Saturday, May 5

चित्रलेखन -5 मई 2018



"चित्र-लेखन।'

मैं आरती उतारूँ माँ गंगे,सुबह व शाम।

चरण बंदना करूँ मैं तेरी दिन -रात।
पतितों के पाप हरने वाली,
भक्तों का उद्घार करने वाली माँ।
मैं आरती उतारूँ तेरी सुबह शाम।
सब पापों को धोने वाली, सबका
दुःख हरने वाली, सुन लो बिनती माँ।
हरिद्वार व बनारस की आरती
अनुपम छटा बिखेरती माँ।
जो इसमेशामिल हो जाये,
भव सागर तर जाये माँ।
भगीरथ के प्रयास हो म ईया
हो भारत की शान तुम म ईया।
हम आपकी संतान है म ईया
दरस हमको दे दो म ईया।
भक्ति करूँ निष्काम मैं म ईया।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।


आज के चित्र लेखन पर मेरी ये कविता------------ मेरी सोच की गंगा

गर मैं अपनी सोचों को बिसरा दूं तो,

जिन्दगी ठहर ठहर सी जाती है, 
उनको साथ लेकर संध्या औ सहर तक,
अंतर्मन की लौं प्रज्जवलित हो जाती हैं।
मेरी सोचें हैं उस गंगा की धारा तक,
जो अविरल बहती जा रही है। 
साथ में अपने प्रेम और विश्वास,
के सीपी कण बहा ले जा रही है। 
जिसमें निष्चल प्यार व्यवहार की,
रेतीली मिटटी घुलती जाती है।
जिसमें अव्यक्त सरल सादगी के
कई, गुलाबी कमल खिलते जाते हैं।
जिसमे मन हदय के पवित्र पावन, 
मंदिर में दीप जल जाते है। 
जिसमे शाम ढले क्षितिज के, 
मिलन का दृष्य उभरता हैं। 
जिसके तट पर मृत्युपंरात, 
काया को मोक्ष मिल जाता है। 
और मेरी सोचों की गंगाऐं........... 
जिन्दगी के साथ बहती जा रही हैं 
उदगम स्थल से संगम को मिलाकर, 
सागर में यूं मिल जाना चाहती है। 
मेरे नाम को, वजूद, मेरे अस्तित्व को, 
मेरे काम से रोशन कर जाना चाहती है।
और एक ढुबकी मेरे मन के विश्वास की, 
इस भवसागर से तर जाना चाहती है। 
मेरे तनमन को आशीर्वादों की गंगा में, 
नहला कर गंगामय कर जाना चाहती है।
----डा. निशा माथुर/8952874359


हिमगिरि के तुंग शिखर से ,
कल कल बहती निर्मल धारा।
धवल वसन धारी उज्वला,

रौद्र रूप भगीरथी सुरा।

सुरसरी पुनित पावनी गंगा,
शुभ्रा मनहरणि गंगा ।
शिवा शीश उद्गमित सुधामृत,
शत शत नमन शुचिता गंगा।।

देव,ऋषि, गंधर्व,विप्र, जन,
नित्य स्मरण, वंदन, पूजन।
सांझ सवेरे करें आरती,
पुनित पावनी गंगे वंदन।।



★गंगा★

भगीरथ के भगीरथ प्रयास से,

रौद्र रूप जल ज्वाल उमटी।
धरणीधर आमोद अचंभित,
शिव जटाजूट में आ सिमटी।।

दिव्य अलौकिक आपूरितता,
शिव मस्तक आल्हादित है।
उद्गम हिमगिरि शिखरांचल का,
धवलासिक्त पुनीत जल है।।

सुजला,सुफला सुरसरि धारा,
चपल चंचला भागीरथी।
तपोभूमि उत्तुंग हिमालय,
बड़भागी मां भारती।।

अविरति अविचला आल्हादिनी,
मोक्षदायिनी सुरसरि गंगा।
पुनीता प्राणप्रदाय प्रबोधिनी,
कोटि कोटिप्रणाम गंगा।।

भवसागर पार उतार गंगा,
वारी वारी बलिहार गंगा.
स्नेहासिक्त फुहार गंगा,
तेरी पावन रहे जल धार गंगा.

- रागिनी शास्त्री 
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 नमामि गंगे नमामि गंगे,
नमामि गंगे मात हे।
हम भक्तों की आरती,

कृपा कर स्वीकार लो।
कर्पूर ज्वाला प्रज्वलित कर,
शरण तेरी आए हैं।
श्रद्धा सुमन चरणों में ,
तेरे अर्पण करने आए हैं।
नमामि गंगे नमामि गंगे,
नमामि गंगे मात हे।
भक्तों की पुकार सुन ले,
उनका तू कल्याण कर दे।
पवित्र निर्मल गंगजल से,
हम सभी को तार दे।
नमामि गंगे नमामि गंगे,
नमामि गंगे मात हे।
© प्रीति


भोर की पहली किरण,
मन्दाकिनी की गोद में।
सहज सुन्दर शान्त मन से,

मुदित हो क्रीड़ा करे।
प्रथम प्रणाम प्रभाकर का,
गंगे माँ स्वीकार लो।
घंट घड़ियाल शंखनाद से,
आवाह्न आपका करें।
कर्पूर को प्रज्जवलित कर,
भक्त सारे भक्ति भाव से,
आपकी आरती करें।
पुष्प दीपक प्रवाहित कर,
आपकी वन्दना करें।
हम सभी का कल्याण कर माँ,
शरण आपकी आए हैं।
©प्रीति


भा.5/5/2018शनिवार,आज का आयोजन
हम सभी उतारें माँ की आरती।
जय जय जय माँ गंगा आरती।

श्रद्धा सुमन सब भक्त चढाऐं,
तुम सबकी हो जय माँ भारती।जय जय...
भागीरथी को भागीरथ लाऐ।
हिमगिरि से माँ तुमको लाऐ।
कैसे बखान करें महिमा हम,
यह बात समझ हमें नहीं आऐ।जय जय...
सुंन्दर सुखद मनोहारी दर्शन।
गंगा तट पर मनमोही दर्शन।
ये भक्त भक्ति गंगा की करते,
जो कुछ मनसे करते अर्पण।जय जय...
पुष्प गुच्छ सब तुम्हें समर्पित।
दीप दान कर ज्योति समर्पित।
करें प्रार्थना करजोर सभी हम,
तनमन सब माँ गंगा को अर्पित।जय जय....
स्वरचितःःः। . .. इंजी. शंम्भूसिह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी


गंगा मैया.. नमामि गंगे
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गंगा हमारी माँ है 
जीवनदायिनी है
हमारे देश की 
कल्याणकारिणी है
हरा भरा मैदान 
गंगा यमुना का
दोआबा कहलाता है
और देश का दिल भी
वो हो जाता है
उसकी हम करते आरती
उससे प्रेम जताते है
हरि की पैड़ी वाराणसी की 
आरती देखने देश विदेश से
लोग वहाँ पर आते हैं
नमामि गंगे ..नमामि गंगे का
गगनभेदी जयकारा लगता है
और यही सब शायद 
गंगा मैया को अच्छा लगता है
माँ हैं वोह हमारी 
हमसे प्यार वोह करती है
और देश को धन धान्य 
खुशियों से वोह भरती है
नमामि गंगे..नमामि गंगे..
नमामि गंगे नमो नमो



जय माँ गंगा भारती
करे हम तेरी आरती
तेरी धारा बन के जीवन

जन के पेट को पालती
जय माँ गंगा भारती...

लहराती बल खाती
जल से घाट संवारती
हिमालय की गोदी से उतर
सागर चरण पखारती
जय माँ गंगा भारती...

पवित्र तू कहलाती
मन का क्लेश उतारती
पाप को धोये जग तुझमे
तू उनको स्नेह दुलारती
जय माँ गंगा भारती...

कृतज्ञ हम सब तेरे जन 
एकत्रित हो कर पूजे सम
भावों की संध्या आरती 
जय जय माँ गंगा भारती..




"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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