Monday, May 14

"स्वतंत्र लेखन"-13 मई 2018



गज़ल

जो घिरे रहे झंझावातों में

दम होता उनके जज्बातों ।।

करिये उनसे मुलाकात
मजा आयेगा मुलाकातों में ।।

देखिये कभी करीब से उन्हे
खुश दिखेंगे हर हालातों में ।।

चुनिये कुछ ज्ञान के मोंतीं 
मिलेंगे उनके ख्यालातों में ।।

सुनहरा मौका मिलता कभी
वक्त कटता ''शिवम" बातों में ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


 एक ग़ज़ल 
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मापनी -१२१ २२ १२१ २२ १२१ २२ १२१ २२ 

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अभी मुझे ये ख़याल आया .....खुदा ने क्यूँ ये जहाँ बनाया 
हसीन लम्हे कहीं दिखाए ........कहीं सुलगता धुआँ बनाया 1
***
खुदा निगहबान है सभी का ....उसी की रहमत बरस रही है 
सजाये मंज़र यहाँ उसी ने ......सभी मुकम्मल यहाँ बनाया 2 
***
बहार बनके कहीं ज़मीं पे ............पुकारती है सदा उसी की 
कली खिली है कहीं चमन में .......कहीं तुम्हे बागबाँ बनाया 3 
***
पहाड़ से जो चली निकल के ....नदी उमड़ती जमीं पे आयी 
कभी उछलती चली मचलती मिलन का सागर वहाँ बनाया 4 
***
विजय कहे क्या समझ न पाए करम खुदा के खुदा ही जाने 
निहारते हैं सुकून पाते ...............तराश के यूँ जहाँ बनाया 5 


मां को समर्पित
मां


मां आ तेरा श्रृंगार करूं
दिल से सच्चा प्यार करूं
मां तू मेरी परछाई है
कोई देवलोक से आई है
तेरे जीवन में प्रकाश भरूं
मां आ तेरा श्रृंगार करूँ 

मां तो मीठी लोरी है
सुन्दर रेशम की डोरी है
मां तू ने जीवनदान दिया
रक्त पिलाकर प्राण दिया
संघर्ष तेरे नहीं भूली मैं
पर मुझे खुला आसमान दिया
तेरे पथ के कांटे साफ करूं
मां आ तेरा श्रृंगार करूँ

मां त्याग की तू तो मूरत है
ममता की भोली सूरत है
तूने मुझे संरक्षित किया
संस्कारों से पोषित किया
पर हमने तुझको छलनी किया
अश्रु का सैलाब दिया
और तूने बस आशीष दिया
तुझे इस दर्द से मैं मुक्त करूं
मां आ तेरा श्रृंगार करूं

मां तेरा मैं सहारा हूं
बूढ़ी आंखों का तारा हू
माना मैं तेरी बेटी हूँ
पर मैं ही तेरी लाठी हूं
विश्वास की तू अलख जगा
चिन्ता वहम को दूर भगा
और प्यार से मुझे गले से लगा
तेरा कर्ज कैसे चुकाऊं मैं
चरणों में शीश झुकाऊं मैं
तेरा हरदम सम्मान करूं
मां आ तेरा श्रृंगार करूं

स्वरचित मिलन जैन

विजय द्विवेदी

 ★माँ की प्रीत ★

माँ की प्रीत

कैसी ये पहेली
ना भाषा और नाही बोली
अनबुझी छुअन है
शून्य में सृजन है
व्योम सा विस्तार 
स्पर्श से सिंगार
अहेतुकी अभिसार
अर्पण अकिंचन प्यार
नेह कि यह रीति
ममता सहज व्यवहार
वात्सल्य अपरंपार
अद्भुत परम यह प्रीति
अरे!अविरल,अनूप

*रागिनी शास्त्री* 
●दाहोद(गुज.)●



 "भावों के मोती"
वार -रविवार
तिथि- १३/५/२०१८


माँ " शब्द मे संपूर्ण नियति समाई हुई है।माँ शब्द सबसे छोटा होते हुए अपने आप मे परिपूर्ण है।माँ शब्द कि व्याख्या करना असंभव है ।यह वो मोती की माला है जिसे शब्दों मे नही पिरोया जा सकता।‍🙏 

माँ की महिमा अपरंपार
जिसे भुला न पाये ये संसार
दर्द में मरहम बनती है
सुख में दूर खड़ी मुसकुराती है।

माँ ममता का सागर है
प्यार से सराबोर वो गागर है
जो छलके तो मन में अथाह प्यार भर दे
दिल का कोना - कोना आनंद से भर दे

माँ तो है दुर्गा का अवतार
अपने सहस्त्रों हाथों में उठाये
सम्पूर्ण परिवारक कार्य
माँ की महिमा अपरंपार ,जानें जो वो हो जाये निहाल

सादा जीवन उच्च विचार माँ
अनवरत लीला की महारास माँ
पूर्णिमा में चाँद का प्रकाश माँ तो
ईश्वर द्वारा लिखा एक सुंदर महाकाव्य है माँ

पल - पल की चिंता करती माँ 
हमारे लिए जीती,हमारे लिए ही मरती माँ
माँ की ममता का कोई तोल नही
कर्ज़ चुका सके ऐसा कोई मोल नहीं।

वो तो यारों अनमोल है .......
वो तो यारों अनमोल है.......

©-सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)

✍🏻 माँ ...
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जसवन्त लाल खटीक
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मन्दर धोक्या, मिन्नत किदि, 
छोड्यो सगळो काज ।
नो मिना तक पेट में राख्यो, 
छोड्यो सगळो साज ।।

माँ री ममता तो देखो,
सुदंर रूप गवायो ।
औलाद ने पावा री खातिर,
दवाया रो घर वनायो ।।

पाल पोष बड़ो किदो,
पढ़ लिख लायक वनायो ।
माँ खुद भूखी रे कर भी,
सगळा ने पेट भर खिलायो ।।

परिया री कहानी केवे, 
सुंदर मीठी लोरी गावे ।
लाखो रा बिस्तर मिले , 
पण वेड़ी नींद कोनी आवे ।।

थारो आँचल म्हारी दुनिया, 
इण में मिल्या हजारो फूल ।
लाख आसमां छु लेवा पण,
सगळा हा माँ रे पगा री धूल ।।

माँ तो अनपढ़ है भाया,
फेर भी सगळो ज्ञान देवे ।
माँ प्रेम री मूरत है भाया,
सगळी दुनिया रो प्यार देवे ।।

"कवि जसवंत" केवे है भाया, 
बात नी है या आम ।
माँ बाप री सेवा कर दीज्यो,
वे जावे चारो धाम ।।



 एक गजल का प्रयास

ये गजल है गजल मेरी अपनी गजल

थोडी अल्हड दिखे फिर भी है सरल।

खूब सुरत है ये हर एक अशआर से
झील मे खिल रहा हो जो कोई कमल।

हो जाता था जब दुध से अलग पानी
क्यो दिखता नही आज वैसा अदल।

बात करके गये जो अदल इन्साफ की
वो अटल भी गये चन्द दिन मे बदल।

हर आदम करे जिक्र उनका यहाॅ पर
आज किसीमे कहाॅ शहीदो सा अमल।

जहर दे देता है आज भाई को भाई
हामिद पीता कहाॅ कोई शिव सा गरल।

हामिद सन्दलपुरी की कलम से


"माँ"
माँ , माँ शब्द की वो खनक,
माँ प्यार का वो अहसास है,

साथ माँ का है ऐसा,
ना बुझने वाली प्यास है।
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सारा जीवन किया है उसने,
इस घर को समर्पण,
छुपा अश्रु आँख में गम के,
पाया सुखी परिवार का धन।
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माँ की किमत हर कोई जानें
मातृत्व के आगे कोहीनूर भी है कम,
उसके आँचल की जब जब छाया पाये
भूल जाए सब दर्दे- गम। 
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किमत माँ की उनसे जानों,
जिनकी माँ गई गुजर,
हो जाने पर जुदा,
रहता दुआऔं में भी असर।
"रेखा रविदत्त"

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