अतुलित आनन्द
मिलकर माटी में हम खेले
आती भीनी भीनी गन्ध

छुपा छिपी बचपन में खेले
लड़ते भिड़ते वापस मनते
गिल्ली डंडा चौर सिपाही
काँच गोलियां जेब में भरते

खेल भावना से मिल खेलो
प्रतिपल सुख आनंद मिलता
रहो सदा मिल जुलकर सबमें
चेहरा उदासी भी खिल उठता

हाथ हिलाते पाँव हिलाते
जब शिशु बनकर हम आये
जीवन अद्भुत खेल है मित्रों
स्व  कर्तव्य  साथ  निभांवे

आत्मविश्वासी खेल विजेता
वह संघर्षों से नित लड़ता।
जीवन जीना खेल नही होता
परिश्रम से नित आगे बढता।।
स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

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प्रदत्त शीर्षक: खेल

करके दूर तनाव को, नव स्फूर्ति संचार।
खेल करे मन और तन, त्वरित स्वस्थ निर्भार।

बचपन बीते खेल में, बढ़े हर्ष उत्साह।
कलुष भाव से दूर रह, सरल सहज सब राह।

खेल जंग मैदान में, खेल देश हित खेल।
किन्तु हृदय पर चोट कर, नहीं किसी सँग खेल।

खेल भावना जोड़ती, अपने-पन का भाव।
अखिल विश्व में प्रेम का, रहे न तनिक अभाव।

विजय पराजय भूलकर, भर उत्साह अपार।
रहे भावना टीम की, खेल खुशी आधार।

डॉ राजकुमारी वर्मा

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भावों के मोती
24/05 /19
विषय - खेल

छोटी कविता 
यही खेल जीवन का 

मधु ऋतु  सुहाये सखी पतझर नही भाये। 

अरे बावरी बिन पतझर ,मधु रस कैसे मन भाये
अंधकार नही तो बोलो कैसे जुगनु चमक पाये। 

रजनी का जब गमन है होता तब उषा मुसकाये
सारा समय चमकता सूरज भी नही भाये। 

निशा की कालिमा ही सूरज में उजाला  भरती
जब घन अस्तित्व खोते तो धरती खूब सरसती। 

फूल झरते हैं खिल के, पंक्षी फिर भी गाते 
गिरा घोंसला पक्षी का फिर भी फूल मुस्काते। 

किसी का आना किसी का जाना चलन यही दुनिया का
जगती में कोई मूल्य नही दुख बिन सुख का।

कोई हारा कोई जीता "यही खेल जीवन का" 
हे री सखी पतझर बिनु मधु रस कैसे जीवन का।

स्वरचित 

                  कुसुम कोठारी ।
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खेल 

खेल-खेल में न जाने 
मैं कब इतनी बड़ी हो गई
जिंदगी की भाग दौड़ में 
मैं  पतंग की लड़ी हो गई
डीली डोरी छोड़ी तो
 मैं उलझ सी गई 
ज्यादा खींची डोरी तो 
मैं बिखर सी गई 
कभी मैं प्यारी सी गुड़िया थी 
किसी के हाथों की कठपुतली हो गई
 किसी के घर की इज्जत तो 
किसी के घर से पराई हो गई 
पिंजरे में बैठी गुमसुम
 कोई मैना सी हो गई 
आसमां में उड़ना तो दूर
 मैं चहकना भी भूल गई 
आज बच्चों को खेलते देखा तो 
बच्चों संग बच्चा हो गई 
खेल खेल में न जाने
 मैं कब इतनी बड़ी हो गई।

एमके कागदाना
फतेहाबाद हरियाणा

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"नमन-मंच"
"दिनांक-२४/५/२०१९"
"शीर्षक-खेल"
स्मरण करें हम अपने बचपन
कितने सुनहरे दिन हमारे
नीत नये हम खेल खेलते
सीख जाते जीवन के पाठ अनेक।

कबड्डी हो या गिल्ली डंडा
टीम भावना से हम खेलते
ईमानदारी का पाठ भी सीखते
खेल खेल मे हम सब सीखते।

अनुशासित था जीवन हमारा
इसमें खेल का था बड़ा हाथ,
आज बच्चे खेलते मोबाइल गेम
नही सीख पाते मित्रता का पाठ।

हार जीत को सहजता मे नही लेते
करने लगते बिध्वसंक ब्यवहार
समय के साथ चलना जरूरी
संतुलन बनाए रखे हम।

खेल है स्वास्थ्यवर्द्धक
इसे न विध्वंसक बनाये हम।
खेल जरूरी हम सब के लिए
नीत खेले मनोरंजक खेल हम।
  स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।
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🌺,🙏🙏जय माँ शारदे,,🙏🙏🌺
नमन मंच भावों के मोती
24/5/2019
,,शीर्षक,, खेल,,,
जिसने जीवन को खेल 
समझा उसने ही 
उसे खिला दिया
जैसे कि नेताओं को 
जनता ने सबक सिखा दिया
 लापरवाही ,गुस्ताखी माफ 
नहीं की जाती हैं
चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो 
करनी सामने आती है
 मानव इनको खेल 
न समझे  राजनीति हो या परिवार
 धर्म ,कर्म अथवा हो ब्यबहार
ईश्वर को साक्षी मान  सदैव
सदमार्ग पर चलते रहना
 कठनाई पर्वत सम हों 
 राई समझकर सहना 
नैतिक जिम्मेदारी की भावना 
मन में जागेगी
 सफलता ,सोहरत 
पीछे पीछे भागेगी
स्वरचित ,,,सुषमा ब्यौहार,,,,

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राधिका हैं रची बसी, कृष्ण तन-मन में
राधा सखी संग बसे, नाच नाचन में,
मनभावन दृश्य देख, बसे ह्रदय में
राधाकृष्ण सभी रचे, रास गोकुल में।

गोकुलन में गाय चरा, जगत जगी जाय
कानन-कानन कर भेंट, कृष्ण मिली जाय,
ग्वालन संग खेल-खेल, भाग खुली जाय
कृष्ण-राधा लेत नाम, मोक्ष द्वार जाय।

भाविक भावी

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नमन "भावो के मोती"
24/05/2019
   "खेल"
1
खेल भावना
हार-जीत स्वीकार
रहे सद्भाव
2
चाल पे चाल
शतरंज का खेल
शह व मात
3
सर्कस खेल
जान हथेली पर
जोखिम भरा
4
जादू का खेल
हाथ की है सफाई
विस्मित नैन
5
भाग्य का खेल
गर्दिश में सितारे
वक्त ने लूटा
6
विरुद्ध नीति
राजनीति का खेल
चाह सुनीति
7
चाँद ने खेला
छुप्पा-छुप्पी का खेल
मेघों के संग
8
सत्ता का खेल
कठघरे में आज
मन परेशां
9
साँप व सीढ़ी
वास्तविक जिंदगी
अद्भुत खेल
10
ईश खेलते
मयावी संसार में
माटी पुतले
11
गुड्डा,गुड़िया
बचपन का खेल
यादें पुरानी
12
आतंकी खेल
दहशत में हम
समाप्त कब
13
कितने तारे
उलझा बचपन
मस्ती से खेलें
14
खेल-खेल में
रुठना व मनाना
याद है लम्हा
15
आशक्ति जेल
जगमाया का खेल
इंसान बंदी

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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नमन
भावों के मोती
💐💐💐
बचपन के ये खेल तमाशे
हम सबको तब कितने भाते!
इन सिक्कों , गोटी,कंचो से
हम गर्मी की दोपहरी बिताते!
संग मां ,पापा ,दादी खेले
जिससे हम बच्चे न झगड़े!
वो कहाँ गया अपना बचपन
इन खेल खिलौनों का संगम..
जो अब मोबाइल,टी,वी ने लिया
बचपना हमारा छीन लिया !!
💐💐
स्मृति श्रीवास्तव(स्वरचित)
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नमन भावों के मोती
दिनाँक- 24/05/2019
शीर्षक-खेल
विधा-हाइकु

1 .
सियासी खेल
राजनेता खिलाड़ी
कुर्सी की जीत
2.
नट का खेल
मेहनत का काम
दो रोटी वास्ते
3.
दोस्तों का मेल
बचपन के खेल
आज भी ताजा
4.
दिमागी खेल
शतरंज खेलना
आसान नहीं
5.
आँख मिचौली
बचपन का खेल
खेलते बच्चे
6.
अजब खेल
कठपुतली नृत्य
राजस्थान में
7.
धोखे का खेल
वोट की राजनीति
खेलते नेता
********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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नमन मंच🙏
सभी गुणीजनों को वंदन,अभिनंदन🙏😊
दिनांक-24/5/2019
विषय- "खेल"
विधा-बाल कविता
**************
चुन्नु,मुन्नु दो थे भाई,
खेल,खेल में हुई लड़ाई,
मम्मी एक ही गेंद ले आई,
अब तो बड़ी मुसीबत आई |

चुन्नु बोले ये गेंद है मेरी,
मुन्नु बोले ये गेंद है मेरी,
खेलें कैसे दोनों भाई ?
खेल,खेल में हुई लड़ाई |

मम्मी ने दोनों को समझाया,
दोनों को पास बैठाया,
एक,एक दिन दोनों रखना,
जिम्मेदारी को तुम समझना |

जो गेंद को संभालकर रखेगा,
अगला खिलौना उसे मिलेगा,
चुन्नु,मुन्नु को समझ में आई,
खेल,खेल में सुलझी लड़ाई |
😊😊😊😊😊😊😊😊

स्वरचित*संगीता कुकरेती*

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शुभ संध्या
शीर्षक -- (( खेल ))
द्वितीय प्रस्तुति

इश्क का भी खेल बड़ा अनोखा है
मिलता इसमें अक्सर ही धोखा है ।।

हो किस्मत का या कोई और हो 
मगर दिल से जाये न ये रोका है ।।

दूर किसी दुनिया में ले जाये खेल
फूलों को हंसने का सुन्दर मौका है ।।

बेचारों की किस्मत काँटों में लिखी
इश्क उन्हे खुशियों का झरोखा है ।।

इश्क में कुछ बने कुछ बिगड़े हैं 
हमने गलत राह दिल को टोका है ।।

हो कोई खेल उसूल न खोओ 'शिवम'
जीत हार वक्त की हवा का झोंका है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 24/05/2019

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भावों के मोती दिनांक 24/5/19
खेल

खेल है 
जिंदगी 
खिलाड़ी हैं 
सब
डोर है 
पास उसके
नाचते हम

सुख दुःख 
है दुनियां में 
छोड़ो  सब
उस पर, 
खेल है 
निराले उसके 
कभी दे खुशी
तो कभी गम

स्वलिखित लेखक
 संतोष श्रीवास्तव  भोपाल

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भावो के मोती
नमन
विषय-खेल

जिंदगी एक खेल ही हो है
जिसमे किसकी हार होगी
और किसकी जीत तय नही है

खेल में नियम बहुत है
पर ऐसा कौन है
जो उन नियमो को तोड़ कर
खेल में जितने का प्रयत्न नही करता है
पर असल मे जीतता वही है
जी नियम के साथ खेलता है

आज की इस जिंगदी में लोग 
खेल ही तो खेल रहे है
कोई किसी की भावनाओ के साथ
कोई किसी की मन सम्मान के साथ
कोई अपने को कहा उठाने के लिए
कोई दुसरो को नीचा गिरने के लिए

पर सब लोग मंद में अंधे हो कर भूल जाते है
खेल जितना भी खेलो 
खेल की असली डोर ऊपर वाले के हाथ है
जो सब देखता है
ओर अंतिम निर्णय वही लेता है
जिंदगी की इस खेल में जितना उसी को है
जो उसका असली हकदार है

स्वरचित
दीपिका मिश्रा

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नमन मंच 
विषय: खेल 
विधा हाइकू 
२४/०५/२१९ 

कर्म हो पूजा 
अंत पास या फेल 
भाग्य का खेल !!

धूप में वर्षा 
नियति रचे खेल
मेल बेमेल !!

ईश से मेल, 
स्पष्ट , सत्य, सरल  
बच्चो का खेल !!

स्वरचित: डी के निवातिया

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नमन भावों के मोती 
विषय - खेल 


जीना सिखाये   
बचपन के खेल 
सबसे मेल 


वक्त वजीर 
नियति खेले खेल 
अनोखी जेल 


गठबंधन 
राजनैतिक खेल 
जोड़ी बेमेल 


श्वासों का खेल 
सुख दुख की रेल 
क्षणिक मेल 


वक्त का खेल 
राजा, रंक, फकीर 
भाग्य जंजीर 


छल का खेल 
स्वार्थ की राजनीति 
हार के द्वार 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई  (दुर्ग )

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शुभ साँझ 🌇
नमन "भावों के मोती"🙏
24/05/2019
हाइकु (5/7/5)   
विषय:-"खेल "

(1)🌙🌍
हारे न जीते   
खेलते रस्साकस्सी 
चांद -धरती  
(2)⛅️
नभ आँगन 
मेघ-रश्मि खेलते 
आँख-मिचौली 
(3)🎾
झूठ का  खेल 
जीवन के मैदान 
हारती आत्मा 
(4)🎳
कीचड़ फेंक 
राजनीति खेलती  
अजीब खेल 
(5)🌳
स्वार्थ का खेल 
पर्यावरण हारा 
तोड़े नियम 
(6)😒
रिश्तों ने खेले 
भावनाओं के खेल 
हृदय टूटे 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

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24/5/19
भावों के मोती
विषय- खेल
__________________
ज़िंदगी के खेल में
कभी हारते कभी जीतते
देखें जीवन के रंग अनेक
जन्म लेता है मानव
जीवन की पहली पारी में
असहाय सा पड़ा
कभी रोकर कभी हँसकर
अपने भावों को व्यक्त करता
खिलौने की तरह
कभी इस गोद कभी उस गोद
प्यार के साए में बढ़ता
थोड़ा बड़ा होते ही
दूसरी पारी शुरू होते ही
जुड़ने लगती माँ-बाप की इच्छाएं
कंधों पर बस्ते का बोझ
बचपन कहीं गुम होने लगता
प्रथम आने की सबको आस रहती
तीसरी पारी में
तो मंज़िल की तलाशते
सपनों को पूरा करने
निकल पड़ते घर से दूर
तकलीफों को सहकर सफल होते
घर बसाकर जीवन की नई शुरुआत करते
चौथी पारी में
अपने सपने तो कहीं दफ़न हो जाते
बच्चों की ख्वाहिशें पूरी करने में
माता-पिता को खुश करने में
रिश्तों को टूटते हुए देख 
खुद को हारता महसूस करते
अंतिम पारी में
एक बार फिर असहाय से पड़े
कभी रोकर कभी हँसकर
अपने भावों को व्यक्त करते
कभी प्यार कभी तिरस्कार सहते
एक बोझ के जैसे 
जीवन को लगते हारने
ज़िंदगी के खेल निराले होते हैं
***अनुराधा चौहान***©स्वरचित✍

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🙏🌹जय माँ शारदा 
..सादर नमन भावों के मोती 
दि.- 24.0519
विषय - खेल
विधा-स्वतंत्र ...(गीत)....
************************************

जिंदगी  है खेल इसे  खेलना ही सार है |
हौसला ही तेरी जीत हार का आधार है ||

जिंदगी के खेल में तू कहाँ अकेला है | 
देख ले  जरा प्यारे  लगा यहाँ मेला है || 
सब  यहाँ  तैयार  हैं  क्या  तू तैयार है | 
जिंदगी है खेल इसे खेलना ही सार है ||

मन से जो हार गया कुछ भी न पाएगा |
जीवन का  गीत  बता कैसे  गा पाएगा || 
हिम्मत  ही  तेरी  जीत  का  आधार है | 
जिंदगी है खेल  इसे खेलना ही सार है ||

जीत के उन्माद में तू हार को न भूलना |
दंभ  अभिमान की  बाहों में  न झूलना ||
नाम  वो  कमा  पाया जो  रहा उदार  है |
जिंदगी  है  खेल से  खेलना  ही  सार है ||

सत्य न्याय के पथ पर हार भी मिली अगर |
करना  स्वीकार  उसे होगी  आसान  डगर ||
मान  ले  ये  बात सरस  मानता  संसार  है | 
जिंदगी  हैे  खेल  इसे  खेलना  ही  सार  है ||

जिंदगी है खेल इसे खेलना ही सार है |

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            #स्वरचित 
             प्रमोद गोल्हानी सरस
              कहानी सिवनी म.प्र.
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नमन
भावों के मोती
24/5/2019
विषय-खेल

किस्मत के खेल,
बड़े ही निराले हैं।
रंक बने‌ राजा,
राजाओं के निकले दिवाले हैं।
सोचता है क्या,
और सामने क्या आता है
किस्मत से इंसान,
बाजी हार जाता है।
हुए भी कुछ विरले,
जिन्होने पासे पलट डाले हैं।
खेलते जो खतरों से,
वे बड़े ही दिलवाले हैं।
जीवन के खेल में,
सबसे आगे चलने वाले हैं।
जो खेलने से डर गए,
उन्होंने सदा हथियार डाले हैं।
जिंदगी के खेल भी,
बड़े अजब-निराले हैं।
सुख-दुख यहां,
बराबर डेरा डाले हैं।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक
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नमन भावों के मोती 
24-5-2018
विषय:- खेल 
विधा :- कुण्डलिया 

लुक्का छिप्पी खेलते , उम्र गई है बीत ।
जितनी ख़ुशियाँ थी मिली ,गई सभी हैं रीत ।।
गई सभी है रीत , याद बचपन है आता ।
ले काग़ज़ की नाव , बीत सारा दिन जाता ।
होती जब तक साँझ , बने रहते थे गिप्पी  ।
आता है अब याद , खेलना लुक्का छिप्पी ।।

Gippy =अधिक खाने वाले अथवा हुड़दंग ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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नमन भावों के मोती 
विषय - खेल
24/05/19
शुक्रवार 
कुण्डली छंद 

सच्चाई  ने  जीत  का ,  पहना  फिर  से ताज।
खेल सियासत का यहाँ, खत्म  हो गया आज।।
खत्म  हो गया आज   ,भाजपा ही अब आयी।
भारत - भू  भी आज  , धन्य  होकर  मुस्कायी।
सभी दलों ने मिलकर ,  हर   नीति    अपनाई।
और  अंत   में   जीती , हृदय   की    सच्चाई।।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर

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नमन् भावों के मोती
24/05/19
विषय-खेल
विधा-हाइकु

अजब खेल
कुदरत कहर
जीव संकट

मनुष्य खेल
प्राकृतिक विनाश
प्रकृति रुष्ट

बच्चे खेलते
क्रिकेट का मैदान
साँझ प्रहर

खेल भावना
हार जीत विरक्त
प्यार सद्भाव

पांसे बनाते
शतरंज की चाल
जीवन खेल

अंकों का खेल
राजनीति का मंच
लोकतंत्र में

मनीष श्री
स्वरचित
रायबरेली

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, खेल,
दिन, शुक्रवार,
दिनांक, 24,5,2019,

खेल व्यायाम
सबसे सुन्दर व्ववहारिक
मित्रता बनाये । 
शरीर स्वस्थ बनाये । 
बचपन के खेल
आते हैं याद
छुपा था उनमें
स्नेह दुलार । 
कितना था अपनापन
आपस में प्यार।
जीवन का खेल
बड़ा अजीब । 
सुकूँन की तलाश
आदमी बेतहाश  । 
खेलता है खेल
आजीविका के लिए
रिश्तों के लिये
मोहब्बत के लिए
मंजिल के लिऐ
नहीं मिलता करार
सब खेल बेकार। 
अभिलाषा जगत
अनुपम अपार
वैचारिक भिन्नता
खेल बिगाड़े । 
ईश्वर का खेल
चलता निरंतर। 
कठपुतली मानव
नाचे उम्र भर
आत्मा की आवाज
जब दे साथ। 
जीवन के खेल में
जीत की आस
प्रभु से मिलन
विजेता के हाथ। 
हर खेल का यही रिवाज
संयम समर्पण
जीत का आगाज ।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,
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नमन  मंच
विषय  खेल
24/5/2019 शुक्रवार
जीवन का है अद्भुत खेल 

मन की इच्छाओं के नाग
डस जाते जीवन की आस
लगा जाते जीवन में आग
सांप .कभी सीढी का मेल 
जीवन का है अद्भुत खेल 

कभी बसे आशाओं के गांव 
बन जाते वो मन की ठावं 
कभी करे यह डगमग नाव 
यह  धूप  छांव  का  मेल
जीवन का है  अद्भुत खेल 

नैनो की  कोर पर अटके 
खुशियों  में भी है छलके
भाव यूँ  अनमोल बहके 
सुख-दुख की दस्तक का मेल 
जीवन  का  है अद्भुत खेल

मीनाक्षी भटनागर
स्वरचित

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"हार-जीत"23मई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
                                    ब्लॉग संख्या :-395
नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक      हार ,जीत
विधा        लघुकविता
23 मई 2019,गुरुवार

हार होती हृदय हताशा
जीत है मेहनत की धारा
जिसने लक्ष्य ठान लिया
जीवन उसका है पौबारा

हार जीत जीवन चक्र है
बुरे भले सब जग में रहते
जिनने की है कड़ी तपस्या
वे नर जग में आगे बढ़ते

जीवन संघर्ष चलता रहता
कोई जूझते कोई रोते
अपने ही कर्मो के कारण
वे सदा जीवन में खोते

हार जीत जीवन भर होती
ईमानदारी और जग सेवा
जो करते हैं सदा परिश्रम
जीवन भर पाते नित मेवा।।
स्व0 रचित ,मौलिक
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।
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सुप्रभात "भावो के मोती"
🙏गुरुजनों को नमन🙏
🌹मित्रों का अभिनंदन🌹
23/05/2019
   "हार-जीत"
################
जीत की खुशी से अहं मन में आया यदि,
सफलता हारकर ठहर जाएगा वहीं ।

हार से टूटकर बिखर न जाना कहीं,
हार के बाद ही मंजिल जीत की मिलेगी वहीं ।

हार-जीत में उलझना न ऐ जिंदगी,
हार कर ही जी ले तू ऐ जिंदगी।

दिल हारकर खुशी जो मिली है हमें,
जीतने की खुशी न मिली हो कभी।

मिला है मुझे जो नसीब में मेरा था,
हार-जीत का न कोई सिलसिला यहाँ था।

दिल हारकर मुस्कान जो मिला था,
जीत की खुशी अश्कों में घुला था।

जो तू मिल जाए तो हार जाँऊ मैं खुद को,
समझूँ रब ने मेरी किस्मत फुर्सत से लिखा था।

अपनी तकदीर से जीता था जो जहां,
हार गई उसी से जो मुकद्दर मेरा था।।

स्वरचित पूर्णिमा साह(भकत)
पश्चिम बंगाल

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नमन मंच-भावों के मोती
दिनांक-23.05.2019
शीर्षक- हार-जीत
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कर्त्तव्यनिष्ठ बन रहे मनुज यह हार-जीत किस्मत का प्रतिफल ।
पुरुषार्थ में लक्ष्य निहित है यह कब है दौलत का प्रतिफल ?
बहुधा यह देखा है हमने कायरता पीछे कर देती ,
वही गले जयमाल पहनता जिसपर है हिम्मत का प्रतिफल ।।
🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺🔺
परिभाषित कैसे कर पाऊँ मैं जिस पर विचार भटका है ।
किन्तु पहुँचना उस सीमा तक जिसमें स्वाभिमान अटका है ।।
स्पष्टवादिता से कहदूँ अब हार-जीत पर दृष्टि गढ़ाकर,
पहले तुम ने क्यों न बताया मुझको  शब्द आज खटका है ।।
====================
भवदीय- "अ़क्स" दौनेरिया

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हार-जीत का प्रश्न नही है, बात है बस विश्वास की।
समय बदलता रहता है जब, निश्चय क्या  इस आस की।
....
आज हार है कल जीतेगे, कर्म की गति बेहतर कर लेगे।
हार-जीत का जो अन्तर है, कर्म के रथ का वो मन्तर है।
...
ना करना अभिमान जीत का, हार पे दुखी नही होना।
शेर की कविता पढा करो, जीवन अनन्त सुख मे होगा।
..
शेरसिंह सर्राफ

@@@@@@@@@@@@@@

।। हार-जीत ।।

जीत का सेहरा उन्हे मिला जो हारे हैं
हार कर वह भाग्य अपने संवारे है ।।

गिर कर उठना होता वह जान गये 
आज सफलता देखो उनके द्वारे हैं ।।

हमने हर हार में चिन्तन मनन किये
न मायूस हुए न आँसुओं को डारे हैं ।।

असफलता की सीखें रखे जिह्न में 
स्वयं प्रकाश पाये भये उजियारे हैं ।।

सारे घाव सारीं चोटें दिखीं बदलते 
सदा न रहे यहाँ कोई गम के मारे हैं ।।

चीटी चढ़ी पहाड़ कछुआ बाजी मारे 
हिम्मत लगन 'शिवम' मित्र हमारे हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 23/05/2019

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23मई2019
हार जीत
💐💐💐
नमन मंच।
नमन,वन्दन गुरूजनों,मित्रों।
🙏🙏🌹🌹
कब किसकी जीत हो,
कब किसकी हार हो।
ये तो कोई जाने ना।

जो हार जीत होती है किसीकी,
वो सिर्फ प्रभु के हाथ है,
सिर्फ कर्म मेरे साथ है।

जो होगा,देखा जायेगा,
हार जीत से डरना कैसा।

सत्कर्म करने बाले जीतते हैं बाजी,
यही सबक याद रखना सदा।
💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी
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भावों के मोती दिनांक 23/5/19
हार जीत 
विधा - हाइकु 

कठिन रास्ते 
जिन्दगी है मुश्किल 
है हार जीत

करो संघर्ष 
हार बदले जीत 
रखो संतोष 

हार जीत में 
उलझता इन्सान 
खेल  निराला 

परेशानी   में 
भटकती जिन्दगी 
है हार जीत 

स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल

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नमन मंच भावों के मोती
शीर्षक-हार/जीत
विधा-दोहे
दिनांक-23/05/2019

हार जीत को सोचकर, करो नहीं आराम।
कर्म धर्म अपनाइये ,रजनी हो  या याम।।

हार बदलती जीत में, करो सकल संघर्ष।
 शूल बदलते फूल में, मिले चरम उत्कर्ष।।

मन का क्षोभ मिटाइये, कभी न करिए खेद।
हार मिली तो क्या हुआ, मिला जीत का भेद।।

जीत मिली तो क्या हुआ, मन को रखिए थाम।
मन घोटक की टाप पर, कसिये एक लगाम।।

शालिनी अग्रवाल
स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित
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तिथि - तेईस/ पांच/ उन्नीस
विषय - हार जीत

थक गई हूँ
बहुत लड़ते लड़ते
लगता है
हार चुकी हूँ
खुद से
हालात से
परिवार से, समाज से
कैसी लड़ाई है ये
समझ नहीं पाती
कब हारी और
कब जीती हूँ
मन विद्रोह करता है
रूढ़ियों और परंपराओं का
कभी कभी
जी चाहता हूँ
उड़ जाऊं 
किसी अनजान नभ में
चल पडूं अकेली 
किसी सुनसान डगर पर
लड़ूँ एक लड़ाई खुद से
और जीत लूँ खुद को
अगर तुम साथ हो
कर सकती हूँ मुकाबला
किसी भी तूफान से
बदल सकती हूँ
अपनी हार को
सुनिश्चित जीत में
आओ साथ मेरे
थमा जाओ
विजय पताका
मेरे हाथ में
पलट कर न देखें 
किसी हार को हम
सामने हो
मदिर बयार सी
मन शीतल करती
जीत हमारी

सरिता गर्ग
स्व रचित
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माँ शारदे को नमन,
सुप्रभात भावों के मोती
दिनांक-२३/५/२०१९
"शीर्षक-हार जीत"
जीत मिले या हार मिले
दोनो हो हमें स्वीकार
हार जीत तो जीवन के संग
दोनो को ले सहजता से हम।

अभिष्ट नही तो जीवन कैसा?
यह नही है सही सोच
जीत हार के आगे भी दुनिया
इसे क्यों भूल जाते लोग?

अकर्मण्य न हो बैठे हम
सतत प्रयास करें हम
ये जीवन है रजतपट नही
इसे सदा याद रखें हम।

याद करें अपने कर्मठता को
जीत मिलेगी और मिलेगा लक्ष्य
हार से सबक मिले हमें
क्यों पीछे छूट गयें हम।

उस कमी को पूरा करके 
जीत जायेंगे फिर से हम।
हार जीत तो जीवन के अंग
इसे न भूल जाये हम।
  स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव ।

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23/5/19
भावों के मोती
विषय- हार-जीत
__________________
हार-जीत की होड़ मे
हम खड़े किस मोड़ पर
रिश्तों को लगातार दांव पर
अहम और वहम की जंग में
हारती ज़िंदगी अपनों के संग
न कोई कम न कोई ज्यादा
फिर भी कैसा है दिखावा
एक-दूसरे को दिखाएं नीचे
कैसे हैं आजकल के रिश्ते
क्या घर क्या बाहर मची एक होड़
हम श्रेष्ठ की नीति से लगाएं दौड़
जीतकर भी हार जाते हैं
जब अपनापन खो देते हैं
अपनों की भीड़ में अकेले खड़े रहते हैं
अहम के घोड़े पर सवार होकर
हाथों में लालच की तलवार लेकर
सही ग़लत को जाते हैं भूल
सच्चाई को हरा जीत जाते हैं झूठ
हराना ही है तो बुराई को हरा दो
ज़िंदगी को भलाई के काम में लगा दो
रहेगा सदा होंठों पर नाम सबके
लाखों की भीड़ में सबसे हटकर
अहम को हटाकर वहम को मिटा दो
नफ़रत मिटा प्यार को जगह दो
***अनुराधा चौहान***© स्वरचित©

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नमन भावों के मोती मंच 🙏
दिनांक - 23/05/2019
वार - गुरुवार
विषय - हार - जीत

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       हार - जीत

हार-जीत से क्या घबराना,
       यह तो आनी - जानी है।
स्थितप्रज्ञ रहना हरदम,
         जीवन बहता पानी है।

धूप-छाँव की आँख मिचौली,
               राजा रंक सभी देखे, 
कर्म का फल खट्टा-मीठा,
              है ये नियति के लेखे।

सामने तूफां को पाकर,
               बैठ हार नहीं जाना, 
हिम्मत के बल बढ़ते जाना,
      लक्ष्य शिखर को पा जाना।

सीधे रास्ते चल कर के,
         मंजिल पास नहीं आती,
मिल जाये जो बिना परिश्रम
      वह जीत स्वाद नहीं पाती।

अगर कहीं किसी मोड़ पर,
            सामना हार से हो जाए,
हाथ मिलाकर मुस्कुराओ कि,
       हार भी तुमसे हार ही जाए।

पाकर जीत नहीं इतराना,
  जो विनित सरल बन जाओगे,
सच कहती है उषा तुमसे,
      तुम जीत दुनिया जाओगे।

स्व रचित
         डॉ उषा किरण

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कहीं जीत कहीं हार लगती है।
ये जिन्दगी इश्तिहार लगती है। 

अभी भी मुझपे  असर है तेरा।
जो  न उतरा  खुमार लगती है। 

थी  लडकपन  की  भूल  मेरी। 
जवां  पहला  बुखार लगती है। 

कभी लगती के कमाई नफरत। 
तो कभी खोया प्यार लगती है। 

मै उसे  रोज ही  याद करता हूँ। 
ये बात  उसे नागवार लगती है। 

मुझे शायद  न होश आए  अब। 
वो खिंजाओं मै बहार लगती है। 

हूँ  सरोबार  जिसमें आज तक। 
बस वही गर्दो - गुबार लगती है। 

जिनसे खेले थे हम कभी रोज। 
वही मुश्किलें बेशुमार लगती है। 

                       विपिन सोहल

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नमन
भावों के मोती
२३/५/२०१९
विषय-हार-जीत

मन के हारे हार है,
मन के जीते जीत।

जिसने जीत लिया मन को
संकट उसके मीत।

हार न मानें वो कभी,
चाहे संकट में हो प्राण।

मन के बल से वो करे,
हर मुश्किल आसान।

स्वाभिमान की वो बने,
जीती-जागती मिसाल।

पुरूषार्थी बनकर सदा,
समय की बदले चाल।

चलता सीना तान कर,
जीते जीवन की जंग।

मस्ती में डूबा रहे,
बनकर रहे मलंग।

बाजी वो न हारता,
खेले मुश्किल खेल।

विकट परिस्थितियों,
से बैठाता तालमेल।

गहरे पानी पैठकर,
ढूंढ के लाता मोती।

अपने आत्मबल से,
जीत उसी की होती।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

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भावों के मोती
23/05 /19
विषय - हार-जीत

फतह तो किले किये जाते हैं
राहों को कौन जीत पाया भला
करना हो कुछ भी हासिल
कुछ खोना कुछ पाना हो
चाहे हो सिकंदर कहीं का
इन्ही राहों से जाना हो
कोई हार के दिल
जीत गया विजेताओं के
कोई जीत के हार गया
सम्मान आंखों से
क्या हारा क्या जीता का
हिसाब बहुत ही टेढ़ा है
जीत हार का मान दंड
सदा अलग सा होता है
सभी जीत का जश्न मनाते
हार गये तो रोता है
नादान ऐ इंसान हार जीत में
कितने रिश्ते खोता है
अपना दिल हार के देखो
संसार तुम पर हारेगा
महावीर ने जग हार कर
सिद्धत्व को जीत लिया
जग में कितने जीतने वालों ने
अपना मान ही हार दिया
तो क्या जीता क्या हारा
आंकलन हो बस खरा खरा।

स्वरचित
कुसुम कोठारी।

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नमन भावों के मोती,
आज का विषय, हार जीत,
दिन, गुरुवार,
दिनांक, 23,5,2019,

संघर्ष नाम है जीवन का, सबको ही करना पड़ता है ।
सिलसिला हमारे जीवन में हार जीत का चलता रहता है।
चलने वाला ही जीवन में गिर गिर कर सम्हलता है।
मंजिल की चाह जिन्हें होती ठोकर भी खाना पड़ता है।
फूलों की सेज किसे मिलती खुद काँटे चुनना पड़ता है ।
 जीवन में कुछ पाने के लिए हार कर जीतना पड़ता है ।
थक कर जो बैठ गये रहों में हार का सामना करना पड़ता है।
जीवन जीने के कौशल को नहीं कभी समझने पाता है ।
विरासत में मिलीं सुख सुविधाओं का आनंद नहीं कुछ आता है।
जो कुआँ खोद कर पीता है वही प्यास समझने पाता है।
यहाँ जीत उसी को मिलती है जो नजर लक्ष्य पर रखता है ।
सतत निर्भय होकर चलने वाला हासिल जीत को करता है।

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,


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🙏🙏🌺🌹"नमन भावों के मोती"
विधा-छंद मुक्त कविता
विषय-हार/जीत
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हार और जीत में , क्या रखा ऐसी प्रीत. में
द्वेष को मिटादे ,लग जाओ ऐसी रीति में

शब्दों में भरो वो स्वर तान छिड़े संगीत में
दे दो शंख नाद स्वर ,भरे ऊर्जा शरीर में

नेताओं ने पछाड़ा राजनीति की होड़ में
गिरा  रहे ईमान वो राजनीति की दौड़ मे

हार और जीत का फैसला जब दौड़ में
बाँधो कफन सिर झुके वतन-ए - हिंद में
स्वरचित
नीलम शर्मा # नीलू

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नवम भाव के मोती 
 दिनांक- 23 मई 2019
विषय- हार जीत 
 विधा -हाइकु

शराबी  व्यक्ति-
हार जाता जिन्दगी
नशे में चूर

अंकों का खेल
परीक्षा परिणाम-
हार व जीत

मनुष्य कर्म-
प्रयत्न व अभ्यास-
जीत की सीढ़ी

निश्चय लक्ष्य
कठिन परिश्रम-
जीत का द्वार

साहसी लोग
हार कर जीतते-
जीवन अंग

सफल चुनाव
लोकतंत्र की जीत-
राष्ट्र निर्माण

प्रेम सद्भाव
हार और जीत में-
खेल भावना

अंकों का खेल
लोकतंत्र की नींव-
जीत व हार

जीतना तय
भरोसा स्वयं पर-
संघर्ष कर्म

स्वरचित
मनीष श्री
रायबरेली

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नमन भावों के मोती 
विषय - हार-जीत 
23/05/19
गुरुवार 
कविता 

लोकतंत्र  का  पर्व  आज  फिर  हार- जीत  के नाम रहा,
किसी  पक्ष  को जीत  मिली तो कोई पक्ष  नाकाम रहा।

हार -जीत  का चक्र  जगत में  प्रतिपल  चलता  रहता है ,
जिससे मानव मन पर दुख-सुख भी प्रतिबिंबित रहता है। 

जो  भी  समय  सिखाता ,उसको  मन  से अंगीकार करें,
विजयी  होकर  रखें   धैर्य , न  प्रतिपक्षी  पर   वार  करें।

हार   सदा  व्यक्ति  को  चिंतन और  मनन सिखलाती है, 
अपनी  त्रुटियों  को  सुधारने  का  सत्पथ  दिखलाती  है।

इसीलिए  इस   हार- जीत  से  जीवन  गतिमय  रहता है,
मानव  इनसे  प्रेरित  होकर   सतत  कर्म-पथ  गहता  है।

स्वरचित 
डॉ ललिता सेंगर
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भावों के मोती
शीर्षक- हार-जीत
हार में भी जीत है
अगर दिल में प्रीत है।
गम में भी खुशी है
अगर साथ में मीत है।

अपनों के अपनेपन से
अमर जीवन संगीत है।
तु खुश तो मैं भी खुश,
यही हृदय का गीत है।
स्वरचित
निलम अग्रवाला, खड़कपुर


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शुभ संध्या
शीर्षक -- ।। हार-जीत ।।
द्वितीय प्रस्तुति

क्या रखा हार जीत के खेल में 
एक आदर्श जीवन का पाठ पढो ।।

जीत से ज्यादा सुख पाओगे 
उन उसूलों को तुम आज गढ़ो ।।

सफलता पाकर भूल से भूलें सब
राहें हैं कुछ उनका अहसास करो ।।

आदर्श जीवन राम का अनुकरणीय
जीत के सब आसार बने याद करो ।।

आज हम आदर्शवादिता भूलें हैं
आदर्शवादी बनो इसका जाप करो ।।

जीत का सेहरा पाकर न कोई 
राज खुले, खुद पर इंसाफ करो ।।

गलत राह जीत मिले वो जीत नही
जानो और अपना दामन पाक करो ।।

राम अमर हैं अमर रहेंगे जीत को
कितने न पाये मनमें ये उजास भरो ।।

ऊँचाइयाँ  वैसे 'शिवम' बहुत छुईं
पर मानवता खोए पश्चाताप करो ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 23/05/2019

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भावों के मोती
23/05/19
विषय - हार-जीत
द्वितीय प्रस्तुति 
विधा हाइकु 

हार औ जीत
यही जग की रीत
थोड़ा ठहर।

लगा है देखो
हार जीत का मेला
दिनों का खेला।

दिलों में रह
बना सबको मीत
क्या हार जीत।

जग को जीत
सबको अपना बना
न रह तन्हा ।

रे मनु मुर्ख
हार जीत में रोता
आपा क्यों खोता।

स्वरचित
कुसुम कोठारी।
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नमन भावों के मोती 
23/5/2019
विषय : हार जीत 
जीवन को कुछ 
                       यूँ आकार दो
सपने सब नहीं
                     पर कुछ तो साकार हो
पल-पल भले ना
                        ख़ुशियों की भरमार हो
पर कभी-कभी
                    इस मन का भी सत्कार हो
बिछड़ना चाहे बार-बार हो
              पर सच्चा प्यार तो एक बार हो
जीतना चाहे बार-बार हो
             पर एक बार हार भी स्वीकार हो
क़दम लड़खड़ाये बार- बार
                       पर इरादों की ना हार हो
जीने कै पल सिर्फ़ चार हों
                     पर फिर बाक़ी ना 
जीवन का कुछ उधार हो
        जीना मरना चाहे बार- बार हो
पर हिम्मत की कभी ना हार हो
                                   शेहला जावैद

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नमन मंच 
विषय हार जीत 
२३/०५/२०१९
!
हार जीत  के  खेल  में, उलझा यह  संसार,   
जनम मरण के बीच में, जीती जंग अपार,  
जीती जंग अपार, मगर हाथ कुछ न आया,
अंत   हाल  में  देख,  मुटठी  खाली  पाया,
खेला कैसा खेल, आया तनिक न समझ में,
खुद  से  पूछे कौन,  कब  जीते  कभी हारे ।।  
!
स्वरचित: डी के निवातिया

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23-5-2019
विषय:- हार जीत 
विधा :-सार छंद 

जीवन पथ में हार जीत ही , आगे ले जाते हैं ।
इन चप्पुओं से नाव को खे कर , तट पर ले जाते हैं ।।

कभी डूबती दिखती नैया , हिचकोले खाती है ।
कभी किनारा जब दिख जाता , दिल को हर्षाती है ।।

चलते पीछे जो हैं हारें , आगे चलते जो जीतें ।
अपनी नज़रों में गिर जाते  , घूँट जहर का पीते ।।

ढाल पराजय की बनती जब , जीत सदा जाते  हैं । 
अपनी नजर लक्ष्य पर रख कर , भेद उसे जाते हैं ।।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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नमन मंच को
विषय : हार/जीत 
दिनांक :  23/05/2019
विधा   : गीत 

हार - जीत 

जीवन भी इतना नहीं आसां, 
केवल सुख ही नहीं  हैं यहां ।
क्यूँ रोता उसे जो गया बीत है , 
कभी हार मिलती कभी जीत है ।
इस जीवन की यारो यही रीत है ।
कभी हार मिलती कभी जीत है ।
मिले जो भी हारें न होना निराश ।
जीवन का दूजा ही नाम है आस।
टूट न जाना कहीं हार से तुम, 
कदमों पे अपने तू कर विश्वास ।
रात अंधेरी गुजर जाएगी,  
नयी सुबह समझ नया गीत है,  
इस जीवन की यारो यही रीत है ।
कभी हार मिलती कभी जीत है ।
लड़ना भी सीखो  ललकार से
ले ले सबक तू भी हर हार से।
मजबूत हौसले ही जीत हैं, 
जीत ले प्यार या तलवार से।
जीत तो हौसलों की मुरीद है,  
कभी हार मिलती कभी जीत है ।
इस जीवन की यारो यही रीत है ।
कभी हार मिलती कभी जीत है ।
इस जीवन की यारो यही रीत है ।

जय हिंद 

स्वरचित :  राम किशोर, पंजाब ।
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नमन भावों के मोती
दिनाँक- 23/05/2019
शीर्षक-हार, जीत
विधा-हाइकु

1.
हार न माने
प्रयास बढ़ाइए
जीत मिलेगी
2.
जीत की खुशी
आकर गले लगी
मन में बसी
3.
हार व जीत
जीवन के पहलू
रहते चालू
4.
नन्हीं सी चींटी
हार नहीं मानती
जीत पाने को
5.
मन की हार
करे नहीं उद्धार
जीत बेकार
*********
स्वरचित
अशोक कुमार ढोरिया
मुबारिकपुर(झज्जर)
हरियाणा

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"खेल"24मई 2019

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