Monday, June 11

" स्वतंत्र लेखन "-10 जून 2018




"धर्म"
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धर्म को तराजू से मत तौलो 

इसमें कई दर्शन हैं 
जो दृष्टि है 
ज्योति है 
कुछ भी हो 
तिमिर में राह दिखलाता है 

विशाल आकाश में 
बादल का मंडराना 
यह कर्म का काम है 
लेकिन आकाश में ठहरकर 
बादल का बरसना 
यह धर्म का काम है 

धर्म और कर्म में 
प्रतिस्पर्धा होने दो 
बारिश हुई तो 
सूखे खेतो में 
पटवन होने दो 
मगर जिन खेतो में 
हरियाली है 
उसपर रहम खाओ 

मेरी बात सुनो 
लोग भावना में 
बह जाते हैं 
जैसे बहते नालियों में 
तिनके की तरह 
धर्म जब घायल होता है 
रीत दर्द से छटपटाती है

आसमां में उड़ना 
चाहते हो तो 
जरूर उड़ो 
मगर मिट्टी से मुहब्बत 
जरूर रखना 
और यह याद रखना 
धर्म जहर नहीं प्राण है
यह ना हिन्दू ना मुसलमान है
@शाको
स्वरचित



मातृभूमि की रक्षा को जब जाओ मेरे वीर 
नगमे बन मैं गीत सुनाऊँ 

कि तेरे हौसले ना डगमगा जाए
शीतल मन्द पवन बन हौले से सहलाऊँ
कि कदम कभी ना रुक जाए
पाँवो में काँटे ना चुभ जाये कभी 
बन फूल तेरी राहों में बिछ जाऊँ 
यादों की तेरी मैं चूनरी पहनूँ 
बारूदी अंगारों से माँग अपनी भर लूँ 
गोलियों की बौछारो को खनकती 
चूँडियाँ समझ लूँ 
मौत से ना घबराना
तेरे पराक्रम से गजरे सजा लूँ 
तेरे शौयॆगाथा की मै टीका सजा लूँ 
माँ की दूध का तू कजॆ निभाना
बहनों की राखी की लाज़ बचाना 
ऐसे हो मेरे वीर तू
तेरी वीरा बन सौभाग्य पर अपनी इतरा जाऊँ 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल 
10 -06-2018




कविता क
ा सौन्दर्य 
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तुम शब्दों का अविरल प्रवाह 
मन में भर देती हो चाह
जितना डूबो लगता है
अभी और गहरी तुम्हारी थाह। 

उपमाओं की उठती जब लहर
रस भरी हिलोरें उठतीं ठहर ठहर
भीगा रहता मन का उसमें शहर
सुबह हो शाम हो या हो कोई भी पहर। 

कविता तुम्हारे पथ अनेक
सब ही सुन्दर एक से एक
शब्दों की अपनी गरिमा
रसों से कर देती अभिषेक। 

सौन्दर्य की अपनी शान
अध्यात्म की अलग पहचान 
प्रियतम की शीतल मुस्कान 
भर देती है मन में प्राण। 

कविता! तुम कवि की श्वास 
शब्दों में भरा अनुपम विश्वास 
लेकर आता है मधुमास
आता है सबको ही रास। 

कविता! प्रदर्शित करतीं तुम मन के भाव
चाहे आनन्दित हो या हो दुख का रिसाव
तपती धूप हो या हो शीतल छाॅव
विरही बेला हो या हो भरा हुआ लगाव।

कविता तुम जीवन की हो सुगन्ध 
तुमसे ही यह महकता मन्द मन्द 
तुम ही बाॅटतीं सबको अनुपम छन्द 
जोड़ देती अपनी शैली में स्मरणीय मधुर सम्बन्ध।




सुनता ही न था कोई सुनाता था रवां होकर। 
मकबूल हुआ कितना जमाने में फना होकर।


रहती है कोई रूह इसमें खामोश है कितना। 
हंसती हुई बस्ती का उजड़ा सा मकां होकर ।

छोटा ही था अच्छा बेहतर जो न बडा होता। 
कलम हुआ है दरख्त क्या खूब जवां होकर। 

चाहत के मुकदमे में शादी की सजा तय थी। 
मुहब्बत से है मुकरा खुद जिन्दा बयां होकर।

सोचूं के सवाँरू कैसे इस जमाने को सोहल। 
बिगडा है तबियत से तरक्की का निशां होकर। 

विपिन सोहल



 10/6/2018(रविवार )अंदाज अपना अपना शीर्षकःव्यंग्य विधाःछंदमुक्त
स्वतंत्र ः
मै मानता हूँ अपने देश मे 

बेरोजगारी घट रही है।
देखिये न कितने बेरोजगार 
अब रोजगारी पा गए
कहीं दनादन पत्थरबाजी तो
कहीं कबूतरबाजी चल रही है।
जिन्हें कोई कल तक 
जानता तक नहीं था आज उनकी
नेतागिरी की दुकान चल रही है।
कोई अपनी जातिवाद की 
तो कोई फासिस्टवादकी 
लाखों की नौकरी पा गया है।
कोई केवल कोर भाषणो से अपने ही
समाज को बरगला कर कार में घूमता
करोडों रूपये कमा रहा है।
उन्हें इससे अच्छा पैकेज अपने
कोई भी प्रधानमंत्री दे नहीं सकते।
फालतू की बातें करना अब बेमानी है,
ऐसी सदावहार पीढियों तक चलने वाली
नौकरी हमारी किसी पार्टी के रहनुमा
कभी किसी को दे नहीं सकते।
आपको पता हैअनपढ तक हमारे देश में
लाखों की नौकरी पा गये और पा रहे हैं।
ये सभीलोग अच्छे अच्छे डिग्री धारियों को
सडकों पर रोजाना रुला रहे हैं।
अनपढ आज हमें पाठ पढाते हैं
सदाचार हमें सद्व्यवहार सिखाते हैं।
कोई धर्म का पाठ पढाऐं पादरी
कहीं देश से दुश्मनी जताते कादरी
कहीं पंडित तो कहीं मौलवी दुकान खोले हैं
जब भी बोले हैं बिन तौले बोले हैं।
हम आपस में खूब लड मर रहे हैं
और यह सब अपनी तिजोरी भर रहे हैं।
इससे सबही बेरोजगारी घट रही है।
पर आप कहते बेरोजगारी बढ रही है।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी


जीवन मे तो सब -कुछ नश्वर है,
एक दिन सब ढह जायेगा।
ना कुछ लेकर आया था तु,

ना कुछ लेकर जायेगा।।

धन-दौलत के लालच मे,
सारे नाते तोड़ रहा ।
प्रेम की पूंजी छोड़ के तु,
ठगनी से नाता जोड़ रहा।।

अकल ठिकाने आयेगी,
जिस दिन ठोकर खायेगा....

जीवन मे तो सब -कुछ नश्वर है,
एक दिन सब ढह जायेगा।
ना कुछ लेकर आया था तु,
ना कुछ लेकर जायेगा।।

अंधा होकर दौड़ रहा है,
क्या साथ तेरे ये जायेगा।
ले भी जाता साथ मगर,
कफन मे जेब कहां से लायेगा।।

सुन ले मौत का मौन निमन्त्रण,
नही बहुत पछतायेगा।।

जीवन मे तो सब -कुछ नश्वर है,
एक दिन सब ढह जायेगा।
ना कुछ लेकर आया था तु,
ना कुछ लेकर जायेगा।।

मात -पिता की सेवा करले ,
करले जग में काम भला।
भाई बंधु से नेह बना कर ,
करले अपना नाम भला।।

होगा जग में नाम तेरा,
गर कर्म भला कर जायेगा...

जीवन मे तो सब -कुछ नश्वर है,
एक दिन सब ढह जायेगा।
ना कुछ लेकर आया था तु,
ना कुछ लेकर जायेगा।।

...राकेश पांडेय


अनकही सी बातें
अनसुने से किस्से
धूल में लिपटी मैं
अपने वजूद को ढूंढे

मिट्टी की है मूरत
मिट्टी की है काया 
मिट्टी से उठ के ही
मिट्टी में मिली मैं

पांवों के निशान ही 
मिट्टी में गहरे डूबे 
इक चांद की तलब में
मिट्टी में गहरे उतरे

कुछ पल सुकुनी काटे
मस्ती की ललक में
लिपटे थे धूल में हम 
जब खोजा हमको तुमने

नई सोच की तमन्ना
अंधेरे में जुगनू चमके
मिट्टी में डूबी काया
नई आकृति को चूमे

स्वरचित : मिलन जैन



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