Wednesday, August 1

"शिव"30 जुलाई2018



"शिव"
                (30/07/18)

       शिव हैं भोलेनाथ,
       वो ही हैं त्रिलोकीनाथ,
       पहने बाघम्बर  छाल,
      सिर पर चंदा का ताज!

               कैलाश मे उनका ठिकाना,
               गोदी में गणपति विराजे,
               बाम में है गौरा का साथ,
               सुन्दर लगे ये परिवार !!

स्वरचित "संगीता कुकरेती"
भा. 30/7/2018( सोमवार)शिव,ईश वंन्दनाः

ऊँ जय शिवशंकर जय डमरूधर जय भोलेभंडारी
जय सोमेश्वर जय कामेश्वर जय जय शिव
त्रिपुरारी।
जय कैलाशपति जय कैलाश नाथ जय हो कैलाशी,
जय रामेश्वर जय घृश्नेश्वर जय हो प्रभु घटघटवासी।
जय भाग्यविधाता जय सुखदाता हे शोभा सिंन्धु खरारी।
कष्ट हरें इस जग के सारे हम जाऐं सब वलिहारी।
सोमवार ये सावन मास का सबको ही मन भाये,
हृदय प्रफुल्लित हों सावन में शिवशंकर जनजन हर्षाऐ।

स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.


जीवन विष ग़र मुझे प्राप्त है
तुम विषधर हो जगत व्याप्त है
इस प्रचंड वेदना को तुम साध लो
या फिर... मुझको कोई राह दो
घट में भरके घट का प्याला
जीवन हालाहल लाई हूँ...!!!

हे !! गंगाधर ..तुम्हें चढ़ाने
अश्रु का जल लाई हूँ....!!!!

पाशुपतास्त्र से " मैं " को मारो !!!
शरण पड़ी हूँ पार उतारो
है कटु पर, यही सत्य है
निज कर्मों का फल लाई हूँ ....!!
घट में भरके घट का प्याला
जीवन हालाहल लाई हूँ ....!!!

हे!! गंगाधर.. तुम्हें चढ़ाने
अश्रु का जल लाई हूँ.... !!!!

                          ✍ "तृप्ति"


II  शिव  II

II  छंद चौपाई II

कहते हैं शमशान निवासी, रोम रोम रम रहा सुवासी...
आदि अंत का जो है ज्ञाता, महादेव वो है कहलाता..

पी कर ज़हर अमृत देता वो, ऐसा वैरागी मन से वो...
जीवन मौत समाये रहते, मृत्युंजय हो जग में रमते....

आदि अंत में भी रहता जो, सत असत परिभाषित करे जो...
जड़ चेतन में जो अविचल है,सनातन वही शिव शंकर है..

दुख लेके सुख देता है जो, भोला बम बम भोला है जो....
वंदन रूप करे जग उसका, सत्यम शिवम सुंदरम उसका... 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II

🌹भावों के मोती🌹
30/7/2018
शिव

शिव तुम,नाद तुम
इस धरा का आधार  तुम।

जग तारण तुम पालन हार
कल्याण करो ए भोले नाथ।

सुख-दुख सब तेरे हाथ
मैं प्रेम की नैया,तुम पतवार।

तुम ही कर्ता, तुम ही धर्ता
मन मानस के तुम दुख हर्ता।

लेकर तेरा एक ही नाम
अमरनाथ जाते सब धाम।

द्वेष,दम्भ को त्याग के मानव
बोलो सब भोले का नाम।

बम बम भोले,जब कोई बोले
कष्ट हरे ये,मेरे भोले।

पिता न शिव के जैसा कोई
अनमोल द्वि रत्न है होए।

शिव गौरी की कथा निराली
दुनिया सुनती कथा ये सारी।

शरण मे तेरे,शिव जो भी आया
झोली भर भर खुशियाँ लाया।

वीणा शर्मा

शिव की महिमा अपरम  पार
शिव की पूजा  से खुले  भक्ति द्वार .

शिव ही महिमा सबसे महान
शिव ही सत्य का दूसरा नाम .

शिव के 32 नाम हर नाम में छिपा हैं
जीवन का एक नया ज्ञान .

कोई बोले भोले भंडारी कोई कहे
गंगाधर महादेव कोई कहे रुद्रधारी.

शिव ही सत्य शिव सुन्दर शिव ही
समाये हैं हर ह्रदय के अंदर  .

शिव की जटाओं में बहती हैं गंगा की धारा
शिव की भक्ति से जीवन को मिलता हैं किनारा
स्वरचित:-  रीता बिष्ट

शिव शंकर भोले भण्डारी
सिर पर गंगा,चन्द्र ओ जटाधारी
मेरी भी लेना सुध जगत के पालनहारी
धरती पर बढ़ गए पाप हरो तुम संहारी
आंक ,धतूरा,बेलपत्र ही तुम्हे सुहावे
भांग , गांजा , चिलम ही तुमको भावे
सबके दुखों को दूर करने वाले शिव शम्भू
हर दुखियारा तेरे ही दर पे आवे
P.k. भांग अलमस्त रहे अविनाशी
हर वक़्त रहते ध्यान मग्न कैलाशी
तजकर सांसारिक सुखों को अपनाया
मोहक लगे तेरा ये रुप ओ मेरे वनवासी



शं शम्भवाय नमः शिवाय
शिवम् तरायै नमः शिवाय ।
शुभं करायै त्रिलोचनाय
भस्मांगरागाय तत्पुरूषाय
देवाधिदेवाय महेश्वराय
आदिदेवाय सदाशिवाय ।
वृषभध्वजाय नमःशिवाय
जटाजूटाय शीश गंगाधराय
नागेन्द्रहाराय घंद्रशेखराय
नीलकण्ठाय मुण्डमालाधराय
निर्वाण रूपाय महादेवाय।
नमःशिवाय ऊँ नमःशिवाय ।
सत्यं शिवं देव सतरूपाय ।
सदाशिवाय शिवं तराय ।
स्वरचित :-शिवस्तुति ।उषासक्सेना

"शिव'
मेरे भोले भंडारी
मैं आई शरण तुम्हारी
भवसागर पार लगाओ
सुन लो प्रभु अरज हमारी

दीन दुखियों के तुम रखवाले
मैं तो हूँ दुखिया भारी
ना माँगू मैं धन और दौलत
न माँगू भवन अटारी
मैं तो माँगू बस दर्शन आपका
सुन लो प्रभु अरज हमारी।

सिर पर है गंगा की धारा
बाए बिराजे मैया गौरी
कैलाश के है आप निवासी
अविनाशि ,हे भोले भंडारी

गणिका, गिद्ध, अजामिल तारे
अबकी हैं बारी हमारी
सुन लो प्रभु अरज हमारी
मैं आई शरण तुम्हारी

अब तक तो पार लगाओ प्रभु
आगे भी पार लगाना
बड़ी आस लेकर आई प्रभु
सुन लो प्रभु अरज हमारी।
   स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।

नमन  मंच  को
दैनिक  लेखन
30जुलाई, 2018
विषय शिव
शिव  ही  सुंदर  है,
शिव ही  सत्य  हैँ,
जटा मे  है  गंगा  धार,
बाघम्बर  तन  पर धारे,
बाएं  अंग  सती  अवतार l

गोद  मे गणपति  बिराजे,
सर्वप्रथम  जो  पूजे  जाते,
कार्तिकेय भी  संग मे  बैठे,
पूजे है  सारा  संसार l

घट  घट  वासी  तू  अविनाशी
कैलाश  है  तेरा  घर बार,
शीश  तुम्हारे  चंदा  चमके,
जटा  विराजे  गंगा  धार l

करू  मै  विनती  दिनरात,
भव  सागर  से  करदो  पार,
जन्म  सफल  हो  जाये  कुसुम का,
अगर  ना  छोड़ो मेरा  साथ l
कुसुम पंत स्व  रचित
सत्यम शिवम्  सुंदरम


🍀🍀🍀🍀शिव 🍀🍀🍀🍀
कर ले मन शिव-शक्ति की भक्ति
मिल जाएगी भवसागर से मुक्ति
शिव ही भोलेनाथ
शिव ही महाकाल है
शिव भक्तों के तारणहार
शिव ही असुरों के काल है

शीश जटा संग शुशोभित
चंद्रमुकुट
गंगा जल का अभिषेक
निरंतर
हाथ त्रिशूल गल मुण्डों की
माला
तेजस्वी मुखमंडल नैत्र
विशाला
तन पर भभूत और सर्पो का
हार है
ऐसा अनोखा मेरे शिव का
श्रृंगार है

शिव ही परमपिता
संसार उनका परिवार हैं
खुद विषपान किया
दुनिया को अमृत दिया
आज उस अमृत से ही ये
खूबसूरत जहान है
स्वरचित -मनोज नन्दवाना

शिव
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शिव अंगार से
श्रृंगार करते हैं
हो जगत का कल्याण
जगत का विष पीते हैं।

हे नीलकंठ!
लोक भी आप में है
त्रिलोक भी आप में है
आप भगवंत हैं।

आप वीभत्स भी हैं
आप विभोर भी हैं
हो जग का कल्याण
आप समाधि में लीन रहते हैं।

आप अनादि हैं
आप अनंत हैं
जन्म मृत्यु काल के
बंधनो से मुक्त हैं ।

आप में ही सत्य है
आप में ही सृष्टि है
आप में ही ब्रह्म है।

आप ही श्रद्धा हैं
आप ही कैलाश हैं
आपका वास जहाँ है
वहीं गंगा है।

आप से ही शक्ति है
आप से ही भक्ति है
आप जहाँ हैं वहीं
ओंकार का नाद है।
@शाको
  स्वरचित

रचना-2
    शिव
शिव की महिमा गाएँगें,
मिलकर सारे कावडिये,
तू रखना दया दृष्टि,
कष्ट तू भोले सारे हरिए,

सजा चन्द्र जटाओं में,
रूप तेरा महाकाल,
आए दर्शन को भक्त,
अमरनाथ हर साल,

सर्प तू कंठ विराजे,
करता तू विषपान,
जपकर नाम तेरा,
हो जाऐ राह आसान,

हे शिव निलांबर,
करूँ मैं तेरी अराधना,
कर पूर्ण मेरी तपस्या,
हो पूरी मेरी साधना।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
30/7/18
सोमवार



श्रावण पवित्र मास,
बेलपत्र दुग्ध आक।
चढ़ा रहे भक्त गण,
जय भोलेनाथ की।।

स्वयं भू हो अनादि हो,
जग का प्रारंभ तुम्हीं।
नील कंठ त्रिपुरारि,
जय भोलेनाथ की।।

जटा में बसाए गंगा,
तुम हो कैलाश पति।
उमापति मृत्युंजय,
जय भोलेनाथ की।।

सदाशिव करें सदा,
प्राणियों का सुख हित।
सर्वज्ञ तू दुख हरे,
जय भोलेनाथ की।।

तू ही है प्रारंभ मेरा,
तू ही है मेरा अंत भी।
तू अनंत अविनाशी,
जय भोलेनाथ की।।

रंजना माथुर
अजमेर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©


II  शिव  II

शिव भोले बाबा, शिव शम्भू हमारे...
शिव चरणों में सब बंधू सखा रे....
शिव महिमा गुणगान करे हम...
शिव सुत हम शिव पिता हमारे....

शिव नाद गूंजे है ब्रह्माण्ड ये सारे...
शिव नर्तन कण कण में शिवा रे...
शिव मेरे भीतर शिव मेरे बाहर...
शिव मुझमें मैं शिव में रमा रे....

शिव देव देवा आदि देव शिवा रे....
शिव कण कण शिव शिव पुकारे....
शिव शिवहरी और अर्धनारीश्वर...
शिव सचराचर शिव ही जगदीश्वर...

शिव ब्रह्मा शिव विष्णु जगत शिव...
शिव काल शिव महाकाल शिवा शिव....
शिव पाताल धरा शिव अम्बर....
शिव शंकर हर दिशा शिव शंकर...

शिव रूद्र शिव है भोला मेरा शिव....
शिव सुख दुःख करता धर्ता शिव....
शिव बाघम्भर हरे सब भय  पीड़ा....
शिव नागेश्वर विष हर्ता मेरा शिव....

शिव त्रिलोकी शिव नाथ सखा रे...
शिव नीलकंठ शिव जगत पिता रे...
शिव सर चन्दर शीतल धरा है...
शिव गंगाधर विषपान किया रे.....

शिव शूल पाणी विष्णुवलभ शिव...
शिव अम्बिकानाथ भक्तवत्सला शिव....
शिव वामदेव विरुपाक्ष शिवा शिव....
शिव नीललोहित जटाजूट शंकर शिव....

शिव माहेश्वर शशिशेखर शिवा शिव...
शिव नीलकंठ शितिकंठ शिवा शिव...
शिव कामारि शर्व शिव अनीश्वर...
शिव सर्वज्ञ सदाशिव गिरीश्वर...

शिव तारक परमेश्वर सदाशिव....
शिव अनंत  दक्षाध्वरहर शिव....
शिव भक्ति निज चरणों की देना....
शिव शिव बोले मेरा हर रोम शिव....

शिव महिमा शिव आप ही रचाई...
शिव भाव दिए निमित चन्दर भाई...
शिव चरणों में बिनती यही मेरी...
शिव मृतुन्जय हर जन हो सुखाई...

II भोलेकृपा रचित - सी.एम्.शर्मा II




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