Tuesday, July 17

"पलकें "17जुलाई 2018


पलकों की दहलीज पर नींद फुसफुसा के ये कह रही,
कैसे उगूं इन आंखो में, सकून का एक पल भी नहीं।
अब कैसे उतरूं और गिरा दूं पलकों का शामियाना ?
यहां तो नागफनी के फूलो, संग ही है दामन थामना।

क्यूं बिखेर रक्खा है अपने वजूद को तिनकों तिनको में
करवटें बदलते ही फांसे चुभ जायेंगी कोमल मनकों में।
क्यूं मन राजहंस रूठा है, जीवन सरिता की नगरी में,
क्यूं टूटा है बांध स्पंदीत, अब अश्रुकणों की गगरी से।
अब कैसे उतरूं और गिरा दूं पलकों का शामियाना ?
कल छोटा सा एक सूरज, मुझे हथेली पर भी है उगाना।

क्यूं भटकते गिन रहे हो, बिस्तर पर चादर की सिलवटें
अनसोया, अनजागा मन हर पल, क्षण ले रहा करवटें।
क्यूं दिन भर के समीकरण पर खोले पोथी और किताब,
खुद से खुद की अभिलाषाओं का क्यूं कर रहे हिसाब।
अब कैसे उतरू और गिरा दूं ये पलकों का शामियाना ?
कल अरूणिमा में अलसाये सपने औ सच से होगा सामना।


----------- डा. निशा माथुर

पलकें उठीं पलकें झुकीं
कुछ क्षण के लिए रुकीं
नये कीर्तिमान हो गये
जीवन की तान हो गये। 

पलकों से पलकों का अभिनन्दन 
महका जीवन में अकस्मात् चन्दन 
शगुन गीत गूॅज उठे मन में 
महक उठे नये सुन्दर बन्धन। 

बने इस तरह समीकरण
और मिल गये अन्त:करण
पलकों का उठना और गिरना
दूर हुआ मन का क्षरण।

बधाई देने लगे अलंकरण
शब्दों ने भी किया अनुसरन
छन्द भी मुखरित हो गये
कविता का हुआ देखो वरण।





पलकें उठाके पलकें गिराना ।

चिलमन से यूँ मुस्कुराना ।
हमला है ये कातिलाना ।
क्यों न होगा दिल दिवाना ।
बन जाये न कोई अफसाना ।
सम्हल के चलो जाने जाना ।
नाजुक दिल का क्या बतलाना ।
कब हो जाये ये बेगाना ।
आँखें खंजर का खजाना ।
''शिवम्" इन से दिल बचाना ।


पलकों की छाँव में कुछ ख्वाब झिलमिलाते हैं,
कुछ कसमसाते हैं, अंगड़ाई भरते हैं,
कुछ आँसू संग नयनों से ढुलक जाते हैं,
कुछ नयनों के तलों में छुपकर उछल कूद मचाते है,
जो ख्वाब बन्द पलको में मुस्कुराते है,
वहीं पलके खुलते ही नूर बन जाते हैं।
खुली पलकों में जीवन का मंज़र सुहाना होता है,
झुकी पलकों में छिपा हया का खजाना होता है,
पलकों का तो अंदाज़ ही कातिलाना होता है,
जो शायरों के भावों का पैमाना होता है।
बन्द पलकों के राज गहरे होते हैं,
खुली पलकों में भोर के उजाले सिमटे होते हैं,
भीगी पलकें अंतस को जगाती हैं,
और बन्द पलकें चैतन्य में लीन हो जाती हैं।

स्वरचित : मिलन जैन


पलकें उठाऊँ तो प्रभु दर्शन हों।
पलकें झुकाऊँ सबशुभ मंगलहो।

नहीं कोई दिखे मुझे यहां दुखी,
प्रभु सबका ही दुख भंजन हो।

नहीं पलकें कभी दुख पीडित हों।
नहीं कोई जन किसी से तृषित हो।
परमेश्वर प्रेमाश्रय हो इन पलको में,
इस जग का जन जन पुलकित हो।

मेरे सदा पलक पांवडे बिछे रहे ,
आतिथ्य अतिथि का कर पाऊँ।
कोई नहीं जा पाऐ भूखा प्यासा,

 यहाँ कुछ परमार्थ भी कर पाऊँ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


पलकें

************
मन भँवर में उलझ गया,
लब कह न पाती है।
नैनों से बयां न हो जाए,
ये पलकें भी झुक जाती है।
अपने मन के भावों को,
सहज कैसे तुम से कह दूँ।
पता मुझे हो तेरे मन की,
तो भाव पुष्प अर्पण कर दूँ।
अपने नैनों के दर्पण में,
तुझे रोज निहारा करती हूँ।
बिठा सहज हृदय कुंज में,
तुझको ही सँवारा करती हूँ।
भूले से कभी उतरा भी करो,
मेरे मन के गहरे समन्दर में।
तेरे रंग में रंगे सारे मोती,
मिल जायेंगे मेरे अन्तर में।
अब तेरे चंचल मन को मैं,
बाधूँगी अपनी अलकों से।
एक पल भी कहीं न जाओगे,
ऐसे छूपाऊँगी पलकों से।

उषा किरण


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सुंदर सुंदर काली पलकें 
जैसे झुकती डाली पलकें 

मीन सरीखे नैनो की 
करती हैं रखवाली पलकें 

मीठे मीठे सपनों का घर 
झुरमुट झालर वाली पलकें 

शाम के जैसे ढल जाती हैं 
जैसे भोर निराली पलकें 

दूर ठिकाने ले जाती हैं 
उठती जब मतवाली पलकें 

घूंघट पर्दे की तरह हैं 
लाज हया की पाली पलकें 

सपना सक्सेना 
स्वरचित



वीणा का सुर और मोहन की ताल
अब तो आजा साजना ओ मेरे दिलदार।
पलकें हया से , झुकी मेरी यार
काहें तू देर करे,आजा ओ मेरे दिलदार।
हृदय की धड़कन ,सुर लय, ताल
समझे न तेरे बिन, ओ मेरे दिलदार।
सागर है बहता, पलकों के द्वार
संभाल मेरी नैया ,तू ही दिलदार।
पलकों में बंद है, सारे ही ख्वाब
मोती बहते है क्यो ओ मेरे दिलदार।।

वीणा शर्मा




पलकें मेरी आज भी बिछी है 
तेरे आने के इंतजार में 
छोड़ गये थे जिस दिन
मुझे तड़पता मधुमास में 
सहमी सी शरमाई सी
देखी थी तुम्हें 
तेरी वही छवि बसती है
दिल के कोने कोने में 
बेला की महक भर देती मुझे 
आज भी मदहोशी के आलम में 
महसूस करती तेरी छुअन आज भी 
बिखरे गजरे के फूलों में 
शर्मो हया से सिकुड़कर
खो जाती हूँ आज भी
तेरे बाजूओं के घेरे में 
सम्पूर्ण हुई थी उस दिन मैं 
तेरे प्यार की रंगत में 
तेरे लहू की कुछ बूँदें 
छूट गयी थी मेरे अंशों में 
तेरे अंशों को पालती रही मैं 
चाहतों के सपनों में 
अपने लहू के रंग से 
लाल हुए थे तुम 
सरहद की सीमा में 
आये थे मुझसे मिलने 
लिपटकर तिरंगे में 
अब मासूम निगाहें ढूंढती तूझे 
कैसे बसा दूँ तेरी छवि 
उन नन्ही सी पलकों में 
है पूछती तेरा पता
अतृप्त सी निगाहों से 
बेबसी अपनी मैं बयाॅ करती
झूकी झूकी नजरों से 
बता दूँगी तेरा ठिकाना 
है आसमान में 
ढूँढेगी तूझे तेरी ही निशानी
बादलों की लहरों में। ।


स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

इस तरह भी वो हम पे करम कर देता है
मेरे नाम सारे दर्द-ओ-गम कर देता है
मेरे महबूब की मोहब्बत है या जादूगरी कोई
खुश्क मौसम में भी पलकों को नम कर देता है

मेरी आंखें जगेंगे रातभर, चांद की तरह
यह देख पलकों ने सितारे सजा लिए

होकर दीवानावार, बेखबर चूमता हूं
इन पलकों से तेरी,रहगुजर चूमता हूं

क्या बताएं, क्या मंज़र सम्हाल रखा है
मेरी पलकों ने, समन्दर सम्हाल रखा है
उछाले गए थे जो हम पे कभी, तेरी बज़्म में
हमने आज तक एक-एक पत्थर सम्हाल रखा है

ये आंखें, दिल की तरफदारी करती हैं
पलकें आंसूओं की पहरेदारी करती हैं
हर बार नाकाम होते हैं मंसूबे इनके
जब-जब ये बरसने की तैयारी करती हैं




पलके झुकाऊँ पलके उठाऊ

दीदार बस तेरा मै पाऊ ।
होना तू नज़रो से ओझल
दिन रात बस ये मै चाहू ।।

सोलह श्रृंगार कर, 
नित-रोज मै इठलाऊ। 
मेरे कजरारे नैनो की चाह 
हर वक्त बस दरस तेरा ही पाऊ।। 

छुपाकर तुम्हे दिल में अपने
नैनो से ये दुनिया दिखलाऊँ।
ख्वाबो में भी तुझे ही बस चाहू
कैसे अपने मन का दर्पण दिखलाऊँ ।।

बसे हो तुम सांसो में 
कैसे मै सांसो को अपनी रोक पाऊ।
नैनो के इस दर्पण में
छवि मै सिर्फ तुम्हारी ही पाऊ।।

दिल में उठे गुब्बार को 
अंसूअन में अपने बहाऊ।
लगा टकटकी तेरी राहो में,
दिन रैन एक कर जाऊ ।।

संजो कर तुम्हारी यादों को
अक्सर उन्हे मैं गुनगुनाऊ ।
माना की चांदनी रात है
फिर भी प्रेम-दीप जलाऊ ।।

दूर रहकर पास होने का
अहसास अक्सर मै पाऊ।
हर पल मिलन की आस मे
प्रेम मिलन के गीत मै गाऊ ।।

चाहू रोकना नैनो को राह तकने से
पर कुछ भी ना मै कर पाऊ।
तुम ही बोलो अब तुम्हे
और कैसे प्रेम परिभाषा मै समझाऊ ।।

छवि ।




बरसों बाद मैं 

उसके सामने था....

मैं इंतज़ार में था....
कब पलकें उठें उसकी...
और कब...
मैं अपनी तस्वीर...
उसकी पलकों के भीतर छुपे...
आईनों में देखूं...

समंदर जितने गहरे होते हैं....
सीप भी उतनी ही गहरी होती है....
सुना था मैंने के मोती पाने को....
बहुत गहरे उतरना पड़ता है....
बहुत गहरे.....

भीतर हमारे बहुत गहरे...
कहीं सीप छुप्पी है...
दो आँखों के बीच में..
जब सीप पलकें....
खोलती है तो...
खुद को पाते हैं....

समंदर मेरे पास था....
मैं गहरे उतर न सका....
पलकें खुली नहीं....
मैं खुद से मिल न सका....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा I



"पलकें"
ये पलकें झपकती हैं जब, 
आँसू गिरा जाती हैं,
भूलना चाहते हैं तुझे,
पर हवा ये तेरी याद दिला जाती है,
तेरी पलकों के साये मेंं चाहा था जीना,
इल्म ना कि जुदाई का जहर पड़ेगा पीना,
पलकें झपकते ही मुराद पूरी की जाती थी,
कहाँ है वो हवा आज, जो पैगाम तेरा लाती थी,
मेरी साँसों में, मेरे दिल में, अहसास तेरा बसता है,
कैसे झपका दूँ ये पलके, 
बनकर सपना तू इनमें बसता है ।

स्वरचित-रेखा रविदत्त


काजल जिनका आकर्षण है
शीरत अंतह का दर्पण है

यदि नैन पहेली समझो तो
पलकों में छुपा समर्पण है
------------------------------
ममता की शीतल छाँव यहाँ
स्नेह की चलती नाँव यहाँ
यहीं प्रेमी युगल भी मिलते हैं
भावों के निर्मल गाँव यहाँ
-------------------------
मौन की जीह्वा हैं पलकें
अनुनय-विनय कहें पलकें
पलकों पे सात समंदर है
कोई ठेस लगे बहे पलकें
--------------------------
ये कहती हृदय की घर्षण है
ये करती घृणा विकर्षण है
सुख में उन्मुक्त किलोल करे
करे दुख में अश्रु से तर्पण है
------------------------------
---------सन्तोष परदेशी



-------
कोई तस्वीर तेरी आँखो में बनी हो जैसे 

तुम ने दिल में कोई राज छुपायी हो जैसे 

देखते-देखते दिल का चमन महका हो जैसे 
मुस्कुराना बाकी है मगर खिलना रूका हो जैसे 

हर दिदार पर महसूस यही होता है 
देख के मुझको अपनी पलकें झुका रही हो जैसे

अब ठहरने ही वाला है जीवन का सफर 
वक्त हर-वक्त रुक-रुक कर चला हो जैसे 

हर वक्त तुझे दिल ने याद किया हो जैसे 
मेरी पलकों पे तेरा प्यार बसा हो जैसे 
@शाको
स्वरचित


पलकों के साये में 
जन्म लेते सपने,
देखते हैं तरुणाई।

मिलन और जुदाई।
कभी पलक झपकते ही,
काल की वक्र दृष्टि
बदल देती है जीवन का भूगोल।
तब पलकें अपलक देखती हैं,
संगतियां-विसंगतियां, तोल-मोल।
कभी मरुथल में प्यासे पथिक का
बनती हैं पड़ाव।
किन्ही प्रेयसी पलकों की छांव।
पलकें होती हैं साक्षी
छुपते आंसुओं की,
बिखरते सपनों की।
छोर बदलते
गैर और अपनों की।
पलकें अपने आप में
पूरा जीवन वृतान्त हैं।
पलकों का पूर्ण विराम ,
एक कथा का अंत है।

- पवन धीमान
17 जुलाई 2018


चंद हाइकु -"पलकों "पर
(1)
यादों की वर्षा 
भावों के मोती झरे
भीगी पलकें
(2)
झुकी पलकें
बेटी का जिस्म तार
शर्म समाज
(3)
नैन ख़ुमार
पलकों के पर्दे से
झाँकता प्यार
(4)
माता व पिता
पलकों पे बैठाते
खुशियाँ लाते
(5)
छेड़ते नैन
शरारती पलकें
छीनते चैन
(6)
भीगी पलकें
खूब बरसी यादें
भाव छलके
(7)
बोले नयन
पलकों की चिलमन
झाँकता मन
(8)
उठती रैना
सांझ पलकों तले
रवि का सोना
ऋतुराज दवे


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