Friday, August 3

"राह /रास्ते"3अगस्त 2018

राह/रास्ते"
(3/08/17)शुक्रवार
( वो बूढी आँखें )


ज़िन्दगी का सफर तय करने निकले
हमदम का हाथ, हाथों में यूँ पकड़े, 
ज़िन्दगी की राह लग रही थी आसान
पूरे होते नजर आ रहे थे अरमान! 

ज़िन्दगी का सफर आगे गतिमान था,
बच्चो से घर सुन्दर बाग़बान था, 
रौनक खूब लगती थी घर पर, 
दिल को बहुत सुकून मिलता था! 

पंख लग गये थे बच्चों में अब, 
नई राह तय करने लगे थे सब, 
कमाने की चाह में बस गये विदेशों में
हम दोनों बूढे राह में रह गये अकेले !

राह तकती हैं बूढी आँखें हर रोज, 
बच्चें आयेंगे कब, किस रोज, 
याद करके पिछला वो समय, 
खींच रहें हम अपनी जीवन की डोर! 

स्वरचित "संगीता कुकरेती"

जीवन के इस पावन पथ पर,
सुख-दुख को ढलते देखा है,
जीवन को चलते देखा है....


प्रकृति के इस मधुर खेल में,
निशा-दिवस के सुघर मेल में,
अंगनाई की उस अमरबेल को..

गिरते और उठते देखा है...
जीवन को चलते देखा है.....

पल-छिन-पल का शरण कहां पर,
जीवन है जहाँ मरण वहां पर,
साश्वत का है हरण कहां पर,
मृग-मारीचिका जीवन सपना,
जो उसका था ही नही अपना....

उसके लिये रोते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

जिसे यौवन खूब लुभाती है,
निज- लावण्य पर इतराती है,
जो रति देवी कहलाती है,
ऐसे अभिमानी नारी को,
यौवन पूर्ण सुकुमारी को...

दर्पण में छलते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

पंख कट गये तो फिर क्या है,
सांस थम रही तो फिर क्या है,
रक्त जम रही तो फिर क्या है,
साहस के उदगारों से
जन के जय-जयकारों से,
विना पैर के प्राणी को,

पर्वत पर चढ़ते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

एक राम एक कृष्ण धरा पर,
एक प्रेम एक शक्ति उपासक,
दोनो है नर श्रेष्ठ चराचर,
अपने स्वार्थ साधन हेतु,
अलग-अलग जनमानस को,

परिभाषा गढ़ते देखा है...
जीवन को चलते देखा है....

जननी-जनक आधार हमारे,
दोनो ही हैं जीवन के प्यारे,
करुण-रुदन में जिन्हें पुकारें,
जीवन के इन अमोल निधियों को,

तपो-भूमि की पावन सिध्दियों को..
रोटी को रोते देखा है...जीवन को चलते देखा है...
भारत की इस अमर भूमि को..
धु-धू कर जलते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

....राकेश



इस जीवन के रास्ते, टेढ़े,मेढ़े हैं।
चलना सम्भलकर तुम,दूर मंजिल है।
राह में लगेंगी ठोकड़ें भी बहुत।
गिरकर फिर सम्भलना होगा।
मंजिल तक पहुंचने के लिए।
बहुत कठिन श्रम करना होगा।
कितने तो गिर जाते हैं।
कितने हीं फिर पहुंच जाते हैं।
घबड़ाना नहीं कभी भी तुम।
चलते रहना फिर मंजिल दूर नहीं।
असफल हुए वे,जो चलने से डर गये।
सफल होंगे वे,जो चलते हीं रहे।
स्वरचित
बोकारो स्टील सिटी


सब राही अपनी राह गए। 

सब राही अपनी राह गए,
क्यों अपलक नैन निहार रहे,
नयनो में मृदु अमृत रस भर जन जन का पंथ पखार रहे,
कब कौन किसे मिल पाता है सब तो विधना का नाता है,
कुछ दूर गए कुछ पास गए,
सब राही अपनी राह गए क्यों अपलक नैन निहार रहे
सबका सपना साकार रहे सबकी अभिलाषा हो पूरी
सबको हृदयंगम करनी है थोड़ी सी जो भी है दूरी,
सबकी अपनी है मजबूरी,
कुछ आस लिए हर बार रहे
सब राही अपनी राह गए,
क्यों अपलक नैन निहार रहे
राहों का क्या रह जाती हैं अन्तः पीड़ा सह जाती हैं
सब की यात्रा करती पूरी
अनगिनत राह को पथिक मिले,
संख्या होती निशि दिन दूनी
पर राह पड़ी राह जाती है जाने क्यों सूनी की सूनी
फिर भी राहों को है सुकून सबका सपना साकार किया
सबको जीवन अमृत घट दे
अपना सर्वस्व निसार किया
कुछ जीत गए कुछ हार गए
कुछ जीवन धन कर पार गए कुछ बापस गेह निहार रहे
सब राही अपनी राह गए,
क्यों अपलक नैन निहार रहे

अनुराग दीक्षित



ीवन की बहुत कंटीली राह
निकलती रहती मुंह से आह
पर फिर भी अचम्भा कितना
हर दिन बढ़ती रहती चाह। 

बहुत सुन्दर दिखता फूल
लेकिन घेरे रहता शूल
कितना ही सुगन्धित वो कर दे बाग
फिर भी पीड़ित करती धूल। 

हर राह की यही कहानी है
कोयल सुरों की रानी है
पर वह भी सदा डरी रहती
यह कैसी ज़िन्दगानी है। 

ईश्वर कहता हो जा बस सरल 
मुझे पाने की यही राह सरल
मैं बोला यदि होती यह इतनी सरल
तो बबूल भी तो देता फल।


न घबड़ाना राही तूँ जब राह न दिखाये
मुश्किलों की घड़ी ही प्रभु से मिलवाये ।।

सुबह का सूरज जब आये जब रात गहराये 
राहें बड़ी अनसुलझीं हैं वो ही राह सुझाये ।।

बच्चों जैसी हठ करना बचपना कहलाये
सुखी वही उसकी मर्जी में जो मन समझाये ।।

फूल और काँटे दोनों ही उसने हैं बिखराये 
मन में प्यार बसाये जो वो सदा ही हरषाये ।।

जीवन की राहों में क्यों मन तेरा घबड़ाये 
विश्वास नही क्या दाता पर जो यूँ अकुलाये ।।

सौंपी बागडोर जिसने वो जीवन सफल बनाये 
अनसुलझीं राहें सुलझीं ''शिवम" न जो भुलाये ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


चाहे राह हम सबकी अलग हैं
पर मंजिल एक सबकी वहीं है।

बात ये सिर्फ मेरी नहीं है वरन,
यह तो सारे जगत ने ही कहीं है।

अपने रास्ते सदा चलते रहें हम।
प्रगति पथ पर ही बडते रहें हम।
कंटीले पथरीले रास्ते बहुत हैं,
संघर्षरत रहें और चलते रहें हम।

संघर्ष कर अपनी राहें बना लें।
राही बनें मगर अच्छी डगर के।
परमार्थ कर निज मंजिल पहुंचें,
रहवर बनें हम सुंंन्दर डगर के।

स्वरचितः ः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


अंजान राहो में तुम से यु ही टकरा गये
ना चाहते हुए भी तुम जिंदगी में आ गए।

राहे अंजान हम भी थे एक दुजे से अंजान
अंजान राहो पर चलते-२ बन गए तुम हमारी जान।

नही कोई मायना जिंगदी का अब साथी तेरे बगैर
बस एक तू लागे अपना ,बाकि दुनिया लागे गैर ।

दुनिया की इस भीड़ में तुम एक मात्र सहारा हो 
मै बलखाती बहती नादिया तुम साहिल किनारा हो।

मेरी उम्मीद मेरा हौसला मेरा जज्बात हो तुम
और क्या कहूँ , मेरे इस जीवन के सरताज हो तुम।

चाहत मेरी मेरे दिल का अरमान हो तुम 
चाहू जिसको खुद से भी ज्यादा वो इंसान हो तुम ।

चले हम साथ साथ ले हाथो में एक दुजे का हाथ
हो चाहे फिर मौत का दामन या जीवन भर का साथ।

जीवन के इस राह के सुख दुख दो पहलू है
साथ अगर तेरा रहे तो ये दुःख भी हँस कर सह लू।

दे दो अब तुम भी हमे ये जीवन संगिनी वाला वादा
सुख दुख मिलकर बाटेंगे दोनों आधा आधा।

छवि ।


"चलो राहें बदल लेते है!!

टूटे हुए पत्तो जैसे हम भी रंग बदल लेते है 
चलो जी अजनबी बनकर राहें बदल लेते है!!

ना परखो मेरी चाहत को ना इम्तहान लो 
इन खामोश चिरागों को अब यूँ हवा ना दो 
तेरा नाम लिखकर आँखों से लगा लेते है 
फिर तेरी चाहत को अश्कों से मिटा देते है
चलो जी अजनबी बनकर राहें बदल लेते है!!

कुछ तेरी ज़िद रही कुछ मेरा अंदाज रहा
मनमर्जियां मेरी चली,यूँ तू भी काम ना रहा 
सफर में धूप तेरे हालातों को समझ लेते है 
तुम कुछ पीछे रुको हम आगे चल देते है 
चलो जी अजनबी बनकर राहें बदल लेते है!!

तेरा बदलना भी यूँ बड़ा हैरत अंदाज था
तुझको तो मेरी जात से गहरा लगाव था 
हौले से हवा के रुख को ही मोड़ देते है 
तुम क्या बदलोगे लो हम ही बदल लेते है
चलो जी अजनबी बनकर राहें बदल लेते है!!

--------- डा. निशा माथुर


राह का भटका हुआ मुसाफिर हूँ मैं 
हर कदम आगे बढ़ते जाता हूँ .


मंजिल की तलाश में हर दिन एक नया ख्वाब सजाता हूँ 
आँखों में मंजिल की हर दिन एक नई हैं .

लगता कभी मंजिल कभी दूर तो कभी पास हैं 
फिर भी मंजिल को पाने की हर दिन एक नई आस मन में जगाता हैं .

मंजिल को पाने की तलाश हैं 
ह्रदय में कुछ कर गुजरने की प्यास हैं 

आखिरी मोड़ तक राह में चलकर 
मंजिल को बस पाने की चाह हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट


"राह"
राहे है अलग अलग

मंजिल सबकी एक है

कर्म ऐसा करे सदा 
राह हमारा आसान हो

अंधकार को क्यों चुने
प्रकाशित हमारा राह हो

राह हो यदि कंटक भरा
बिश्वाश रखें पुरुषार्थ पर

चुने हम कुछ ऐसा कदम
राह बन जाये आसान अब।

राह बस भटके नही
मंजिल मिल ही जायेगी।

सत्कर्म और सुविचार कर
पग सदा आगे बढायें

राह के काँटे कभी शूल 
न बन जाये कही

राह बदल सकते नही
सुगम उनको बनाइए

स्वविवेक व स्वनिर्णय से
राहे सही चुने सदा

सहज,सरल होता नही
कभी किसी की राहे

महान हस्ती के पगचिह्न पर
कदम दर कदम बढ़ते जाईए।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।


राह
राह मेरी तो 
वो ही है केवल,

प्रभु के दर तक ,
मुझको ले जो ले जाये।
जिन राहों पर 
चलकर हम साथी,
प्रभुवर को
खुशियाँ दे जायें।
मानव का गर 
जन्म मिला है हमको,
बस मानवता के 
पथ पर हम चले चलें।
मानवतन पाकर 
हम सब साथी ,
कलुषित पथ पर 
हम नहीं चलें।।

डॉ.सरलासिंह।




सोचा एक दिन 
सागर किनारे बैठ कर,
ना बुझा सके प्यास इसकी
हजारों लाखों दरिया भी मिलकर ।
रोक लो दरिया को सागर से पहले,
वो भी खारा हो जाएगा।
फिर एक बूंद भी,
किसी के काम ना आएगा।
पुरुषार्थ कर,
मोड़ दे रास्ता दरिया का।
हाथ फैलाने से नहीं देगा सागर

स्वरचित -मनोज नन्दवाना



राह मे मिला इक साथी न्यारा, 
लगता था वो बंजारा, 
लगा लज्जा का घूँघट न्यारा, 
मैं दिल हारी वो दिल हारा
फिर जीवन मैं भी हारी , 
वो भी हारा l

मैं बेबस वो भी बेबस, 
मुझे मर्यादा की चिंता, 
उसको समाज ने मारा, 
दर्द दोनों का था न्यारा, l
फिर मैं भी...... 

जीवन एक कंटीली झाड़ी है, 
प्रीत विष की प्याली है, 
पेय लगे है बहुत ही प्यारा 
कर देता जीवन तमाम सारा l
फिर मैं.... 

राह मे रा ही देखे बहुत से, 
कुछ अच्छे कुछ सच्चे बहुत थे, 
लगता था तू सबसे न्यारा, 
मेरे मन का मीत प्यारा 
फिर मैं..... 

मेरे बचपन का मीत था वो
इस जीवन का संगीत था वो, 
प्रीत का था खेल सारा, 
गाये हरदम राग मल्हारा l
फिर मैं..... 
राह प्रीत की भाई नहीं थी
राजी मेरी माई नहीं थी, 
छोड़ ना पायी परिवार सारा
फिर छोड़ दिया उसको बंजाराl
फिर मैं दिल हारी, वो दिल हारा 
मिला था मुझको इक बंजारा l
कुसुम पंत 
स्वरचित


 धूल मिट्टी और पत्थर। 
रास्ते मे जो न हो अगर।
फिर रहा कैसा मजा। 

आसान हो जो सफर। 
राह दुष्कर जो मिले। 
मन में हिम्मत है फले। 
बढते आगे है सदा जो। 
राह की ठोकरों मे पले।
धुंधलायेगी भी नजर। 
घबरायेगा भी जिगर। 
गिरने का गम तू न कर।
न पथ से डिगना मगर।
हिम्मत बढती जायेंगी। 
मेहनत तेरी रंग लायेगीं। 
बस हौसला कायम रहे। 
मजिंले पास आयेगी। 

विपिन सोहल


जग से रंजिशे मिटाकर देखो 
वक्त की बंदिशें तोड़कर देखो 
ऐ मनुज! अज्ञानता का
तिमिर मिटाकर देखो 
जीवन सार्थक हो जाएगा
सत्य की राह पर चलकर देखो । 

पल रहें जो सिसकियों में 
उनके आँगन में खुशियों का दीप जलाकर देखो 
पल दो पल के लिए ही सही 
बेबस, असहाय लोगो से 
मीठी वाणी बोलकर देखो ।

बेसहारों, ग़रीबों की
उम्मीदो की किरण बनकर देखो 
जी रहे हैं जो दीन-हीन में 
उन्हें सहारा देकर देखो ।

तुम भी खुदा हो जाओगे एक दिन 
फ़कीरो की दुआएँ लेकर देखो 
जिन्हें नसीब नहीं वसन की 
उन्हें एक बार वसन देकर देखो।

पल दो पल की दुनिया है 
पल दो पल की दुनिया में 
प्रेम की राह पर चलकर देखो 
काँटे भी एक दिन
महकेंगे 
अपने दिल से ईष्या-द्वेष मिटाकर देखो।
@शाको
स्वरचित


मंजिल कहाँ किसे पता
बस रास्ते चलते हैं
आते-जाते लोग भी
इन पर चलते हैं

कहीं सीधे -सरल सरपट 
दौड़ते 
कहीं अनेक पेचदार मोड़
लिए होते हैं

कहीं रास्तों के सीने
जख्मों से भरे पड़े हैं
कहीं रक्तरंजित रुह से
जानलेवा होते हैं

कहीं रास्ते अकेले चलते
कहीं भीड़ लेकर
कोई जन को साथ लिए
कोई तंत्र की राह चले

बस चलते चले जा रहे
रास्ते 
लोह पटरियों ,कोलतार ,रेत से सने 
अनवरत् बिना थके।

डा.नीलम.अजमेर.
स्वरचित

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