Wednesday, July 4

"गुरुर"04जुलाई 2018




*****(】 मेरा गुरुर 【)******

झुकता जरूर हूँ, पर गिरता नही हूँ रे,
जीत के लिए,हमेशा लड़ता जरूर रे,
हार कर भी मैं बन जाता बाजीगर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरुर है।

झुठ बोलते है ओ,ये उनका का कसूर रे,
सच बोलकर मैं,दुश्मनों से लड़ता जरूर रे,
लड़ता रहूंगा मैं,दुनिया से जरूर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरूर है।

जीत कर भी दुश्मन,हजार बार सोचता जरूर रे,
हार कर भी ओ,कैसे हो गया मशहूर रे,
आएगा मेरा दिन,एक बार जरूर रे,
तेरे शहर में हो जाऊंगा,मशहूर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरुर है।

नाराज हो गया मुझसे,आज फिर एक खजूर रे,
करता नही हूँ मैं "जी हाँ हुजूर" रे,
दुनिया मे बस मेरा,इतना सा कसूर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरुर है।

मर रहे है लोग,और जवानकिसान रे,
दिल्ली में भी है,इसकी पक्की खबर रे,
अंधी हो गयी है सरकार,कहूंगा जरूर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरुर है।

दिल तोड़कर मेरा ओ,हँसते जरूर रे,
मेरे बारे में सोचकर,बिस्तर में रोते जरूर रे,
इस बात की मुझे लगी है पक्की खबर रे,
मुझे अपने प्यार पर पक्का गुरुर हैं।

रोज पिता शराब हूँ,पर रहता होश मुझे जरूर रे,
तेरी हर बात की मुझे पक्की खबर रे,
भूलता नही हूँ अपने घर का पता ,जरूर रे,
मुझे अपने होश पर,पक्का गुरुर है।

मर कर भी दिल मे,जिंदा रहूंगा जरूर रे,
तेरे शहर में मैं हो जाऊँगा, मशहूर रे,
इस बात पर मुझे,पक्का गुरुर है।

" प्रदीप रामटेके"
लांजी,मध्यप्रदेश



भावों के मोती
दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता
दिनांक 4.7.18

विषय गुरुर
रचयिता पूनम गोयल

गुरूर है मुझे स्वंय पर कि मैं नारी-शक्ति हूँ ! 
एक पुरुष को जो जन्म दे , मैं ऐसी शक्ति हूँ !!
मेरे हैं अनेकों रूप , उन सभी में मैं सशक्त हूँ !
मैं माँ हूँ , एक बहन हूँ , एक पत्नी हूँ !
और ऐसे , न जानें , कितने रिश्तों में विभक्त हूँ !!
अपने परिवार की धुरी हूँ मैं , उसके लालन-पालन को सम्भालती हूँ मैं !
जब पुरुष व्यस्त हो कारोबार में , तो अपने अपनों की रक्षा करती हूँ मैं !!
कहता है संसार मुझे अबला फिर भी , क्योंकि अपनी शक्ति नहीं जताती हूँ मैं !
वरना तो वज्र-सम सीना है मेरा , हिमालय भी हंसते-हंसते , पार कर जाती हूँ मैं !!


जय माँ शारदे
सबको नमन,वन्दन।
4जुलाई2018

B.s.city'
गुरुर
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
जो भी बने हम आज हैं।
देश के भरोसे हीं आज हैं।
देश पर होते मगरूर हैं।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
तन,मन,धन करें न्योछावर।
धन्य हुए जन्मे जो इस धरती पर।
चिंता,फ़िक्र से हम दूर हैं।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
नाज करते हैं कि हम भारतीय हैं।
सब देशों से हम सभ्य हैं।
अपने देश का अलग नूर है।
मुझे अपने देश पर गुरुर है।
स्वरचित
वीणा झा


गुरूर करूँ किस बात का मै,
यहाँ मेरी क्या औकात है।
जो कुछ भी मिला मुझे सब,
उस अखिलश्वर की सौगात है।

मात्र दिखावा करता हूँ मै,
सब बनावटी है ये मस्ती।
जीवनाधार प्रभु चरण हैं मेरे,
नहीं कुछ भी है मेरी हस्ती।

तनमनधन सब उसका है तो,
गुरूर करूँ किस चीज का मै।
सबकुछ ही जब उस दाता का,
क्यों किसका अभिमान करूँ मै।

ये महिमा तो उस परमेश्वर की है,
क्यों नहीं उसका गुण गाऊँगा।
मै तो केवल मिट्टी का पुतला हूँ, 
एकदिन मिट्टी में ही मिल जाऊँगा।

सर्वस्व यहीं छोडकर जाना है,
इस रजकण में मिल जाऊँगा।
सदकर्म किऐ कुछ मैने तो फिर,
इस मातृभूमि पर खिल आऊँगा।
स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.




नश्वर है ये काया प्राणी 
नश्वर सारा संसार
किस गरुर में जीये प्राणी
जिंदगी दो दिन की बहार

मेरा मेरा का राग अलापे
नहीं यहां कुछ तेरा
दो दिन की है कहानी
दो दिन का रैन बसेरा

'मिट्टी की है काया प्राणी
मिट्टी में मिल जाए
रूप रंग पर गरुर तू करता
ये कभी न साथ निभाए

भागे तू माया के पीछे
माया तो है ठगनी
आज तेरे साथ चले वो
कल राह पकड़े अपनी

तू गरुर में अंधा होकर
पाप कर्म कर जाए
अंत समय जब आंख खुले
तो फिर काहे पछताए

रिश्ते नाते भूल गया सब
हो मद के नशे में चूर
पड़ा अकेला सब को पूछे
जब हो गए सारे दूर

गुरुर के सुरूर में
है सारे मदहोश
श्रेष्ठता की दौड में
सबने खो दिए होश

खाली हाथ जग में आया
खाली हाथ ही जाएगा
सत्कर्म तू कर ले प्राणी
ये ही साथ निभाएगा

नश्वर है ये काया प्राणी 
नश्वर सारा संसार
गरुर को तज़ दे प्राणी
कर ईश्वर का आभार

स्वरचित : मिलन जैन


ुरुर में ऐसा क्या सुरूर है
कि आदमी इस नशे में चूर है
दुनियां तो बस एक सराय है
और जाना यहां से बहुत दूर है। 

आख़री में होने चाहिए कन्धे चार
गाड़ी घोड़े आदि सब बेकार
गुरुर है सांसों का व्यापार 
उसके बाद सब अन्धकार। 

गुरुर हो बताओ तो किस बात का
वक्त अज्ञात मृत्यु से मुलाकात का
पता नहीं सुबह का और रात का
पता नहीं उस समय के हालात का।

चिता सब कुछ जला देगी
राख में बिल्कुल मिला देगी
गुरुर करने वालों समझ लो
यह तुम्हारा साम्राज्य हिला देगी। 

मरते समय कोई साथ होगा क्या पता
देखते देखते ही प्राण होंगे लापता
मौत हर गुरुर को बतायेगी धता
कोई नहीं सुनेगा तुम्हारी है क्या ख़ता



देख देख तन आपना, काहे का अभिमान....
खिलौना टूटे पल में, आन पड़े शमशान....

माया काया मोह का, रिश्ता बड़ा अजीब...
सगा कोई रहा नहीं, जिसके हुआ करीब....

बेटे का गरूर किया, बाप हुआ करजई...
दानवीर दुनिया कहे, कर बेटी विदाई...

भूपति जन्मांतर सोच कर, नापता है धरती...
बिसर गया मिलती कहाँ, दो गज ऊपर धरती...

खानदान मिटटी मिला, रावण किया गरूर...
'चन्दर' रख मन में हरी, हरे तेरा गरूर.... 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II


4-7-2018
गुरुर
गुरुर न कीजिए कभी ,पल भर की ये शान है
चाँद की चांदनी भी ,सदा न उसके साथ है
बादलों की बारात ने,ढक लिया जो चाँद को
चाँदनी भी खामोश है,ये कैसा गुरुर है।।

हुस्न पर ये गुरुर क्यो,छलका सा ये जाम है
बूंद-बूंद जो छलक गई,इसकी क्या बिसात है
हुस्न न रहा एक सा सदा,गाँठ बांध लो सभी
इस हुस्न में जो बह गया,फिर अंधेरी रात है।।

गुरुर कीजिए सदा, धरती पर इस जन्म का
गुरुर कीजिए सदा,मात-पिता वरद हस्त का
पल पल समय बदलरहा,संभल जाओ अब सभी
गुरुर कीजिए सदा, सफलमय मानव जन्म का।।

वीणा शर्मा


जिसने किया गुरुर अंत उसी का होता है
काटेगा फसल वही जो किसान बोता है
मत कर इंसान घमंड इस जीवन मे

घमंडी का सीर हमेशा निचा होता है

P.k. गर्व का प्याला मद में चुर होता है
घमंडी इंसान सभी रिश्तों से दूर होता है
किया रावण ने भी घमंड मरना पड़ा उसे
इस दुनिया में घमंडी हमेशा मजबूर होता है



गुरूर
जिस मिट्टी के कण कण में 

ईश्वर का वास है 
जहाँ स्वर्ण सा सबेरा है
चिड़ियों का बसेरा है
हरियाली आँचल में 
ममता की छाँव है 
जिसकी रक्षा को
वीर कुरबान है
जन्म ऐसी वीर भूमि पर 
मन मेरा मगरुर है
तकदीर पर अपने गुरुर है
************************
तेरे सादगी की मैं पूजा करुँ 
तेरे प्रेम की मैं वंदना करुँ 
आचरणों पर तेरे 
मैं जीवन अर्पण करुँ 
मिला ऐसा सुहाग का
वरदान मुझे
भाग्य पर अपने गुरुर करुँ 

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




गुरूर 
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गीत गज़ल में मत बांधो
जो कहना है वो कहने दो 
गुरूर नहीं , एक दरिया है 
जज्बात कलम से बहने दो...

सीधा-सादा दिल है ये 
पर पीड़ा में रो उठता है 
हलचल जैसे सागर में 
दर्द कहीं पर चुभता है 
जो पाया वो लिख डाला 
है ख़ता अगर तो करने दो...

और किसी के पदचिह्नों पर 
चलना मुझे मंजूर नहीं 
हालात के आगे झुक जाऊं 
ऐसी भी मजबूर नहीं 
या तो मेरे साथ चलो 
या फिर तन्हा रहने दो ........

स्वरचित 
सपना सक्सेना




गुरूर है मुझे उस अपनेपन का

जो हैं मुझे अपनो से मिलता।
गुरूर है मुझे उस सम्मान का
जो मुझे दुसरो से मिलता।

ये सीख दे जाता है मुझे
मत अपमान करे हम दूसरो का।
गुरूर है मुझे उस अनुराग का
जो है मेरा जीवन संबल।
दिला रहा है एहसास मुझको
होने का कुछ खास आज।

गुरूर है मुझे उस आदर का
जो दिलाये यह एहसास
नही करना है मुझे किसी की उपेक्षा
बस करना है सबसे प्यार।

गुरूर है मुझे उस उपासना का
जो दिलाये मुझे भक्त होने का एहसास ।
धर्म की रक्षा करें हम सदा
बस करे हम भगवान से प्यार।

गुरूर है मुझे उस सम्मान का
जो हमेशा याद दिलाये
नही उड़ाना मखौल किसी का
यह संकल्प हमेशा याद दिलाये।

गुरूर है मुझे उस आचरण का
जो मुझे यह याद दिलाये
अकारण हम न सताये किसी को
करे हम सब जीवों से प्यार।

इतने सारे गुरूर तो मैने तो 
बस इसलिये है पाले
सतत प्रयास करते रहे हम
और न कभी चूक जाये हम।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।




रहता नही यौवन रहता नही धन 

गुरूर फिर किस पर जानें श्रीमन ।।

बहुतों को देखा है नपते हुये 
अपनों के आगे झुकते हुये ।।

बहतर है जानें अन्तस में कौन 
रहता है जो हरदम ही मौन ।।

कीजिये मुखर उसकी आवाज
पहचानिये जीवन के गहरे राज ।।

जीवन मिला जो जानिये जरा
व्यर्थ के गुरूर में कुछ न धरा ।।

फैंकिये गुरूर की जो चादर पड़ी
जानिये ''शिवम'' ये दीवार है बड़ी ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



जरा ठेस लग जाय जो,होते चकनाचूर
सम्हले से सम्हले नहीं, आइना,दिल, गुरूर

रावण कंस चले गये, तुम हो क्या हजूर
नश्वर इस संसार में, टिकता नहीं गुरूर

उसे नाज़ है अपने तीरे नज़र पे
हमें भी गुरूर है अपने जख्मी जिगर पे

ये वक्त एक दिन, सब लूट ले जायेगा
तेरा है जो भी कुछ, यहीं छूट जायेगा
ये किस बात का दंभ भरते हो दोस्त मेरे
गुरूर किसका रहा है,तेरा भी टूट जायेगा

पाकर उसे अब मगरूर रहता हूं मैं
उसके इश्क के सुरूर में रहता हूं मैं
सिवा उसके न कुछ दिखाई दे मुझे
लोग कहते हैं कि गुरूर में रहता हूं मैं


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"बहुत गुरूर है आदमी को 

आदमी होने का 
वक्त आने पर श्मशान 
उसका गुरूर तोड़ देता है"

आदमी हूँ या आदमी जैसा हूँ
स्वयं स्वाभिमान स्वयं गर्व हूँ 
मिट्टी हूँ धुंआ हूँ ओस कण हूँ
नहीं तो धरती का पुत्र हूँ 

उड़ना चाहता है 
जो ऊंचे आसमां में
साहस उस उड़ान का 
हौसला हूँ 
घूमता ढूंढता हूँ
प्रेम जगत में 
जगत कहता है 
प्रेम का रूप हूँ 
बैठ धरा पर
गगन देखता हूँ
रवि का कर रहा 
इंतजार हूँ 
जलकर राख हो 
चुका हूँ कई बार 
आदमी रह न सका 
क्या आदमी हूँ।
@शाको
स्वरचित




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