Wednesday, August 15

"बलिदान "13अगस्त 2018




कमी न रही बलिदानियों की देश में
सदा रहे हैं किसी न किसी भेष में ।।
महर्षि दधीच का शरीर समर्पण अमर है
भगत के बलिदान से रोय थे विदेश में ।।

ताज्जुब किया था दुनिया भर का वंदा
अँग्रेजों को कोसा था अँखेरा औ अंधा ।।
सिकन न थी उनके चेहरे पर जरा भी
मानवता हो गई थी उस दिन शर्मिन्दा ।।

जान गये थे अँग्रेज भारतियों का जुनून
आखिर और कितने पीना होंगे खून ।।
कतार लगी थी बलिदानियों की ''शिवम"
छोड़े थे तब अँग्रेज बनना अफ़लातून ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


लाखों कुर्बानी से पाया आजादी के ताज को
फ़र्ज़ हमारा रखें सलामत भारत मां की लाज को
हंसते हंसते वीरों ने फांसी का फंदा चुमा था

वंदे मातरम् कीमत धुन पर हर इक सिपाही झूमा था
कितनों का बलिदान हुआ हुईं मांग सुहागन की सूनी
आजादी के सब मतवाले खले होली थे खूनी
चौबीस घंटे बर्फ गिरे पर सैनिक सिमा पर जाएं
बलिदानों को याद करें हम जन गण मन मिलकर गाएं।।
जय हिन्द वन्देमातरम


वलिदान मांग रही फिर भारतमाता,
इसका हम सबको कर्ज चुकाना है।

छिपे हुए गद्धार कुछ देश के दुश्मन,
अब उन्हें चुनचुन कर मार भगाना है।

सोने की चिडिय़ा कहलाती जो भूमि,
आज वहशी दरिंन्दों ने मटमैली कर दी।
अपनी सुसंस्कृति संस्कारों की जननी,
इन दुष्टों ने फिर कैसी गंदी मैली कर दी।

भगतसिंह ,आजाद, अब्दुल ,प्रताप ने,
जिसको अपने रक्त पसीने से सींचा।
नोंच नोंच कर खंडित कर दी इसको,
जिसे वीर सपूतों के वलिदानों ने सींचा।

अब कुछ तो आरपार की हो जाने दो।
एकबार युद्ध भी हो जाऐ हो जाने दो।
कबतक जुल्म सहेंगे इन आतंकियों का,
जो भी हो वलिदान एकबार हो जाने दो।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


भारत से हिन्दी लुप्त हो रही , 
जनता इसकी सुप्त हो रही, 
कैसे कह दू इसे हिंदुस्तान, 
ज़ब हिन्दी हो गयी यहाँ बलिदान l

आजाद दिवस मना रहे है, 
भूल कर आजाद को, 
नहीं याद रहा किसी को, 
उसके बलिदान को l

आंग्ल माध्यम बने विद्यालय, 
अंग्रेज सब बन बैठे है, 
बर्बाद किया अपने देश को, 
हिंद को India कहते है l

15दिन के पखवाड़े मे हिन्दी दिवस मनाते है, 
बाकी दिन अंग्रेजी के तलवे चाटे जाते l
विडंबना देखो मेरे देश की, 
सरकारी विद्यालयों में भी, 
अब तो हिन्दी गायब हो गयी

क्या यही हे मेरे देश की आशा, 
नहीं रही कोई जिज्ञासा, 
राष्ट्रभाषl का अपमान हो रहा, 
मेरा हिदुस्तान सो रहा l
कुसुम पंत 
स्वरचित 


* बलिदान * नये उपवन सजाने की खातिर 
सुहागन करती अपनी अस्मिता का बलिदान 


नर संग हाथ मिला चलने की खातिर 
नारी करती अपनी राहों का बलिदान 

घर के कर्तव्यों को निभाने की खातिर 
बेटियाँ करती अल्हड़पन का बलिदान 

परिवार को महकाने की खातिर 
स्वामिनी करती अरमानों का बलिदान 

स्वजनों की मान मर्यादा की खातिर 
गृहस्थी करती लफ्ज़ों का बलिदान 

गुरुजनों के संस्कारों की खातिर 
हम सब करते अभिमानों का बलिदान 

बच्चों के भविष्य सजाने की खातिर 
गृहिणी करती अपने सपनों का बलिदान 

सृष्टि के अंकुरण की खातिर 
धरा करती स्वयं का बलिदान 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


बलिदानों की वेदी पर
चढ़ जाते
 सीना तान कर
पर आंच नही आने देते हैं
भारत माँ की आन पर।
जल ,थल,नभ तीनों में ही
लहराते तिरंगा वीर जवान
इन वीर सपूतों के कारण 
बनता है भारत देश महान।
दुश्मन कोई भी कहीं भी हो
उनको चुन मार गिराया है
वो मिट्टी में मिल जाता है
जो भी इनसे टकराया है।
त्याग धैर्य की अटल शिला
करते हैं नामुमकिन से काम
ऐसे इन वीर सैनिकों को
सर्वेश का बारंबार प्रणाम।


जो दे गये अपना बलिदान, 
ऐ मेरे वतन के लोगों तुम,
कर लो जरा उनको याद, 
उनकी ये कुर्बानी हमको, 
सदा रखनी है याद! 

सुभाष, बिस्मिल और भगत सिंह
ये थे भारत के वो जाँबाज, 
फिरंगियों की गुलामी से ,
कर गये हमको आजाद
है मेरा कोटी-कोटी प्रणाम!

आज भी आतंकवाद बन गया, 
एक जहरीला अभिशाप, 
इससे देश को बचाने के लिए, 
जवान दे रहे रोज बलिदान, 
तिरंगे का रख रहें हैं मान! 

ऐसा कब तक चलेगा, 
सरकार उठाये ठोस कदम, 
बच जायेंगे माँ के लाल, 
दीपक हर घर में जलेगा,
भारत माँ को मिले सम्मान! 

स्वरचित "संगीता कुकरेती"


आजाद भारत के निवासी हम
भूल नही सकते उन बलिदानों को

देश को आजादी दिलाने में
कितनों ने दी अपनी बलि

तिरंगे मे लिपटा कितनों की वीरता
का योगदान व उनका बलिदान
राष्ट्रगान दिलाते याद हमें उन
सेनानियों की बलिदान की कहानी

ऐश्वर्य, आकांक्षा जो भी है आज हमारे पास
स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान स्वरूप है हमारे पास।

आज हम भी हैं तैयार देश की शान
हर क्षण बलिदान देने को तैयार
कुत्सित विचार दुश्मनों का हो तो
हम तोड़ दे उनकी कुत्सित मंशा को

कृतघ्न नही है हम,भूल जायें उन बलिदानो को
नराधम नही हम,झुकने दे देश की शान को
भूल नही सकते हम उन बलिदानो को
जो हँसते हँसते चूम गये फांसी के फंदे को

वे हमारे देश की शान है
हम भी तैयार है बलिदान को
हमारे भी कुछ फर्ज है निभाने को
हम भी भारत माँ के पुत्र है
तैयार है माँ की रक्षा के लिए
शीश कटाने को।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।

विषय - बलिदान
कवि जसवंत लाल खटीक

बांध कर कफ़न माथे पे , 
दुश्मनों से लड़ने को आतुर ।
भारत देश के सिपाही , 
सब के सब है वीर बहादुर ।।

देश के लिए जीते है , 
देश के खातिर मरते है ।
देश पर कोई आंच ना आये, 
मरते दम तक लडते है ।।

धन्य है ! वो सब माँ , जिन्होंने ,
ऐसा दुध पिलाया है । 
माँ के दूध का कर्ज चुकाने , 
वीर सरहद पर आया है ।।

रात-दिन नही देखा करते , 
गर्मी ,सर्दी ,बरसात ,नही ।
मातृभूमि की रक्षा करते ,
क्षण भर का विश्राम नही ।।

चौड़ी छाती वीरो की , 
कन्धे लोहे से मजबूत ।
तोप गोले बन्दूक दागे, 
ये भारत के वीर सपूत ।।

सीने पर पत्थर रखकर ,
अपने परिवार से दूर रहते ।
भारत माता की रक्षा खातिर ,
वीर अपना बलिदान करते ।।

ऐसे वीर बहादुरो को ,
" जसवंत " करे कोटि-कोटि प्रणाम ।
आओ सब मिल कर करें ,
वीर बहादुरों को दिल से सलाम ।।



हर पल भीगी कोरों को दुपट्टे से पोंछता है कोई...
चुप्पके से रोज़ ही खाने का थाल लगाता है कोई....
काश! मेरा लाल आ जाए अब की बार कहीं से...
रह रह के बुझती आँखों से दर को खोलता है कोई....

हाथों में चूड़ियों की ख़नक जवानी में ही चली गयी....
माथे की बिंदिया चमकने से पहले ही खत्म हो गयी....
बलिदान सुहाग का देश की खातिर जबसे है हुआ....
पलकें ऐसी कि भारी वो तन से ज्यादा हो गयी.....

नन्हें वीर की किलकारियां मन में विश्वास फिर जगाती हैं....
जो नहीं लौटा उसी की राह चलने की हिम्मत दिखाती हैं...
अपनी माँ का जाया भारत माँ की वीरांगना का लाल है वो....
बाप के बलिदान की गौरव गाथा माँ हर पल सुनाती हैं....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II



बलिदान 
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1


अपनी कुर्बानी देकर बलिदानी 
भारत माँ को सुहागन रखते हैं 
लाल रंग है सिन्दूर का 
लाल रंग है लहू का 
वीर सपूत अपने लहू से 
भारत माँ का श्रृंगार करते हैं ।

2

जाकर वीर के हाथों में तिरंगा मुस्कुराता है 
बनकर कफन शहीदों का तिरंगा इतराता है।

3

हँसते-हँसते शूरवीर 
अपने प्राणों की आहुति देते हैं 
लिपटकर ऐसे मतवालों से 
तिरंगा मुस्कुराता है 
चढ़कर पुण्यवेदी पर
पराक्रमी इतराते हैं 
तिरंगा है सलामत 
वीरों के शौर्य से ही
बनकर कफन शहीदों का 
तिरंगा इतराता है ।
@शाको 
स्वरचित
 




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