Monday, July 9

"हरीतिमा"09जुलाई 2018


हरित -हरीतिमा देख कर
प्रकृति का यह उपहार 

धरती सज दुल्हिन बनी 
लख,अम्बर करे मनुहार ।

प्रभु चरणों में जो पुष्पार्पण करते।

सभी इस बसुधा से हमको मिलते।
बृक्षारोपण से हरीतिमा छाऐ तब,
हृदय सुमन हम सबके ही खिलते।

आओ मिलजुलकर हम बृक्ष लगाऐं।
इस वसुंधरा को अपने हाथ सजाऐं।
रंगबिरंगी पुष्पित फुलबगियां हो ये,
हम हरित क्रांति दुनिया में फैलाऐं।

ऐसी हरीतिमा कर दें हम पृथ्वी पर,
मनमयूर सबका पुलकित हो जाऐ।

 देखें इसे जब इस जगत के प्राणी,
उन सबके मन प्रफुल्लित हो जाऐं।

हरीभरी वसुधा हमको खुश कर देगी।
ये अप्रतिम खुशियाँ मनको हर लैंगी।
हृदय कुसुम अपने खिल जाऐंगे जब,
हरित क्रांति हरीतिमा यहाँ बिखरेगी।

सुखद प्रसून खिलाऐं सब धरनी।
मधुर फलों से लदी हो यह अवनी।
फल खाऐंगे इसके हम सब प्राणी,
माँ भारती भारतभूमि सब अपनी।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी



शीर्षक :-हरीतिमा 

आज मौसम में उमस सी हैं 
हवाओं में कुछ नमी सी हैं 
लगता हैं बारिश तो होगी पर
फिलहाल कुछ कमी सी हैं

बहने लगी हैं पुरवाई जब से 
नवजीवन ने ली अंगड़ाई तब से
'हरितिमा' की चूनर ओढ़ 
धरती संवरने लगी हैं तब से

मिट कर बनना बनकर 
फिर मिट जाना होता है 
जीवन में निखरने के लिए
बिखर जाना होता है
-मनोज नंदवाना




हरीतिमा की हल्की चादर ओढ़ती धरती

टहलते आस्मां तले ज्योत आँखों को मिलती ।।

मगर बादलों से जो हमने कर ली है बुराई
उसकी कीमत हमारे साथ पशुओंं ने चुकाई ।।

सबकी भोजन व्यवस्था प्रभु ने थी बनाई 
मगर इंसा ने दिखाई अपनी बुद्धि चतुराई ।।

प्रकृति में आग लगाई अब मुसीबत है छाई
बदले मौसम के रूप हरियाली न दी दिखाई ।।

अषाढ़ निकले बारिष की न हुई अगुआई 
धरती लगती सजी सँवरी दिखी बेहयाई ।।

हरी चादर ओढ़ने को वो तरस रही भाई
एक भूल ''शिवम" करे कितनों की रूसवाई ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



दैनिक कार्य स्वरचित लघु कविता
दिनांक 9.7.18

विषय हरितिमा
रचयिता पूनम गोयल

हरितिमा -हरियाली , मानव को प्रकृति-प्रदत्त एक अद्वितीय एवं अद्भुत देन !
जी चाहता है कि प्रकृति माँ , तेरी हरितिमा में खो जाऊँ !
व दीन-दुनिया से पृथक् , मैं अपनी एक दुनिया बसाऊँ !!
तेरी नदियों , झीलों एवं झरनों , के संग मैं खेलूँ !
तेरी सुन्दरता को मैं , अपने इस आँचल में भर लूँ !!
हरे वृक्षों की घनी छाँव , मुझे बहुत-अधिक भाती है !
जिससे मुझे अपनेपन की , महक सी आती है !!
कभी चाहूँ कि पर्वत की ऊँची चोटी पर जा बैठूँ !
कभी चाहूँ कि धरती को ही अपना बिस्तर बना बैठूँ !!
कभी घने बादलों की ओट में , जा छुप जाऊँ !
तो कभी बारिश की बूंदें बनकर , सबके ह्रदय को ठंडक दिलाऊँ!!
अनुपम , अद्भुत व मनोहारी , छटा है प्रकृति तेरी !
माँ के आँचल-सा सुकून देती है , यह गोद तेरी !!
अभिलाषा है मेरी कि तुझसे कभी-भी दूर न जाऊँ !
एवं तेरे इस सानिध्य में ही , मैं अपना पूरा जीवन बिताऊँ !!

खूब सजी हैं धरती हमारी
हरी चुनरियाँ की घूंघट निराली।

पेड़ों पर पंछी चहचहाय
हरी भरी रहे धरती हमारी
सदा गुलजार रहे ये कोटर हमारी।

गंगा जमुना बहे रसधारा
कह रहे है हमें हरीतिमा लुभाती
हिमालय, बिन्ध दे रहे चेतावनी
संभल जाये धरती वासी

पेड़ न काटे न काटे जंगल
वरना विनाश हो जायेगी
हरीतिमा हमारी।
चारो ओर प्रकृति की हरीतिमा
देख मन म्यूर यो नाचे

कितना सुंदर, कितनी प्यारी
है धरती माँ हमारी।
हम सब तो है उनके बच्चे
कुछ तो फर्ज बनती हमारी।

धरती की रक्षा करे हम सदा
और सरक्षिंत करें हम जंगल को
पानी को बबार्द न करें हम
नये पौधे हम अवश्य लगाये

तभी बची रहेंगी हरीतिमा हमारी
जिससे जुड़ी है भविष्य हमारी।
हमसब मिलकर ले एक प्रण
सरक्षिंत करें हम पेड़ हरदम।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव



हिय ,तन मेरा डोल रहा,
कर सोलह श्रृंगार
कब आएगी मधुरिमा,लेकर मधुर बहार
जब कोयल की कूक सुनी,
हिय ,मयूर सा डोल गया
हर गली-गली और उपवन में
श्रृंगार हरीतिमा हो गया।
खग-विहग भी डोल रहे
बरखा भी थी इतरा रही
हौले-हौले ,रिमझिम-रिमझिम
धरा पर पांव पसार रही।
देख हरिमय हरीतिमा,देव भी हर्षा रहे
तन -मन पुलकित हो रहा
बैकुंठ वापिस न जा रहे।


वीणा शर्मा
स्वरचित मौलिक 9/7/2018



बूदों के साज पे हरीतिमा, चपल चपल डोले है मन साजन 
झूमे है धरा,पावों मे बूदों की पायल संग रास, है रचा मन
मेघों की डोली में झूमती आई, आज मेरी वर्षा बनकर दुल्हन
फैली नभ में सूरमें की डिबिया, आज चिंहुक उठा अन्तर्मन,

शब्द उगाते उमङते आये बदरा, कहीं धूप के छुटपुट छन्द!! 

बूदों के संगीत पे हरीतिमा, थिरक थिरक पाँव की थिरकन 
मेरी कोमल इच्छाओं पे, वो नीले नीले आसमान का नर्तन, 
महुऐ सी गंध सा मेरा अन्तस तक कैसे बहका महका मन,

 हाथों की मेंहदी में यूं हरियाली तीज का , सुघङ सा अंकन, 
सावनी आकाश, यादों के हिंदोल झूलता, गाता मेरा सावन।

बूदों की सरगम पर हरीतिमा, वो लरजती सी बोली का कम्पन 
होठों पे आते ही मेरे दो रूके बोलो का, फिर से मल्हार गायन 
अलकों से झरती गहराती सी शाम का, धुंधलका सा आवरण 
भीगे तन पर कुछ टेसू के फूलों के साथ खिला खिला चन्दन 
उल्लासित मयूरी सा असंयमित बूदों की सरगम सा मेरा मन।
----------------- डा निशा माथुर



प्रकीर्ति सजाई जहां को अपने हर रूप रंग...
जीवन जीने का इस से हर जीव पाए हैं ढंग....
है हरियाली जीवन संदेस धरा का ये सबको....
तुम रखोगे खुश मुझे मैं रखूँ खुशहाल तुमको...

ले प्रकाश सूर्य का पौधे करते हैं साँसों का दान....
आक्सीजन सब को बाँटते पर न करते अभिमान.....
फिर भी न जाने क्यूँ न समझे इंसान बना शैतान....
करे कत्ल अंधाधुन्द पेड़ महल बनाये आलिशान... 

न हों गर ये पेड़ पौधे न होगा आक्सीजन निर्माण....
सोचो कैसे ज़िंदा रहेगा धरा पे कोई भी ए इंसान....
न चहकेगी चिड़िया कोई न कोयल गीत गायेगी...
महल अटारी चढ़ देखना जब बारिश न आएगी....

न मयूर नाचेगा वन में न ही नाचेगा वो तेरे मन में....
सोच सोच अपना कृत्य तू पछतायेगा फिर मन में....
बेटी से रौनक है घर की हरियाली से धरा की है....
बेटियां वंश निर्माण करती हैं सृष्टि निर्माण धरा से है....

II स्वरचित - सी.एम्. शर्मा II


प्रकृति
हरीतिमा धारण किए
एक नव यौवना
चाँद सी बिन्दिया
सूरज सी आभा
चमचमाती रश्मि सी चुनर निशा
पूरवाई से उड़ते केश
आहहह बेहद खूबसूरत छटा
अपने अंक में समस्त सुन्दरता
समेटे 
रंगबिरंगे प्रसून से श्रृंगारित
महकती मदमाती
आसमान को निहारती
मेघों को पुकारती
कि वे प्रेम रस बरसाएँ
और उसे पूर्ण करें
इस अद्‌भूत मिलन को देख
कोयल मीठे गीत गाए
दादूर ताल की थाप बजाए
मोर भाव विभोर हो पंख फैलाकर नृत्य करे
साक्षात लक्ष्मी सी अवतरित
प्रकृति
सुख एवं समृद्धि का प्रसार करे
इस अनुपम सौन्दर्य पर
दरिन्दे गाज बन कर गिरे
इसके सम्पूर्ण सौन्दर्य को
ध्वस्त करे
मेघ भी दुःख से विह्वल होकर
पलायन करे
और लक्ष्मी स्वयं दुःखी हो
रसातल में जा छिपे
चलो एक अनुपम प्रयास करें
दरिन्दों की मानसिकता बदले
लक्ष्मी का आहवान करें
मेघों की मनवार करें
फिर से प्रकृति को हरीतिमा का
उपहार दें
और सौन्दर्य मिलन का ह्रदय से रसपान करें

स्वरचित : मिलन जैन




प्रकृति की शोभा कितनी निराली है, 
चारों ओर देखो कितनी हरियाली है,

ये पहाड, सरोवर, बहते झरने, 
नित्य सिंगार करते हैं इसका, 

हरियाली की सुन्दर चादर पहने, 
जैसे बैठी नयी नवेली दुल्हन सजे, 

सावन के इस भीगे मौसम मे, 
तीज में लगा ली प्रकृति ने हरीतिमा! 

"संगीता कुकरेती "




खु
श कर देती है ललिमा 
खुश कर देती हरीतिमा 
सौन्दर्य के ये अद्भुत पृष्ठ 
इनकी नहीं कोई सीमा।

प्रकृति का जब होता आॅचल हरा
उमंगों का मेला लगता सब ओर भरा
पतझर भी दिखता डरा डरा
धरती का वक्ष लगता उभरा उभरा।

पक्षियों के गूंजने लगते तब कलरव
दृश्य बदलते सुन्दर नव नव
अलौकिक होती प्रकृति की छव
चमकता प्रकृति का हर अवयव।

लगता हरी विशाल चादर बिछाई है
सब ओर नृत्य करती तरुणाई है
यह भावों की ऐसी प्रेम सगाई है
जिसमें बजती मधुर शहनाई है।

इसमें प्रकृति के अद्भुत राग
और चान्द बनता स्वयम चिराग 
उजला हो जाता हर भाग
दमकता प्रकृति का सुहाग। 

स्वरचित 

सुमित्रा नन्दन पन्त

1

खोदकर धरा हरीतिमा खोजते हो 
मारकर बेटियाँ मुस्कान खोजते हो
आदमी हो आदमी की संवेदना देखो 
दबाकर अबला की ध्वनियाँ 
संगीत खोजते हो 

2

जलाकर चमन खुश्बू ढूंढते हो 
मिटाकर अमन चंदन ढूंढते हो 
आदमी हो आदमी की संवेदना देखो 
रौंदकर अबला को शीतल परागकण ढूंढते हो 

3

धुँधले गगन को ना ताको
अपने आँगन में निहारो 
अगर चाहते हो 
असंख्य पुष्पों की खुश्बू 
तब सुमन जैसी बेटियों को ना मारो 

4

अगर हर घर में बेटियाँ 
मिटाने जाने लगी तो 
हरीतिमा कहाँ से लाओगे 
अपने घर में मुस्कान 
कहाँ से लाओगे 

5

अब रूक जाओ 
ठहर जाओ
आदमी हो 
आदमी जैसा काम करो 
सोई हुई संवेदना को जगाओ
बेटियाँ घर की हरीतिमा 
होती है यह बात समझो

6

अपने आँगन से चमकते 
चाँद की चाँदनी ना मिटाओ
अपने घर को वीरान ना बनाओ 
गुम होती ध्वनियों को गूँजने दो 
छूप गयी है जो विभा
उसे आलोकित होने दो 
नव पल्लव को मखमली सा होने दो 
धरा की खूबसूरत हरीतिमा है ये 
इसे भी जीवन जीने दो 
घर आँगन में इसे भी चहकने दो 
आओ इनके जीवन को 
सुगंधित करें 
इनके बिना हरीतिमा नहीं 
सब को सच बताएं 
बेटियाँ ही धरा है 
बेटियाँ ही हरीतिमा है 
यह बात बताएं

@शाको
स्वरचित

दैनिक लेखन 
शीर्षक - हरीतिमा 


देख सखी घुमड़ घन आए !
सुध लीन्ही बिरहन धरती की
लोचन जल भर लाए...

अंग लगा के भीनी पवन को 
आतुर तरू लहराये...

झुक झुक चूमे वसुंधरा को 
पल पल नेह बरसाए ....

सज धज बैठी नववधु सी 
हरीतिमा में छिप जाए ......

सपना सक्सेना 
स्वरचित



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