Wednesday, May 2

सौन्दर्य -2 मई 2018


 आज श्रांगार पर मेरी ये कविता------
 "घूँघट पट से नयन झांकती"

जब चांदनी मेरी छत पे पिघले

पूनम का चांद मचलता हो,
जब बरखा रानी बिजुरी को छेङे
मन बैचैनी में बतियाता हो,
जब बूंदों की ताल से मिलकर
शाखों का सावन गाता हो,
जब पांव महावर में रंग कर
प्रीत के फूल खिलाता हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

जब चंचल नैनों की अनुरक्ति में
कजरा चहका चहका हो,
जब इन गजब घनेरी जुल्फों में
रजनीगंधा महका महका हो,
जब तेरी झांझर की रूनझुन में
मौजों की ता ता थैया हो,
जब दिल की डगमग नैया में
सागर की हैया हैया हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

जब तेरे दिल की धङकन भी
धक धक धक धङकी हो,
जब मन के सूनेपन की ज्वाला
प्रेम अगन में भङकी हो,
जब बरस बदरिया सावन की
झम झमा झम बरसी हो,
जब तुम जोगन सी बन दीवानी 
पिया मिलन को तरसी हो,
तब घूँघट पट से नयन झांकती
मुझसे मिलने आ जाना तुम
दो लाज भरे सुरमई नैनों संग
मुझसे कुछ बतिया जाना तुम!!

-----डा निशा माथुर/8952874359 whatsapp



सागर की लहरों पर,
उषा किरण सी स्वर्णसुधा बन,
रश्मियों के पुंजों संग,

इक बार प्रिये तुम आ जाना।
माथे पर सिंदूरी सूरज,
आँखों में निशा का काजल।
श्वेत कमल के कर्णफूल
अधरों पर राग सुरीला,
तारों की लड़ियों से माँग सजा,
सोलह श्रृंगार कर ,
इक बार प्रिये तुम आ जाना
सुर्ख धवल पीली साड़ी,
लहरों के वर्तुल से कंगन।
छमछम करती पैजनियां,
काली घटा से गेसू,लहराती हुई ,
इक बार प्रिये तुम आ जाना।
कुछ बातें तुमसे करनी है,
कुछ शब्द तुम्हारे कर्णप्रिय,
आत्मसात मुझे करने हैं।
सारे जग के बन्धन से,
मुक्त स्वयं को करके।
अनन्त मार्ग पर चल कर,
इक बार प्रिये तुम आ जाना,
इक बार प्रिये तुम आ जाना.......

वीणा के तारों ने मधुरिम,
सरगम का श्रृंगार किया।
सप्तक कि स्वर लहरी ने,

पावन पुँजित उपहार दिया।

अभ्युदय सेअस्तांचल तक,
अभिगम से उपरान्ह तलक।
झनकार छिडे जो तारों मे,
सौंदर्य बिखेरे जमी फलक।।

दग्धांतक का आतप हो,
स्वर्गिक सुख की अभिलाषा।
प्रणय गान या प्रलय गीत,
उर कि प्रीति कि परिभाषा।।

संगीत महालय गीतों का,
अनुपम सौंदर्य बरसता है।
झंकृत तारों की वीणा का,
मृदु शोर मधुरिम बजता है।।



सौन्दर्य 
🔏🔏🔏🔏

सौ
न्दर्य का अलग ही है आकलन
इसमें नहीं होता कोई आवरण। 

जब दो शब्द मधुर बोल दो
प्रेम के सुर इसमें घोल दो
अलंकारों का श्रंगार हो
मृदु भावों का उदगार हो। 

लावण्य का सम्मान हो
सुन्दर सा परिधान हो
खुशी भरी मुस्कान हो
गौरवमयी एक शान हो। 

चन्द्रमा सी शीतल 
महका दे पल पल
आनन्द उमड़े छल छल
स्वागत करे हो निश्छल। 

शारीरिक सौन्दर्य नहीं है पूर्ण
यह सुन्दर कहानी है अपूर्ण
चन्द्रमा में भी जब सोलह कलायें मिलती
तब ही पूर्णिमा से वह होता पूर्ण।



कोई स्वपन संजोने लगता है,,
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कूँ -कूँ करती कोयल की,

जब गीत सुहानी लगती है,,,
मीठी-मीठी स्वर कोई,
जब जानी-पहचानी लगती है,
जब प्रेम कापोलें भरतें है,
जब मन मे कलरव होता है,,,

तब एकाकी मन मेरा,
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,,,,,

जब पीली-पीली सरसों से,
धरती की शोभा बढ़ जाती है,,,
जब कोई कुमुदनी- भ्रमर के,,
प्रेम में पड़ जाती है,,
जब कलसी लेकर अलसी,,
अपने पर इतराती है,,,
जब गेहूं के खेतों में,,
पवन जरा थम जाती है,,
जब टप -टप महुवा गिरती है,
जब आम हरे रंग लाती है,,
जब मीठे-मीठे नीदों में,,
जग सारा सोने लगता है,,,,,,,

तब एकाकी मन मेरा ,
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,,,,

जब मधुप कोई मधु के लालच में,,
अपनी आहें भरता है,,
जब कोई चकोरा चंदा को,
तिरछे नजरों से तकता है,,
जब कोई चतुर चपला,,
नयनो के बाण चलाती है,,
जब गुथी हुई केश -बेणी,
जुड़े से खुल जाती है,,,
जब नवयौना अपना कोई,,,
आँचल गिरा लजाती है,,
जब चंचल मन मेरा,
आपा खोने लगता है,,,

तब एकाकी मन मेरा
कोई स्वपन सजोने लगता है,,,,

(राकेश पाण्डेय)


 नारी हैं सौंदर्य की प्रतिमा 
कभी बेटी बहू तो कभी माँ .


नारी हर रूप में पूज्नीय सौंदर्य की मूर्ति हैं 
कभी बेटी बनकर सबको लाड़ लड़ाती हैं 
कभी बहू बनकर गृह लक्ष्मी कहलाती हैं 

कभी जीवन संगनी बनकर हर मोड़ पर 
अपने जीवन साथी का साथ निभाती हैं .

कभी माँ बनकर ममता लुटाती हैं 
नारी का रूप सौंदर्य से परिपूर्ण हैं 
सोलह श्रृंगार से सजकर नारी 
के सौंदर्य में चार चाँद लग जाते 
हैं .

क्योंकि नारी का जीवन ही सौंदर्य त्याग 
बलिदान आत्मविश्वास और सम्पर्ण हैं .
# रीता बिष्ट


" सौंदर्य'

उषा किरण जब जलज पर बरसे, 

मंद मंद तब वे मुस्काये।
भौरों का गुंजन जब बगीया मे
अलसायी कली को जगाये
तब प्रकृति का अनुपम सौंदर्य
निखर निखर जाये।
रंग बिरंगी तितलियां जब फूलों के
इर्दगिर्द मडराये।
आमो मे मजंर जब बगिया मे आये
तब कोयल की कूहू कूहू मन मे भाव जगाये
तब प्रकृति का सौंदर्य निखर निखर जाये।
चाँदनी रात में सागर की लहरें
जब उठते गिरते मचल मचल जाये
तब चाँद इठलाये अपनी सौंदर्य पर।
तब प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निखर निखर जाये।
मंदिरों में दीपक की माला
भक्तों के मन मे ग्यान जगाये
और जब नारी माँ बन जाये
उनका सौंदर्य निखर निखर जाये।

 💐भावों के मोती💐
2-5-2018
सौंदर्य
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चंचल रात्रि चंद्र की सहदायिनी 
जगमग सितारों की ओढ़नी ओढ़े
सौंदर्य के अंतिम श्रृंगार पर
बहक रही थी, मुस्कुरा रही थी।
रात्रि चंद्र, तारों को
आग़ोश में लेकर
मेनका को जला रही थी।
न जानें रात्रि ने स्व श्रृंगार पर
कितनों को दीवाना बना दिया
खुद अंधेरे में रह कर
जुगनू को परवाना बना दिया।
सोलह कलाएं भी
इस सौंदर्य पर बलिहारी है।
पूनम की रात्रि
बिंदी,चूड़ी,टीके,गजरे की महक पे भारी है।
कामिनी के हुस्न औ शबाब को
पूछता अब कौन है...
रात्रि कला के सौंदर्य पर
स्वयं अप्सराएँ भी बलिहारी है।

वीणा शर्मा


जब स्वप्न की खूबसूरती 
यथार्थ से मिली
स्पंदन सहित ह्रदय में 

ज्योत्सना थी कहीं 
स्वप्न की खूबसूरती 
मुस्कुराई 
थोड़ी सकुचाई 
अपने सौंदर्य पर इठलाई
और लगी फरमाने 
यथार्थ दोस्ती कर लो मुझसे 
मुझ में डूबकर
भूल जाओ दुख अपने 
देखो मुझ में डूबकर 
सब भूल जाते हैं शिकवे 
भूलकर गम सारे 
खुश हो जाते हैं कितने 
अपनी मुफलिसी कर मेरे हवाले 
खो जाते हैं मुझ में मदहोश हो सारे 
यथार्थ था शांत 
देखता रहा 
स्वप्न की खूबसूरती के फसाने सुनता रहा
बाद में यथार्थ मुस्कुराया 
आंखों में झांककर 
फरमाया 
यह सौंदर्य तो है 
पानी का बुलबुला 
जो होता है 
क्षणभंगुर सा
तुम्हीं में खोकर
इंसान छलावों को ढूंढता है 
अतृप्त मन की आकांक्षा 
में ईमान को गिराता है 
क्या तुम्हें अपनी खूबसूरती पर रश्क नहीं आता है?
जो इंसान को इंसानी फर्ज से डिगाता है 
दुनिया के नैसर्गिक सौंदर्य 
में मेरा अस्तित्व ही भूल जाता है

 यदि मैं तुमसे दोस्ती करता तो तुम्हारे हुस्न की महत्ता ना रहती
 इंसान की तकदीर तुम्हारी खूबसूरती में न जकड़ी होती 
लोग झूठी क्षणभंगुरता के पीछे ना भागते 
सदैव मुझसे पनाह मांगते 
जीवन की सच्चाई में 
मेरी छवि पाकर 
अंतःकरण से
तदबीर में जुट जाते

स्वरचित मिलन जैन



*सौंदर्य*
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शिशिर की सांझ हूँ

हेमंत की सुबह हूँ मैं
बसंत में खिल खिला कर
पतझड़ में बिखरा जमींदोज 
प्रकृति का मासूम सौंदर्य हूँ

गीत, गज़लों नज्मों में
गुनगुनाता 
छंद ,चौपाई,अलंकारों में
लय सुर ताल बद्ध
अक्षर अक्षर रस में डूबा
अलंकरण हूँ मैं

भोर के आँगन में बिखरा 
सिंदुर में लिपटा आँचल हूँ
संध्या सुंदरी के गुलाबी- श्यामल आँचल में टंके
सितारों में झिलमिलाता
लहराता श्रृंगार हूँ मैं

हाँ सच है ललना हूँ
पर प्रकृति का संपूर्ण
श्रृंगारित सौंदर्य हूँ मैं
चाहे खिला हो चाहे बिखरा।

डा. नीलम 
(अजमेर)


 पूनम का चाँद जब
धरती की गोद उतरता है
भोर साँझ को रवि जब

नभ सिन्दूर भरा करता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

नई नवेली दुल्हन का जब
सोलह श्रृंगार दिखा करता है
मेहँदी में छुपा हुआ जब
प्रीत का प्यार रचा दिखता है 
हाँ सौंदर्य दिखता है 

धरती की गोदी में जब
नव अंकुर खिला करता है
पत्थर में संघर्षरत जब
कहीं फूल भी हँसता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

माँ की करुणा का ज्वार जब
शिशु पे प्रेम बन उमड़ता है
ममता का सागर बन जब
नेह का मेघ बन बरसता है
हाँ सौंदर्य दिखता है 

ऋतुराज दवे

"मिटटी"14फरवरी 2019

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