Thursday, September 13

"परम्परा "13सितम्बर2018


परम्परा एक अटूट सिलसिला है, 
सदियों से जो चला आ रहा है, 
पूर्वजों से मिली विरासत ये है, 
पीढी दर पीढी हम संजोते है |

जैसे गुरू-शिष्य परम्परा, 
जो सभी धर्मों में है एक समान, 
महिमा इसकी सबसे निराली, 
गुरू बिना नही है ज्ञान |

परम्पराओं का है वैज्ञानिक महत्व, 
कुछ मैं भी करूँ विस्तार, 
सूर्य हैं अरोग्य देवता विशेष है इनका प्रकाश 
सुबह इनको करे नमस्कार |

सूर्य ग्रहण में बाहर न निकलना, 
परम्परा पर ये भी सवार, 
तब हानिकारक किरणें निकले,
पहुँचाती हम सबको नुकसान |

पीपल, बरगद, तुलसी, चंदन 
परम्पराओं में देवी-देवता समान, 
पूजा कर मन को संतोष पहुँचाये, 
पीडा में हैं औषधि समान |

चारों धाम यात्रा की परम्परा, 
कराये पूरे भूगोल का ज्ञान, 
अच्छा सा व्यायाम हो जाये, 
पर्यावरण का बोध कराये |

तीज-त्योहार जो हम मनायें
उसका भी महत्व बतायें, 
रक्षा-बन्धन भाई-बहन,प्रेम को बढाये
करवा चौथ दांपत्य जीवन में मधुरता लाये|

विदेशी भी जब भारत आयें, 
परम्पराओं से प्रभावित हो जाये, 
परम्पराओं में खूब रम जायें, 
मन की शान्ति और सुकून पाये |

माता-पिता, गुरू चरण स्पर्श, 
मनुष्य की चार चीजें बढाये,
आयु, विद्या, यश और बल, 
संसार में जीना सिखायें |

आज परम्पराओं को बोझ समझ, 
रीति-रिवाज सब भूले जा रहे, 
इनमें छिपे वैज्ञानिक महत्वों को, 
पढ-लिखकर भी नहीं समझ पा रहे |
स्वरचित *संगीता कुकरेती*


परम्परा की सेज पर 
चढ़ जाती बेटियाँ 
दहेज की सूली पर .
पूछता हैं दिल वार वार .
ये परम्परा हैं या व्यापार .
चीत्कार उठता हैं मन मेरा .
जब कोई बेटी बहू जलती हैं .
परम्परा के नाम पे 
जब वो सूली चढ़ती हैं .
क्यू और कैसी ये परम्परा हैं .
जहा कुच्छ वस्तु पैसो के कारण 
बन जाता इंसान हैवान .
सिसक उठता हैं कोई पिता .
देख बेटी की लाश .
कुछ नही कर पाता वो कमजोर .
सोचता बस धरे हाथ पे हाथ .
कैसा परम्परा हैं .
घन और बेटी दोनो गवाया .
हैवान के आगे शीश झुकाया .
.................
मीरा पाण्डेय उनमुक्त



परम्पराओं को जानो
परम्पराओं को पहचानो ।।

तभी करो उनको स्वीकार है
परम्पराओं से बँधा संसार है ।।

सच जानना सबका अधिकार है
मानव को स्वार्थ ने जकडा़ यार है ।।

स्वार्थ के चलते लपड़े भये हजार है
मानी से बेमानी होता दिखा सार है ।।

मंजिल कहाँ दिखा न वो द्वार है
सच होता कड़ुवा किसे स्वीकार है ।।

कितनी परम्पराओं में कोई न आधार है
सिर्फ लूटना अहं दिखाना दूजा न विचार है ।।

जिसने ली इनसे टक्कर बन गई रार है 
कितने समाज सुधारकों को पड़ी मार है ।।

आलोचना के हुये वो शिकार है
भेड़ चाल से दुनिया को प्यार है ।।

जागो ''शिवम" समय की पुकार है
निज स्वार्थ पनपा न समाज परिवार है ।।


परम्परा
ये है मेरा देश भारत।

इसकी अद्भुत है परम्परा।
पत्थर में यहाँ भगवान का वास।
उनको हम पूजते।
माता,पिता का आदर करते।
गुरुजनों की आज्ञा मानते।
हम संयक्त परिवार में।
दस,दस लोग एक साथ।
हैं रहते।
कभी लड़ते,झगड़ते।
फिर रूठते,मनाते।
पर अगर विपत्ति आ जाये।
तो पूरे गाँव एक साथ जुटते।
यही है हमारी परम्परा।
हमारे भारत की परम्परा।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी




परंपरा मेरा गहना है,
मैं परंपरा से बंधी एक गृहिणी हूं
अच्छा लगता है,
व्रत त्योहारों पर सजना संवरना,
अच्छा लगता है,
परिवार की परंपरा का पालन करना,
अच्छा लगता है,
सबको एक सूत्र मे पिरोये रखना,
अच्छा लगता है,
सांस ससुर की सेवा करना,
अच्छा लगता है,
बच्चों की देखभाल करना,
परंपरा मेरा गहना है,
अच्छा लगता है,
सबका आदर सम्मान करना,
परंपरा मेरा गहना है,

स्वरचित:-मुकेश राठौड़


1
ये परंपरा
भारतीय संस्कृति
पीढ़ी से पीढ़ी
2
रीति रिवाज
परंपरा का मान
देता समाज
3
पैरों में बेड़ी
परंपरा का नाम
बालिका कैद
4
लोगों की आस्था
परंपरा मधु सी 
होते संस्कार
5
आज की पीढ़ी
परंपरा है लुप्त
समझे बोझ
स्वरचित-रेखा रविदत्त
13/9/18
वीरवार




व्यवहार के तरीकों की द्योतक 

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को 
हस्तांतरित होने वाली आदतें 

रीति-रिवाज़ों का अनुकरण 

व्यवहार का स्वीकृत तरीका 

सामाजिक विरासत का अभौतिक अंग 

प्रथा 
प्रणाली 
अटूट सिलसिला 

ईश्वर ने हमें जन्म दिया 
और हम परम्परा का निर्वहन करते रह गए 
क्या है ढ़ोंग, पाखंड, कुरीति आडंबर? हम समझ नहीं पाए।

जीवन गुजार दी हमने 
रीति-रिवाज़, प्रथा का अनुकरण करते-करते 
फिर जिन्दगी की हकीकत क्या है? समझ नहीं पाए। 

ये जात-पात-धर्म सिर्फ बातें हैं मेरे दोस्त 
वरना आदमी तो मर तभी जाता है 
जब परम्परा के नाम पर 
आडंबर, रूढ़िवादी, अंधविश्वासी,
ढोंगी, पाखंडी हो जाता है।

क्यों आदमी प्रेम,सदभाव, मानवता भूलकर 
घृणा नफ़रत ईष्या-द्वेष का वसन 
पहन लेता है ?

ये विचारों की हवा भी बेरहम हो गयी 
जिन्दा आदमी को आदमी रहने न दिया 
मर गए तो फिर ढ़ंग से जलने न दिया
और जब जला तब धुंआ और
राख बना दिया। 

कैसी परम्परा 
कौन सी रीत
समझ ऐ मेरे दोस्त 
ढ़ोंग, पाखंड, कुरीति 
जैसी परम्परा ही समाज की विडंबना है 
आत्म-प्रवञ्चन, आत्म-श्लाघा 
सबसे बड़ी समस्या है। 

क्या बात करें रीति-रिवाज़ों, प्रथाओं, परम्पराओं की 
हर प्रथा अटूट सिलसिला है 
आदमी आदमी से नफरत करता है 
और पत्थर को भगवान कहता है।
@शाको
स्वरचित
पटना


मूक नयन पूछ रहे, परम्परा के वाहकों से

कैसे खुश हैं तेरी मां,बलि ले मेरे शावकों से

कब तक आखिर नासमझी के शिकार होते रहोगे
अप्रासंगिक परम्पराओं के बोझ को ढोते रहोगे
ढकोसलों में लिपटी कुरीतियों को मरना होगा
कब तक यूं ही परम्पराओं का रोना रोते रहोगे

परम्पराओं को बेशक, निभाया जाए
लेकिन, पहले इंसान तो बन जाया जाए
समझें ना जो दर्द किसी का, इसके आगे
उन परम्पराओं को फिर, मिटाया जाए

सडी -गली कुछ परम्पराओं का विसर्जन करते हैं
चलो इसी के साथ नई परम्परा का सृजन करते हैं

स्वरचित- अभिमन्यु कुमार


परम्परा पहचान ह हमारी
जिसके लिए हमने जान भी वारी

परम्परा जीवन को संभालती है
परम्परा दिक्कतों को टालती है
सबके लिए माँ है एक धरा
पर सबकी अपनी ह परम्परा
कुछ परम्परा जीवन बदलती है
कुछ परम्परा बचपन छलती है
बचपन मे ही शादी कर देते है
बेटी के जीवन मे दुख भर देते है
जो गलत हो उन परम्परा को तोड़ दो
बेटियो को बचपन मे तो छोड़ दो
स्वरचित--विपिन प्रधान




पता नहीं क्या हुआ हमें जो कुछ

सनातनी परम्पराओं को भूल रहे।
सुसंस्कृति संस्कारों को छोडकर,
हम पाश्चात्य संस्कृति में झूल रहे।

विचार हमारे गीताज्ञान सा दूर हुए हैं।
रामायण के आदर्शों से हम परे हटे हैं।
वेशभूषा पहनावा और केश विन्यास,
सब पर क्यों विदेशियो के रंग चढे हैं।

माथे का तिलक खो गया कहीं हमारा,
शिखा ,यज्ञोपवीत परंपरा भूल गये हैं।
कपडे फाड फाडकर पहनते हैं कुछ,
विदेशी कारों में हम मजे से घम रहे हैं।

चूनर अब नहीं दिखे अपने ठिकाने पर।
मांग में सिंदूर माथे की टिकिया भूल रहे।
पता नहीं चल पाता सधवा विधवा कौन,
परंम्पराऐं सिंदूर पूरी मांग भरना भूल रहे।

परंम्पराऐं विरासत में हमको मिलती हैं।
जो कुछ अपने वेद पुराणों से बनती हैं।
कुछ तो आध्यात्मिक वैज्ञानिक आधार ,
वरना क्यों हमें वरिष्ठजनों से मिलती हैं।

स्वरचितः ः


सदियों पुरानी है भारतीय परम्परा 
आधुनिक दौर में भूलते जा रहे हैं 
सूर्य प्रणाम को छोड़ 
पाश्चात्य नमन में मग्न हो रहें हैं 
अपनी तो परम्परा है निराली
हमारे रीति रिवाज और परम्परा
पूरक हैं 
वेद हमारी पौराणिक परम्परा 
कवि साहित्य की परम्परा 
गुरु शिष्य की परम्परा (गुरुकुल)
नृत्य संगीत की परम्परा 
इससे युवा भाग रहे हैं 
ओढ़कर आधुनिकता की चादर
दिग्भ्रमित हो रहे है
परिवर्तन परम्परा का हिस्सा है
इससे परम्परा को तराशते हैं
इसके पीछे का तर्क इसे जीवित 
रखता है
वरना यह सिर्फ प्रथा बनके रह जाती है 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला




है परम्परा रीढ़ अपनी,
हम इसे खो सकते नही,
कुछ कमी को लेकर,

उम्र भर रो सकते नही,
....
है कसौटी नैतिकता की,
ये न कोई धोखा है,
आईना है इतिहास की,
पूर्वजों का झरोखा है,
...
क्या कमी थी राम में,
जिनसे व्यथित हो जाते हो,
क्या कमी थी कृष्ण में,
जिनसे कुपित हो जाते हों,
या फिर बुद्ध के ज्ञान से,
अकुलाते अझुराते हो,
.....
क्या मां सीता ने किया,
कुछ अनैतिक कार्य क्या,
या मीरा का प्रेम तुमको,
है नही स्वीकार्य क्या,..
....
सब हमारे आदर्श है,
सबके सब सिरमौर्य है,
इनके आगे हम क्या,
हस्ती हमारी गौण है,

.....
मूल्य अपनी धरा की,
हर हाल में बढ़ाएंगे,
जो तंय किया है अग्रजों ने,
उसे आगे हम बढ़ाएंगे...

है परम्परा थाती अपनी...
आगे इसे ले जाएंगे....

....स्वरचित राकेश पांडेय




वह जो परम है परा न हो हमसे 
हितकर हो दूर नहीं कभी हमसे

बुजुर्गों ने जिसे कर के विचार 
परखा विधिवत कर व्यवहार

उसी को अगली पीढ़ी को कर आदेश
ऐसा समझा कर बनाया पूरा परिवेश

वो ही बनती गई हमारी है परम्परा 
समाज उसे जब अपनाकर निखरा

बोला धन्य है हमारी पुण्य परम्परा
इसके बराबर न कुछ भी दूसरा 

स्वरचित रेखा तिवारी



यदि हम भुला नही सकते
अपनी बुरी आदतों को
तो क्यों भुला दे अपनी परंपराओं को

बड़ो के चरण स्र्पश करें हम
न करे हम हाय बाय
बच्चों को गले लगाये हम
फिर पाये हम उनका प्यार दुलार

मैंने लगाई बस एक गुहार
बच्चों माँ फिर कहो एक बार
ये माँम माँम जो कहतो हो
समझ न पाये माँ तुम्हारा प्यार

परंपरा जो बनायें रखें ,हमारी पहचान

जिससे बढ़ाये हमारी संस्कृति का मान
उसे ही हम अपनाये आज
जिससे बढ़े समाज में अनिमियता
उसे तुरंत फेकें हम आज

जिससे सुन्दर उज्जवल हो
हमारी समाजिक ढांचा
बस वही रहे हमारी परंपरा।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।




विषय, परंपरा
कैसा आया ये नया जमाना
जिसने सारी परंपरा को है भुलाया
वो भी था एक जमाना
मात पिता की सेवा करते
कभी ना उनका अनादर करते 
हाय हाय रे आज कैसा आया नया जमाना
माता पिता को वृद्धा आश्रम है पहुंचाना
वो भी था एक जमाना
नारी का कभी अपमान किया नहीं
क्या नारी का सम्मान हमेशा
हाय हाय रे ये नया जमाना
आज नारी को हर पल अपमानित करते 
अपनी तीखी नजरों से उसका हर रोज बलात्कार है करते 
उसकी आत्मा का कत्ल है करते
हाय हाय रे कैसा आया यह नया जमाना इसको खूब पहचाना
आज परंपरा ना जाने कहां लुप्त हो गई
सभ्यता के अंधेरों में कहां खो गई
फिर लौटा दो मेरी उस संस्कृति को
जो हर पल सुखद सा अनुभव कराती थी
परंपरा तो बस अब किताबों में छुप कर रह गई है
हाय हाय रे नया जमाना
स्वरचित हेमा जोशी



रूढ़िवादिता कहुँ या परम्परा, 
हर युग मे जग ने नारी को छला, 
हमेशा थोपी गयीं उस पर रूढ़िवादिता, 
बताकर पुरखो से चली आ रही परम्परा l

कभी बाल विवाह मे मारी गयीं, 
कभी सती प्रथा से जलाई गयीं, 
विरोध ज़ब भी किया उसने, 
समाज से विरक्त कर दीगयीं l

भूमि हिंद कीपरम्पराओ सेभरी, 
फिर क्यूँ पृथ्वी रक्त से रंगी, 
इज्जत रोज लूटी जा रही, 
कहाँ गयीं वो परम्परा भली l

कहने मात्र की अब परम्परा, 
कहाँ रहा विश्वास भला, 
किसकोपरवाह है संस्कारो की, 
सीना ताने बेटा बाप संग खड़ाl

परम्परा कुछ है ही नहीं, 
बस अनुकरण है एक दूजे का, 
मै गर जो आज करूँ, 
वही बच्चो की होगी परम्परा l
कुसुम पंत 
स्वरचित 





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