Thursday, August 2

"बाल कविताएं"2अगस्त 2018


आज का विषय
बाल कविता
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पापा जल्दी आ जाना
पापा जल्दी आ जाना ।
दुश्मन को संगीन दागना,
हिंदोस्तां की आन बचाना,
छुक-छुक-छुक-छुक रेल से आना,
मेरे लिए बंदूक है लाना ।
छोटी बूआ डाँट लगाती,
खोज-खबर है नही बताती,
झुमकी हमको बहुत सताती,
मम्मी सबकी डाँट लगाती ।
बाबा की छडी तुम लाना,
दादी की रामायण लाना,
माँकी सुंदर साडी लाना,
सोनी मोनी के संग खाना ।
फ्राकू सुंदर गोटे जडि या,
रसगुल्लों की भारी हडिया,
सोनी की लाना तुम गुडिया,
मोनी का गुड्डडा हो बढिया ।
तब हम खाएँ मठरी मिट्ठी,
आलू की टिक्की हो खट्टी,
गुलुवा से कर लेना खुट्टी,
कहता रोज शिकायत झुट्टी ।
टामी देखे दरवाजे पर ,
ढूंढता,सूंघता है पूरा घर,
ना दिखे,तो भों-भों है कर,
बैठे बाहर घर देख कर ।
मैं भी सेना में जाऊंगा,
आपका नाम फैलाऊंगा,
देश की शान बढाऊं गा,
इनाम फिर मैं पाऊंगा ।
रंजना सिन्हा सैराहा


कविता
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विषय :- बचपन
2/8/2018
******************
बहुत याद आता है,
मेरा प्यारा- सा सलोना बचपन,
जहां सुबह होते ही,
कोयल कुहू की ध्वनियों से,
नदियों में लहराती नाव,
जहां अम्मा की डांट पर,
सुबह कलेवा खाकर,
स्कूल पहुंच जाते भागकर,
बगिया में आम के पेड़ पर बौरे देख,
खुशियों से उछल जाते,
इस साल खूब आम खाने को मिलेंगे, 
यह सोच बचपन मे हम मन में ही ललचते,
बूढ़ी दादी चारपाई पर बैठे, 
बहुओं पर हुकुम चलाती,
खाने में स्वाद लाने का हर, 
नया तरीका सरीखा सिखाती
खाने की सुगंध से,
घर का महक जाना,
काहो भौजी "का बना बा"
थोड़ा- सा मंगवाना,
भागकर बूढ़ी दादी से लिपट जाना,
‘हमरे राजा कहकर’
चुपके से गुड सतुआ,
प्यार से उनका खिलाना,
हर त्योहारों को घर में खूब खुशियों सेमनाना,
चाची ,भाभी ,दोस्तों संग मिलकर
फगुआ मे खूब हुड़दंग मचाना,
शादी ब्याह में अपने नटपन से,
सबको खूब हंसाना,
काश बचपन मे हम रहते,
युही हम खैराती पुलाव से,
अपने प्यारे आज जो भी सजाते। 

निशा सतीश मिश्रा



दो प्यारी सी बहना,चली आभ सजाने
एक बाल गीत सुनाने

सौम्य गुँलाबी वसन सुहाने
चली प्यार से आभ लुभाने
मन्नु-देबु प्यारी बहना
चढ सीढी चंदा को बुलाने।
एक बाल गीत सुनाने,,,,,,,

चंदा तुम हो कितने प्यारे
जब तब रहते साथ हमारे
फिर क्यों यूँ ऊँचे चढ बैठे
आओ बिल्कुल पास हमारे।
एक बाल गीत सुनाने,,,,

सघन तमस कि नीड छोडकर
तारों को झोले मे भरकर
धरती पर तुम आ जाओं
हाथ बढाऐं सीढी चढकर।
एक बाल गीत सुनाने,,,,,,,

नन्ही नन्ही जान दुलारी
पर है हिम्मत और खुमारी
परियों से उडन खटोले पर
अनुज अग्रजा करें सवारी।
एक बाल गीत सुनाने,,,,,,,

बेटी घर की है ज्योति
चांद चुरा कर खुश होती
सपन सलोने चंदामामा
आओं खाऐं दूध रोटी।
एक बाल गीत सुनाने,,,,,,,,

●रागिनी शास्त्री●
●दाहोद(गुजरात)●



सुनो सुनाऊ एक कहानी 
आओ चुन्नू, मुन्नू रानी।

एक बगीचे एक बार 
फुलो की हुई तकरार ।
कोन बडा है कौन छोटा 
इस बात पर बहस थी होना।
सबसे पहले आया कनेर
कभी किसी से न रखता बैर।
बारह मासी मे रहता हूं
माली को न दुख देता हूं।
दुजा आया चम्पा का फूल
मुझको छुती नही है धूल।
हल्का सीधा सरल सफेद
ये है मेरे गुणो का भेद।
इतने मे हवा का झोका आया 
गैंदा आकर यू इतराया ।
सबसे गुच्छैला सबसे मोटा
जहाॅ भी जाओ पडे न टोटा।
चमेली मोगरा रात की रानी
सबने की अपनी मन मानी।
अगर इतर मे हम काम आए
फिर हम क्यो पिछे रह जाए।
सबकी सुन कर बोला गुलाब
सब सुनलो मेरी फरियाद।
आपस मे जो फूट रहैगी 
फिर ये धरती माॅ क्या कहेगी।
जिसने सबको है अपनाया
काला गोरा न भेद दिखाया।
सब को देती एक सा अनाज
कभी किसी से न हो नाराज।
आपस मे तुम कभी न लडना
कभी किसी से न भेद करना।
दुश्मन गर देखे ये बुराई
वो फिर हम मे कराए लडाई।
सीख ने दिल मे दीप जलाए
हामिद ने सबके भेद मिटाए।
अब आपस मे न करे लडाई 
एक वतन के हम भाई भाई।

हामिद सन्दलपुरी की कलम से


मन मेरा इत उत भागे रे....
उड़ जाए बदली बन कभी...
कभी चाँद सा झांके रे....
मन मेरा इत उत भागे रे....

जंगल में सबने क़ानून बनाया...
दुश्मन भी जिसने दोस्त बनाया...
बिल्ली मौसी के घर शादी...
चूहा दूल्हा बन नाचे रे....
मन मेरा इत उत भागे रे....

भालू भी दावत में आया....
आलू और टमाटर खाया...
पेट उस का भर न पाया....
फिर भी थैंक्यू बोला रे......
मन मेरा इत उत भागे रे....

शेर दहाड़ न मारे अब...
पेट में उसके पडते बल...
शेरनी बनाये खाना अब...
और लगाए लिपस्टिक रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

लोमड़ी चाची नाक सिकोड़ती...
घूमें इधर उधर मटकती...
या पढ़ती फिर बैठ पोथी...
बातों में उसकी कोई न आये रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

बन्दर मियाँ खी खी करते...
खजूर के पेड़ पे पड़े हैं लटके...
बच्चों को अब वो खूब हंसाये...
केले उनके नहीं खाये रे.....
मन मेरा इत उत भागे रे....

गिलहरी फुदके इधर उधर..
तोता मैना बैठे जिधर...
हाथी पे बैठ कुत्ता जाए...
'चन्दर' मन सब भाये रे..... 
मन मेरा इत उत भागे रे....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 

(मेरी किताब "आपकी नज़र" से उदृत)



बिल्ली तुम्हारी म्याऊॅ सुनकर
चूहा भाग गया दुबक कर
लेकिन वो कुत्ता अब रुक कर
सूंघता तुम्हारा रस्ता झुक कर। 

अब तुम जाओगी किधर
चूहे को भी नहीं है डर
तुम्हारी योजना गई बिखर
कुत्ता मारने को तत्पर। 

तुमने चालाकी से डाला डेरा 
और जब मैंने मुंह अपना फेरा
तुम दूध पी गई सारा मेरा
मेरा बीता भूखा ही सवेरा। 

अब मैं नहीं तुम्हें बचाऊंगी
यूॅ ही बस नाच नचवाऊॅगी।


मेरी नन्हीं सी आंखों में चश्मा चढ़ाया.. 
उफ़्फ़..माँ..! तुमने मुझे कितना पढ़ाया 
यह मोटी मोटी किताबें मुझे डरा रहीं है 

सच्ची....माँ..! बहुत नींद आ रही है... 
मुझे खेल खिलौनों के सपने में खोने दो न..!
बहुत हुई पढ़ाई..माँ..! अब सोने दो न..
समय की इस दौड़ में मेरा बचपन न खोने देना 
मासूम से अपने बेटे को जल्दी बड़ा न होने देना 
तुम्हारी ममता का कर्ज मैं इस तरह उतारूंगा..
तुम मेरा बचपन सहेजना मैं तुम्हारा बुढ़ापा संवारूँगा..!


मैय्या तू क्या जाने?
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हे मैय्या तेरी बात हमारे,
कभी समझ न आता है,

तू कहती क 'चंदा' है मामा,
तो घर पर क्यों नही आता है?

कभी-कभी बादल में आकर,
हमको जीभ चिढ़ाता है,

कभी तो डरकर कई दिनों तक,
कहीं नजर न आता है,

पकड़ में न आये पापा के,
इसलिये वो खेल रचाता है,

कभी बड़ा तो कभी छोटा,
नये रूप धर आता है.....

हे मैय्या तेरी बात हमारे,
कभी समझ न आता है,

तू कहती अगर रहेगा भूखा,
तो पेट में चूहे दौड़ लगाएंगे,

तो बोलो भोजन करने पर,
वो चूहे कहाँ पर जाएंगे?

दिन-रात हमेशा पेट में रहते,
या पढ़ने भी जाते हैं,

उसकी भी तो मैय्या होगी,
फिर पेट में क्यो आजाते हैं,

जीत-हार होती है उसमे या,
यूँ ही दौड़ लगाता है....

हे मैय्या तेरी बात हमारे,
कभी समझ न आता है,

तेरी कहानी में तो पारियां,
सब कुछ तो कर जाती हैं,

पर केवल सपनों क्यों हैं?
दिन में क्यों नही आती हैं?

खेल-खिलौने टॉफी, बिस्किट,
उससे हम मंगवाते फिर,

होमवर्क मेरा सारा,
चुटकी में करवाते फिर,

उसके साथ गगन में उड़ते,
खूब सैर करवाते फिर,

मां तू क्या जाने होमवर्क से?
कितना मन घबराता है....

हे मैय्या तेरी बात हमारे,
कभी समझ न आता है,



"मेरा बस्ता"
( 2/08/18)


मम्मी-पापा बस्ता मुझको ला दो ना, 
स्कूल में दाखिला मेरा करा दो ना ,
मैं भी स्कूल पढने रोज जाऊँगी,
अच्छे सबक खूब सीख पाऊँगी! 

मम्मी सुबह जल्दी मुझे जगाना, 
मेरा बस्ता है मुझे तब लगाना, 
किताबे होंगी उसमें दो-चार, 
टिफिन,थरमस कर देना तैयार! 

स्वरचित "संगीता कुकरेती "


Rita Bisht 
सूरज (बाल-कविता)
देखों सूरज उग आया 

किरणों ने धरा पर किया उजाला .

कितना सुन्दर हैं प्यारा नजारा 
सूरज की किरणों से जग गया संसार सारा .

चीं-चीं करके पंछी अपना राग सुनाये 
फूल और कलियाँ मस्ती में झूमे नाचे गाये.

सूरज दादा के आ जाने से पिंकी सोनू सब जग जाये
सूरज की किरणों से सारा जग रोशन हो जाये .

दादी-माँ सूरज को हरदिन जल चढ़ायें
हर तरफ बस सूरज की रोशनी बिखरी जाये .
स्वरचित:- रीता बिष्ट



आओ मुन्नी संग हमारे,
सुन्दर सा एक चित्र बनाएँ।
वृक्ष बनाएँ धरती पर,
और वृक्ष पर फूल खिलाएँ।

फूल पर बैठी सुन्दर तितली,
रंग -विरंगे पंखों वाली।
डोलती चंचल सी ईत -ऊत,
इन्द्रधनुष सी रंगों वाली।

आओ मुन्नी आकाश बनाएँ,
उसमें काले-काले बादल।
उड़ते-फिरते काले - काले,
झमझम पानी बरसाते बादल।

कागज का फिर नाव बनाएँ,
बहते पानी में उसे चलाएँ।
तेरी - मेरी नाव चले जब,
मीठे सुर में गाना गाएँ।

स्व रचित
उषा किरण


खुशहाली का देश हमारा 
हमको इससे प्यार है
खेतों में सोना उपजे है
चारों तरफ बहार है
आजाद, भगतसिंह, सुखदेव हुए 
ऐसे वीर बलिदानी 
मात्रभूमि पर मर मिटने की
जिसने मन मे ठानी 
आजादी की डोली के
वे सब ही कहार है
खुशहाली का देश हमारा 
हमको इससे प्यार है
स्वतन्त्र भारत खुशहाल रहे
ऐसी सबकी आशा है
भिन्न-भिन्न है वेशभूषा 
अलग अलग ही भाषा है
रंग बिरंगे फूलों का 
यह सुन्दर सा हार है
खुशहाली का देश हमारा 
हमको इससे प्यार है
उच्च हिमालय गगन चूमता
हरे भरे मैदान है
सभ्यता का प्रहरी है यह
पूरा संस्कृतियों की खान है
गंगा का अमृत जल p.k.
जाते मोक्ष के द्वार है
खुशहाली का देश हमारा 
हमको इससे प्यार है




मैया मोऐ चंदा मामा दिलबा दै।
काऊ खिलौना मोऐ दिलवादै।
दाऊ भैय्या मोये रूलाऐ मैय्या,
इन्हें जरूरत से जादा डटवादै।

मौडा मौडी काहे मोऐ चिडावैं ।
मोसों बोलें सच झूठ खिलावैं।
कहते मोसों टांग तोड दैंय तेरी,
ऐसी वैसी कहकर काये खिजावैं

मैया एक बांसुरी मोहे दिलादै।
भैया को नहीं तू कभी बतावै।
जे भौत भात हैं बच्छा बछिया,
कछु तू छोटे छोटे मोये मंगा दै।

काठी कौ मोये घोडा मंगवा दै।
ताके के ऊपर तू मोये चढवा दै।
संटी भौत जोर सै मारेंगे मैया
जैसे तू चाहै घोडा रूकवा लै।

तू माखन मिश्री मोये खिलाऐ।
पर मेरे मन क्यों जे माटी भाऐ।
सावन के दिन अबआ गये मैया,
काय नहीं मोऐ झूला झुलवाऐ।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

"चाँद दिला दो"
माँ मुझको चाँद दिला दो,
करूँगी बहुत सी बतिया,
उसमें बैठी अम्मा से मिला दो,
तारों की उस बगिया में,
झूला मेरा लगा दो,
खेलूँ मैं उनके साथ,
खुशियाँ सारी झोली में समा दो,
माँ मुझको चाँद दिला दो,
आते ही सूरज चँदा को भगाए,
सूरज को तुम डाँट लगा दो,
क्यों रहते हैं अलग-अलग
इनकी तुम दोस्ती करा दो,
मोटा पतला होता क्यों चँदा,
माँ इसे तुम डॉक्टर को दिखा दो,
माँ मुझको चाँद दिला दो,
चाँद दिला दो, बस चाँद दिला दो।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
2/8/18
वीरवार



देखो फूल हैं कितने प्यारे
रंग
 बिरंगे जग से न्यारे
लाल ,गुलाबी,पीले,नीले
मन करता है इनको छूले
होंठों पर इनके मुस्कान
भँवरे करते इन पर गान
पंख पसारे तितली आयी
बच्चों के है मन को भायी
फूल हमें जीना सिखलाते
काँटों में भी हैं मुस्काते।


बच्चों का कोना
😊
😊😊😊😊😊😊😊😊

छुक-छुक करती आती गाड़ी
भरती ख़ूब सवारी गाड़ी
पटरी पर इठलाती गाड़ी
कहते इसको रेल गाड़ी।😊😊
***************************
2
आओ -आओ मिस्टर भालू आओ
अपने बारे में भी तुम बतलाओ
मैं हूँ मोटा ताजा भालू
मेरा काला-काला रंग
मेरा घर बीहड़ जंगल
शहद है मुझको भाता
ठुमक कर नाच दिखाता।😊😊
***************************
3
टन-टन,टन-टन बज गई घण्टी
हुई स्कूल की सारी छुट्टी
भगदड़ मच गई चारों ओर
भागो-भागो घर की ओर।😊😊
****************************
4
चीं-चीं, चीं-चीं, चिड़िया प्यारी
घूम रही थी भूखी प्यासी
दिखे बहुत जब उसको दाने
पेट भरा फिर गाए गाने।😊😊
************************
"बच्चो का कोना "के अंश😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊😊
वीणा शर्मा



मम्मी मेरी प्यारी मम्मी
ब्यर्थ क्रोध करती हो

मैं ही क्यों पढ़ने जाँऊ
तुम क्यों नही चलती हो?

मम्मी मेरी प्यारी मम्मी
ब्यर्थ तुम डरती हो
हम दोनों ड्रेस पहन कर
चल चले हम स्कूल की ओर

टिफीन समय में हम खायेंगे
हम दोनों मिल बाँट कर
पूरी सब्जी तुम खा लेना
मैं खाऊँगा चाँऊमिंग जी भर कर

जब आये परीक्षा सिर पर
दोनों बैठ कर पढ़ेंगे जी भर
मैं प्रथम तुम होना दिव्तीय माँ
दोनो मिलकर जीतेगें प्राईज

स तरह से हम दोनों मिलकर
लायेंगे ढ़ेरो खुशियाँ घर पर
मम्मी मेरी प्यारी मम्मी
तुम क्यों नही बात सुनती हो?
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।


मम्मा मुझे सुनाती लोरी,
दादी कथा सुनाती है,
मैं जब नानी के घर जाता,
मुझको खूब हसाती है..

दादा छुप के मीठा खाते,
प्राणायाम करके मंदिर जाते,
अपना चश्मा कहीं भूलकर,
फिर मेरी वो दौड कराते..

बहना मेरी बडी सयानी,
अच्छे अच्छों की वो नानी,
मां का हाथ बटाती है,
पर मुझको खूब चिढाती है..

पापा मेरे प्यारे न्यारे,
थकान आफिस में छोड आते,
लाते मेरे कई खिलौने,
हम सब को रोज घुमाते..।



बाल कविता 
बच्चो से निवेदन 
विधा गीत 
तर्ज आओ बच्चो तुम्हे दिखाए........ 

आओ बच्चो तुम्हे सिखाएं, 
भाषा ये हम ज्ञान की, 
हरियाली को तुम बचाओ, 
पुकार है हिदुस्तान की 

हरियाली गर खोयेगी तो , 
पर्यावरण दूषित हो जायेगा, 
लाले तुमको पड़ जायेंगे, 
अपने साँसो प्राण कीl
आओ...

आओ बच्चो कसम ये खाये, 
एक एक वृक्ष लगाएँगे, 
रक्षा करेंगे इस पृथ्वी की, 
पर्यावरण बचाएंगे l
आओ....... 

जीवन का सत्य है ये, 
सबको हमें बताना है, 
वृक्ष भूमि की सम्पदा है, 
इनको हमें बचाना है l
आओ....... 
कुसुम पंत 
स्व रचित




मदारी आया बन्दर लाया
सबको अपना नाच दिखाया।
बन्दर ने सबको खूब हंसाया,
मेरा मन भी बहुत हर्षाया।

चिड़िया घर मे घूमने आया
शेर् देख मै घबराया,
झट से आँचल मे मुँह छुपाया।
पापा ने भी गले लगाया।

जब भी मैने मुँह फुलाया,
पुरे घर ने मुझे मनाया।
ढ़ेर सारे खेल खिलौने
देकर मुझसे प्यार जताया।

जब भी मै पास हो जाता,
सबसे खूब लाड लड़ाता।
अच्छा इंसान बनने के लिये,
मै स्कूल मे रोज़ ही जाता।




आओ चुन्नू आओ मुन्नू
मिलकर आओ, पेड़ लगाए
धरती को हरी भरी बनाये
सबका जीवन निरोग बनाये।।

टीचर कहती ये देते ऑक्सिजन
पेड़-पौधे देते सबको जीवन
पशु पक्षी हो या इंसान
सबको करते, ये जीवन दान ।।

माँ कहती कम हो रहे है तरुवर
काट इन्हें, लोग बना रहे है घर
पशु-पक्षी सब ,हो रहे है बेघर
प्रकृति नित जा रही उजड़।।

बिन पेड़ न बरखा होगी
सूखी-सूखी नदियाँ होंगी
धरा सूख,तड़पती होगी
गंगा जमना रोती होगी।।

दादी माँ ने भी, मुझे बतलाया
उनको भाती नीम की शीतल छाया
कहती ,रहती इससे निरोगी काया
दातुन भी इसका ही उन्हें भाया।।

क्यों सब दुख भरा जीवन बिताएं
आओ मिल सबका दुख मिटायें
जीवन सबका खुशहाल बनाएं
आओ मिल हम पेड़ लगायें।।

स्वरचित
गीता लकवाल



छोटे बच्चो को देखकर 
याद अपना बचपन आ जाता है
उन यादो के पंख लगा
मन फिर मेरा गुजारिस कर जाता है,
कि,आओ चलो फिर से,
बचपन में खो जाए हम
यादो को अपने बचपन की 
फिर से जी आये हम 
अच्छे बुरे का भेद भूलकर
अच्छा अच्छा जी आये हम
मौज मस्ती इज़्ज़त बेज़्ज़त भूलकर
बेफिक्रे से हो जाये हम
खाते पीते खेल-कूदकर 
चेन की नींद सो जाये हम
माँ मेरी पसन्द का खाना 
स्कूल में लंच में है ले जाना
और इसी उमंग में स्कूल 
पहुँच जाये हम ,
जाते ही स्कूल में भूख लग जाती
क्लास में ही टिफ़िन चट कर जाये हम।
आकर वापस माँ के आँचल में
छुपकर प्यार भरा स्पर्श पाये हम
आओ ना चलो फिर एक बार,
बचपन जी आये हम।

छवि ।


आओ बच्चों तुम्हें बताएँ
शिक्षा जीवन ज्ञान की
जीवन जीना जिसको कहते

वो जीवन क्या जीना है

सुबह से उठना नित्यकर्म करना/ 

पुस्तक का बोझ उठा चंद घंटों आखर ज्ञान लेना
फिर घूम फिर कर सो जाना

आचार ,व्यवहार ,संस्कारच्युत
शिक्षा पाकर भी अनपढ़ ही
रहना है ,तो वो शिक्षा किस काम की

बच्चो शिक्षा में थोड़ा सा
व्यवहार का रस घोल कर
आचार संस्कार के तड़के से संवार कर जो ज्ञान पाओगे
वही शिक्षा सच्ची शिक्षा होगी।।

डा.नीलम



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