Saturday, May 12

"खिलोना"-11 मई 2018



खिलौना
याद आते हैं ,बहुत रुलाते हैं।
खेल खिलौने बचपन के।
वो दिन भी क्या दिन थे मेरे।
सारा दिन खेलते रहते।
दोस्तों के साथ मिलजुलकर।
गुड्डे गुड़िया की शादी करते।
वो खिलौना कितना कीमती था।
किसीको भी नहीं छूने देते।
मेरा वो बचपन का खिलौना।
कोई कहीं से ला दे मुझको।
वीणा


क्या हुआ हूं, और मैं क्या होना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 


घर के आगंन मे थी बिखरी हंसी की रोशनी। 
उन खुशी की लडियों को पिरोना चाहता हूं। 

माँ की गोदी से कोई शै, मुझे प्यारी नहीं थी। 
खोई उस जन्नत को फिर से पाना चाहता हूं। 

जिसने चलना सिखाया, चल के मिलने जाऊँ। 
बाबा के कंधे चढ ऊंचा सबसे होना चाहता हूं। 

कितनी यादें बह के आई आसुंओ के साथ मे। 
भाई-बहन संग एक थाली में खाना चाहता हूं। 

रूठ कर बिछडे मेरे अपने, बड़े सब क्यों हुए। 
टूट कर बिखरे ये मोती सब संजोना चाहता हूँ। 

लिख रहा हूँ जाने कैसे हाले दिल मत पूछिये। 
रोके रुके न अश्क, दामन भिगोना चाहता हूं। 

फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 

विपिन सोहल


 ''दिल एक खिलौना"

खेलिये न दिल से ये दिल बड़ा नादान है

आँखें ही जुबाँ हैं इसकी ये बेजुबान है ।

दिल बनाके दाता भी हो गया हेरान है
इक खिलौना बन गया टूटने का सामान है ।।

कोई न करता यहाँ दिल की अब पहचान है
भूल शायद हो गई दाता करे अनुमान है ।।

क्यों इसे बनाया जब कोई न कद्रदान है
तोड़ कर ढूड़े इसे सब दूसरी दुकान है ।।

क्या प्रभु ने सोचा था क्या रहे अरमान है
जिससे मानवता ''शिवम"और ये जहान है ।।

उसी की फिकर न ये कैसा इंसान है 
खिलौना नही दिल इंसानियत की शान है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



खिलौना
🔏🔏🔏🔏

अक
्सर लगता अस्तित्व अपना एकदम ही बौना
मौत के आगे बन जाते हैं हम जब एक खिलौना
यह मेरा नैराश्य नहीं जो बोल रहा
मेरा मन विज्ञान को है तोल रहा। 

हम एकाएक एकदम ही प्रस्थान करते
फिर क्यों इतना स्वयम पर सदा ही अभिमान करते 
बढ़ा चढ़ा कर अपनी शान का गुण गान करते
हम तो एक बुलबुले हैं इसका नहीं ध्यान करते। 

हम अद्भुत खिलौने हैं और हम में जान है
हम से ही चलाती प्रकृति अपना हर अभियान है
हमारी हर श्वास में प्रकृति का सुन्दर गान है
सारी महत्ता है उसकी और उसको साष्टांग प्रनाम है

11/05/2018


वो मिट्टी का चूल्हा चौका,
दिये के तराजू, मिट्टी का बबुआ।
वो ऊँट हाथी घोड़ा,गुड़िया का घरौंदा,

बहुत याद आते वो मिट्टी के खिलौने।
बड़े ही जतन से ,गढ़ गढ़ कर बनाते,
वो हाथ जिनकी कला हमको भाती।
कुम्हारों की मेहनत हमारा,
बचपन सँवारती।
आज सोचती हूँ कितना मेहनत करते,

 वो कलाकार खिलौनों मे जान डाल, देते वो सृजनकार।
बदले में पारिश्रमिक 
बहुत कम मिलता।
अनमोल कला का न मोल मिलता
वो गुड़िया के नैन नक्श,
गुड्डे की टोपी,हाथी का सूँड़।
गणेश जी का मुखड़ा,
लक्ष्मी जी का कमलासन,
क्या खूब गढ़ते।
आओ हम सब एक निर्णय लें,
मिट्टी के खिलौने खरीदें,
उचित मूल्य पर,
कुम्हारों की कला को,
प्रोत्साहन दें।
©प्रीति


विभिन्न लघु विधाओं पर आज के विषय"खिलौना"पर प्रस्तुति।
(हाइकु)5/7/5

इसी का रोना
दिल बना "खिलौना"
खेले जमाना

(ताँका)5/7/5/7/7

मिट्टी "खिलौने"
बच्चे मुँह बिगाड़े 
कोने में पड़े
सूनी पड़ी गलियाँ
डिजिटल दुनियाँ

(सेदोका)5/7/7/5/7/7

कृत्य घिनोना
बच्ची बनी "ख़िलौना"
खेल तोड़ना
समाज के आँगन
भेड़िये का घूमना

पिरामिड

ये 
न्यारे
"खिलौने"
हठ याद
स्वप्न हजार
समाया सँसार
बचपन का प्यार

(चोका)5/7/5/7


मुस्काती यादें
बचपन खिलौने
बुने सपने
मुट्ठी में थी दुनियाँ
मिट्टी घरौंदा
जिद्द व मनुहार
वो तुनकना
चहकती गलियाँ

ऋतुराज दवे

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