Saturday, May 12

"कल्पना"-11 मई 2018




मन ये करता है मैं भी परिंदा बनूँ,
नीले अम्बर मे ऊंची उडाने भरूँ।
उडके तेरे पास आऊं औ तुझसे मिलूँ,

दिल की बातें करूँ ,
जी को हल्का करूँ।
ज़मी पर नहीं आसमां मे मिलूं,
चाँद तारों की झिलमिल शमाँ मे मिलूँ।
चाँदनी रातों मे तुझको ,
जी भर के देखूँ।
पास बैठूँ तेरे खुल के हँसू।
मन ये करता है मैं भी परिंदा बनूँ।
सारी बाधाएं तोड़,
ऊचाइयों को छू लूँ।
नामुमकिन को मुमकिन बना के रहूँ,
जाति धर्म का भेद मिटा के रहूँ।
सरहदों मे सौहार्द फैला के रहूँ,
भाईचारे का जज्बा जगा के रहूँ।
ग्यान की ज्योति फैला के रहूँ।
प्यार की गंगा बहा के रहूँ।
मन ये करता है मैं भी परिंदा बनू।
तिनके तिनके को चुन कर,
घरौंदा बनाऊं।
बुन बुन के ख्वाबों से,
उसको सजाऊँ।
प्यार का कोई गीत,
उसमें मैं गाऊँ।
दुख की काली रातें भुलाऊँ,
आशा की किरण मैं,
उसमें खिलाऊँ।
खुशियों का चमन,
मैं उसमें लगाऊँ।
रजनीगंधा की खुश्बू,
उसमें फैलाऊँ।
गुनगुनी धूप सुख की,
उसमें खिलाऊँ.
सुख का सवेरा,
मनभावन मैं लाऊ,
मन ये करता है मैं भी परिंदा बनूँ।
©प्रीति

 कहूँ एक बार फिर मै मेरा मन प्राण तुम हो।
तुम्ही आविर्भाव मेरा और अवसान तुम हो।


विचारों में विचरती कल्पना के रंगों में रंगी। 
निश्चिन्तता का योग और अनुमान तुम हो। 

पुष्प सी सज्जा लिए सुगन्धा हो मकरन्द सी। 
उपमा अप्रतिम लावण्य की उपमान तुम हो।

वाणी से अर्पित गीतांजलि तुम हो आराधना। 
साधना का मेरी उत्कर्ष हो उत्थान तुम हो। 

आरती हो पूजा हो तुम अर्चना का हो सुमन। 
मन के मन्दिर की हो प्रतिमा प्रतिमान तुम हो। 

स्नेह की वर्षा हो तुम ही गीतिका तुम रागिनी। 
मन की मर्यादा का मान हो अभिमान तुम हो। 

मन की वीणा के स्पन्दन में बसा अनुराग हो। 
श्रंगार हो तुम छन्द के प्रणय का गान तुम हो। 

विपिन सोहल


आज के शीर्षक - कल्पना......पर देखिए मेरे दिल की कल्पना................... बरामदे की धूप

विस्मृति के क्षणों की गांठे खोल लूं आज कुछ पल

समय से चुराकर ले आऊ इस धूप की चादर पर
कुछ देर बैठूं और सुस्ता लूं अपनी अधूरी कल्पनाऐं
और फिर से दो पल को जी लूं बरामदे की धूप को।

अरगनी पे सुखा लेती हूं सीलते भीगे नयनों के छंद
कुनकुनी गरमाहट में सेंक लूं सर्द दिल के अरमान।
अलाव की आंच दिखा ही दूं हथेली की लकीरों को
’शायद! गीली पांखुरी से किस्मत ओस सी झर जाये।

दो पल कुछ रिश्तों की उधड़ी बखिया भी सिल लूं
रोशनी में पाट लूं मन में पड़ी गहरी जर्र दरारों को
धूप की अठखेलियां देखूं सीढियों पे यूं चढते उतरते
छूकर देखूं अपनी छाया के बनते मिटते पहाड़ों को।

कुछ बतिया लूं सौरभ में अपनी पिघली सांसो संग
कर लूं आलोकित नेह नेह सा बिखरा खोया तन
’श्वेत वसन से ढक काया को अंगड़ाई लेती हुयी 
मखमली ऊन संग अंतस के भी धागे सुलझा लूं। 
कुछ देर बैठूं और सुस्ता लूं अपनी अधूरी कल्पनाऐं
और फिर से दो पल को जी लूं बरामदे की धूप को।

-----डा.निशा माथुर/8952874359

शीर्षक : कल्पना

मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना
हां मैं हूं कल्पना
मैं ख्यालों में
उकरती हूं उभरती हूं
और मिट जाती हूं
सुन्दर हूं सतरंगी भी
बहुत भागती हूं
और बिखर जाती हूं
हां मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना

तृष्णा का ज्वार हूं
प्रेरणा का आधार है
प्रगति का द्वार हूं
सतत् व्यवहार हूं
हां मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना

समझो तो काया हूं
न समझो तो माया हूं
समझो तो शूल हूं
न समझो तो धूल हूं
हां मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना

हूँ मैं भिन्न भिन्न सी
प्रेम भी प्रपंच भी
पुण्य भी प्रचण्ड भी
आगाज़ भी उत्थान भी
हां मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना

जीवन का वेग हूं
सृजन का संवेग हूँ
कर लो अराधना
समझ ईश साधना
हां मैं हूं कल्पना मस्त मलंग अल्पना

स्वरचित मिलन जैन


 ''कल्पना"

सर फटने लगता जब गम से

तब हो जाते हम नरम से ।।

भले कल्पनाओं में सही उड़कर आते 
थोड़ी देर को ही सही ये बोझ घटाते ।।

क्या अच्छा क्या बुरा पल भर जाते भूल
खुद के प्रति वफादारी करते कुबूल।।

वक्त की ही तो बात है ये बदलता है
सम्हाले नही सम्हला जो सम्हलता है ।।

कल्पना भी उस ईश्वर देन है
समझिये ''शिवम"क्यों बैचेन है ।।

मानव को ही ये सुविधा उपलब्ध है
शायद ये मानव का कोई प्रारब्ध है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

भावों के मोती 
शनिवार 12/5/18
विधा - काव्य 

शीर्षक - कल्पना 

मैं बन जाऊं अलादीन 
या मिल जाए चिरागे जिन 
उसे रगड़कर जिन को बुलाऊ
जोर-शोर से हुकुम सुनाऊं 
सुनो जिन ये काम करो जी 
कूड़ा करकट साफ करो जी 
मेरी धरती को चमका दो 
सुंदर प्यारा स्वर्ग बना दो 
नदियों को पानी से भर दो 
जगह जगह हरियाली कर दो 
सबको दे दो एक एक घर 
कोई न भटके इधर-उधर 
न कोई भूखा न कोई प्यासा 
हर एक चेहरा खिला खिला सा 
बजे हर तरफ चैन की बीन 
अगर मैं बन जाऊं अलादीन ।

सपना सक्सेना 
ग्रेटर नोएडा



मैं चाहूँ,
ऐसा संसार।
सत्य के परे,

स्वप्न के उसपार।।
.
.जहाँ मैं रहूँ,
तुम रहो,
और रहे हमारा प्यार,

.प्रातः ही तुम कमल,
बनकर खिल जाओ,
भ्रमर बनके मैं,
तुझसे लिपट जाऊँ।
तुम मेरे प्रेम में,
बहक जाओ,
मैं तेरे गंध से,
महक जाऊँ।

खो दूँ मैं सुध-बुध,
अपना सर्वस्व तुम भी,
करदो तत्पर,
तुम्हारी कोमल काया पर,
मैं कर दूँ सर्वस्य न्योछार....

मैं चाहूँ,
ऐसा संसार।
सत्य के परे,
स्वप्न के उसपार।।

दोपहर में जब तीक्ष्ण हो,
रवि का प्रकाश,
लु में जल रही हो,
धरा आकाश।

तब तुम अपनी,
आँचल की छाँव में,
सुलाओ मुझे,

शीतलता अपनी नेत्रों,
से पिलाओ मुझे।

तुम्हारे प्रेम में मैं,
सगुण साधक,
हो जाऊँ निराकार.....

मैं चाहूँ,
ऐसा संसार।
सत्य के परे,
स्वप्न के उसपार।।

संध्या में जब,
रवि छिप जाये,
बादलों की ओट में,
हो जाये धरा पर,
तिमि प्रसार,
तब तुम चांदनी बनकर,
उज्ज्वल कर दो,
मेरा संसार.....

तुम मेरा हाथ थाम कर,
मैं तुम्हारा हाथ थाम कर,
चलें...

सत्य के परे,
स्वप्न के पार...

मैं चाहूँ,
ऐसा संसार।
सत्य के परे,
स्वप्न के उसपार।।

....✍️✍️राकेश पांडेय


🌹भावों के मोती🌹
12-5--2018
कल्पना
*
********************
ऐसा सुहाना समाँ फिर कहाँ होगा
कल्पना में बसा कोई रहनुमा होगा।
हाथों में हाथ थामे,प्रेम की बस्ती में
तुमसा न कोई,हमनवा होगा।
अधरों पर खिली मुस्कान,गुलाब की पंखुड़ी
खिलने पर उसके जैसा,नशा कहाँ होगा।।
मेरी कल्पनाएं तुम्हारे लिए सुखद चंचल है
प्रेम बूंदों से हृदय भरा, ऐसा सागर कहाँ होगा।।
इश्क,मुहब्बत में मेरी कल्पनाएं परवान चढ़ी है
आ कर जो छू ले उसे,ऐसा सोपान कहाँ होगा।।

वीणा शर्मा

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