Thursday, May 24

"कर्मफल "-24 मई 2018




भा.24/5/2018(गुरुवार )शीर्षक ःकर्मफलःःःविधाःमुक्तकः
कर्म अच्छे करते रहें ईश पर सब छोड दें।
कर्मफल क्या मिलेगा ईश पर सब छोड दें।

कर्तव्य करें पथ प्रसस्त निश्चित होगा हमारा,
ये बागडोर अपनी हाथ प्रभु के सब छोड दें।

सकर्म जिसने किऐ उसे ही सुफल मिलेगा।
दुष्कर्म जो किऐ उसे बैसा ही फल मिलेगा।
हमारे कर्मों का लेखाजोखा उसके पास है,
जिसने जो कियाउसे बैसा ही फल मिलेगा।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी।

कर्मफल सुधारने को धरा पर आये ।
जीवन का उद्देश्य मुक्ति बतलाये ।
भारतीय दर्शन सर्वोपरि कहलाये ।

मगर हम ही हैं उसको ठुकराये ।
अपना मन इधर उधर हैं भटकाये ।
परिणामत: आज दुख से छपटाये ।
हालात दिन व दिन गिरता जाये ।
कैसे हो सुधार ये समझ न आये ।
आज छोटा बडो़ं को आँख दिखाये ।
कर्मो का बोझ नित बढ़ता ही जाये ।
काश कोई भागीरथ बन कर आये ।
कर्मो का हिसाब चुकता कराये ।
आत्म सुधार ''शिवम" क्यों न भाये ।
कर्म फल से यहाँ कोई न बच पाये ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
24/05/2018



शीर्षक-'कर्मफल'

कर्मो का लेखा जोखा,

आगे हमको देना है।
जैसा कर्म करेंगे हम,
वैसा ही फल मिलना है।।

इंसान अकेले पैदा होता,
अकेले ही मरता है।
अच्छे और बुरे कर्मों का ,
फल अपने आप भुगतता है।।

सुख और दुःख ,
सब कर्मो का फेर है। 
जहां ना तो देर है,
ना कहीं अन्धेर है।।

कर्म की इस दुनिया में,
बहुत श्रम करना है,
हमारी इन लकीरों में,
रं ग खुद को ही भरना है।।

कर्म ही दण्डित करते हैं,
करते है यही पुरस्कृत।
किसी को शीघ्र फल मिलता है,
किसी को देरी से मिलता है।।

स्वरचित--ममता सकलेचा
२४/५/१८



कर्मफल से जो घबराएं
घबराकर गंगा जी जाए
मानव तेरी रीत है न्यारी

करे कुकर्म फिर क्यो अज्ञानी।।

सदा कर्मों का लेखा जोखा
किश्तों में अब कही न रहता
आज नही तो कल भुगतेगा
श्रीफल से तू सदा चूकेगा।।

कह गए है बड़े ही ज्ञानी
मन मे न रख पाप की वाणी
पल पल तू नजरों में रहता
प्रभु सा न कोई बड़ा ज्ञानी।।

करो सदा ही उत्तम कर्म
तभी मिलेगा उत्तम फल
श्री फल की जो चाह करेगा
उत्तम फल भी वही चखेगा।

वीणा शर्मा



 पंच तत्विय
नश्वर मानव देह
घेरा मोह माया नेह।

प्रत्यक्ष या परोक्ष
प्ल पल गतिमान गेह।
सासों का चलना निर्बाध
रूधिर का बहना अबाध।
समय सदा ही चलता रहता
रवि शशी को थपकी देता।
बोलो कहाँ रहा अविवेक 
कैसे चक्र चले यह नेक।
याद करें गीता की बानी
करें नहीं अपनी मनमानी।
नीति नियम कि ओर चले
चाह स्वार्थ की हम टाले।
कर्म सुफल याअसफल
है दोनो ही मार्ग अचल।
जो जैसा भी बोयेगा
वो वैसा ही पायेगा।
सांस चली तो प्राण मिला
रूधिर बहा तो ज्ञान मिला।
क्रिया प्रतिक्रिया ही फल है
जीव देह का संबल है।
है कर्मफल निश्चित बात
आगे तो सब प्रभु के हाथ।।
रचिता:-रागिनी शास्त्री

No comments:

"स्वतंत्र लेखन "17नवम्बर 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-568 Govin...