Wednesday, August 1

"स्वतंत्र लेखन"29जुलाई, 2018






सच कहूँ,जीना भी तुम मरना भी तुम
इस प्रभा की जीवन ज्योति भी तुम!
मै हंसू रोऊ कारन भी तुम
असत्य मार्ग का निवारण भी तुम!!

मेरे शब्दों में स्वर व्यंजन हो तुम
स्वरों में छवि बनकर आये हो तुम!
शब्दों में तुम्,पद में हो तुम
मेरी कविता में पदबंध हो तुम!!

मेरी सरलता में हो तुम
मेरी एकाग्रता का कारण हो तुम!
भाव में तुम, सदभाव में तुम
मेरे पथ को आलोकित करते हो तुम!!

छवि ।

झुकते झुकते रूख से तेरे हट गया नकाब है
अब तलक वल्लाह ऐसा देखा नही शबाब है ।

एक झलक का था जुनू वो तो मेरी ऑख का
घोडे से हम गिर गये जो टुटा था  रकाब है ।

देख हॅसी जमाल तो हो गये मदहोश हम
नजरो से झलक रही देखो तो शराब है ।

जुल्फ से खुश्बू बिखरे जो महकता हो चमन
दिल खिला रे हमारा जैसे खिला  गुलाब है ।

हिजाब से बदन ढकना हमे तुम्हारा यू लगा
काली घटा मे हो छिपता जैसे  माहताब है ।

मन ने मन मे समझ ली उनके मन की बात को
बिन खोले दिलवर पढता ये ऐसी किताब है ।

थी जमी पर रौशनी और फलक पर चाॅद गुम
हामिद कहती सारी महफिल ये कैसी उजास है ।

हामिद सन्दलपुरी की कलम से

ग़ज़ल
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वज़्न--122 122 122 12

कभी ये जहाँ गुदगुदाता तुम्हें
कभी ये जहाँ आजमाता तुम्हें।

हैं सुख-दुख तो जुड़वा बहिन ज़िंदगी
विधाता ये लीला दिखाता तुम्हें।

है मुश्किल सफ़र ज़िंदगी अब संभल
है मंजिल कठिन कुछ बताता तुम्हें ।

ये अच्छा-बुरा रंग हैं हर तरफ़
हँसाती हमेशा ये आशा तुम्हें।

फ़िजा में मुहब्बत है बिखरी हुई
ये संगीत सुर गुनगुनाता तुम्हें ।

अँधेरा घना दूर होगा कभी
सफ़ल ज़िंदगी थपथपाता तुम्हें ।

रखो तुम ये विश्वाश खुद पे अभी
मिलेगी "भवानी" सफलता तुम्हें ।

शावर भकत "भवानी"
स्वरचित

🌹भावों के मोती🌹
28/7/2018
स्वतंत्र लेखन

छल-प्रपंच,मोह-माया
ये जीवन के अंत
अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त जब
स्वयं सिद्ध ,जीवन गर्क।।

नेत्र पट है भींच लिए
कर्म गति गई मारी
हृदय हूंक डोल रही
सत्य पथ,गई हारी।।

दम्भ-द्वेष भावना छली
जागृत हिय,सुक्षुप्त
सुकर्म गति तीव्र कर
अनिश्चित जीवन अंत।।

जड़-चेतन के मूल का
निश्चित होता अंत
भजो हरि ॐ नाम सब
सर्वम यही सुखद।🙏

वीणा शर्मा
स्वरचित
एक गज़ल का प्रयास

जाने क्यों एक तेरा ही जिक्र करता है दिल
सम्हालूँ तो सम्हाले नही सम्हलता है दिल ।।

कब से नही आ गया हूँ मैं उस महफिल से
मगर अब भी उसी के लिये मचलता है दिल ।।

क्या रंगत थी उन जुल्फों में उन निगाहों में
बार बार उसी में खो जाने को करता है दिल ।।

सब ही है आज मगर तेरी कमी खलती है
बहलाऊँ भी कहीं तो बहलता नही है दिल
।।

अकेला चल रहा हूँ आदत सी पड़ गई है
मगर अब भी कभी कभी ठिठकता है दिल ।।

शायद अब भी उसे उम्मीद है दीदार की
हर रोज ही उसके वास्ते दुआ करता है दिल ।।

काश कहीं मिल जाये वो सूरत ''शिवम"
इस उम्मीद में उन गलियों से गुजरता है दिल ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

शायरी

निदाघ मे यूं बदरी ना इतराया करो
जमकर ना सही थमकर बरस जाया करो

दिल कि लगी ये आग जला कर ना करदे राख
तपते हुए अश्कों को भिगो जाया करो।

ओ रे चंदा ओट मे बदली के जाकर क्यों छुपे,
चाँदनी भी छुप रही तुम यूं ना शरमाया करो

ओस कण कि वो नमी हूँ ओज छू ओझल हुई,
सोज कि तृष्णा तृषा तुम तो ना तरसाया करो

बाग के पुलकित सुमन से ये चमन सुरभित हुआ
सौरभी शुचिता समीरा यूहीं महकाया करो

आँखों के आँसु है मोती टाँक दो बादल तले,
युहीं बरबस शुष्क धरती पर बरस जाया करो।

नेह कि प्यासी धरा शुचि अश्रुधारा  संचिता,
सौरभी सिंचन जलज वो तुम ही ले आया करो।

चंद्रमा का पलना चाँदनी गाय लोरियां,
रात सितारों के संग झुला झुलाया करो।

नेह का डोला सजाया रजनी के आगोश में,
नीदिया रानी चुपके चुपके तुम चली आया करो।
         रागिनी शास्त्री

★अर्जुन का मोह ★

माया मन मोहिनी
कंठ में डाले फंद
ये नटनी जब नाच नचावे
मन में होवे द्वंद
थे समक्ष रण में खड़े
माया तारणहार
तद्यपि अर्जुन था रहा
आज स्वयं से हार
धरा गांडीव युद्ध धरा पर
बोला कर को जोड़
 हे ! केशव.. रक्षा करो
देखूं तुम्हारी ओर
तुम सखा सारथी मेरे
गुरु पद अब ग्रहण करो
शरण में तुम्हारी आन पड़ा हूं
मनके द्वंद हरण करो
सगे संबंधी सब मेरे
किस-किस पर प्रहार करूं
निज रक्त पर हे!हरि..
किस तरह मैं वार करूं
अंक में जिनके खेला हूं
कैसे उनका मारण करूं
रक्त से लथपथ विजयश्री को
किस तन पर धारण करूं
ये तो आचरण धर्मविरुद्ध होगा
हे!जनार्दन मुझसे न युद्ध होगा
देख भक्त को मोहग्रस्त
 बोले श्री भगवान
कर्ता कर्म कारण मुझमें
निमित्त मात्र इंसान
मैंने इच्छामात्र से
 रचा संसार यह सारा है
फिर किसी के जन्म मरण पर
कैसे अधिकार तुम्हारा है
जगत जीव समाहित मुझमें
मैं जीवन हूं मैं काल हूं
देख! सुंदर स्वरूप मेरा
मैं विराट हूं विकराल हूं
मुझ शोकनिहंता के समक्ष
मोह का विसर्जन करो
हे !कौन्तेय गांडीव साधो
कर्तव्य का निर्वहन करो
देख हरि का विराट रूप
अर्जुन का मोह दूर हुआ
"मैं" कर्ता हूं "मैं" कारण हूं
अज्ञान ये चूर चूर हुआ
शरण में आए सखा भक्तों को
निज दर्शन का दान दिया
सकल विश्व को शिक्षा दी
जग को गीता का ज्ञान दिया

                                   ✍️ तृप्ति
"तुम ही हो"

जैसे हो तुम वैसे हो तुम
कोई शून्य भी और पूर्ण भी तुम
ये दुःख सुख द्वैत तुम्हारा है
ये मन का खेल तुम्हारा है
हर रंग तुम्हारे अपने हैं
हर साथ तुम्हारे सपने हैं
नक़ल नहीं अद्वितीय हो तुम
कोई संग नहीं एक ही हो तुम

तुम हो भी तुमसे
या
हो नहीं खुद से
यह संघर्ष तुम्हारा है
हर तर्क तुम्हारे अपने हैं
कुछ
उधार लिए हुए सपने हैं
मात्र स्वप्न नहीं एक होश हो तुम
मात्र बुद्धि नहीं हाँ बुद्ध हो तुम

प्रकृति जैसी है वैसी है
स्वाभाविक
सहज
नैसर्गिक सी है
और कोई दृष्टिभेद तुम्हारा है
सौंदर्यबोध तुम्हारा है
हर तुलना तुम्हारी तुमसे है
हर संकीर्ण दीवारें तुमसे है
कोई तुलना नहीं अतुलनीय हो तुम
कोई कैद नहीं आकाश हो तुम

तुमसे है दौड़ जीवन की
या..
जीवन बस पड़ाव भर
तुम हो किसी के लिए
या...
कोई जो तुम्हारे लिए
हर विश्वास तुम्हारा है
अहंकार तुम्हारा है
हर शब्द तुम्हारे तुमसे है
हर बूँद  तुम्हारे तुमसे हैं
मात्र  शब्द ही नहीं हाँ गीत हो तुम
कोई बूँद नहीं सागर हो तुम

हाँ
तुम्ही हो
प्रकृति की
हर असंभव सम्भावना
तुम ही हो

ऋतुराज दवे
स्वतन्त्र लेखन
29जुलाई2018
दिल है तो अहसास भी होंगे।
इंसान हीं हूँ मैं, कोई खुदा तो नहीं।
माना कि हो गई कोई गलती।
हम सबसे जुदा तो नहीं।
मन में कुछ हुआ,तो लड़ते झगड़ते हैं।
ये कोई गुनाह तो नहीं।
अपने को कभी मना भी लिया करो।
इंसान हीं हूँ मैं, कोई खुदा तो नहीं।।
सारे शिकवे,शिकायतें मिट जायेंगे।
मुस्कुराना कोई गुनाह तो नहीं।
एक बार मुस्कुरा लो तो,
पत्थर भी पिघल जाते हैं।
इन्सां हीं हूँ मैं, कोई खुदा तो नहीं।।

*******************
बिन राधा वह भी आधा है
*******************
सूनी सी गलियाँ मधुबन की,
          सूना - सूना उपवन है।
            जड़ चेतन भी सूना सा,
                  सूना राधा का मन है।

पंथ निहारत गुजरे निशदिन,
           सदियाँ जैसे बीत गई।
       अंखियाँ हो गई सावन भादो,
             बदली बिन बरसे रीत गई।

वादा करके जो न आया,
          ऐसा वो हरजाई है।
       ठहरे यमुना जल में दिखे,
                उसकी ही परछाई है।

गुमसुम बैठी यमुना तीर,
     विकल हो रही राधा है।
कण-कण में छवि समाई जिसकी,
            बिन राधा वह भी आधा है ।

                       उषा किरण

"ऐ कवि! ऐसी रचना का सृजन कर कि
अक्षर-अक्षर आज वो ऋचा बन जाए
जिस पन्ने पे हो आपकी रचना
कल वो काव्य बन जाए"

1

करूण-अंतर में वेदना ना कर
बंधन-मोह में रचना ना कर
तप-कानन की लता से
पुष्प की बरसात कर
युग-युग तक जिन्दा रहे जग में मानवता
दीन-हीन असहाय जनों पर
अस्पृश्यता का विनाश कर ।

2

स्वर - स्त्रोतों में हलचल ना कर
उर के भावों में आवेग प्रबल ना कर
प्राणों की वंशी पर रसमय स्वर में गायन कर
युग-युग तक प्रज्वलित हो
नव ज्योति की प्रभा
श्रृंगी की प्रभाती राग में
विभूति स्वर में गायन कर।

3

तड़पते ह्रदय में तमिस्त्र ना कर
वीरान सी राह में अँधेर ना कर 
सूखी घास पर पावस की बूँदों की बरसात कर
युग-युग तक रहे सरिता में कलकल
पर्वतों के ऊँचे शिखर से अविरल धार में झर-झर कर

4

नभ- दीपों में धुँधले स्वप्न ना भर
वनफूलों में वेदनाओं का ओस ना भर
अरूण की आभा से अमिट मुस्कान में सत्य की राग भर
युग-युग तक रहे प्रदीप्त विभा
दूर खंडहरो में भी मधुर ज्योति का खध्धोत कर।
@शाको
  स्वरचित

भा. 29/7/2018( रविवार)पीडा तो मेरी रानी है ः( बहुत पुरानी रचना)ःः

पीडा तो मेरी रानी है,
मैने इससे प्यार किया है।
बचपन से ले बर्तमान तक
जिसने मेरा साथ दिया है।पीडा तो.........

ओ,प्राणप्रिय मै प्रियतम तेरा
तेरा मेरा एक बसेरा।
अपार नेह को पाकर मैने,
मृत्यु नगर में डाला डेरा।
दुर्गम पथ की बाधाओं से,
हम दोनों ने सुलह किया है।पीडा तो.........

सुख की गंध निकट जब आई,
इसने मुझको आँख दिखाई।
थोड़ा इसने किया इशारा,
मैने तब फिर लिया किनारा ।
वपदाओं से होड लगाने,
सका दामन थम लिया है।पीडा तो..........

हिम्मत इसकी निपट सहेली
जिसकी संगति एक पहेली।
मुझकों तो ये अमृत जैसी,
होगी तुमको विष की वेली।
मैने जिसका हाथ थाम के,
आत्मशांति पथ खोज लिया है।
पीडा तो..........
हर प्रेमी का प्रेम रहे ज्यों,
साथ रहेगा मेरा इसका।
मेरा तो संकल्प एक है,
आशीष चाहिए केवल उसका,
जिसनें परिचय पीडा से करने ही
मृत्युलोक में भेज दिया है।
पीड तो मेरी रानी है,
मैने जिसको प्यार किया है
बचपन से ले बर्तमान तक,
जिसने मेरा साथ दिया है।

स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


"स्वतंत्र लेखन"
"एक अजन्मी बेटी की माँ की पुकार"

 मुझे मत मारो कोख में
गोद में आ जाने दो माँ
दादा,दादी बुआ ,चाचा
ये सब तो मेरे अपने है माँ।

फिर क्यों नही मुझे वे आने देते
इस सुनहरी दुनिया में माँ।
तुम समझाओ प्यार से उन्हें माँ
समझ जायेंगे बात वो माँ।

भैया को मैं तंग न करूंगी
मैं खेलूँगी अपने आप
थोड़ा प्यार बचा लो न माँ
डाल दो मेरी झोली में न माँ

मैं बनुँगी बहादुर बिटिया
खूब नाम कमाऊँगी मैं माँ
मैं भी करुँगी खूब सेवा
तुम्हारा बुढ़ापा मे माँ।

भैया को जब तुम लोरी सुनाओगी
चुपके से मैं सो जाउँगी मैं माँ
दुनिया से तो मैं लड़ भी लूँगी
अपनो से कैसे लड़ू मैं माँ।

मैं जिस शिद्दत से तुम्हें प्यार करती हूं
उसी शिद्दत से तुम भी करो न माँ।
दुनिया के थपेड़े से लड़ लूंगी मैं माँ
बस तुम रखना सर पर हाथ माँ।

मैंने तुम पर विश्वास किया है
धोखा तो तुम दो न माँ
मत मारो कोख में मुझे
गोद में आ जाने दो न माँ
  स्वरचित -आरती श्रीवास्तव।
मुसाफिर

मुसाफिर हैं सारे ही यहाँ पर,
जग है  एक मुसाफिरखाना ।
लगा ही रहता साथी यहाँ पर,
लोगों का है नित आना जाना।
भूल जाते हम  फिर भी क्यों,
दुनिया तो है  इबादतखाना।
मानने लगते क्यों लोग यहाँ ,
नहीं पड़ेगा  यहाँ से जाना ।
हत्या चोरी व मारकाट का वे ,
बुनते रहते नित  तानाबाना।
भूल रहा है सुन पागल पंथी ,
नहीं यहाँ दो दिन का ठिकाना।
जीवन के सच को तू बाँच ले ,
राहें हैं अलग पर एक ठिकाना।
मानव हो तो इतना करना तुम,
जीवन को बस सफल बनाना।
मुसाफिर हैं सारे ही यहाँ पर ,
जग है एक मुसाफिरखाना ।

डॉ.सरला सिंह

स्वतन्त्र लेखन
२९जुलाई२०१८
(रविवार)
विधा- ग़ज़ल
काफ़िया- निभाते
रदीफ़- चलो
वज्न- १२२ १२२ १२२ १२
प्रस्तुत है एक प्रयास -

सदा साथ मिलते मिलाते चलो
न दे साथ कोई भुलाते चलो

यहाँ पर दिलों के अजब ढंग हैं
नये ढंग से तुम निभाते चलो

ज़माना बुरा है न ये तुम कहो
नई रीत अब तुम चलाते चलो

सभी को सभी कुछ न मिलता कभी
खुशी से खुशी तुम लुटाते चलो

मुखौटें सजातीं यहाँ सूरतें
नजर को जरा तुम बचाते चलो

यहाँ रास्ते हैं कँटीले बड़े
जरा आहिस्ते से हटाते चलो

जहाँ में दिलें के बड़े भेद हैं
सभी भेद दिल के मिटाते चलो

यहाँ आशना है नहीं कुछ मगर
'तलब' रास्ता तुम बनाते चलो
                  #
- मेधा नारायण.

स्वतंत्र लेखन पर प्रभू का भजन

           "भजन"
लगन नैनों में तेरी है,
तेरा मिलना जरूरी है,
क्या आशा करू जमाने से,
जब तू ही बनाए दूरी है,
सुन घनश्याम मेरे,
 तू तो घट-घट में है,
देता नही क्यों तू दर्शन,
श्याम तू किस हठ में है,
क्या मेरा क्या तेरा है,
व्यर्थ की मोह माया है,
आकर श्याम तेरी छाया में,
सब कुछ मैनें पाया है,
इश्क किया मैनें हरि से,
फिर क्यों ये दूरी है,
लगन नैनों में तेरी है,
तेरा मिलना जरूरी है।

स्वरचित-रेखा रविदत्त

 मंच पर आज के विषय पर मेरी प्रस्तुति:-

हमेशा ही अपना तो समझा तुम्हे
नही देख सकता मैं रोता तुम्हे।

अदा है तुम्हारी कयामत सनम
ये आशिक रहेगा लुभाता तुम्हे।

हमे जिंदगी से मुहब्बत हुई
नजर में सनम जब बसाया तुम्हे।

शराफत यहाँ काम आती नही
मिलेगा यूँ अपनो से धोखा तुम्हे।

करेगा हुनर पर भरोसा यहां
जमाने मे आगे दिखेगा तुम्हें।

करेगा नही जो समय की कदर
दिखेगा हमेशा वो रोता तुम्हे।

             प्रदीप रामटेके
         लांजी,मध्यप्रदेश


जब से हम सब बड़े और  लापरवाह हो गए
सच मे बहुत सारे किससे त्योहार उपहार खो गए
बचपन मे जब भी ये वर्षा रानी आती थी
जम कर हम पर छुट्टीया भी बरसाती   थी
जैसे जैसे बादल आसमान में तनता था
उसके साथ साथ अपना छुट्टी का मौसम बनता था
बादल के साथ जैसे हवाई चलती थी
दुश्मन हवा छुट्टी को भी निगलती थी
हवा बदल को उड़ा ले जाती थी
बिन बारिश के छुट्टी पर पानी फेर कर जाती थी
सड़के नदिया और नदिया सागर हो जाते थे
हम भी जमकर टोली संग जमकर ही नहाते थे
सावन के आते ही झूले पेड़ो पर पड़ते थे
गिरकर हाथ पांव टूटने पर भी घरवाले ना लड़ते थे
बारिश के आते ही बिजली गुम हो जाती थी
बैठ शाम को दादी माँ कहानी खूब सुनाती थी
बिजली के आते ही बच्चे जमकर चिल्लाते थे
एंटीना ठीक करके आगया चला गया बतलाते थे।।
जब तक एंटीना ठीक कर नीचे आते थे
बत्ती को गया हुआ ही पाते थे...
""""स्वरचित ---विपिन प्रधान""




   -:इश्क :-
सुरमई शाम में
    साहिल की रेत
       पर लहरों को छूना
इश्क हैं
चाँदनी रातों में
    चाँद से उनकी
         बातें  करना
इश्क है
तन्हा रातों में
    छत पर बैठ कर
      तारों को तकना
इश्क है
अपने प्यार को
   आईने देख कर
      हल्के से मुस्कुराना
इश्क हैं
पैगामे मुहोब्बत
   लिखनाऔर मिटना
      मिटा कर फिर लिखना
इश्क हैं
तेरी यादों के दिये से
    दिल का आशियाना
       रोशन कर गुनगुनाना
इश्क हैं
खुशियाँ बिखेर कर
    जमाने में छुप-छुप
       आँखों से अश्क बहाना
इश्क हैं
दुनिया में सबसे खूबसूरत
दर्द इश्क है,इंतजार इश्क हैं
मिलन इश्क हैं,दीदार इश्क हैं
गर यह सब हैं तेरे मेरे दरमियां
तो मेरे यार
मुझे तुमसे..
तुम्हें मुझसे
इश्क है
स्वरचित -मनोज नन्दवाना

* बेपर्दा हो रहे लोग *
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ऐतबार नहीं होता है मुझे अब इस दुनिया पर,
जलते-भुनते हैं लोग यहां दूसरों को बढ़ते देख।

घिन आती है दिखावों की व्यवहारिकता पर,
कुढ़ते पल-पल लोग यहां दूसरों को हंसते देख।

असलियत दिखता नहीं किसी के चेहरों पर
इठलाते हैं लोग यहां दूसरों को झुकते देख।

राज दिल का समझ न आए, किसी को देख,
सकुचाते हैं लोग यहां दूसरों को संभलते देख।

अपनों की खुशी में शामिल नहीं होने के सौ बहाने,
बेचैन रहती आत्मा दूसरों को जंग जीतते देख।

शर्मों हया दिखती नही है अब सबकी आंखों में,
बेपर्दा है लोग यहां दूसरों को पर्दा करते देख।

--रेणु रंजन

हे नीलकंठ शिव महाकाल।

जय आशुतोष जय प्रभु कृपाल
हे नीलकंठ शिव महाकाल।
हे आदि देव त्रिपुरारि हरे
जयशंकर शिव भयहारि हरे
जय भूतनाथ अवढर दानी
जय गंगाधर धर विष व्याल
जय आशुतोष जय प्रभु कृपाल
हे नीलकंठ शिव महाकाल
जय डमरू धर जय नन्दीश्वर
जय परम पिता जय परमेश्वर
जय आदिदेव जय महादेव
 जय महाप्रभु जय चन्द्रभाल
जय आशुतोष जय प्रभु कृपाल
हे नीलकंठ शिव महाकाल।
कैलाश पती जय जगत पती
जय त्रैलोचन जय भयमोचन
 जय कृपासिन्धु संकट मोचन
करते सीधी गृह वकृ चाल
जय आशुतोष जय प्रभु कृपाल
हे नीलकंठ शिव महाकाल।

अनुराग दीक्षित


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"स्वतंत्र लेखन"26मई 2019

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