Tuesday, July 3

"आईना"02जुलाई 2018


भावों के मोती
2-7-2018
आईना/दर्पण


चुलबुली हंसी
चेहरे नशीं
गमों पर है पर्दे
दर्पण में दिखते।।

लाख छुपाना
गम का फ़साना
आईने से सीखों
हकीकत दिखाना।।

पारदर्शी सा तन
निश्छल हो मन
दर्पण सा बन
सँवारों जन्म।।

वीणा शर्मा




हृदय के आईने में निहारूँ सियाराम को।
दिल के आईने में निहारूँ सीताराम को।

निर्मल हो जाऐ कहीं मेरे मन का आईना,
निश्चित निशदिन मै निहारूं घनश्याम को।

कैसे करूँ साफ अपने दिल का आईना।
प्रभु धरूँ ध्यान फिर देखूं मनका आईना।
हृदय पटल उज्जवल कर पहुचूँ सामने ,
दर्प छोड निहार सकूँ आत्मा का आईना।

रागद्वेष से पुता हुआ सब मेरा ये आईना।
वैरभाव से लिपा हुआ सब मेरा ये आईना।
आत्मग्लानि से सना आत्मावलोकन करूँ,
बर्षों से धूल चढी साफ करूँ मेरा ये आईना।

ईश कृपा से ही साफ कर सकूँ मै ये आईना।
भक्ति भजन से कहीं धो सकूँ मै ये आईना।

 मनोविकारमुक्त हो अगर अभिमान हट सके,
निश्चित ही चमकदार बना सकूँ मै ये आईना।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना, म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी



कभी-कभी यूं ही, बैठे बैठे,मुस्काना अच्छा लगता है,
खुद से खुद को भी, कभी चुराना अच्छा लगता है,
लोग कहते है की मैं ,धनी हूं मधुर स्वर्ण हंसी की,
निस्पृह बच्चे सी निश्चल बन जाना अच्छा लगता है।

वासंती संग मोह जगाना, जूही दलों संग भरमाना,
सतरंगी सुख स्वप्न सजाना, सब अच्छा लगता है
जब बन जाते है यादों के , बनते बिगङते झुरमुठ
असीम आकाश में बाहें फैलाना अच्छा लगता है।

मन के आतप से जल, कुनकुनी धूप में फुर्सत से
भाग्य निधि के मुक्तक को रचना अच्छा लगता है,
नन्हें पंछी का तिनका -तिनका नीङ बनाना देख,
अभिलाषाओं पे मर मिट जाना अच्छा लगता है।

धूप धूप रिश्तो के जंगल, नहीं खत्म होते ये मरूथल
जलते सम्बन्धों पे यूं, बादल लिखना अच्छा लगता है।
पूर्णविराम पे शून्य बनकर, शब्दो से फिर खाली होकर,
संवेदनाओं पे रोते रोते हंस जाना,फिर अच्छा लगता है।

दर्पण देख देख इतराना, अलकों से झर मोती का झरना
अन्तर्मन के भोज पत्र पे, गीत सजाना अच्छा लगता है।
कभी-कभी यूं मुस्काना और गालों पे हिलकोरे का पङना
मधुमय वाणी में कुछ अनबोला रह जाना अच्छा लगता है।

-----------डा. निशा माथुर



मैं सच्चाई यारो छिपाता नही
सुनो आईना झुठ दिखाता नही।

तू नफरत यहाँ आदमी मत करे
ज़हाँ जिंदगी का भरोसा नही।

बनाना है मुझको फसाना नया
झगड़ने का मेरा इरादा नही।

मैं झुकता हुँ गिरता नही, आदमी
तमाशा बनाना यूँ आता नही।

है सारा जमाना दिवाना मिरा
ले रिश्ते निभाना,मिटाना नही।

मुझे हर कली को घूरना नही
मैं आशिक हुँ यारो यूँ भौरा नही।

लगा के यूँ दिल तोडना न सनम
ये दिल मेरा कोई खिलौना नही।

यहाँ काम तो ठीक आता नही
सियासत चलाना तमाशा नही।

तुझे वक्त का अब तकाजा नही
ले करना यहाँ अब बहाना नही।

सियासत मुझे यार नाटक लगी
मैं हूँ आदमी कोई बच्चा नही।

सियासत लगी लूटने रूपया
जमा बैंक में पैसे करना नही।

प्रदीप रामटेके
लांजी, मध्यप्रदेश

जब तलक टूटा न था तो होने का क्या मायना था
जब टूटा तो पता चला दिल तो महज़ आईना था


खड़े हैं यूं मुकद्दर के सामने
हो आईना जैसे पत्थर के सामने

देखते ही देखते वो हद से गुजर गया
आईना था पत्थर से लड़ गया

बहरूपिए बन फिर रहे, करते कितना ढोंग
आईने के रूप में, पत्थर जैसे लोग

वो ज़ालिम सितमगर है जो, शक्स वो हमारा है
जिसके दिल की ज़मीं पे पांव के, नक्श हमारा है
मैं उसकी आंखों को आईना यूं ही नहीं कहता
खुद देख लो तुम, उनमें अक्स जो हमारा है




"भावों के मोती "
सोमवार - 2/7/18
दैनिक लेखन 

शीर्षक - आईना 

आईना 
---------
आईना मैं आईना 
बोलता हूं सच सदा 
जिसको भी गुमान है 
आये सामने जरा, 

हमसफर हूं मीत हूं 
गुनगुना लो गीत हूं 
मुस्कुरा के देखा जो 
रंग ही निखर गया, 

तुम्हारा ही तो रूप हूं 
छाया भी हूं, धूप हूं 
रात हो तो रात मैं 
दिन हुए तो दिन कहा, 

दाग खुद के देखिये 
मुझको यूं ना फेंकिये
कौन सच बताएगा 
मैं अगर बिखर गया ।।

सपना सक्सेना 
स्वरचित


गोविन्द सिंह चौहान

मां के आचल की छांव और
मासूम बचपन के वो दिन
जरूरत नहीं थी उस चेहरे को
आईने की... 
निश्चल मुस्कान,मासूमियत ही
काफी थी आईने को आईना दिखाने के लिए।
दौर बचपन का गुजरा तो 
जमाने की दहलीज़ पर आ बैठे
आज शीशमहल की दीवारों पर
लगा लिए आईने महंगे
मासूमियत को निगलकर ये अब
मुखौटा सजाकर बाहर भेजते है
ताउम्र गलतफहमियां सिर पर छाई रही...
अपने-पराये की पहचान छूपाते रहे आईने
ये बद्जुबां,शातिर आईने...
कहते हैं- जैसे है वैसा ही प्रतिबिंब दिखाते है..
अपने ही चहरे से मुलाकात कराते है
दिल के ग़ुरूर को भी छूपा जाते है आईने
नज़र आते ही भूले चहरे,ख़ामोश हो जाते है
जवानी के कई राज दफ़्न है इस आईने में
वो गुजरे लम्हें आज आईने में नजर नहीं आते
वक्त-बेवक्त सच दिखा जाते है
अकेले में मुखौटा हटा लेते है आईने
यूँ तो सजने-संवरने की चीज है यह
कभी-कभी अपने ही चहरे से डरा जाते है आईने



न भी एक आईना है
प्रकृति प्रदत्त नगीना है
जितना यह निर्मल होगा
अध्यात्म में सफल होगा। 

यह आईना बहुत गन्दा है
तभी तो आदमी दरिन्दा है
सात साल की बच्ची से घिनौनी हरकत
और वह पिशाच अभी तक ज़िन्दा है। 

मन के आईने ने चमक खो दी
मानवता बुरी तरह रो दी
सौ सौ प्रतिशत अंक ले आये
लेकिन नैतिक पढ़ाई पूरी धो दी। 

धुंधलाती आॅख पथ ढूंढती है
और संवेदना आॅख मूंदती है
जिस किलकारी पर तमन्ना लुटा दी
अपने पैरों से वही छाती रुंदती है।

आईने सब अब तो टूट गये
अहम से बुरी तरह फूट गये
फूटे फिर जुड़ते भी कहाॅ है
जोड़ने वाले भी तो रुठ गये।


 आईने से आज आप मुलाकात कीजिए
दिल ही दिल में दिल से जरा बात कीजिए


सूरत पे अपनी एक नज़र डालिए हुजूर 
जरा ढूढिए तलाशिए चेहरे का खोया नूर
खुशियों से भरी जिंदगी की रात कीजिए 
दिल ही दिल में दिल से जरा बात कीजिए

नुक्स निशां सब आपके दिखाएगा आईना
सच्चाई को कभी न तुमसे छुपायेगा आईना 
फिक्रो अमल रुहानी बस दिन रात कीजिए 
दिल ही दिल में दिल से जरा बात कीजिए

मुश्किलों में हो कोई तो खुद साथ दीजिए 
मांगे कोई तो बढ़ा के अपना हाथ दीजिए 
यूँ जुल्मों सितम की शह की मात कीजिए 
दिल ही दिल में दिल से जरा बात कीजिए 

विपिन सोहल



हाँ, मैं हूँ आईना
सब करते मेरा सामना।
अपनी काम मैंने है
सच्चाई से निभाई।
नही मुझे किसी का भय
नही कोई मुझे डिगा सकता
कोई लोभ।
हो जाये यदि मेरा टूकड़ा
तो भी मैं दिखाऊँ
असली चेहरा।
हर एक के हाथ मे हो
यदि एक आईना
बदल जाये समाज
का तस्वीर।
मेरे नजर मे है सब
एक समान।
न करूं मैं कोई
भेद भाव
सच्ची तस्वीर दिखाना
है मेरा काम।
मैं हूँ आईना।
समाज की आईना
स्वरचित आरती श्रीवास्तव।

हकीकत बोल जाता है
नहीं खामोश रहता है
आईना राज़ नहीं रखता
भेद सारे खोलता है

बहरुपिये लोग होते है
लोगों संभलना ज़रा इनसे
खुद को दोस्त कहते है
खंजर दिल में रखते हैं

आईना है नहीं ऐसा
न ही वो बैर रखता है
जो जैसा है बताता है
न पीछे से वार करता है

इंसान है बड़ा खुदगर्ज 
नहीं खुद में झांकता है
धूल लिपटी है चेहरे पे
दोष आईने पे डालता है

बड़ा नाजुक है दिल इसका
संभलना ज़रा यारों
ज़रा सी ठेस लगते ही
ये टूट कर बिखरता है

शीशा पारदर्शी हो 
तो आर पार दिखता है
परत चढ़ते ही आईने में
सबकुछ साफ दिखता है

अपने दिल को भी तुम
आईने सा बना डालो
कुछ गुण इसके लेकर तुम
जीवन अपना संवार डॉलो

स्वरचित : मिलन जैन


बैठ आईने के सामने,
खुद को ही ढूँढ़ रही हूँ,
दूसरों की खुशी के खातिर,
फनाह खुद को करती जा रही थी,
आईने ने आज ये दिखा दिया,
रश्क करता था जमाना जिस चेहरे पर,
आज वो मुरझाने लगा,
देख आईने में अपना अक्श,
नजरों से नजरें मिलाई थी,
जागी लौ आत्मविश्वास की,
लबों पर मुस्कान आई थी,
भरने को एक नई उडान,
दिल में तरंग इक जागी थी,
उम्मीद की एक किरण,
आईने से ही तो पाई थी 

स्वरचित-रेखा रविदत्त
2/7/18

II आईना-२ II

चलो ज़िन्दगी को हम आईना बना लें....
दुःख सुख हरेक के हम इसमें बैठा लें....
रहे न कोई अपनों में फिर पराया....
मन दर्पण में सब को हम ऐसे बसा लें....

नज़र से नज़र मिले तो मूरत दिखे सबकी...
किसी को फिर नहीं हो शर्मिंदगी कभी भी...
चलो हाथ अपने से हर दामन बचा लें....
लूटेगा न अब कोई भी खुद को जता लें....
चलो ज़िन्दगी को हम आईना बना लें....

मेरा घर तेरे घर सा होगा नहीं भले ही....
कोशिश करें हम अपनी दीवार गिरा लें....
फूल तेरे घर के खुशबू बिखेरें मेरे घर..
दुःख तेरे सभी मेरी धड़कनें संभालें....

चलो ज़िन्दगी को हम आईना बना लें...
दुःख सुख हरेक के हम इसमें बैठा लें....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II




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