Monday, June 4

"स्वतंत्र लेखन" -3 जून 2018



 नमन 'भावों के मोती'
आज का विषय-स्वतंत्र लेखन
एक छोटा सा प्रयास


सबके होंठों पे एक खामोशी सी
मुस्कुराहट का इंतजाम कौन करे

सबके चेहरों पे कई चेहरे हैं
अब भला अहतराम कौन करे

मुश्किलों का है दौर कुछ इस तरह
बंद आँखों से आराम कौन करे

मची हुई है खींचतान रिश्तों में
मुँह पे अब राम राम कौन करे

अब सुकून की तलाश है हर पल
मुश्किलों को तमाम कौन करे

सदियाँ हुईं हैं चैन से सोये हुए
नींद का इंतजाम कौन करे

सर्वेश पाण्डेय
03-06-2018



गुजर रही है ये जिन्दगी जहालत मे 
लगा है मुक्कमिल जहाॅ की चाहत मे।

मिली जिन्हे मुक्कमिल जिन्दगी यारो
वो रहते सदा ही खुदा की इनायत मे।

कर न गिला बस शुक्र उसका करता रह
कमी न करना कभी रब की इबादत मे।

तू अपने आमाल पर हरदम नजर रखना
जमानत होती नही रब की अदालत मे।

जिन्दगी को हामिद खुश दिली से जिले तू
नही रखा है कुछ शिकवा शिकायत मे।

हामिद सन्दलपुरी की कलम से


तुम्हारे आघातों को,
प्रतिघातों को,


सह लेता हूँ मौन होकर।
दोष लक्षित हुआ ना अबतक,
किन्तु अपराधी से खड़ा हूँ क्योंकर ।।

उदासियों की भट्ठी में होम,
हो जाता हूँ तबतक।
तुम तृप्त हो न जाती जबतक।।

संविदा बनकर जलता रहता हूँ,
तबतक।
तुम्हारी क्रोध अग्नि शांत,
हो न जबतक।।

जब तक तुम शांत होती हो,
मैं राख हो चुका होता हूँ ।
पर तुम्हे ग्लानि नही किंचित,

पर मुझे अभिमान है,
मेरे जलने पर।
कमसे कम प्रेम की पवित्र अग्नि में
एकाकार तो हुआ।।

(राकेश पांडेय)



ए हमसफर मेरे
आ संग में झूमें
सागर के पार चलकर
डूबे चांद को ढूंढें

यूं अनमने से होकर
हमें देखते हो तुम क्यूं 
आओ लबों पे अपने
नए राग हम छेड़ें

भीनी सी खुशबू में
खो जाओ संग मेरे
आओ इस गुलिस्तां को
फिर से हरा हम कर दें

यूं खींच हाथ मेरा
बेसब्र हो रहे हो
आओ दिल की कसक को
रूमानी हम कर दें

यूं रूठ कर हमसे
खामोश हो गए हो
आओ इश्क को अपने
नई रुह हम दे दें

अठखेली करती लहरें
आगोश में भर लो तुम
आओ दिल की धड़कन को
काबू में हम कर लें

माना बहुत ही दिलकश
अंदाज़ हैं तुम्हारे
आंखो से कत्ल का
आगाज़ हम कर दें

रुसवा हो जिन्दगी से
खता बक्श दो मेरी
सदके तुम्हारे दिल के
कदमों में जां रख दें

स्वरचित : मिलन जैन


 शहर 

ये शहर जो कभी सोता नहीं

किसी की बेबसी में रोता नहीं
चकाचौन्ध में ग़ुम है
उजाला हो के भी दिखता नहीं

आँखों में पानी मिलता नहीं
रास्ता कहीं पहुंचता नहीं
गगन चूम रही इमारतें
जमीं पे कोई टिकता नहीं

रिश्तों का भी अता नहीं
पडौस में कौन पता नहीं
घड़ियाँ की बड़ी कीमत है
पर वक्त अब सस्ता नहीं

सुकून अब मिलता नहीं 
हाथ का सुख दिखता नहीं 
सपनों के पीछे दौड़ती जिंदगी 
कोई अब रुकता नहीं

ऋतुराज दवे

पंख लगाकर दिल ने ऊँचाई तो बहुत छुईं पर
नहीं जमाने को उसकी खुशियां मंजूर हुईं पर
पहले दिखलाए लाखों रंगीन ख्वाब फुसलाया
तोड़ दिए फिर सारे कुछ भी पास नहीं बच पाया
दिया सहारा झूठा इसको सब्जबाग दिखलाए
ऐसा छोड़ा फिर कि इसकी खाक नहीं बच पाए
लेकर हाथों में इसको वो खेले समझ खिलौना
दिल बहला कर अपना इसको दे दी मौत बिछौना
ये मासूम चला आया बातों में उलझ गया बस
उन तिरछे नैनों के जालों में ये "अनिल" गया फंस
समीर "अनिल"
३/६/२०१८ (स्वरचित)

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