Thursday, May 24

"परिवार "-21 मई 2018


 परिवार ही व्यक्ति की पहचान है,
बिन परिवार खोता वो सम्मान है।


संसार तो सिर्फ मीठी ठगनी माया है,
दर्द में तो सिर्फ परिवार का साया है।

जो न समझें महत्ता परिवार की,
वो रोज ठोकरें खाता है संसार की।

आओ परिवार की छोटी - मोटी गलतियों को, तुम भूल दो त्याग,
और एकजुट हो साथ परिवार ,सम्मान से ,सर उठा के जिलो आज।

©सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


 परिवार समाज की इकाई है
परिवार सुन्दर बनाओ जी ..


अपने अपने घर को अच्छे
संस्कारों से सजाओ जी ...

नित नयी खुशियाँ बरसेंगीं
कुछ सुविचार अपनाओ जी ..

काम नही हैं कोई कठिन
कुछ आदतें अच्छी लाओ जी ..

क्या भला क्या बुरा सब जाने
थोड़ा सा दृड़ हो जाओ जी ...

इधर उधर मत देखो होवेगा ठीक
विश्वास मन में जगाओ जी।...

चमक उठेगा ये घर संसार
इस काम में हाथ बँटाओ जी..

प्रभु भी इससे खुश होगा 
समझो ''शिवम" समझाओ जी..

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




परिवार 
🎈🎈🎈🎈

सा
री खुशियों का मुख्य द्वार 
है सबका अपना एक परिवार 
इसके सहयोग से सहते सारे वार
जीवन में नहीं मानते हार। 

जीवन में सब ही को चाहिए सम्बल
जीवन में आये नहीं कोई दलदल
परिवार ही होता है केवल जो
ओढ़ायेगा उत्साह के कम्बल। 

परिवार से जो सदा जुड़ता है
ऊॅचाईयों पर सदा उड़ता है
परिवार तोड़ने वाला तो
अकेला अपने में कुड़ता है।




शीर्षक- " परिवार"

परिवार हमारी शान है,

हर घर की पहचान है।
वृक्ष की इस छाया में,
मात पिता का साया है।।

सबसे सुंदर सबसे प्यारा,
दुनिया से है सबसे न्यारा।
है अपना परिवार।।

अपनो का प्यार खुशी की बहार,
ऐसा है अपना घर संसार।
थोडी मस्ती थोड़ा प्यार,
खिलखिलाता है परिवार।।

परिवार सुखो का ताज है,
हर घर का आगाज है।
इसके बिना कोई धन नही,
परिवार बिना जीवन नहीं।।

इसमें जो भी रहता है,
हरदम आगे बढ़ता है।
इसका कोई नहीं है मोल,
सब रिश्तो में हैं अनमोल ।
स्वरचित--ममता सकलेचा
दिनांक- २१/५/१८

शीर्षक :परिवार

रुप स्वरूप अनुपम जित आंख शरम समाय

छोटन देत सम्मान उत बुर्जुग देव समान
बडे क्षमा उर बसे हिलमिल साथ निभाय
धन्य वो परिवार है जित मिले मान सम्मान
लोभ द्वेष जित गौण रहे संयम वाणी 
माय
प्रीत अमृत मोती हो वो कुटुंब देव स्थान


स्वरचित मिलन जैन
दिनांक २१ मई २०१८


परिवार
जीवंत सपनो का संसार
हंसता खेलता परिवार

सुहाने मौसम की फुहार
प्यारा सा परिवार
जीवन रूपी प्रगति का आसार 
खुशियां बिखेरता परिवार
ईश्वर को विनम्र आभार 
दिया उसने अनुपम ये परिवार
इच्छाएं हुई सारी साकार
कठिनाइयां दरकिनार करता रहा परिवार
सुख ,समृद्धि,ऐश्वर्या का आधार
सभी स्वजनो से सजा ये परिवार
सपनीले सफर की बहार
अपना ये परिवार

कामेश गौड़



आज का शिर्षक है- "परिवार"
" परिवार"
जहाँ समझी जाती है, 

एक दूसरे की भावना,
वो होता है परिवार,
होती जहाँ सलामती की कामना।
*************************
रहकर दूर परिवार से,
ना सीखा जाए व्यवहार,
कौन है दादा, कौन है दादी,
पाएँ फिर कैसे संस्कार,
******************
जो रहते पूरे परिवार में,
प्यार ना पाएँ वो कभी कम,
दूर जाने की बात से ही,
हो जाती जिनकी आँखे नम।
***********************
मिटाकर द्वेषभाव मन के,
तोड़ दो आँगन की दीवार ,
खेलें बच्चें एक आँगन में,
तभी रहेगा सुखी परिवार।
" रेखा रविदत्त"
21/5/18
सोमवार



मुस्कुराता हुआ 
हँसता हुआ 
सुन्दर सा 

अतिसुन्दर सा 
भद्र सा 
शालीन सा 
सहनशील सा 
संयमता सा घर में 
रहता है मेरा परिवार

धार्मिक रीति-रिवाजों में 
लीन रहता है मेरा परिवार 

देश की गरिमा का 
संविधान की मूल्यों का 
लोगो की प्रतिष्ठा का 
बहुत सम्मान करता है मेरा परिवार 

सरहद पर तन कर खड़ा रहता है मेरा परिवार 
वतन के लिए खुद को कुर्बान करता है मेरा परिवार 

सच कहता हूँ 
चमन सा 
मुस्कान सा है मेरा परिवार 
संस्कार की खूशबूओ से
भींगता रहता है मेरा परिवार 

रहे देश में अमन 
अमन की इबादत करता है मेरा परिवार 
मानवता की राह पर 
सदा चलता है मेरा परिवार 

सच कहूं तो 
एकता और अखंडता की महक है मेरा परिवार 
विविधताओ में एकता का रूप है मेरा परिवार
@शाको





छोटे छोटे परिवारों की आज बड़ी भरमार हैं

25 गज के प्लाट में रहते परिवार चार हैं ।।

मुँह फुलाकर रहते वो भी , शेर सी दहाड़ हैं
बनन न पति पत्नि में और से क्या दरकार हैं ।।

कोई टीवी में मस्त हैं कोई झाँक रहे द्वार हैं
मुन्ना मुन्नी उठे न कल से वो बहुत बीमार हैं ।।

सेकेण्ड फ्लोर की आंटी करती सबसे रार हैं
परीक्षायें बच्चों कीं सर पर मूड बेकार हैं ।।

कुण्ठित से बच्चे , दिल में पल रहे गुब्बार हैं
रोजगार को भागे घर से यहाँ और भी मार हैं ।।

किस्मत के मारे ये सुनती न कोई सरकार हैं
गाँव में ही अच्छे थे अब कर रहे बिचार हैं ।।

परिवार चलाना मुश्किल अविवाहित हजार हैं
कोई तो सुनो ''शिवम"इंसा कैसे कैसे लाचार हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




अनुशासन
बुजुर्गों का दुलार
एकात्म भाव

अंतरंगी फुहार
संयुक्त परिवार

कब बीता शैशव
कब आई जवानी
मदमस्त दिवानी
सहमी सिमटी 
हो गई बेगानी
ससुराल कि देहरी पार की
कई निगाहें मुझ पर ही टिकी थीं
अंतर अनिष्ट कि आशंकाओं
से घबराऐं कि
तभी कुछ शब्द कानों से
आकर टकराये
वधू संस्कारी है
मन को धीरज मिला
लेकिन इसी धीरज ने
मुझसे ही मानो सवाल किया
ये संस्कार आए कहाँ से
जवाब अंतरनिहित ही था
ये वो संस्कार है जो
सनातन संस्कृति की धरोहर
*संयुक्त परिवार* में
बच्चों को जनमघूटी मे ही
पिला दिये जाते है......



क्या हुआ हूं, और मैं क्या होना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 


घर के आगंन मे थी बिखरी हंसी की रोशनी। 
उन खुशी की लडियों को पिरोना चाहता हूं। 

माँ की गोदी से कोई शै, मुझे प्यारी नहीं थी। 
खोई उस जन्नत को फिर से पाना चाहता हूं। 

जिसने चलना सिखाया, चल के मिलने जाऊँ। 
बाबा के कंधे चढ ऊंचा सबसे होना चाहता हूं। 

कितनी यादें बह के आई आसुंओ के साथ मे। 
भाई-बहन संग एक थाली में खाना चाहता हूं। 

रूठ कर बिछडे मेरे अपने, बड़े सब क्यों हुए। 
टूट कर बिखरे ये मोती सब संजोना चाहता हूँ। 

लिख रहा हूँ जाने कैसे हाले दिल मत पूछिये। 
रोके रुके न अश्क, दामन भिगोना चाहता हूं। 

फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 
फिर से बच्चा बन के मै खिलौना चाहता हूं। 

विपिन सोहल

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