Sunday, September 2

" स्वतंत्र लेखन"02सितम्बर 2018







चले जाना
मुझको भुला दिया है ये दिल माने तो चले जाना
सुकून कितना है तुम्हे ये दिल जाने तो चले जाना


तस्वीर तेरी आकर के मेरे ख्यालों में मुस्काती है
गौर से देखो तुम जरा गमगीन रहे तो चले जाना

आबाद है​ महफ़िल यादों की मेरे दिल की गली ​में 
तुमको महसूस खलिश सी होने लगे तो चले जाना

इश्क की इन राहों पर इक साथ चले थे हम तुम 
कदमों के निशां जो तुमको न मिले तो चले जाना

खुशबू हो फूलों​ की या हो रंग फिज़ाओं के सारे
जब तुमको लगे ये पशेमां है मुझसे तो चले जाना

इक रात सजा लेने दो आलम हो चाँद सितारों का
दिल की ये गुज़ारिश तुम पूरी करके तो चले जाना

कयामत आ जाए मेरी ख्वाबों ख्यालों की दुनिया में
जान "विजय" की तेरे पहलू में निकले तो चले जाना
#विजय#



*
बाते अब तेरी माई की, लागती मुझको तीर ।
अबकी मुझको साथ मे ले चल, ओ ननदी के वीर ॥
**
तेरे बिन ना कटती राते, नैना बरसे नीर।
बात मेरी अब मान भी ले तू , ओ ननदी के वीर ॥
**
ताना मारे बहने तेरी , माई देखे छीर।
कहती हूँ मै सुन न पाऊँ, ओ ननदी के वीर ॥
**
ले चल मोहे संग तो अपने, मुझमे नाही धीर।
नाही तो मै मर जाऊँगी , ओ ननदी के वीर ॥
**
करते विचलित विरहा से तन, कोमल मन अधीर ।
बीत रहे सावन के पल, ओ ननदी के वीर॥
**
''शेर'' कहे मन कंम्पित मोरा, मन मे जागे पीर।
हाथ जोड विनती करू, ओ ननदी के वीर ॥
**


अभिसार

स्पर्श के नित, एक छुवन से 
उर में स्पंदन समाये 
प्रीत के संगीत में
प्रियतम सकल जीवन लुटाए। ।

स्वाति के बूंदो के जद में
बन पपिह नित-नित निरेखूँ 
खोल अधरों के सुमन को
मैं विकल नित प्रात देखूं ।।

बूँद के एक प्रीत से
संगीत का संचार होता
मिट ही जाता प्यास जब
प्रियतम से एक अभिसार होता ।।

स्वर्ग सा मधुमास जब-जब
मेरे यौवन को निरेखे
जैसे लगता है विरह में
एक बिरहन खुद को देखे
बंद्य पर प्रिय-प्रिय की उपमा
और अधर पर प्यार होता
कास इस मधुमास में
प्रियतम का निज अभिसार होता ।।

अशोक सिंह अलक



आक्रन्ति ???

*अजन्मी बेटी* 

मैं कोई अपराधी हूँ क्या माँ
ज़रा मुझे एक बात समझा।
सज़ा ए मौत की हकदार..
मैं हुई कैसे ? ज़रा ये तो बता।।

*मां* 
ना बेटी, ना ही अपराधी है तुं
और ना ही सजा की हकदार
तेरे दादा जी ही का हुक्म है..
बेटी नहीं बेटा हो अबकी बार।।

*अजन्मी बेटी* 
गलती क्या है..?फिर मेरी 
क्यूँ कोख में रही है मार..?
क्यों तेरे लिए हुक्मदार बना
ये नीच सोच का सरदार*
*=दादा जी

*मां* 
चुप रह कैसे जुबान चलाती है
ये नीच सोच के नहीं ये बड़े है।
जो बड़े कहेंगे वो ही हम करेंगे
खानदान के कायदे थोड़े कड़े है।।

*अजन्मी बेटी*
कायदे के पीछे क़ातिल बनेगी?
क्यों तुम पे नीच सोच भारी है..
किस काम के वो तुगलकी कायदे 
जिनसे पैदा हुई **ये बीमारी है ।।
** भ्रूण हत्या।

*मां* 
बस कर बेटी अब मत रूला
मैं जीवनदाती, नहीं जीवनन्ति 
मैं भूल गयी थी कर्तव्य मेरा..
रखूंगी मैं तेरा नाम आक्रन्ति

*अजन्मी बेटी*
मां समझ गयी तुं मेरी बात
शुक्र गुजार तेरी रहूंगी...।
दुनियां देखती रह जायेगी
इक ऐसी उड़ान भरूंगी।।

*मां* 
बेटा सोच बदल दी तूने मेरी..
मैं जन-जन को जा बताउंगी
मां जीवनदाती है जीवनन्ति नहिं
मैं सब जन को समझाऊंगी।

लेखक : सुखचैन मेहरा # 9460914014




निर्झर नैना .
......................
अधर मूक सी क्यू बैठी हैं .


निर्झर बहते नैना .
अबकी सावान बीत गए .
आए क्यू ना सजना .
..............
पाती लिख लिख थक गयी .
नेह बिछोह सा लगता हैं .
डाकिया भी अब हँसता .
देख बाबरीपन मेरा .
................
राह निहारु पग पग पे .
कोई आए संदेशा .
अबकी सावन बीत गए .
आए क्यू नही सजना .
.................
पुरव्या भी शूल गए .
बोझ लगे हैं कंगना .
अबकी सावन बीत गए .
आए क्यू नही सजना .
..................
सब सखियों की आस सजी .
उमंग और उल्लास भरी .
मैं बदरी बीच बैठ .
देखूँ बस सपना .
पायल की झंकार भी .
लगे नागिन सा डसना .
अबकी सावन बीत गए .
आए क्यू नही सजना .
..................
सखी सुन इक काम कर दे .
मेरे पिया को संदेशा दे दे .
उन बिन बीत ना रही .
अब दिन ना रैना .
अबकी सावन बीत गए .
आए क्यू नही सजना .
.................
मीरा पाण्डेय उन्मुक्त .




तू जीत गए रे मैं हारी
-------------------------------

दुनिया के मेले मे भीड़ पड़ी रे भारी...
तू जीत गए रे मैं हारी। -2

सुख के साए में सब साथ निभाए।
दुख पड़े जब तो सब देते बिसराए।।---2
जगत में है खेल तेरी रची सारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।-2

आस लगी है इस दीनन की तुम पर ।
कर दे नैया पार फंसी मझधार पर।। 2
सुख दुख में डोले रे दुनिया सारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।--2

करतब तेरी अजब रही है वसुंधरा पर।
कोई हंस रहा है कोई रो रहा यहां पर।। 2
हृदय में हाहाकार मची रे भारी
तू जीत गए रे मैं हारी। - 2

नाम जपते रहे हम सुबहो - शाम तेरा।
फिर क्यों बिगड़ता रहा है घर मेरा।। 2 
आई तेरे दर रे किस्मत हारी।
तू जीत गए रे मैं हारी।-2

दुनिया के मेले मे भीड़ पड़ी रे भारी...
तू जीत गए रे मैं हारी। -2
-- रेणु रंजन
( स्वरचित )

'' तन्हाई "

सूरत से बढ़ कर सीरत क्या गजब हस्ती है ।

मुझे गुजरना था वहाँ से जहाँ उनकी बस्ती है।
बात बात पर देख कर जाने क्यों वो हंसती ।
उनके यहाँ तो हँसी भी शायद बहुत सस्ती है ।

मुस्कुराने की अदा अजब ही कहायी है ।
जाने कहाँ से जालिम वो ये अदा पायी है ।
दिल भी तब ले रहा था पहली अँगड़ाई है ।
चलना था जादू ''शिवम"मिलना थी तन्हाई है।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित - 02/09/2018





Sarvesh Pandey 🌸🌸कृष्ण🌸🌸

१-
सुन्दर छवि
बाल कृष्ण निरखि
मन हर्षित।
🍁🍁🍁🍁🍁
२- कृष्ण संधान
हरत कंस प्राण
करें कल्याण।
🍁🍁🍁🍁🍁
३-मधुर तान
विभोर मन प्राण
कृष्ण मुरली।
🍁🍁🍁🍁🍁
४-गोविन्द गान
कर्म करें महान
गीता का ज्ञान।
🍁🍁🍁🍁🍁
५-महाभारत
कृष्ण सत्य के साथ
सत्य विजित
🍁🍁🍁🍁🍁

सर्वेश पाण्डेय
स्वरचित



बात बाकी है, वही बात अभी बाकी है।
टूटा है ख्वाब ,मगर रात अभी बाकी है।


अगर था शिकवा कभी तो ,खुला कहते।
खफा थे हमसे गर तो नजर मिला कहते।
दिखा रहे है मुझ ही को वो आईना देखो।
अभी तो जिनकी होनी बारात बाकी है।
बात बाकी है वही बात अभी बाकी है।
टूटा है ख्वाब मगर रात अभी बाकी है।

तडप है दिल मे ,और नजर मे तुम हो। 
मेरे सांसो की हर एक लहर मे तुम हो।
मान जाते तुम जो दिल की बात कभी।
ये हकीकत पर जज्बात अभी बाकी है।
बात बाकी है, वही बात अभी बाकी है।
टूटा है ख्वाब ,मगर रात अभी बाकी है।

आज बिखरा हूं , एक ताश की मानिन्द।
कैसे जिन्दा हूं , एक लाश की मानिन्द।
कैसे समझाऊं, क्या बताऊं तुम्हे अब।
हाल हे ये ,मगर हालात अभी बाकी है।
बात बाकी है वही बात अभी बाकी है।
टूटा है ख्वाब मगर रात अभी बाकी है।

एक मुददत से, दूरियां बढी है कितनी।
मुश्किले दिल मजबूरियां बढी है कितनी।
आ भी जाओ ना कि देर हो जाए कहीं।
आखिरी एक मुलाकात अभी बाकी है।
बात बाकी है वही बात ,अभी बाकी है।
टूटा है ख्वाब मगर रात अभी बाकी है।

विपिन सोहल



(1)
जो सबको स्व में समा ले,

उसे हम समंदर कहते हैं।
पुरूषार्थ कर परमार्थ बने
उसे ही मुकद्दर कहते हैं।
हारकर भी जीतने की जो,
निरंंन्तर कोशिश करता रहे,
इस जहाँ में उसको ही शायद
हम लोग सिकंदर कहते हैं।
********************* 
( 2)
तुम्हें याद करके हम क्या करें,
दिल के जख्म हरे हो जाते हैं।
तुम्हें याद करकर के ही हम,
तुम्हारी यादों में खो जाते हैं।
********************

मैं सीढियां ही गिनता रहा और
उधर मंजिलें अपाहिज चढ गये।(1)

वक्त ने उठाया झकझोर कर
तबतलक व फासले तय कर गये।(2)

तुम भूल जाओ मुझे यूं मगर ,
मै भूल पाऊँ ये मुमकिन नहीं।(3)

मै उन्हें ढूँढता रहा खुद में मगर,
ख्यालों में जमाने के हमें मिले।(4)

हम नहीं चाहते ये जगत हंसे,
मगर वे गुलशन लुटाने पर तुले।(5)

स्वरचितः
इंजी शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.
जय जय श्री राम राम जी



"बँटवारा"

इंसान को दोहरी, 
जिन्दगी जीनी होती है! 
कुछ ख्वाब और, 
कुछ हकीकत होती है! 
हकीकत में जीना, 
ज्यादा बेहतर होगा! 
क्योंकि ये ख्वाब तो, 
कोई नेता लूट लेगा! 
दो कस्तियों की सवारी,
बेकार होती है! 
ख्वाबों के टूट जाने पर, 
जिन्दगी बर्बाद होती है! 
हमारे जीवन में बहती, 
समय की ये धारा है, 
शायद तभी जिन्दगी का, 
दो हिस्सों में बँटवारा है! 

स्वरचित *संगीता कुकरेती*




** आरजू **

**********
कामना इतनी 
बस इतनी सी आरजू.... 
हर सोंच में शामिल रखना मुझे 
जैसे मै रखती हूँ...... 
आँखों में तेरा ही 
रूप ले सोऊ 
जागूँ जब 
मेरे मन के अंबर में 
तुम्हें ही मुस्कुराता पाऊं 
होना तुम्हीं प्रतिबिंबित झिलमिल ओस की बूँदों में 
सायं जब नभ में 
सिंदूर सा बिखरा हो 
गोधूलि में 
तुम्ही नजर आना 
चुहल करे जब पुरवाई 
आँचल को 
तुम्हीं छूकर जाना...... 
आँखों में भर 
सुरमई ख्वाब 
मेरा हाथ थामे तुम 
नीले अंबर की 
सैर कराना.... 
पूरी करना सदा 
मेरी इतनी सी आरजू..... ।

स्व रचित 
उषा किरण


हाँ ये काली घटा,
आयी रिमझिम लीये,
अब नशा हो रहा है,

बिना ही पिये.....

कभी टिप-टिप,कभी रिमझिम,
मयूरा नाचे मगन.....

खेत सिमटे हैं,
धानी चुनर ओढ़कर,
जबसे बरसी है,
काली घटा घेरकर,

चल पड़ी जो पवन,
आह ठंडी लीये,
हँस पड़ीं डालियाँ,
अपनी मुँह फेरकर,

....कभी खर-खर कभी सर-सर,
गीत गाती पवन......

हाँ ये काली घटा,
आयी रिमझिम लीये,
अब नशा हो रहा है,
बिना ही पिये.....

बूंद बजती है,
की जैसे पायल बजे,
जैसे धुनपर कोई,
साज सुन्दर सजे,

सज उठी ताल-पोखर, 
सजी क्यारियां,
जैसे यौवन भरी ,
कोई नारी सजे,

...कहीं कल-कल कहीं छल-छल,
की जैसे झरना कोई......

हाँ ये काली घटा,
आयी रिमझिम लीये,
अब नशा हो रहा है,
बिना ही पिये.....

अब तो आजा तू भी,
शहर छोड़कर,
अपने बाबुल की,
गालियां और घर छोड़कर,

जो भी समझे तुझे,
उनसे मिलके गले,
जो ना समझे,
उनसे मुह मोड़कर,

....साथ मेरे तेरे हँस पड़ेंगी फिजा,
हाय मिलकर गले.....

हाँ ये काली घटा,
आयी रिमझिम लीये,
अब नशा हो रहा है,
बिना ही पिये.....

.....राकेश,



"स्वतंत्र-लेखन'
"कितनी गलत थी मैं"

कुछ दिन पहले मैं अपने बेटा को बंगलोर के लिए स्टेशन छोडऩे गई।मैं और मेरे पति बेटा को ट्रेन में बैठाकर नीचे उतर गये,और थोड़ी देर मे ट्रेन चल पड़ी।:जैसा की अक्सर प्रिय जन को छोड़ते हुये होता है, मेरे आँखों से अश्रूधारा निकल पड़ी और मैं रोते हुए 
अपने पति के साथ घर के लिए प्रस्थान कर गई।तभी रास्ते में मेरे एक दूर के रिश्तेदार मिले और मुझे अभिवादन करके फोन मे बाते करते हुए आगे निकल गए।
मुझे उनका यह ब्यवहार अखर गया।और मैं अपना रोना भूल कर यह सोचने के लिए मजबूर हो गई कि कैसा जामाना आ गया है, आज कल लोग कितने ब्यस्त हो गये है कि मुझे रोता हुआ देखकर भी एक मिनट रूक कर मुझसे बात करने की जरूरत नही समझे कि आखिर मैं रो क्यों रही हूँ।वैसे तो बहुत अपनापन दिखाते हैं, परन्तु मुझे आज रोता हुआ देख कर भी तुरन्त आगे निकल गये।
तभी मैंने देखा कि वे जिस तेजी से आगे निकले थे, उसी तेजी से पीछे पलटे और मुझे वे अपनी फोन पकड़ाते हुये बोले"लिजिए मौसी आप मेरी वाईफ से बात कर लीजिए।उनकी पत्नी मेरी बचपन की सहेली हैं ।मै रोना भूलकर खुश होकर उससे बाते करने लगी।बात पूरी होने पर वे मेरे पास आकर बोले"मैंने आपको बेटा को ट्रेन में बैठाते हुए देख लिया था, अतः मुझे आपके रोने का कारण ज्ञात था ,यदि मैं पूछने जाता तो आप और रोती।अतः मुझे आपको चुप कराने का इससे अच्छा कोई उपाय नही soojha।"
अब मैं मन ही मन शर्मिंदा थी कि मैं उन्हें कितना गलत समझ रही थी।और मुझे एहसास हुआ कि बिना पूरी बाते जाने किसी के बारे में गलत धारणा नही बनानी चाहिए।




*आईना*
🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀
सिर पर जो सूरज आया,
ना अपना *
अक्स* नजर आया। 
अपने ही अंदर ज्यों झाँका,
हां था एक धुँधलाया साया। 

दिल के *आईने* में कैद लम्हें, 
खयालों की जागीर हो जैसे। 
तन्हाई को जब भी मिले सरहाना, 
ख्वाबों की कतार हो ऐसे। 

स्याह रातों के खयाली झुरमुट, 
दिल मे उतरे है बनकर शमशीर। 
शर्म से नजरें झुक गई एक पल, 
ऐ सनम हूबहू आपकी है तस्वीर। 
🌹💖🌹💖🌹💖🌹💖🌹
स्वरचित:-रागिनी शास्त्री,,,,,, 


शीर्षक, गमो की कहानी ।

हम रो रो कर लिखते हैं

वो यू हंसकर पड़ जाते हैं
हमारे दिल ए जख्म में एक खंजर सा कर जाते हैं
जो सपनों को तोड़ चुके 
वो अक्सर सपनों में आते हैं
अश्रु बरसाती आंखों ने ख्वाबों को ढोया
कसमें वादों की यादों मैं मन जाने कितना रोया
अब धीरे-धीरे अपनी ही रचनाओं में खो जाते हैं
तड़पाया हमें समाज के उलझे हुए सवालों ने
जवाब कहां से दे पाते हम हम तो थे उनके ख्यालों में
फिर भी मन को हटा ना पाए
उनके मधुर ख़यालों से
तनहाई में ही जीना है ये दिल को समझाते हैं
दर्द ए गम के अंधकार में कैद हुए हैं हम
सांसो में कोई एहसास नहीं
मन में कोई आभास नहीं
बीते चाहे कोई मौसम
स्वरिचत . हेमा जोशी मोदीनगर गाजियाबाद







परिवार कहूँ या प्रयोगशाला 
दोनो का एक ही है हाला 
प्रयोगशाला में तत्व तो 

परिवार में व्यक्तितत्व 
मिलते है समुचित 
जैसे कुछ घुलनशील 
कुछ ज्वलनशील 
कुछ निष्क्रिय 
कुछ सक्रिय 
कुछ मिलनसार 
कुछ पारदर्शी 
तो कुछ अपारदर्शी 
कुछ विस्फोटक 
कुछ ठोस तो 
कुछ द्रव 
पर 
जल रूपी हो 
तत्व व व्यकतित्व 
जो खुद में घोल ले सबको 
और सदा एक सा रहे ....
स्वरचित 
शिल्पी पचौरी




नयनों मेंआंसू छलके सावन में।
ढिबरी यादों की जलते सावनमें।।

कामना ओ के फलने के दिन है।
हमारा तप फलेगे अब सावन में।।
तुमसे दूर रहूं मुझे मंजूर नहीं।
बूंदों पायल बजते सावन में।।
किस कदर छाये सुहाने काले बादल।
मन प्यासा चातक तरसे सावन में।
विकल प्यार को नींद नहीं आये रात में।
मूक मन को स्वर दिये तुमने सावन में।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास।



विषय-किसान
चंद हाइकु 
(1)
कृषक पूजा
कर्मभूमि अर्पित 
स्वेद के पुष्प
(2)
रजत वर्षा
भू से निपजा स्वर्ण
कृषक हर्षा
(3)
ठिठुरी रात
खेत माँ का आँचल
गोद किसान
(4)
कर्ज का मर्ज
किसान आत्महत्या
श्रम को शर्म
(5)
प्रभु आसरे
स्वप्न बोए किसान
आशा के खेत
(6)
खेत माँ शीश 
किसान पहनाये 
हरी चुनर
(7)
खेत मन्दिर
किसान पूजे कर्म
श्रम ही धर्म
(8)
सीमित चाह
किसान स्वप्न जोहे
बादल राह
(9)
मिला ना आना 
किसान हाथ आँसू 
सस्ता पसीना 

ऋतुराज दवे





मोबाइल 
========== 


हाथो का प्रहरी, जगत से है प्यारा 
टिन टिन करता ये, मोबाइल हमारा 
वाट्सअप फेसबुक मै दुनिया सिमट गयी 
पास के दूर, दूर के पास होकर रह गए 
अब नहीं रहा चिट्ठी और कार्ड का इंतजार 
क्युकि मोबाइल बन गया इन सबका आधार 
जिओ यूं ही नहीं कहता करलो दुनिया मुट्ठी मै 
सब कुछ भरा है इसकी सिम और मेमोरी मै 
गया अब जमाना लाइब्रेरी जाने का 
अँधेरे मै टोर्च को ढूंढ कर लाने का 
हिसाबों को पन्नों मै करते जाने का 
अलार्म घड़ी को सिरहाने रखने का 
स्टूडियो मै जाकर फोटो खिचवाने का 
पिक्चर गाने समाचार सुनने का 
सब कुछ मिलेगा इस देवता मै 
ये सौ सौ बीमारी की एक ही दवा है 
दवा मै मगर कुछ जहर भी भरा है 
ज़ब कानो से हम लोग ऊंचा सुनेगे 
आँखो मै नम्बर के चश्मे चढेगे
सिर मै तरंगो से कैंसर बनेगे 
सेल्फी लेते ज़ब गिरकर मरेंगे 
तभी शायद हम 
इसके चिपकूपन से बचेंगे 
स्वरचित सीमा गुप्ता 
अजमेर 
2.9.18




यामिनी का चिर प्रभाकर
कालिमा संलग्न चक्कर।
होता न भयभीत आकुल, 
क्षणिकभर वह रजनीचर।।

गान स्वयं मदमस्त गमन
कर दर्शन राह मधु स्वप्न।
सुनाते भ्रमित धुन नक्षत्र,
वह नाचे मन छन- छन।।

हे! चिर प्रवाही,निर्भयी
क्यों अनित्य भयभीत नहीं?
क्यों भयानक मंडल चक्र,
बद बेसुर पथ गीत नहीं?

रे मानव! श्रवण कर बात
क्यों डरूँ?,उजली फिर रात।
जो पथ कर देती रोशन,
प्राप्त अनिष्ट तम को मात।।

परमार प्रकाश
#स्वरचित_सृजन





मेरा हर्षित मन,बच्चों के संग गीत गायें,
स्कूल चलें हम सब, स्कूल चलें हम सब,
स्कूल में मेरा काग़ज का, एक खेत हो,
किसान बनकर,शब्दबींज खेत में बोऊँ,
रंगबिरंगी शब्दों की ,प्यारी-प्यारी फसलें,
तमसभरे अग्यानता में, काव्य ज्योति फैलें,
हम सब काव्यसंगीत की, मधुर धुन से हर्षित,
अक्सर चित मेरा होता है, बच्चों के संग हर्षित,
पाठशाला की कक्षा में गूंजे, जब काव्य ध्वनि,
खिले हो चेहरें बच्चों के , तब जैसें मोती मणि,
उमंग भरे भाव से ,काव्य संदेश करें अर्जन,
कोमल हाथों से ,नयें शब्दों का करें सर्जन,
जब भाषण की गूंज में,चित से होते प्रफुल्लित,
तब हर्ष और उमंग भरें,भावों से होते सम्मलित,

'सुनीता पँवार' 'उत्तराखण्ड' (०२/०९/२०१८)




लघु कथा
" अधूरी चाहत"

गोविन्दम् आदि पुरुषम् तमहं भजामी......ब्रह्म मुहूर्त,मंगलारति।
पूरानी यादें ..शीतल मंद पवन संग कभी-कभी अंतस को झकझोर जाती है।बचपन से ही मैं माँ के साथ सूर्योदय के पहले बिस्तर छोड़ उठ जाती हूँ ।"ISKCON"मंदिर में मंगलारति में माँ के साथ जाया करती थी कभी कभार अकेली भी..।मंदिर ढाई-तीन किलोमीटर दूर था तो जाते-आते सुबह की सैर भी हो जाती थी।वहाँ बहुत तो नहीं पर कुछ लोग प्रतिदिन आते थे सभी के साथ भावनात्मक रूप से लगाव हो गया था।एक-दूसरे को ना जानते हुए भी चेहरे से पहचान हो गई थी।आरती के बाद कुछ लोगों के साथ वार्तालाप हो जाया करती थी।वक्त बीतता गया लोग आते जाते मिलते जुलते रहे..।
इसी बीच एक शख्स दिल में घर कर गया था...शख्सियत ही कुछ ऐसी थी।दो-तीन साल गुजर गये कि आचानक उसने मंदिर आना बंद कर दिया।मेरी नजरें किसी को ढूंढती रही पर नाकाम.. मैं प्रतिदिन यह सोचकर जाती थी कि शायद आज...।रात को सोचती सो जाती कि शायद कोई काम..कल आ .. ।
एक रात मैं सपनों में उनसे बातें कर रही थी।मैने क्या पूछा उन्होंने क्या कहा ..सुबह उठकर कुछ याद नहीं रहा।उस दिन भी मैं मंदिर पहुँच गयी पर अकेली। आरती समाप्ति के बाद मेरे कदम अनायास ही उस ओर चल दिए ...कभी एक दो बार अपने निवास के बारे में बता चूके थे लेकिन सटीक मालूम ना था।मैं पूछते पूछते पहुँच गयी,नाम बताया तो किसी ने सामने गेट की तरफ इशारा किया। मेरे बेल बजाने से जिस शख्स ने दरवाजा खोला वो वही था, मुस्कुरा कर अन्दर आने को कहा तो...।मंदिर मे अनुपस्थिति का कारण पूछी तो बताया कि उसका तबादला हो गया हैजाना है इसलिये कुछ दिन से घर बैठे मानसिक रूप से सबसे रिश्ता तोड़ रहा हूँ।
कुछ देर वार्तालाप के बाद बाइक निकालकर कहा चलो घर तक छोड़ आता हूँ। मैं चुपचाप पीछे बैठ गई। रास्ते में मेरी मुलाकात भाई के साथ हुई तो मैं भाई के साथ घर आ गई। 
उसके बाद काफी दिनों तक सुबह मैं मंदिर तक का सफर तय नहीं कर पाती। उसके कुछ बातों ने मुझे व्याकुल कर दिया था।
ऐसा भी एक अधूरा सफर था हमारा।एक अधूरी कहानी या फिर अधूरी चाहत ......।
"समंदर का आना और तट बहा ले जाना.......
वक़्त का फिसलना और यादों को पीछे छोड़ देना........।"

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला 
02/09/2018








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