Friday, June 8

" श्रृंगार"-8 जून 2018



मधुरस पावक अमृत प्याला।
अधर अंगारकृत जस ज्वाला।।

नकबेसर जस जीवन जाली।
मकराकृत कुण्डल मतवाली।।

केष घटा छाई करियारी।
नेत्र धनुह में काजर कारी।।

ग्रीवा सुन्दर समत सराहु।
जस के पुष्प पुंकेशर पाहु।।

वक्ष उठान पर्वत सम तोरे।
जस रजत थाल दो स्वर्ण कटोरे।।

कटि प्रदेश बहु उत्तम पसरा।
ढांक सके ना हरित अंचरा।।

अन्य प्रदेश पैरन सुघराई।
मरम कोयु बरन ना पाई।।

पायल-नूपुर उ ध्वनि गुंजारत।
जस मंदिर घड़ियाल है बाजत।।

अस मूरत जाकर होय जाई।
ताके धरा पर स्वर्ग हो जाई।।

जिनके नेह इनसे टुट जाई।
कह राकेश होई जोगी भाई।।

......राकेश


श्रृंगार
*****
प्रकृति ने किया 

कैसा अद्भुत श्रृंगार
सुंदर छटा बिखेरी
जैसे सजती नार।
ऊँचे ऊँचे पर्वत
हिम् से हैं आच्छादित
कल कल बहते झरने
हो रहे हैं उन्मादित
पतझर बीत गया अब
आई नई बहार
प्रकृति ने किया 
कैसा अद्भुत श्रृंगार।
स्वर्ण हरीतिमा बिखरी
पंछी कलरव करते
नदियों के प्रवाह में
मन हमारे हैं बहते
श्रावण मास की बूंदों से
भीगे तन मन द्वार
प्रकृति ने किया
कैसा अद्भुत श्रृंगार।
सर्वेश पाण्डेय


श्रृंगार
हरे,हरे वस्त्र पहनकर।
प्रकृति ने किया श्रृंगार।

देख,देखकर मन हर्षित हो।
इसका अजब रूप,निखार
लाल,पीले फल लगे इसमें।
लगे ये और भी न्यारा।
कैसा अद्भुत रूप है इसका।
दुनियाँ भर में प्यारा।
दिल करता है,देखते जाएँ।
दिन,रात, सुबहो,शाम।
कितना भी देखूँ, मन नहीं भरता।
आँखों को लगता देखकर आराम।
इसी रूप,श्रृंगार पर।
कवि ने कविताये लिखी अनेक।
अद्भुत सृजन है ये देव का।
देखें सभी लोग,बूरे हों या नेक।।
स्वरचित
वीणा झा
8जून2018


 ''श्रंगार"

गली गली ब्यूटी पार्लर की दुकान अब दिखती है

स्वाभाविक सुन्दरता भी कुछ अलग मायने रखती है 

सजने को तो ये श्रष्टि भी कभी सजती है 
मगर समय पर ही सजने को वो कहती है ।।

हर सीख सिखाये श्रष्टि पर इंसा को कहाँ जँचती है 
पशु पक्षी अनुकरण न छोड़े , बीमारी उन्हे न लगती है ।।

हर क्षेत्र अब व्यापारिक आज जेन्टस पार्लर पनपती है 
पैसे से बौराये इंसा पर दुनिया धूल झोंकती है ।।

सजने की चाहत बेहद दर्द भी अब सहती है
स्किन सर्जरी तक भी सजने की चाह पहुँचती है ।।

नश्वर काया को सजाना कुछ सोच उजागर करती है
अध्यात्म पर पैर रख भौतिकता ''शिवम" पसरती है ।। 

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


चंद हाइकु 
विषय -श्रृंगार 


(1)
प्रकृति करे
धरती का श्रृंगार
रूप हजार
(2)
तारों की चिंदी
नभ के श्रृंगार में
चांद की बिन्दी
(3)
मन भरमा
नारी के श्रृंगार से
फूल शरमा
(4)
तन का घडा
श्रृंगार के रस से
यौवन भरा
(5)
रुप सत्कर्म 
आत्मा के श्रृंगार से 
सच्चा निखार 
(6)
रवि श्रृंगार
साँझ की मांग भरे
सिन्दूरी लाल


भावों के मोती💐
8-6-2018
शुक्रवार
(
श्रृंगार )
***************************
सौंदर्य में जो रची बसी,वो प्राण प्रिय शकुंतला है
अंतर्मन वो खिला खिला ,मधु के प्याले जैसा है।।

पूर्ण चंद्र भी स्वयं लजाए,उर्वशी,मेनका नगण्य है
नयन तड़ित पात करें जो,वोकोई ओर नही , शकुन्तला है।।

केशों में गजरों की वेणी,मदहोशी सी ले आती है
अंतस में बहती सरिता है,दूर बहा ले जाती है।।

ऋतु वसंती देख के तुझको,हया से मारी जाती है
श्रृंगार रस की खान है जो,वो कोई ओर नही, शकुन्तला है।।

दर्पण में चेहरा देख मयूर ,धूमिल सा हो जाता है
गहन जुल्फों गहना है वो,दमक कही भी जाता है।।

इंद्रधनुष भी देख उसको,लज्जित सा हो जाता है
जो छुईमुई सा पौधा है,वो कोई ओर नही, शकुन्तला है।।

वीणा शर्मा


आज के विषय " श्रृंगार" पर मेरी ये रचना " इंद्रधनुष" आप सबकी नजर. 
इंद्रधनुष


मेरी तिरछी तिरछी चितवन में,
कितने बिखरे है इंद्रधनुष
आज कुछ ऐसी बात करो,
अपने प्यार का रंग मिलाकर,
पिया जी, मेरा हार करो, श्रंगार करो।
आज कुछ ऐसी बात करो 

दो नयनों के नीले तरूवर में,
आस-निराश के गहरे सागर में,
नजरों से मुझ को प्यार करो
फिर कुछ भूली, कुछ याद करो
प्रियतम रंगो की बरसात करो।
आज कुछ ऐसी बात करो………..

लिख दो मेरे गुलाबी अधरों पे,
एक काव्य सृजना इस जीवन की
फिर तुम,तुम ना रहो, मै, मै ना रहूं
ऐसा मिलकर शब्दार्थ करो,
पिया जी, नख शिख तक हरसिंगार करो।
आज कुछ ऐसी बात करो………..

माथे की लाल चमकती बिंदिया से,
अपने विश्वासों का सौपान करो,
सूरज सा दमकता तेज लिये,
गहरी पीड़ाओं का दान करो,
प्रियतम , मेरे सिन्दूर का मान करो।
आज कुछ ऐसी बात करो………..

चाँदी सी चमकती रूनछुन पायल में,
उम्मीदों के स्वेद सुखद सवेरे हैं,
देखो, कान्हा की मुरली में जैसे
मन भरमाती मीठी रागों के फेरे हैं, 
पिया जी, मेरी धड़कन का आभास करो।
आज कुछ ऐसी बात करो………..

जुल्फ घनेरी श्याम सलोनी अलको में,
सावन का बहकता आवारा बादल हैं,
अल्लहड़पन , चंचल मन से उड़ता
भीनी खुश्बू से लिपटा आंचल है
अपनी तन्हाई मे अब दो पल तो विश्राम करो।
आज कुछ ऐसी बात करो………..

इक बंधन है रंग बिंरगी चूडी में,
जलतंरग सा जादू बिखरी रंगत है,
कुछ नाजुक सी, पर अनमोल, भोली सी,
अल्फाजों में तुझे बंया करती मेरी हसरत हैं
सजन जी, इसकी खनखन का अहसास करों
आज कुछ ऐसी बात करो………..
अपने प्यार का रंग मिलाकर,
पिया जी, मेरा हार करो, श्रंगार करो।
-------डॉ. निशा माथुर /8952874359


 हरित श्रंगार कर चमक उठी ये धरा
मुस्करा कर महक उठी हे ये धरा
***

मानस हृदय उछल पडता देख धरा
वर्षा, तपीस, शरद,सहती हे ये धरा
****
अन्न धन से भरपूर श्रंगारित होकर
चमम चमाती दिखती हे ये धरा
**** इश्वर के सृजित वरादान को देखे
सोलह "श्रंगार"करती "मोहन" ये धरा


भावों के मोती नमन
शीर्षक--"श्रृंगार "
धरती तेरी गोद हो

आलोकित शैशव हो
उषा सी बाल्यावस्था हो
हरियाली डगर हो
तपती धूप सा यौवन हो
ईमान मेरा धर्म हो
समभाव सदभाव कर्म हो
दिल में मेरे प्रेम हो
सादगीपूर्ण जीवन हो
लगन मेरी सच्ची हो
छोटी छोटी खुशियाँ हो
गम भूलने की शक्ति हो
गोधुली सी शाम हो
नीरव तिमिर विभावरी हो
चित्त शांत वृध्दावस्था हो
जीवन में मेरे ऐसे सोलह श्रृंगार हो
प्रभु!!!!कामना मेरी ना अधूरी हो

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल


"भावों के मोती "
शुक्रवार 8/6/18


श्रंगार 
--------
नयनन कजरा धार कटीली 
,चारू चितवन चोर
घूंघर केश कपोलन झूलें 
छाई घटा घनघोर 
रुनक झुनक पग पैंजनीया 
धूरि भरे कन्हाई 
पीत वसन किंशुक अधरा 
जसुमति हिय हरसाई 
खेलत फिरत नंद अंगना में 
कोटि काम कन्हैया 
निरख रूप अनूप हरि को 
भई सखी बावरिया ।

सपना सक्सेना 
स्वरचित


इस रंग बदलते जमाने पर
इतना सा करम तुम और करो।
वैसे ही तुम हो बेहद हॅसी
श्रृंगार पर इतना न गोर करो।

चैहरे से हटा लो जुल्फो को,
इस चाॅद को रौशन होने दो।
हाथो से छिपाकर इसको तुम,
क्यू अंधियारा धनघोर करो।
वैसे ही हो तुम बेहद हॅसी, ,,
ये दिल है तुम्हारा दिवाना, 
शम्मा पर शैदा हो परवाना।
इन लटके झटके से भी तुम,
यू दिल ना मेरा कमजोर करो।
वैसै ही तुम हो ,,,,,
हामिद सन्दलपुरी की कलम से


 II श्रृंगार - 1 II

तन श्रृंगार किये मैंने जिसके लिए बहुतेरे....

दिल ने नाम रटा जिसका हर शाम सवेरे....
उस वैरी ने लूटा मुझको प्यार कभी न कीन्हा...
जल के भस्म हुए फिर सारे सपने मेरे....

नाग का श्रृंगार और तन पे है भस्म रमाये...
बंद आँखों से देखे मधुर मधुर मुस्काये...
जग ये सारा है बस उसी का ही दीवाना...
जटाजूट मृगशाला बैठा जो ध्यान रमाये...

कर कर तन श्रृंगार दिया क्यूँ समय गंवाये...
बिना रूह शृंगार के चेहरा रहा मुरझाये...
करोगे श्रद्धा से अर्पण जब 'भावों के मोती'...
'चन्दर' तुम महकोगे जग भी दोगे महकाये... 

II मौलिक - चन्दर मोहन शर्मा II



 II श्रृंगार - 2 II
जो मिल जाते तुम एक बार...
ख़्वाब मेरे सब सच हो जाते...

मिल जाता मुझे सारा संसार...
जो मिल जाते तुम एक बार...

पलकों पे मैं बिठाता तुम्हें...
नयन जल नहलाता तुम्हें...
ह्रदय अंग पहनाता तुम्हें...
साँसों की माला कर अर्पण...
करता मैं यू फिर तेरा श्रृंगार....
जो मिल जाते तुम एक बार...

भावों के मैं थाल सजा कर...
प्रेम का तिलक लगाता तुम्हें... 
मिलते जब नैनों से नयना मेरे...
प्रेम भोग बनता मेरा प्रसाद...
रोम रोम भर लेता मैं तेरा प्यार...
जो तुम मिल जाते एक बार.... 

हंसी तेरी से मैं राग चुराता... 
दिल साज पे उसे सजाता...
दोनों के दिल की धड़कन को...
गीत बना मैं तुम्हें ही सुनाता...
रिझाता नाच नाच मैं तुझको...
ताल तेरी पायल की झंकार....

जीवन मेरे में जो खुशियां हैं...
अर्पण तुम्हें कर देता सब मैं...
पहना के हर सुख मुस्कान... 
ले लेता तेरा हर दुःख मेरी जान...
'चन्दर' देता तुमको ये उपहार... 
जो मिल जाते तुम एक बार..


 श्रंगार"
माथे पर टीका हो मान का,

नैनों में कजरा हो हया का,
लबों पर सजती रहे मुस्कान,
कंठ मे हो सरस्वती का वास,
हृदय हों में दया के भाव,
रखे उदर मे सारी बात,
चाल में रखे सदा संयम,
इन गहनों का श्रंगार,
करती है जो नार,
सम्मान की है वो हकदार
स्वरचित-रेखा रविदत्त


संवर के आईने में जो मुस्कुरा देते हैं। 
आग ठहरे हुए पानी में लगा देते हैं। 


हाय आलस भरी आँखों की कसम।
लेके अंगड़ाई वो तूफान जगा देते हैं।

सिहरन से रोम- रोम मेरा कांप उठा। 
छुअन से ऐसे मुहब्बत में भिगा देते हैं।

रूठ कर जब वो पलटते हैं मुस्कुरा के। 
जैसे नमकीन को मिश्री मे पगा देते हैं। 

जो देखे मेरी आँखों मे डालकर आंखें। 
मेरे ईमान को पल भर में डिगा देते हैं। 

विपिन सोहल


"श्रृंगार "
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उजाड़ा गया जब चमन,
सूखने लगे फूल 
रौंदा गया जब खेत, 
उगने लगे शूल 
कोई मुझे बता दे ,
कैसा श्रृंगार हो रहा है 
खुदा, सजदा मेरी सुन,
उपवन को सजा दे,
उजड़ते हुये गुलिस्ताँ का 
जीवन संवार दे 
वतन की हिफाजत हो 
बलिदान चाहता हूँ 
पाक्-ए-कफन तिरंगा जैसा 
श्रृंगार चाहता हूँ।

लहूलुहान है सरहद 
रात-दिन चलती है गोलियां 
शत्रु है चालबाज 
करता है छुपकर वार 
बारूद है बन्दूक है 
और है तोप 
उस पार शत्रु मुल्क है 
जिसका इरादा नापाक है 
आज लहू से लिख दे 
धरा पर नाम मेरा 
पाक्-ए-हिन्दुस्तां तुझे सलाम है मेरा 
ऐ वतन मेरी एक फरियाद सुन 
जग मेरी माँ को कहे 
"है यह शहीद की माँ "
अपने माँ के लिये ऐसा मैं श्रृंगार चाहता हूँ 
कटे धर मेरा वतन के लिये 
ऐसा वरदान चाहता हूँ ।।

आगे शत्रुओं का देश हो या उसका बसेरा 
बांधकर माथे पे कफन 
हम आगे बढ़ चले हैं 
डरकर हमारे पराक्रम से 
शत्रु पीठ दिखा रहे हैं 
मुस्कुरा रहा है हिन्दुस्तां 
नापाक् मुल्क रो रहा हैंं 
हिन्दुस्तान जिन्दाबाद का, स्वर चाहता हूँ 
शक्ति, शौर्य यश का श्रृंगार चाहता हूँ।।।

फौलाद सा है स्थूल मोम बना दे 
मेरे मधुबन में आ 
अपने वतन का राष्ट्रगान सुना दे 
फिर जाकर सरहदो पे 
दुश्मनो के दाँत खट्टे कर दें 
और आसमां में तिरंगा फहरा दें 
कटे शीश मेरा वतन के लिये 
ऐसा उपहार चाहता हूँ
वतन के लिए मैं "शाको" ऐसा
श्रृंगार चाहता हूँ।।।।
@शाको
स्वरचित

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"कांच /शीशा ""10अक्टुबर 2019

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