Thursday, July 12

"महक"11जुलाई 2018





घर में जन्मी,एक नन्ही परी,
महक गयी हर गली-गली,
कितनी सुन्दर, कितनी कोमल, 

लगती कितनी भली-भली, 
फूलों की खुशबू है उसमें, 
घर की बगिया महक गई, 
चहक रही तुतलाती सी वो, 
रोम-रोम मेरा खिला गई, 
घर में जन्मी ,एक नन्ही परी, 
महक गयी हर गली-गली!
महक उठें सब आंगन द्वारे।
खिल उठें प्रभु हृदय हमारे।
नहीं चाहिए हमें और कुछ,
प्रफुल्लित हों संसारी सारे।

"महक"
मेरे देश के मिट्टी के कण कण मे महके
भारतवासी का प्यार दुलार।

यहाँ होती हैं नारी -शक्ति की पूजा
भक्ति-भाव से महके घर बार।

जब आये बसंत बगिया मे
महक उठे प्रकृति का प्यार
नित्य नये कोंपल खिले
खिल उठे भौंरौं का प्यार।

उमड़ घुमड़ कर बरसे जब बादल
सोंधी महक उठे धरती से
हरे भरे हो जाये बाग -बगीचा
निखर निखर जाये प्रकृति का यौवन

चकोर जब चाँद को देखे
मन हरषे, मन मन बहके
महक बहक जाये चकोर का चितवन
देख देख प्रकृति गुनगुनाये।

घर के आँगन मे तुलसी का पौधा 
सुवासित कर जाये चहुँ ओर वतावरण
धूप प्रज्वलित हो पूजा का जब
महक उठे सबका तन मन।

जब आये बिटिया जीवन में
महक जाये घर बार सबका
बहू जब बेटी बन जाये
सुवासित हो जीवन सबका

बच्चे जब रखें रिश्तों का मान
महक उठे जीवन का बाग।
खुशी के गीत हम मिलकर गाये
महक उठे रिश्ते हर बार।
स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।


आत्मा महकती है चैतन्य से

चैतन्य महकता है दर्शन से
दर्शन महकता है सत्य से
सत्य महकता है पुरुषार्थ से
पुरुषार्थ महकता है परमार्थ थे
परमार्थ महकता है धर्म से
धर्म महकता है कर्म से
कर्म महकता है श्रम से
श्रम महकता है हौसलों से
हौसले महकते हैं संकल्प से
संकल्प महकता है विश्वास से
विश्वास महकता है ह्रदय से
ह्रदय महकता है प्रीत से
प्रीत महकती है पिया से
पिया महकते हैं समर्पण से
समर्पण महकता है अर्पण से
अर्पण महकता है श्रृंगार से
श्रृंगार महकता है प्रसून से
प्रसून महकते है बहार से
बहार महकती है सावन से
सावन महकता है बादल से
बादल महकते हैं आकाश से
आकाश महकता है चाँद से
चांद महकता है कौमुदी से
कौमुदी महकती हैं काव्य से
काव्य महकता हैं कवि से
कवि महकते हैं कलम से
कलम महकती है भाव से
भाव महकते हैँ शब्द से
शब्द महकते हैं अंतर्मन से
अंतर्मन महकता है आत्मा से

स्वरचित : मिलन जैन
महके गुलदस्ता हर बस्ती का।
तू ही खिवैया है हर कश्ती का
महके कुसुमित हो फुलबगिया,
दिखे नजारा प्रभु की हस्ती का।

हृदय सुमन सबके खिल जाऐं।
रागद्वेष हम सबके धुल जाऐं।
महका दो तुम ये भारतभूमि,
कण कण में सोरभ घुल जाऐ।

महकें तन और सुरभित हों मन।
सुगंधित हो हर दिल का गुलशन।
मानवीयता सहिष्णुता के आभूषण,
परमेश्वर पहने इसभारत का जनजन।

मानव मानस का मनोरंजन हो।
सबके दुखद कष्टों का भंजन हो।
भयभीत किसी से हो नहीं प्राणी,
महकें अखिलेश अलख निरंजन हो।

सुरभित सुगठित शरीर विकसित हों।
नहीं ये जीवन पर्यावरण प्रदूषित हो।
रहें सदा चहकते सभी प्रभु बालवृन्द,
जो भी हो सब हर्षित यहाँ सुघटित हो।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी "अजेय"
मगराना गुना म.प्र.

बहुत खूबसूरत होती यादों की कसक 
बहुत प्यारी होती हैं यादों की अनमोल महक .


महक तो जिंदगी में बसी हैं ऐसे 
जैसे जिंदगी का साया साथ चलता हैं .

कभी बच्चपन की यादों की महक 
कभी यौवन की यादों की महक .

कभी ना भूलने वाले अनमोल यादों की महक 
जिस महक में कभी अपनों का साथ तो कभी 
अपनों की याद होती हैं .

महक कभी खूबसूरत यादों की होती हैं 
कभी प्यारी बातों की .
स्वरचित :- रीता बिष्ट


महक महक मालती सा, हिचकोले जिया 
कनखियों से देखे, हौले हौले बोले पिया 
चंचल चुलबुली चांदनी, आयी मेरे आंगन 
प्रिय! बहकते शरद ने, यूं मादक किया!!! 

सुरभित सेंवती, मौन मौन महका दिया 
कातिक रात है, बावरा मन मुस्का दिया 
रूप दपर्ण में संवारू, उम्र का बांकपन 
हंसनी सा उङे, कमसिन खुनके हिया!!! 

बटोही सी ठहरी, भोर ने शुभागम दिया
खिसकती दोपहरी ने भी, अनमना किया 
हंसती धुंध लपेटे है, कस कर सनन सन
शिरा शिरा तङके है, यूं धङके है जिया!!! 

मलय समीर ने ठिठुरन, कंपकपा दिया 
पुष्प पल्लिवित सुरभि, ने गहमा किया 
पांव भारी शरद के, चंचल ठुनक ठुन 
ऋतुओं की ऋचा, कैसे भङके है हिया!!! 

देह देह सिहरात, मधुमास इठलाये हिया 
उङी अलकें कान्धे पे, झुमका बोले पिया 
पलकें खोले हौले हौले ,पांखुरी अनमन 
शरद की चांद खुमारी, महके है जिया!!! 
चंचल चुलबुली चांदनी आयी मेरे आंगन 
प्रिय! बहकते शरद ने यूं मादक किया!!!

डा. निशा माथुर /8952874359

महक
पलाश सी ख़ूब रंगत हो तुम
गुलाबी महकती महक हो तुम
प्राण-प्रिय यूँ ही नही कहलाते हो
हृदय तरंगित तरंग हो तुम।।

मन मनुहार स्पंदित करते हो
चाँद-तारों सा सहेजा करते हो
खिली कली मैं उपवन की थी
प्रेम वर्षा बौछारें तुम करते हो।।

महक तेरे आते ही होती सजन
कली खुशी में फूल बनती सजन
तुमने स्नेह इतना बरसा दिया है
प्रेम गगरी तेरे लिए छलकती सजन।

वीणा शर्मा


ज्ञान का बिगुल बजाओ 

रास्ता सदमार्ग का अपनाओ ।।

चमन है ये जग इसको 
खुशबुओं से महकाओ ।।

फूल हैं इस बगिया के हम
बगिया की रौनकें बढ़ाओ ।।

मालिक खुश हो जिसमें
वो खुशी समझ जाओ ।।

क्या नही बनाया उसने
जरा गौर कुछ फरमाओ ।।

उसकी हर कोशिश में
चार चाँद तुम लगाओ ।।

सब में कुछ आकर्षण
अपनी खूबी गले लगाओ ।।

काँटों का भी रहस्य गहरा
काँटों से मत घबड़ाओ ।।

गुलाब नही घबड़ाया 
वैसी कीमत तुम पाओ ।।

पूरे चमन में छटा निराली
सौन्दर्य संग महक बढ़ाओ ।।

विविधतायें रहेंगीं ''शिवम"
मन में कुंठा नही जगाओ ।।

सबसे मिलकर बना समाज
सभी से तालमेल बैठाओ ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन जिनसे महक उठा है गुलशन !!जूही , गुलाब , चम्पा , चमेली !
सबकी खुशबू बड़ी अलबेली !!
कुछ ऐसी ही महकती , ग़र हो जीवन की घड़ियाँ !
तो दामन में भर जाएँ , खुशियाँ ही खुशियाँ !!
पड़े ग़र कभी किसी दुख की छाया !
और उससे हो मन घबराया !!
तो धैर्य से काम लेकर , जीवन सफल बनाना चाहिए !
और दुख का सागर पार कर , जीवन फूलों सा महकाना चाहिए !!




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