Thursday, June 7

" उपहार"-7 जून 2018





उपहार
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मेरे इस जीवन का सुन्दर

अनमोल उपहार हो तुम,
पतझड़ को जिसने खत्म किया
ऐसी एक बहार हो तुम।
1-जब तुम रहती पास हो मेरे
लगता सारा जग अपना है
प्रेम और विश्वास न टूटे
बस तुझसे इतना कहना है
तन मन जिसने भिगो दिया
ऐसी मेघ मल्हार हो तुम
मेरे इस ......
2-सारी दुनिया सिमट गई है
साथ तेरा जब मैंने पाया 
प्यार,समर्पण, त्याग, धैर्य,
सुंदर मन सुंदर काया
जिसने मन झंकृत कर डाला
ऐसी वीणा की तार हो तुम
मेरे इस......
सर्वेश पाण्डेय

 ''उपहार"

उसने दिये जो उपहार

मैंने किये वो स्वीकार ।।
मगर गुलदस्तों में काँटे थे 
मैं रोया रातों आँसू डार ।।

मैंने उसे उपहार नही माना
उसे कोसा , बोला मानमाना ।।
मगर बुरा न माना उसका बड़प्पन 
आज जब हकीकत पहचाना ।।

मेरी खुशी का न रहा ठिकाना
फूल बिखरे , काँटों का दर्द गया ना ।।
ढूड़ते रहे वैध आखिर कर मिल गया
मिली जो दवा असर मुश्किल है बताना ।।

वो हमारा परम हितेषी है
वो नही कोई विदेशी है ।।
वो बहुत परिचित है हमसे 
उसने हमारी फितरत देखी है ।।

उससे नही होना नाराज 
उसके उपहार समझना ताज ।।
मगर काँटे भी लपेटता है ''शिवम"
हमें तो उसके उपहारों पर है नाज ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




भा.7/6/2018( गुरुवार)शीर्षकःउपहार ः
विधाःःकविता ः
उपहार दिया श्री राम ने जो

किसी के काम आ जाऐ।
भगवान से मिली हमें सौगात
जरूरतमंद के काम भी आऐ।
इस काया की क्या रहेगी कीमत,
समय पर जो किसी के काम न आऐ।
तन दिया परमात्मा ने उपहार में हमें।
मन दिया कुछ करने के लिए हमें।
नहीं आऐ किसी के काम ये तनमन,
किस काम का जो दिया विधाता ने हमें।
उपहार पाने पर प्रसन्नता बहुत होती है।
तवियत इसे पाने पर बाग बाग होती है।
प्रसन्नता हमारी और भी बढ जाऐं अगर
दें उपहार बेटी को जो खुशी को रोती है।
जो कुछ भी दिया समाज ने सम्मान
बडा उपहार है हम सबको।
मिला है जो कुछ जरूरत पर समझें
निश्चित लौटाना है हमको।
जैसा करेंगे हमें वैसा ही भरना है
ये हमारा नहीं जमाने का दस्तूर है भैया
जरूरी है लौटाना उधार नहीं रखना
जो भी तनमनधन उपहार मिला हमको।
स्वरचितः इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी।




"उपहार"

क्या उपहार दूँ.. 

तुम्हें मैं...
क्या उपहार दूँ... 
वस्त्र दूँ गरीब तन को....
या अमीर चाटुकार बनूँ...
तुम बोलो क्या चाहिये...
तुमको मैं....
क्या उपहार दूँ....

अट्टहास करते दानव की...
भुजा उखाड़ दूँ...
कोमल काया से या कोई...
खिलवाड़ करूँ...
बोलो न तुमको, मैं...
क्या उपहार दूँ....

कुत्तों से खाएं छीन जो... 
उन्हें भोजन ओ प्यार दूँ...
या तेरे अहम को मैं... 
माला-हार दूँ...
बोलो न तुमको, मैं...
क्या उपहार दूँ....

धूप में जलती भुनती काया...
अपना पेट जो भर न पायी...
उसको खाना दो बार दूँ...
या तेरे पेट को मैं...
और विस्तार दूँ...
क्यूँ चुप्प हो तुम बोलो न...
तुमको, मैं...
क्या उपहार दूँ....

ज़मीर अपना मार कर मैं...
बेशर्मी...बेहया सत्कार करूँ...
नहीं तुम्हें मैं देख देख...
खुद को ही मार लूँ...
क्यूँ मौन धरा तुमने अब...
बोलो ज़रा..तुमको, मैं...
क्या उपहार दूँ.....

जिभ्या मौन..शिथिल अंग हैं... 
धरती पे तेरे नयन गढ़े हैं...
इन्हें पुकार करूँ...
या पत्त्थर हो मैं मौन धरूँ...
बोल न तू...तुमको, मैं...
क्या उपहार दूँ.....

निश्चल ...निर्मल प्रेम..
आरूढ़ नहीं हो तुम...
निर्लज्ज..निरंकुश...आरोही तेरा...
क्या आह्वान करूँ...
फूटो तो ओ शिला मस्तक ...
मैं तुम्हें....अब...
क्या उपहार दूँ....

मौलिक - चन्दर मोहन शर्मा 




 * उपहार * 

तुमको पसंद आए वो उपहार कहां से लाऊँ 

तुमको जो अच्छा लगे वो प्यार कहां से लाऊँ ....

साथ तेरे रह के सीखा आंखों को पढते हो तुम 
दिल की बात कह सकुं वो इजहार कहां से लाऊँ ....

खुदा ने है खुद बनाया वो नूर बेमिसाल हो तुम 
जो तुम को सजा सके वो श्रंगार कहां से लाऊँ .....

खुशनसीब है वो जिसको तुम सा प्यार मिले 
बेसब्र है इतना दिल ये इंतजार कहां से लाऊँ .....

चाहत बस यही अब साथ मिले तेरा उम्र भर 
जो दिल को सुकून दे वो करार कहां से लाऊँ .....

कमलेश जोशी 
कांकरोली राजसमंद


गुलाब में समेट के प्यार दूँ
तुम्हें भावों का उपहार दूँ


तुम्हारे प्रेम में मौन, निःशब्द
अपने जन्म तुझे हजार दूँ

महक रही साँसो में मेरी
अपने प्राणों का उद्‌गार दूँ

तुम्हारे फूल से हाथों में 
अपने मन का संसार दूँ

चुन लूँ काँटे दामन से तेरे
तुम्हें फूलों की बहार दूँ

ठहरो अब मेरे ही दिल में
धड़कने तुम्हीं पे वार दूँ

दिल के घर आईना है तू 
कि आओ खुद को मैं सँवार दूँ


******उपहार *******
मिला ऐसा उपहार मुझे 

महक उठी बगिया मेरी 
चहक उठा अँगना मेरा 
परि सी गुड़िया को देख 
खिल उठा चेहरा मेरा

हाथ जोड़ शत शत नमन करुँ 
ईश्वर ने दिया अनूठा वरदान मुझे 

घर अपना किलकारियों से गूँजने लगा
मुसकान उसकी खिलखिलाने लगी 
मैं भाव विभोर निहारती रहती 

सार्थक मेरा जनम हुआ 
सबसे प्यारा उपहार मिला 
बिटिया ने जब *माँ* कहा

नन्हें नन्हें पाँवो से चलकर
माँ सरस्वती के द्वार चली 
सफलता ने जब कदम चूमा
एकदिन ऐसा उपहार मिला 

दूर देश को चली एकदिन 
अग्रसर शिक्षा की ओर हुई 
नयन अब रहते प्यासे 
निहार सकूँ एकबार उसे 

सोचती रहती हूँ अब तो 
मिला कैसा उपहार मुझे 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




"उपहार'

अनुनय करूँ मैं तुमसे
मत दो उपहार कोई मुझे।

आईना दिखाऊँ मैं तुम्हे
बस अपने कर्म को सुधार लो।

उपहार देना है तो मुझे दो
मुझे एक वचन आज।

मत बर्बाद करो तुम अन्न का
किसानों के मेहनत को समझो।

जो हैं बेबस गरीब लाचार
उन्हें दो बस थोड़ी सी प्यार।

नाहक हो तुम परेशान
मुझे नही चाहिए कोई उपहार।

इतिहास है गवाह
उपहार के है काँटे हजार।

बस करो तुम मानवता से प्यार।
यही है मेरा सच्चा उपहार।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।



 उपहार 
🔏🔏🔏🔏

प्
रशंसा से सुगन्धित हार
कितना अनुपम यह उपहार 
और जब सबकी मुस्कराहट घुल जाती
हो जाता है यही त्योहार। 

बच्चों का मुस्कानी उपहार 
भर देता है अनुपम प्यार
माॅ का स्वभाविक दुलार
ले आता है चमत्कार। 

भर जाते सारे अखबार 
दुश्मनों में मचती हाहाकार 
रणबांकुरा भर कर हूॅकार
पाता वीर चक्र उपहार। 

अब हमारी प्यारी बालायें
गौरवान्वित करती शालायें
कीर्ति की पहनती मालायें
पूरी करती अपनी अभिलाषायें

यह भी है एक सुन्दर उपहार 
विमान ले जातीं गगन के पार
शत्रुओं को देतीं ललकार
ताकि भारत माॅ का न उजड़े श्रंगार।




"उपहार"
बच्चों को देते आए,
सदा से माँ-बाप उपहार,
उज्जवल हो भविष्य उनका,
करते मेहनत बेशुमार।
माँ-बाप के लिए है आज,
ये सबसे बड़ा उपहार,
अपनी व्यस्त जिदंगी से,
दो उनको भी वक्त और प्यार।
होगा खत्म उनका सुनापन,
बरसेगी दुआवों की बारिश,
प्रसन्न रहें अगर मात-पिता,
उपहार स्वरूप मिलेगा आशीष।
स्वरचित-रेखा रविदत्त



"उपहार"
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ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 

लोकतंत्र की मर्यादा दूँ 
या अमन या उस चमन का सुमन दूँ 
जिस चमन में पर्णपात ना होता हो 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
शुचिता का मधुबन दूँ 
या गरिमा का मकरंद 
या उस मिट्टी की महक दूँ
जिस मिट्टी का शूरवीर करते हैं तिलक 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
धर्म का आचरण दूँ 
या कर्म का लिबास 
या उस संस्कार की धार 
जिसमें हो बंधुता का वास 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
गगन का बादल 
या धरती के अश्रु
या भूखी हड्डियों की 
चीख 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
वज्र सा स्थूल 
या लोहे के कान 
या पत्थर सा दिल 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
कल्पना सी विधि की अम्लान 
या पल पल छाते घन के अंबार 
या व्याकुल संसार 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
सजग,प्रदीप्त ज्योति की लौ 
या नन्हे-मुन्ने की अरमान 
या जाकर सरहदो पर अपना शीश 

ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 
अगम,आनंद, जलधि 
या अपने बदन का लहू 
या खेतो में प्राण 
समभाव ,सदभाव हैं पहचान तेरे 
ऋषियों ने ,मुनियो ने, 
संतो ने, सूफियों ने, साधुओ ने,फ़कीरो ने अपने तप से 
तुम्हें सिंचित किये हैं 
ना जाने कितने शहीदो ने अपने लहू से तेरे तन को सींचे हैं
आज बोल 
ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ 

ना जाने कैसी हवा चली है 
सूख गये हैं उपवन के सारे फूल 
कलियाँ चमन छोड़ चली हैं 
पर्वत पर्वत रो रहे हैं 
हर तरफ चित्कार सुनाई देती है
गाँव गाँव झोपड़ी उजड़ी हुयी है
अर्धनग्न बदन, भूखे पेट 
जन रहते हैं 
ऐ स्वर्ण मुल्क 
है तू कहाँ सोया हुआ 
उठो, जागो और खोलो कान आँख मुँह
और बोलो 
क्रंदन, रूदन का उपहार दूँ 
या नील कुंज का स्वप्न 
या चंद्र किरण का चित्र 
या कंपकपाते होंठो की 
मुस्कान 

शून्य 
या चहक
या किसानो का चौपाल दूँ
सूखा है पन और पनघट यहाँ 
ऐ मुल्क बता कैसे तुझे 
गागर का यौवन दूँ

चिन्ह नहीं जब 
माँग, कलश, काजल, सिन्दूर का 
तब कैसे सुहाग का उपहार दूँ
किस तरह से मीठे बोल बोलकर ?
युग युग का संदेश दूँ

ऐ मुल्क बता कहाँ खोजें
आज
बुद्ध, महावीर, गाँधी 
कि विवेकानंद जैसा उपहार दूँ 

हे जहाँ माँ का पुण्य तरल 
निर्भय गंगा बहती है 
प्रभात जहाँ मधुर स्वर देते हैं 
उस स्वर्ण भुवन सा मुल्क को क्या उपहार दूँ 
कीचड़ सा खेतो का 
या फटे चिटे मटमैले बिछौने का उपहार दूँ
मैं तुच्छ अदना सा 
ऐ मुल्क तुम्हें क्या उपहार दूँ
@शाको
स्वरचित

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