Friday, August 31

"संतुलन"31अगस्त 2018





कुछ भारी हो कुछ हल्का तो ,
तराज़ू का बिगड़ता है संतुलन ,
अति वृष्टि हो या अल्प वृष्टि,
मौसम का बिगड़ता है संतुलन ।
भुखमरी या जमाख़ोरी से ,
समाज का बिगड़ता है संतुलन ।
विशाल इमारतें या झुग्गी झोपड़ी ,
दिखाती है आर्थिक असंतुलन ।
बेइन्तहा लगाव या हो द्वेष, 
बताता है भावनाओं का संतुलन । 
बेटा , बेटी मे भेदभाव ,
होता है पारिवारिक असंतुलन ।
छोटों बड़ों से व्यवहार मापता ,
है हमारा मानसिक संतुलन ।
सुख दुख मे संम्यक भाव ,
लाता है जीवन मे संतुलन ।
पंच तत्वों का ये अद्भुत संसार ,
प्रकृति का है अनूठा संतुलन ।
,
© कुन्ना .


आज जीवन का संतुलन बिगड़ा हुआ है
इंस
ान के पेट का संतुलन बिगड़ा हुआ है
जिससे शरीर में बीमारियों ने घर कर लिया है

आज जीवन का संतुलन बिगड़ा हुआ है।।।
पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा हुआ। है
जिससे दुनिया में तबाहियों ने घर कर लिया है।।

आज जीवन का संतुलन बिगड़ा हुआ है
इंसान की नीयत का संतुलन बिगड़ा हुआ है
जिससे कुछ लोगो की मानसिकता को गुलाम कर लिया है।
आज जीवन का संतुलन बिगड़ा हुआ है
चलो आज मिल कर कुछ प्रयोग करे।
इस संतुलन को सुधारने में सहयोग करे।
स्वरचित -sona



जीवन तो जैसे,
डोलते तराजू के पलड़े।
लाखों इसके पचड़े।।

जिसने बना लिया,
दिल मे उमड़ते भावनाओ में,
सही संतुलन।
निकलेगा इस संग्राम से,
वही तो विजेता बन।।

और एक दिन स्वयं ही,
सिकंदर सा महसूस करेगा।
नही किसी से डरेगा।।

वरना कितनी जिंदगियां,
गुमनाम सी खो जाती है।
इस बोझ को,
नही ढो पाती है।।

तो जरूरी है स्व संतुलन।
आइये मिल करें इस कोशिश का समर्थन।।

#गिरीश
#स्वरचित



सन्तुलन जीवन का अब,
श्रीनाथ जी के पास है ।
सब यहाँ अच्छा ही होगा,
जब प्रभु का साथ है ॥
••••••••
रूग्ण हो जीवन का पथ या,
शबनमी बरसात हो ।
मन मे रख विश्वास बस,
कल्याण ही कल्याण हो॥
••••••••
सन्तुलन बिगडा अगर फिर,
कष्ट की शुरूवात है ।
त्राहि करते लोग है फिर,
कष्ट मे संसार है ॥
••••••••
''शेर'' कहता है प्रभु के,
सन्तुलन के साथ चल।
रौद्र दिखती है धरा ,
मानव तू इतना ध्यान रख॥



सन्तुलन का जीवन में महत्व है अलग ।
सन्तुलन जो न सीखा हुआ अलग थलग ।
बचपन से बुढ़ापा आया कितनो से विलग ।
घर सम्हाला भले ही रोया हिलक हिलक ।

झगड़ा भी किया अपनों से परायों से ।
मगर सचेत रहा डरा गम के सायों से ।
टूटा रूठा पर लक्ष्य न हटा निगाहों से ।
तभी आज खुशबू है भींनी फिजाओं से ।

गुलशन से पूछिये यूँ ही न बहार है ।
आँधी और तूफानों से हुई तकरार है ।
चाँद भी कहाँ बचा राहु की पड़ी मार है ।
फिर भी हँसे मुस्कुराये हँसने की दरकार है ।

मंदी में भी व्यापारी करता व्यापार है ।
सन्तुलन से जीवन में सबका सरोकार है ।
लहरों में घबड़ाये न जो नाविक हुनरदार है ।
जीवन नैया का ''शिवम" सन्तुलन पतवार है ।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


मेरे नगर में
मर रहे हैं पूर्वज
ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ

अदृश्य सम्वाद !
किसी की नहीं याद –
हम ग़ुलाम अच्छे थे
या आज़ाद ?

बहुत ऊँचाई से गिरो
और लगातार गिरते रहो
तो उड़ने जैसा लगता है
एक अजीब सा समन्वय है
डायनमिक इक्वीलिब्रियम !
अपने उत्त्थान की चमक में
ऊब रहे
या अपने अपने अंधकार को
इकट्ठी रोशनी बतलाकर
डूब रहे हैं हम ?

हमने खो दिये
वो शब्द
जिनमें अर्थ थे
ध्वनि, रस, गंध, रूप थे
शायद व्यर्थ थे ।
शब्द जिन्हें
कलम लिख न पाए
शब्द जो
सपने बुनते थे
हमने खोए चंद शब्द
और भरे अगिनत ग्रंथ
वो ग्रंथ
शायद सपनों से
डरते थे ।

थोड़े हम ऊंचे हुए
थोड़े पहाड़ उतर आए
पर पता नहीं
इस आरोहण में
हम चल रहे
या फिसल ?

हम दौड़ते रहे
और कहीं नहीं गए
बांध टूटने
और घर डूबने के बीच
जैसे रुक सा गया हो
जीवन ।
यहाँ इस क्षण
न चीख़
न शांति
जैसे ठोकर के बाद का
संतुलन ।




संतुलन पर सब कुछ निर्भर
ये बिगड़े सब हो जाए जर्जर।

जब तक है संतुलन धरा घूमती
बिगड़े तो करुण पुकार गूँजती।

पल में सब धराशायी ध्वस्त हो जाता
जीवन सबका अस्त व्यस्त हो जाता।

मस्त पवन का चलना सबको भाता 
असन्तुलित हो जाए कहर बरपाता।

सागर की लहरें लगती सबकों प्यारी
पल में उजाड़ जाती है ये बस्ती सारी।

झूम झूम मेघ बरसते, सबका मन हरते
बिगड़े जो संतुलन पल में बादल फटते।

मानसिक संतुलन से दुनिया स्वर्ग है
बिन इसके जीवन जीना सम नर्क है।

मन का संतुलन पुरुषोत्तम बना दे
असंतुलन में ये दैत्य रूप दिखा दे।

संतुलन जीवन का हो या प्रकृति का
इसका होना जरुरी है।
असंतुलित होते ही आपदा, विपत्ति
का आना जरुरी है।

संतुलन जिसने बना लिया अमरत्व का भान किया
दुनियां में पहचान बनाके रोशन खूब नाम किया।।

डी के निवातिया 
(स्वरचित)




आता है भूचाल
जब असंतुलित
प्रकृति होती हैं
मचता है हाहाकार
जब उफान यें
नदियाँ भरती है......।
संतुलन से खुशी आता
फलता- फूलता है संसार
संतुलन जीवन में भी लाता
खुशियाँ अपार ........।
धन, वैभव और ज्ञान
सबका एक सीमा है
भूख ,रूप और जान
सबको यह संतुलन ही
बनाता महान.......।

स्वरचित - मुन्नी कामत ।


हमें जीने के लिए,
यह मानव जीवन,
हमें मिला हैं,
हमें कैसे जीना,
अपने ऊपर है,
मानव जीवन,
इक साधना है,
आराधना है,
सुख और दुख,
जीवन की, परछाइयां है।
सुख और दुख,
सतत चलता रहता है,
सुबह के बाद शाम,
शाम के बाद,सुबह
आता है,
सुख दुख की,
अवधि निश्चित नहीं,
जैसे ्वृक्ष में पते, फूल,फल,आते हैं,
लेकिन
समय पर,
सब समाप्तहोजाते है।
अतः: हमें
सुख दुख की स्थितियों में,
समभाव रहना
संतुलन बनाते रखना,
जीने की कला है।
सब पर,
सुख,दुख,के चक्रआतेहै।
सुख दुख,एक दुसरे के पूरक हैं।
सुख औरदुःखका मिश्रण,
मानव जीवन है,
परमात्मा को याद करना,
सरल है,
जगत मित्रता है,पर भूलना कठिन है।
स्वरचित संतुलन कविता,
६२६६२७८७९१!



.........................
जीवन पथ की कोई डगर हो .
जीवन संतुलन बनी रहे .
..हो दुख या खुशी अधिक .
..फ़िर भी संतुलन बनी रहे .
..नवतेज हो नवराज हो .
जीवन हास्य परिहास 
..मान अपनो की बना रहे .
जीवन संतुलन बनी रहे .
.............
बात हो कभी विवेक की .
या हो कामक्रोध की .
जीवन पथ अंगार .
चलता रहा तू पथिक ये सोच कें .
मंजिल दूर सही .
पाना हैं अपनी राह नयी .
गिरेगा उठेगा .
पर संभलना साथ हो .
जब संतुलन की बात हो .
.............
नया जोतपूण्ज्य होगा .
पथिक तू विजय होगा .
मन मे ना अवसाद रख .
अंतर्मन से खुद पे विश्वास रख .
अलौकिक किरण साथ होगी .
चाहे कितनी मुश्किल राह होगी .
तनिक ना होना विचलित .
संतुलन जीवन भर साथ होगी ..
...................
मीरा पाण्डेय उनमुक्त की कलम से .



---
संतुलन जीवन का आधार है ।
संतुलन से ही जीवन में प्यार हैं।

असंतुलन जब जब जीवन में आया
काम बिगड जाता हैं।
फिलता हुआ बाग आपने आप 
ना जाने क्यों उजड जाता हैं।

संतुलन से ही चाॅद सुरज ढलते हैं।
संतुलन से ही धरती अम्बर रहते हैं।
संतुलन से ही मौसम आते जाते है।
संतुलन से ही फसल बोते जाते हैं।

प्यार भी करो तो आपने बराबरी से करो।
बढे से करोगे तो उसकी सोहरत के आगे झुकना पढेगा
छोटे हे करोगे तो उसे आपने आगे झुकना पढेगा
किसी के सामने झुकु मुझे पसंद नही है।
और कोई में सामने झुके ये भी मुझे पसंद नही।
( स्वरचित )
-अजय वर्मा-



शीर्षक: "संतुलन"
विधा : हाइकु

एक प्रयास 
1
सौर मंडल 
संतुलन ब्रह्मांड 
गतिशील है 
2
सुबह शाम 
दिवस संतुलन 
कर्म सफल
3
खाद्य संयम
स्वास्थ्य का संतुलन 
सुखी जीवन
4
धनी निर्धन
असंतुलित राष्ट्र
है भेदभाव 
5
जीवन नैय्या 
असंतुलित धारा 
डूबा खेवैय्या
6
डूबता कश्ती 
संतुलन अभाव
वृथा प्रयास 
7
न्याय की मूर्ति 
संतुलित तराजू
सत्य की जय
8
खोज विज्ञान
प्रयास संतुलन 
राष्ट्र गौरव
9
है संतुलन 
संध्या संधि प्रहर
दिवस रात
10
निष्प्राण जीव
भू संतुलन खोता
भूकंप होता

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


संतुलन की चाह मे
निकल पड़ी मैं राह में

नजर मेरी अटक गई
एक बच्ची से टकरा गई

देख उसने मुस्कुरा दिया
हौले से समझा दिया
गर मुस्किलें हो राह मे
मुस्कुरा कर आगे बढ़े।

थोड़ी मैं आगे बढ़ी
शोर से घबरा गई
गाडिय़ों के शोर से
मन मेरा अकुला गया

घबरा कर मैं मुड़ गई
शांत गली को मुड़ चली
शांति एहसास दिला गई
अशांत हो जब दिमाग
मन को थोड़ा दे विश्राम 

थोड़ा मैं आगे बढ़ी
नदियों की शोर सुन
उस तरफ मैं मुड़ चली
नदियां थी उफान पर

वेग से मैं समझ गई
उसका गुस्सा जायज था
पेड़ काट कर हम स्वयं
आमंत्रित कर रहे विपदा हम

ज्यों ज्यों बढ़े मेरे कदम
समझ मे मेरी बात आई
प्रकृति ने तो दिये संतुलित जीवन
हमने अपनी नादानियों से

हम असंतुलित कर रहे हैं स्वयं
और परिवेश को
संतुलित जीवन जिये हम
और प्रेरित करें दूसरो को

अपनी नादानियां मै समझ गई
मुड़ चली मैं घर की ओर
रहस्य मैं समझ गई
संतुलन है हर जगह
बस उन्हें असंतुलित न करे हम।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।




वाणी का संतुलन खोकर तुम 

रिश्तो का संतुलन खो दोगे 
शब्दों का चयन खोकर तुम 
पहचान संतुलन खो दोगे 
जिव्हा के स्वाद मै आकर तुम 
काया का संतुलन खो दोगे 
सुख पाकर तुम अभिमानी बने 
नजरों का संतुलन खो दोगे 
दुःख पाकर जीवन हार गए 
साहस का संतुलन खो दोगे 
झूठ सहारे जीवन चला के 
सत्य का संतुलन खो दोगे 
खनन प्रदूषण करके तुम 
प्रकृति का संतुलन खो दोगे 
संस्कार बीज नहीं डाले तो 
गौरव का संतुलन खो दोगे 
संतुलन शब्द बहुत गहरा 
जीवन को सुहासित करता है 
प्रकृति को पल्ल्वित करता है 
गर 
संतुलन हमने बिगाड़ दिया 
चहु और विनाश हम कर देंगे 
हम अपने ही कर्मो से अपनी 
मर्म कहानी लिख देंगे 
स्वरचित सीमा गुप्ता 
अजमेर 
31. 8.18



हर बात में संतुलन होना चाहिए
संतुलन होना चाहिए
संतुलन होना चाहिए।।
कायदा हो वायदा हो
मैत्री या शत्रुता हो
तन हो या मन हो
धनी और निर्धन हो
क्रोध हो या प्रीत हो
हार हो या जीत हो
मरण हो जीवन हो
वन हो उपवन हो
सुर हो या राग हो
शीत हो या आग हो
आँधी हो तूफान हो
छत हो मचान हो
जान हो बेजान हो
खेत हो खलियान हो
घर हो मकान हो
दफ्तर हो दुकान हो
कद हो काठी हो
दादाजी की लाठी हो
पाना हो खोना हो
हँसना या रोना हो
वर्षा हो गर्मी हो
चाहे पड़ती सर्दी हो
लिखायी हो पढ़ाई हो
शादी हो सगाई हो
ज्ञान हो विज्ञान हो
साज हो सामान हो
जान हो पहचान हो
मां हो सम्मान हो
संतुलन होना चाहिए
संतुलन होना चाहिए।।

स्वरचित
गीता लकवाल



जीवन का हर संतुलन .
सीखी हूँ माँ तुमसे मैं .
पापा कें पैसो क़ो सहेजना .

उचित जगह खर्च करना .
खुद की कटौती कर 
हमारी जरूरत पूरा करना .
ताकि कभी कोई मुश्किल ना आए .
लोग समाज मे रहना सिखाना .
उचित अनुचित का ज्ञान देना .
कुछ खुशी क़ो परे रख .
औरो की खुशी देखना .
मीठी वाणी कोमल मन .
झूठ कें आगे कभी ना झुका .
कितना कुछ सीखी तुमसे .
आज तुम नही हो .
पर बताई दिशा निर्देश हैं .
जीवन का अनमोल संतुलन .
..........
मीरा पाण्डेय उनमुक्त



जिन्दगी ऐसे ही गुजर गई 
कभी प्यार से
तो कभी लड़ते-झगड़ते
जिन्दगी ने बहुत कुछ 
दिया भी और लिया भी 
कभी सोचा कि जो पाया
और उसके बदले में जो खोया
समान ही रहा 
न कम न ज्यादा 
यह जिन्दगी का संतुलन है
जितना अधिक पाने की लालसा
उतना ही खोना भी होता हैं
जिन्दगी संतुलित रहे तो मस्त 
नहीं तो व्यस्त ही व्यस्त
संतुलित दिनचर्या 
संतुलित आहार
संतुलित विचार 
संतुलित वचन 
जिन्दगी को स्वर्ग सी बना देते हैं..
-मनोज नन्दवाना




संतुलन बिगड़ने लगा है 
-----------------------------------

हे मानव अब तो रूक जाओ 
स्वार्थ पर अपने अंकुश लगाओ
मेरी निधि जीवन मात्र के लिए है
तेरे बढ़ते असीम स्वार्थ के लिए नहीं।

तेरे बढ़ते असीम लालच के कारण 
हरे भरे आंचल छलनी हो गए है 
मेरी सहनशीलता अब टूटने लगी है 
मेरे अंतस में हलचल मचने लगी है।

अति लोभ तेरा मतिभ्रष्ट कर दिया है
मेरे संतानो को ही मिटाने लगा है 
कई प्राणियों का अस्तित्व मिट गया 
कुछ प्राणी मिटने के कगार लगे हैं। 

प्रकृति हमारी विकृत हो रही है
वन-संपदा दिनोंदिन क्षीण हो रही है 
मेरे गर्भ में संचित संपदाएं भी 
तेरे लालच की भेंट चढ़ती रही है।

प्राकृतिक आपदाएं बढ़ने लगी है
कभी व्याकुलता में हलचल होती तो
कहते हो कि बचो भूकंप हो रहा है 
पर समझते नही मेरी पीड़ा बढ़ रही है।

अकसर अतिवृष्टि, ओलावृष्टि होते 
बाढ़ की विनाशकारी लीला दीखती 
अति ताप मेरे ग्लेशियर गला रहे
फिर भी तुम्हें अक्ल क्यों नही आती।

देखो मानव अब भी होश में आओ
अब मेरा संतुलन बिगड़ने लगा है 
प्रकृति के कोप से बच नहीं पाओगे 
तब तुम भी धरा से समूल मिट जाओगे।

--रेणु रंजन 
( स्वरचित ) 
31/08/2018






:गवाह/सबूत"22 जून 201 9

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