Friday, June 22

"चंचल"21 जून2018



भा.21/6/2018( गुरुवार)शीर्षकःचंचलःःः विधाःः कविता ःः
बस यही प्रार्थना है परमेश्वर,
ये चंचल मन वश में हो जाऐ।

नहीं भटके ये इधर उधर अब,
श्री राम भक्ति में लग जाऐ।
भटक रहा मन अकारण यूंही,
लगा रहता है अपनी मस्ति में।
तत्पर रहता अशुद्ध कर्म करने
नहीं लगता है भगवतभक्ति में।
मन बहुत चलायमान भगवन,
इससे बडा नहीं चंचल दिखता।
बहुत सताता है ये हम सबको,
अभी यहाँ पल में कहीं पहुंचता।
चंचल चपल जटिलता मन की
इसकी गति प्रभु अपरंम्पार ।
वैज्ञानिकों का पता नहीं इसे,
अभी पकड़ नहीं सका संसार।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी


चंचल
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शोर मचाये चंचल मन 

दौड़ लगाये चंचल तन 
मदमस्त सा 
मदहोश सा 
हसीन वादियो को चुमता 
राह में अठखेलियां करता 

मासूम सी तितलियो को पकड़ता 
आसमां तक हाथ उठाता 
कलकल करते झरना के पानी को 
चंचल पैरो से छूता 
हरियाली सी घासो पर बैठ मुस्कुराता 

उन्मुक्त सा 
निश्छल सा 
खोकर ख्वाब में
ना जाने किस स्वर में 
संगीत सुनाता 
सबका दिल छू लेता 

रोम रोम सिहरन हुई 
चंचल आँखियां जब 
चाँद निहारी 
लहर चंचल तन में 
उठने लगी
प्रीत सा रंग चढ़ने लगा 

पर रूक गये जब कदम 
रूह ने आवाज दी 
पीछे आकर मोहब्बत खड़ी हुई 
फिर दिल से दिल का 
मिलन हुआ 
अब चंचल मन शांत हुआ 
और चंचल तन प्रेम में डूबा ।

@शाको
स्वरचित


चंचल चपल होता है बचपन यही उसकी पहिचान है

तमाम दुखों और कष्टों से रहता वोह अनजान है

जैसे जैसे समय बीतता बढ़ती उमर है उसे समझाती

क्या होती है चतुराई और दुनियादारी की समझ आती

यहीं से चंचलता और चपलता गायब होतीं ओढ़े रहता गंभीरता

कभी होम वर्क की चिंता कभी प्रोजेक्ट परेशान करता भारी बस्ता

क्या और कैसा है सिस्टम कैसी पढ़ाई अब आयी है

बच्चों की चंचलता चपलता खोयी कमर भी झुक आयी है


"चंचल'

चंचल मन मेरा धीरज

काहे न धरे।
जैसे प्रभु शबरी बैर खाओ।
वैसे ही प्रभु हमारे कुटिया
मे पधारो।
चंचल मन म्हारो धीरज धरो।

जैसे प्रभु अहिल्या को तारो
वैसे ही प्रभू हमारे घर पधारो।
जैसे प्रभू अजामिल तारो।
वैसे ही प्रभू हमको उबारो।

मन चंचल तो सबका होये
पर धर्य का साथ हम कभी ना छोड़े
प्रभु आवेंगे पार लगाने।
डूबते को तिनका वही दिलावे।

मन तो हमारा वैसा चंचल
जैसे मृगछौना हो मन
चंचल मन को बस मे करके
हम प्रभु का बस ध्यान लगावें।

प्रभु आवेंगे दरश दिखाने 
हे मन चंचलता छोड़ ।
धीरज धरो।
अबकी बारी हमारी बारी।
प्रभू ने सुन ली अरज हमारी।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव


तुमसे मिलना कुछ और नही,
बस भावों का खो जाना है।
प्रेम सिद्ध में आतुर हो,

मन का चंचल हो जाना है।।

कई बार मिले हम-तुम एकांत,
तेरे घर की अमराई में।
वो भोलेपन की थी उमर हमारी,
था वसन्त तरुणाई पर।।

अब ना तो ओ दिन ही रहे,
ना ही ओ आतुर प्रेम रहा।
अब ना ओ चंचल नैन रहे,
जिसने ओ सारा पीर सहा।।

अब प्रेम नही तिजारत है,,
बस पाना है बस पाना है...


 ''चंचल"

चैन चुराये चंचल नैन ।

मीठे मीठे से दो बैन ।
कासे कहूँ ये दिल का चैन ।
रहे ये दिल हरदम बैचेन ।

चंचल नार की नेह नजर ।
जोगियों को भुलाये डगर ।
ऐसा छोड़ जाये असर ।
छटपटाये वो जीवन भर ।

दवा न दें बेरहम निकलते ।
चंचल नैन किसे न छलते ।
रहे ''शिवम" हम आँखें मलते ।
देख महफिल अब राह बदलते ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



1
चंचल मन 
यायावर बन के 
घूमता जग


2
 चंचल नैन 
हृदय की चुगली 
पकड़ा प्रेम


3
हिरणी चाल 
चंचल चितवन 
नैन कटार

4
खेले चंचल 
रजनी की गोद में 
चाँद धवल

5
 चंचल मेघ 
पल में फिसलते 
गये विदेश

6
चंचल जल 
नदियों सा जीवन 
बहता पल

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