Thursday, August 23

"साथ"23अगस्त 2018



साथ

समंदर के लहरों सी. 

लहराती हुई ज़िंदगी ၊
सम्हालते हुए,
जीवन के दो पहिये ၊
समय की सीमा में चलते,
भूत, वर्तमान, भविष्य ၊
आते हैं कभी,
काल समय के बवंडर ၊
कभी तूफान ,
कभी डराते काले बादल ၊
करते मुकाबला दोनों,
कभी हँसते, कभी रोते ၊
छटते तो है बादल,
और दे जाते,
कभी खुशी, कभी गम ၊
शिकवे भी होते,
शिकायतें भी होती ၊
लेकिन होती चाहत ၊
साथ ना छुटे कभी,
सात जन्म तक 

प्रदीप सहारे

सफर सुहाना हो जाये जब हो सुन्दर साथ 
हर बिगाडी बनने लगे रहे न मुश्किलात ।।

साथी की कीमत समझे जो रहे न काली रात
अमावस भी लगने लगे पूनम सी सौगात ।।

कौन अकेला चल पाया सबको साथी की चाह 
कठिन मोड़ हैं जीवन के उलझी है हर राह ।।

साथ कोई हो जीवन में न रहिये बेपरवाह
अपना फर्ज न भूलिये करिये माफ गुनाह ।।

भाई बन्धु पत्नि सखा साथ अनेकानेक 
सभी साथ माँगें सदा सूझ और विवेक ।।

मर्यादाओं से लिखा जीवन का आलेख 
''शिवम्" सफल वो ही रहा जो चला राह नेक ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



साथी तेरा साथ ना छूटे।
कैसे भी हों हालात।
चाहे जितनी आँधी आये।
या फिर हो बरसात।

अंधेरे में भी हरदम तुम।
पकड़े रहना मेरा हाथ।
बिजली कड़के तब भी ना डरूँ।
जो रहे तुम्हारा साथ।

ये जिंदगी के लम्हें होंगे।
बहुत हीं खुबसूरत।
जब दोनों होंगे हमेशा।
एक दूसरे के साथ।

चाहे कितने भी हों झमेले।
चाहे जितने बिगड़े हालात।
पर तुम ना मुँह मोड़ना कभी।
मैं निभाऊंगी सदा तेरा साथ।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी




अजब सी उलझन है दिल में
तुम बदलते गए इस तरह क्यूं,
कभी मेरी बात रही सबसे अच्छी 
अब बना दिये मुझे गलत क्यों।

तुम्हारी खुशी का रखा ख्याल हरदम
फिर मुझे दुखकारी बना दिये क्यूं,
कभी थी मेरी परवाह तुझे बहुत 
अब तुम बेपरवाह बन गए क्यूं।

जीवन के सुख दुख में साथ निभाए 
अब अकेले मुझे छोड़ दिए क्यूं,
रिश्ते नातों की फिकर बहुत थी
अब सबसे नाता टूट रहा क्यूं।

थकने लगी हूं अब जीवन के राह में
उलझनें दिन-ब-दिन बढ़ता रहा क्यूं,
छूटता जा रहा है तेरा साथ मुझसे 
दिल पर जख्म और बढ़ता रहा क्यूं।

अजब सी उलझन है दिल में
तुम बदलते गए इस तरह क्यूं,
कभी मेरी बात रही सबसे अच्छी 
अब बना दिये मुझे गलत क्यों।

--रेणु रंजन 
(स्वरचित )
23/08/2018


Vipin Sohal
जाने क्या होता तुम अगर साथ न होते।
दिल बडा रोता, तुम अगर साथ न होते।


अश्क इन आखों में उतरते हुए डरते हैं। 
हाल क्या होता, तुम अगर साथ न होते।

वो छोटा सा सफर याद हमें क्या रहता। 
भूल गया होता, तुम अगर साथ न होते।

खूब होती शिकायतें और शिकवे गिले। 
और कोई होता, तुम अगर साथ न होते।

क्या कहता शेर सोहल तुम क्या पढते। 
न जो हो होता, तुम अगर साथ न होते।

विपिन सोहल



.साथ...........

तेरा साथ अगर हो

जमाने को मैं दिखा दूंगा
आंधियाँ गम की हो भले
मैं वफाई की सदा दूँगा ।।

वक्त के वार का रुख
प्रेम तक मैं मोड़ लाऊंगा
चांदनी के उजाले में तुझे 
आपना बनाऊँगा ।।

तेरे नजदीक भी गर 
द्वेष का आभास गर होगा
किसी भी पथ पर गर एक क्षण
तेरा उपहास गर होगा
मैं उस वादी को तेरे
मंजिलों तक मोड़ लाउँगा ।।

अशोक सिंह अलक 
दिनांक-23/8/18
स्वरचित




 II साथ II 

मन मेरे पास बैठ थोड़ी देर....

कुछ बातें मेरे साथ भी कर....
तू अकेला इधर उधर भागता रहता है...
परेशान रहता है....
तू परेशान होता है तो मैं भी परेशान होता हूँ....

अभी अभी तू घर की सब्जी भाजी का....
बच्चों की फीस का हिसाब कर रहा था...
और घर के खर्चे का हिसाब कर रहा था...
और अब... 
दोस्त के बेटे की शादी है अगले माह...
उसमें कौन क्या पहनेगा...क्या देना है...
क्या देना है याद आते ही...सोचने लग गया कि...
कल को वो क्या देगा...
तुम्हारे घर शादी या किसी फंक्शन में...
पूरा हिसाब लगा रहा...लेने देने का...
छोड़ इन सब को तू मेरे पास बैठ....
मैं अकेला हूँ....

ये क्या अब पडोसी आ धमका.....
"क्या हाल है शर्माजी"...'बस ठीक नहीं है'...
"क्यूँ क्या हुआ"....
'बस ऐसे ही थोड़ा सा बुखार डॉक्टर पास जा रहा'....
"चलो मैं भी चलता हूँ साथ"....'नहीं नहीं...मैं चला जाऊँगा'....

अरे ये क्या...तुम तो भले चंगे हो...फिर झूठ किस लिए...
ओह..तुमने झूठ इस लिए बोला क्यूंकि तुमको पसंद नहीं रिश्ता बनाना...
या यह कि कल को उसको ज़रूरत पड़ी तो तुम बच सको...
बहुत हिसाबी-किताबी हो यार तुम तो....
तभी परेशान रहते हो....ना तुम किसी के हो ना कोई तुम्हारा...
या ये कि कोई घमंड है तुझे...कि तुम उस से बेहतर हो...
घमंड है तो छोड़ दे अभी...देख हाल शमशेर सिंह का...
कल तक वह दहाड़ता फिरता था...आज...
राख में पड़ा है विसर्जन होने को....
खैर छोड़...आ जा हम बात करते हैं...बैठ ज़रा....

अब ये क्या...तू किस सोच में डूब गया...
घर ना पडोसी...कहाँ गुम हो गया....
ऐसे जैसे पुरानी यादों में खो गया....
आँख से कभी आंसू बहते हैं....
कभी खुद ही मुस्कुराता है....
वाह...कमाल है...
पर बात क्या है....यह तो बता...
ओह...किसी प्रेयसी कि बात है जो इतना शरमा रहा...
ठीक है...लगे रहो...
पर फिर आंसू क्यूँ....
छोड़ गयी अकेले को...
तो फिर क्या....
ज़िन्दगी तो है ही ऐसी...
जो आज है कल नहीं होगा...
सब मतलब के साथ साथी हैं...
जिसका जितना मतलब...उतनी देर साथ...
मैं तो हूँ ना तेरे साथ....
फिर तू क्यूँ होता है उदास....
इसी लिए तो कहता हूँ...
छोड़ यह भागना...
जब तक भागता रहेगा...परेशान रहेगा...
शान्ति नहीं मिलेगी...
रुक जा...बैठ जा...मेरे साथ...
सिर्फ मेरे साथ....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२३.०८.२०१८

तेरा साथ,
---------------
है नाथ मेरी अभिलाषा ये,

तेरा साथ मुझे दिन-रात मिले,

मिले समर्पण प्रियवर का,
कोई प्रेम भरी सौगात मिले,

मैं सुध-बुध सारी खो दूंगी,
बस हाथों में तेरा हाथ मिले,

मैं भीग- भीग मिलने आऊं,
रिमझिम सावन की रात मिले,

मिले समर्पण रघुवर सा,
शिव-गौरी जैसा साथ मिले,

मिले सुनहरा धूप रवि का,
तारों की बारात मिले,

सुख भी हो दुख भी हो,
सम दोनों का अनुपात मिले,

मैं मिलूं उन्हें मीरा बनकर,
वो बनकर दीनानाथ मिलें,

बस चाह हमारी इतनी है,
की तुझमे खुद को खो पाऊँ,

तुम मुझे रिझाओ,हर्षाओ,
मैं तुझपर वारी-वारी जाऊँ,,,

......राकेश




आऐं प्रभु कुछ साथ निभाऐं,
हमको शुभाशीष प्रदान करें।

अंतरतम में दर्शन कर लें,
ऐसा भगवन कुछ दान करें।

अगर आपका साथ मिल जाऐ,
उन्नति शिखरों पर चढ जाऊँ।
केवल साथ परमेश का पाकर,
मै सब स्वजनों से साथ निभाऊँ।

रखा क्या इस नश्वर जीवन मे ं,
हम सभी परस्पर सौहार्द बढाऐं।
रहें सदा प्रेमप्रीत में घुल करके,
दुखसुख में हम साथ निभाऐं।

गिरधर गिरधारी गिरवर नागर।
पार लगैया है तू ये भवसागर।
मिले ज्ञान साधना साथ शारदा,
निश्चित स्नान करें सुखसागर।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



------------- 
समय कहता है मेरे #साथ चल। 
दुनिया बदलती है तू भी बदल।
न रुक तू पल भर यहाँ। 
बस तू चल और चलते चल। 
रास्ते में तुझे ख़ुशी मिले या गम। 
तू सबको #साथ ले तेरे #साथ हैं हम। 
न करना चाह बस फूलों की। 
न सफ़र से डरना शूलों की। 
इस रंगीन सफ़र में तू। 
नफरतो को दूर कर। 
चाहतो और विश्वास को। 
दिल में अपने अब तू अपने भर। 
हर रात को अपनी समझना अंतिम रात। 
हर सुबह रंगीन है न करना इसे बर्बाद। 
जिए जा तू शान से औरो को जीना सीखा। 
''समय'' तेरे #साथ है ''दीप '' तू प्रकाश दिखा।।
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दीपमाला पाण्डेय 
रायपुर छ ग
23.08.2018



"तुम क्यूं हो गये विदा"

काश! तेरे नयनों से मेरे, नयनों की बात कर पाती
झुकी हुई बोझिल पलकों पे कुछ ख्वाब सुला पाती,
क्यूं हंसों के जोङे को देख, मेरे प्राण अकुला जाते
आज मेरे देह द्वार तुम दो पल अतीत सजा जाते।
निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

दिल की धङकन देख, तुम्हैं, यूं उन्मादित होती
ये सूनापन ना होता सोचो, कितनी मादकता होती।
पिया विरह ये तङप विरहनी, होंठ कभी मुस्काते,
कैसे शूल चुभे चितवन में, व्याकुल नयना बतलाते।
निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

सांसों में गुम होती सांसे, भीगी भीगी प्रीत निभाती
सौभाग्य की पहचान बताती, माथे सिन्दूर सजाती,
शतदल सी गोरी कलाई, और तुम हरी चूङीयां लाते,
कान्त,अभिमंत्रित फेरो के, कितने ही वचन निभाते।
निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

उर में छिङती नयी रागिनी, अलसायी संध्या गाती,
खिलती काले गेसू के जादू, महुवा मनवा भटकाती।
मैं अमावस सी घिर घिर जाती, तो तुम मेघ बरसाते,
अंध गर्त से जीवन को भी, रतरानी सा महका जाते
निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

ले जाते निज याद तुम्हारी, हदय मेरा मुझको दे जाते
मेरी पीर भरी व्यथा लेकर तुम, मेरे त्यौहार दे जाते।
मौन बन गया प्रश्नचिन्ह सा, क्यूं मेरी पूजा ठुकराते 
इसी जनम साथ छोङ गये, क्या सातों जनम निभाते।
निष्ठुर! तुम क्यूं हो गये विदा, ये तो बतला जाते?

डा. निशा माथुर/(स्वरचित



मेरा शीर्षक जीवन साथी 
23अगस्त 2018
प्रियतम मेरा साथ हो, 
बस हाथो मे हाथ हो,
प्रेम की बरसात हो, 
बस साजन तू मेरे साथ हो l

जीवन के सारे दुःख, 
भूल जाऊँगी इक पल मे, 
सारे सुख आ जायेंगे, 
बस तेरा विश्वाश हो l

मै हूं अर्द्धांगिनी तेरी,
तू ही है आस मेरी, 
दिन रैन मै तुझको पुजू, 
तू मेरा जगदीश है l

नहीं चाहिए धन और दौलत, 
ना मुझको मकान चाहिए, 
बस तेरे दिल के आंगन मे, 
थोड़ा सा स्थान चाहिए 

तू काम कामदेव है मेरा, 
मै, "कुसुम "रति तेरी, 
कंटक वन मे भी रह लेंगे,
बस हम दोनों साथ हों l 
प्रियतम...... 
कुसुम पंत 
स्वरचित




साथ' सभी है 

साथी कौन होता है ,
वक्त रिश्तों का
कडा इम्तिहान लेता है।

कही साथ बँधन,
तो कहीं ..
'साथ' होके भी
स्वतंत्र होता है,
कहीं बोझ, समझौता
तो कहीं ...
जीने का मंत्र होता है।

कोई पराया होके भी
दामन थाम लेता है,
तो कोई अपना होके भी
'साथ' छोड देता है ।
तो..
इस छोडने-थामने में भी
कहीं स्वार्थ होता है,

खुशनसीब वे जहाँ
'साथ' निस्वार्थ होता है
वहाँ ..
प्रेम और विश्वास का
वास होता है
शायद..
वही सच्चा साथी
और..

'साथ' का अर्थ होता है...।

स्वरचित 
ऋतुराज दवे



"साथ"
1*

उलझा मन
झूठे का बोलबाला 
टूटा विश्वास 
2*
वक़्त की मार
कठिन इम्तिहान 
प्रभु का साथ
3*
सच का साथ
विश्वास है कायम
मिटाता तम
4*
स्वार्थी दुनिया 
कोई नहीं है साथ
कड़वा सच
स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




विषय - साथ
विधा - दोहे

दोहे -

१-
सच का साथ न छोड़िए, कुछ भी हो परिणाम ।
सुमन-सेज चाहे मिले, या हो शूल इनाम ।।

२-
वे जन धन्य मनाइए, जिन-सर प्रभु का हाथ ।
खुशियाँ सहर्ष बाँटिए, दे निर्भर का साथ ।।

३-
समय देखता भावना, करिए नहीं गुमान ।
निर्बल का बढ़-साथ दें, शीघ्र ही श्रीमान ।।
#
- मेधा नारायण,
(स्वरचित)
तिथि- २३/८/१८.




ख्वाबों में नहीं, हम सच में साथ है,
खुशनुमा दिन और मस्तानी रात है!!

वक्त चलता ही रहेगा, अपनी चाल में,
संग हम मिल रहे है, ये बड़ी बात है!!

थोड़े में ही खुश हो जाते हैं, हम तुम,
मिलन तेरा मेरा, अनुपम सौगात है!!

ख्वाहिश नहीं कि दुनिया हमें जाने,
रहें तेरे दिल में, उमड़ते जज्बात हैं!! 

जिंदगी दिखाती है, धुपछाँव सभी को,
मिलके संग संग हमने बदले हालात हैं!!

कह दिया रहनुमाओं से, हमने भी अब,
थम जाए पल, लगे ना कोई आघात है!!

#गिरीश
#स्वरचित


"साथ"
मन की बातें मन में रखूँ,
चाह मुझे तेरे साथ की,
तेरी यादें दिल महकाएँ,
जैसे रानी रात की,

जींदगी के सफर में,
जरूरत तेरे साथ की,
आजा साजन बाहों में,
कर ले कदर जज्बात की,

यूँ ना रूठो साजन मुझसे,
है वादा साथ निभाने का,
जल जाएगी समाँ अगर,
हाल होगा क्या परवाने का,

जाने ना दूँगी हाथ छुड़ाके,
बाँधी है प्रेम की ड़ोर,
देना साथ सदा तुम,
चाहे जीवन में आए कोई दौर।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
23/8/18
वीरवार





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