Friday, May 25

"बाल मजदूरी "-18 मई 2018





शीर्षक: बाल मजदूरी

नन्ही कलियां नन्ही कोंपलें

जन्मती हैं मुरझाती है
नन्हें ख्वाब सूनी अंखिया 
बैठ मिल बतियाती हैं

नन्हें बचपन के ये सपने
संघर्षों की भेंट चढ़े
अम्मा मुझको रोटी दे दो
भूखा बचपन शोर करे

फटे हाल हो गया है जीवन
दर्द भला ये कौन सुने
शिक्षा की सब बातें करते
पेट भला अब कौन भरे

छोड़ खिलौने मीठे सपने 
वो कुदाल उठाता है
चन्द पैसों की खातिर बचपन
रुंदता है मिट जाता है

बाल मजदूरी अभिशाप है सुन के
बाल मन घबराता है
मजबूरी तो दूर करो
ये बालपन चिल्लाता है

दर्द पीड़ा से भरा ये जीवन
अपराधी बन जाता है
खेलकूद की उम्र तो वो
कारावास में बिताता है

नींव हमारी बिलख रही है
लोगों थोड़ा होश करो
भविष्य हमारा बने ये उज्जवल
थोडा तो पुरुषार्थ करो

स्वरचित मिलन जैन

आज फिर देखा एक बच्चे को गुब्बारे बेचकर 
खुश होते हुए और गाड़ी में बैठे हुए बच्चे को
खुश गुब्बारा खरीदते हुए

ये छोटे बच्चे दिल के होते है सच्चे
पप्पू,रामु,कालू,छोटू और न जाने 
कितने ही इनके नाम
सुबह से लेकर शाम तक 
अनवरत करते है ये काम
झाड़ू पोंछा ये करते दुकान पर
घर का जिम्मा उठा लेते अपने
छोटे से कंधे सरीखे आसमान पर
प्यार की चाशनी घोल देते ये
अपनी वाणी से सबकी चाय में 
साथ ही प्यार के दो बोल से 
निखर जाते दिन प्रतिदिन अपनी 
बचपन की छांव से 
कभी डांट कभी फटकार 
तो कभी मार 
यही रहती है उनकी दिनचर्या
रोज रोज मरते है यहां जीने के लिए
भूखे प्यासे अकुलाए पेट 
नाश्ता करवाये ये सभी को भरपेट
जुबान पर लगा लगाम 
करते दिन रात ये काम
देते अपने जन्मदायियों को 
कुछ आराम
अपने से छोटे भाई और बहिन का
बोझ ये उठाते है और अबोध उम्र में ही
वयस्क ये बन जाते है।
खुद नंगे पैर और पॉलिश से सभी 
के जूतों पर चमक देते है ये उकेर
सवेरे सवेरे निकले घर से और घुसे 
ये दिन अंधेरे
रोज मर कर जीते है ये अबोध चितेरे
कामेश गौड़



********************
देखा है उन्
हें राह आते जाते अक्सर
बौझिल मुस्कान को हाथ फैलाए अक्सर
नन्हे हाथों में बड़ा बौझा लिए फिरते है
नही दिखती हमे भूख की मार अक्सर।।

वो नंगे बदन धूप में चलते है अक्सर
द्वंद जीवन का स्वयं लड़ते है अक्सर
अक्सर समाज की मार सह लेते है 
हम जिन पर मार काट मचाते है अक्सर।।

क्यो ये देख आंखे मूँद लेते हम अक्सर
इनके प्रति हमारा भी कर्तव्य है अक्सर
क्यो न बीड़ा उठाएं हम आप मिलकर
विद्यालय तक छोड़ आए उन्हें अक्सर।।
*****************************
वीणा शर्मा


भा.1*18/5/2018,शुक्रवार, विषय बाल मजदूरी ः
सुबह से शाम तक जो नन्हे मुन्ने
कचरे से अपनी रोटी ढूँढते हैं।

दैनिक दिनचर्या ही बन गई है इनकी,
लगता जैसे इसमें जीवन ढूँढते हैं।
निर्धन होना मानोअभिशाप मिला हो।
जैस जीवनदायी पाप मिला हो।
ये सब परमपिता परमात्मा की संतानें,
फिर क्यों इनको श्राप मिला हो।
यह सब हमें समझना होगा।
इनके योगदान को देखना होगा।
कर्मवीर सब हैं ये बच्चे,
हमें इनका दर्द समझना होगा।
बाल मजदूर जानकर नहीं बनते हैं ये
इनकी कुछ मजबूरी होगी।
गरीबी हो सकती है इनकी पीढा,
या फिर शिक्षा इनकी कमजोरी होगी।
शिक्षित इन्हें करना ही होगा।
श्रम का महत्व समझना होगा।
मूल्यवान शिक्षा होती है,
इनकी शिक्षा का प्रयास करना होगा।
स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम


 बाल मज़दूरी
🔏🔏🔏🔏🔏

कैस
ी होती है मज़बूरी 
बच्चे करते हैं मज़दूरी 
खेल खिलौनों से होती
इनकी मीलों की दूरी। 

क्या किया इन्होंने आख़िर वो पाप
जो मिला इन्हें ऐसा अभिशाप 
इन भोली भोली आंखों में
क्यों नहीं झांकते ईश्वर आप। 

जब भी हम विवश होते
दुनियां वाले कर्कश होते
आकाश की ओर ही उठती आॅखें
सब उसके ही वश में होते। 

आर्थिक सामाजिक पहलू किधर गये
हमारे नैतिक दायित्व क्यों बिखर गये
हम किन बातों से डर गये
हमारे संवेदन तन्त्र क्यों मर गये।




प्रस्तुति 01

18 मई 2018


" बाल मजदूर "

बाल आँखो में जहाँ भविष्य के सपने होने चाहिये

अपने भविष्य के प्रति आशान्वित और आश्वस्त होना चाहिये

ये अबोध बच्चे झूझते हैं अपने भाग्य से महज़ रोटी के लिये

क्या हमारे देश के भविष्य का ऐसा ही भाग्य होना चाहिये

नहीं करता कोई बाल मजदुरी मात्र अपने शौक़ के लिये

भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिये कम से कम पेट भरना चाहिये

क्या विलक्षण बात है हमारे देश के माहौल में

जो बैठता है छाँव में और मजेदार माहौल में

उसका तो पेट भरता और डकारें पे डकारें लेता

और जो कड़ी धूप और बारिश जाड़ों में अनवरत खटता

उसको कभी भर पेट मिल जाये खाना तो आश्चर्य होना चाहिये

जिन नौनिहालों देश के भविष्य को होना चाहिये था किसी शाला में

उनको क्यूँ दिन भर उन्हें बाल मजदूर बन दिन भर खटते रहना चाहिये

यूँ तो कानून देश में बाल मजदूरी पर हैं बहुत

कम से कम अब तो इनका ईमानदारी से इस्तेमाल होना चाहिये..

बात ये है शर्म की और गहन सोंच की

क्यूँ न बाल मजदूरी पर एक स्थायी लगाम लगनी चाहिये

(स्वरचित)

अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव


मजबूर हूँ विवश हूँ इसलिए बच्चपन की 
नटखट भोलेपन शैतानी और मासूमियत से 
दूर हूँ .


बाल मजदूर बना हूँ मजबूरी में घर की 
जिम्मेदारी हैं मुझ पर इसलिए दुखों 
का अथाह भार हैं मेरे सिर पर .

छोटे से कंधों पर अपने परिवार का बोझ 
उठाता हूँ अपनों को दो वक्त की रोटी 
खिलाने के लिए हर दिन मौत से लड़ता हूँ .

बाल मजदूर हूँ मैं तरस खाकर कुछ मेरी 
झोली में खाने को डाल जाते हैं लोग 
लेकिन मैं बाल मजदूर क्यों बना हूँ ये 
कोई नहीं जानना चाहते हैं ये लोग .

मेरी यही कहानी बच्चपन सड़कों में बीता 
बाल मजदूरी करने में आगे क्या हैं कहानी 
इसका नहीं कुछ पता .

स्वरचित ,:- रीता बिष्ट


 "भावों के मोती "
शुक्रवार 18/5/18
शीर्षक - बाल श्रम 


कोमल अल्हड चालों में वो मस्ताना पन रहने दो 
मत खींचतान के बड़ा करो बचपन को बचपन रहने दो 

साया भी ना पडने पाये नाजुक तन पर पत्थर का
भोली-भाली मुस्काने न बने निशाना पतझर का
मस्त हवा के झोंके सा वो बाल लड़कपन रहने दो 
मत खींचतान के बड़ा करो --------

समझ रखा है धूल जिसे वो आँगन का चंदन है 
सबसे प्यारी रचना और बड़ी अनमोल नियामत है 
नन्हे हाथों में बोझ नही, आजाद ये तन-मन रहने दो 
मत खींचतान के बड़ा करो -----

Arati Shrivastava

 "बाल-मजदूरी'
बच्चे है हमारे देश के कर्णधार।
क्यों इनका हो बंटाधार।

इनके है खेलने-खाने के दिन।
क्यों ले हम इनसे बचपना छिन।
दो वक्त के रोटी के लिए काम
करे वे क्यों दिन रात।
इनके मासुम चेहरे पर है
काम करने का दिन रात तनाव
जब वे देखे हम उम्र उनके,
खेलते खाते मौज उड़ाते
तब उनका मासूम बचपन
रोते सिसकते रात गुजारे।
हमें दिलाना है उनको उनके
अधिकारों का ज्ञान।
जिससे है वो अब तक अंजान।
शिक्षा है सबका अधिकार।
शिक्षित बनो और पा जाओ
बाल मजदूरी से परित्राण।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।



शीर्षक ''बाल मजदूरी"

गज़ल


बचपन में न आये जवानी 
करने दो अभी उन्हे नादानी ।।

बैठ के उन संग ताजी करलो
बचपन कीं यादें वो सुहानी ।।

सबका हक है हँसने गाने का 
रोना तो सबको ताजिन्दगानी ।

किसी का हक कभी न छीनो 
भूल बड़ी है कुछ समझ प्रानी ।।

एक बार मिलता है बचपन 
कीमत तो सबने है पहचानी ।।

ईश्वर का उपहार है बचपन
क्यों काम की उनसे ठानी ।।

अभी तो आँखे खुली भी न 
काम दाम की शुरू कहानी ।।

मजबूरी तो सदा ही रहती 
होती ही रहती लाभ हानी ।।

बच्चे तो नन्हे पौधे होते हैं 
पानी दो जो फल है खानी ।।

''शिवम्" बुलन्द कर खुद हौंसले
बरकत अच्छाई में ही मानी ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




नन्हें , कोमल हाथों से ,
जिम्मेदारी ,का बोझ उठाते ।
सपनों , का गला गोंट कर ,

दो जून , की रोटी कमाते ।।

बचपन में , युवा बन जाते ,
परिवार को , कमा कर देते ।
माँ- बाप ,के लिए , दवाई ,
बहनों के ,गुड़िया ला देते ।।

खिलौने ,इन्होंने देखे नहीं ,
खो गया ,इनका बचपन ।
रोटी ,के खातिर बच्चे ,
ईट- पत्थर , लादे हरपल ।।

एक भी ,जमात पढे नही ,
विद्यालय , जाने को तरसे ।
तपती धुप , में करे मजदूरी ,
टप-टप , पसीना बरसे ।।

" जसवंत " लिखे दुखी मन से ,
" बाल मजदूरी " बन्द करो ।
ईंट की जगह , किताबे दो ,
बच्चों , का जीवन धन्य करो ।।

भावों के मोती
18/05/2018

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