Monday, September 17

"पत्थर "17सितम्बर2018


शीर्षक -पत्थर

तुम लिखो इश्क पर मैं तो ज़मीर लिखूंगी,
पत्थरों के सीने पे अपनी तहरीर लिखूंगी,

ऐ जिंदगी जितना चाहे आजमाले तू भी ,
फिर अपने हाथों से अपनी तकदीर लिखूंगी,

माना की फलसफा जिंदगी का आसान नहीं,
सीप के मोती सा ढ़ूढ़ कर तदबीर लिखूंगी,

आशिकी सौदा नहीं एहतराम मोहब्बत की कर
इश्क में दिल को सिर्फ अपनी जागीर लिखूंगी,

पत्थरों से टकराकर गुमां मौजों का भी टूटता है,
जाने से पहले जिंदगी की लाजवाब तासीर लिखूंगी।
©"विजय"
स्वरचित

********************
[ 1 ]
एक रूदन नन्हे बालक का,
करूणा मन मे लाया है।
झाडी के पीछे से शायद,
मुझको कोई बुलाता है ॥

**
जाकर देखा तो मेरा यह,
हृदय सन्न हो जाता है।
किस पत्थर दिल माता ने,
इस बालक को यू त्यागा है॥

**
रक्त से सने इस दुधमुहे को
किसी ने यहाँ पर छोडा है।
झाडी मे पत्थर के पीछे,
पत्थर दिल ने फेका है ॥

**
हृदय वेदना से भर बैठा,
किसने ये पाप किया है।
भीड बढी तो इक माता का,
ममता जाग उठा है ॥

**
सीने से वो लगा के शिशु को,
पागल बन कर चूमे ।
कितनो की आँखे भर आई,
तो पत्थर दिल भी रोई ।

**
भाग्य ने कैसा खेल दिखाया,
कहाँ से कहाँ ले आया ।
इक ने ममता त्याग दिया तो,
एक मे ममता जगा ॥

**
स्वरचित.. Sher Singh Sarraf




पत्थर दिल नही वो कुछ मजबूरी है

रहने दो ऐसे ही जो भी ये दूरी है ।।
पथरा गईं हैं यह आँखें अब तो 
मुलाकात को किस्मत भी जरूरी है ।।

पत्ता भी हिलने को माँगे इजाजत
रब की ही जानू मैं इसे अदावत ।।
बनते हुये बिगड़ें वो शुभ मुहूरत
हासिल न अब वो दीदारे दावत ।।

कोई न कोई जुल्मो सितम सबके खाते
पपीहा भी बरसात में प्यासे रह जाते ।।
अपनी भी कुछ यही कहानी है ''शिवम"
बड़े अजीब हैं दुनिया में किस्मत के नाते ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 17/09/2018


विषय पत्थर
पत्थर बन बैठी हूं मैं
पत्थर बनी सब सहती में
घुट-घुटकर रहती हूं मैं
इसलिए चुप रहती हूं मैं
मौन सी बैठी हूं मैं
ये मत पूछो ,क्यों? कैसे
बस पत्थर बन बैठी हूं मैं
पूछो उन हैवानों से
मोम सी पिघलती लड़की 
को क्यो 
पत्थर बना कर छोड़ दिया 
आज बेजान सी बैठी हूँ मै 
बस पत्थर बन बैठी हूं मैं 
स्वरचित /अप्रकाशित हेमा जोशी




हम दिखावे के उजालों में,
तन्हाई के लिए अँधेरे तलाशते रहे !
ख्वाबो में देखी तस्वीर को,
हकीकत में ढालने के लिए पत्थर तराशतें रहे !!
ज़माना लूटता रहा,
खुशियो से आबरू – ऐ – इंसानियत !
अपनी शान बचाने में,
हम शर्म की चादर से खुद को ढापतें रहे !!

बेईमानी की शरद रातों में,
वो दौलत की आग से हुए पसीना पसीना !
अपना हाल कुछ यूँ था,
ईमानदारी की लौ में भी थर्र-थर्र काँपते रहे !!

लालच की लालसा में
ज़माना बेदर्द है कितना मालूम जब हुआ !
देखा रिश्तो का क़त्ल होते,
लोग अपनों को ही गाजर मूली सा काटते रहे !!

क्या करोगे जानकार “धर्म”
जमाने का दस्तूर बड़ा निराला होता हैं !
जिन्हे हक़ दिया अपना,
वो ही नश्तर चुभाकर, मरहम पट्टी बाँधते रहे !!

हम दिखावे के उजालो में,
तन्हाई के लिए अँधेरे तलाशते रहे !
ख्वाबो में देखी तस्वीर को,
हकीकत में ढालने के लिए पत्थर तराशते रहे !!
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स्वरचित- डी. के. निवातिया __!!!


तराश कर ,
मूर्तियों में ढाल कर ,
तुझे पत्थर बना दिया ,

सच में देवा तुझको भुला दिया ।।
चट्टान से इरादों को ,
छेनी हथौड़ियो ने ,
बौना बना दिया ,
लोगो के आँखों का तुझको खिलौना बना दिया ।
तेरे ऊचे मूर्तियों के नीचे ,
किसानो के जमीं को , 
सौदा बना दिया ,
सच में धरती माँ को मसौदा बना दिया ।
तेरा क्या है ?
जो तुझसे पुछू ,
तुझको मुनाफा बना दिया , 
सच में अमीरों को तेरा रहनुमा बना दिया ।
धान जौ गेहू से ,
पापी पेट भरता कहाँ ,
कंक्रीट का दाना बना दिया ,
सच में न पचे ऐसा खाना बना दिया ।
©स्वरचित एवं मौलिक BP YADAV




एक अदना सा पत्थर रास्ते में पड़ा हुआ....
ठोकरों से इधर लुढ़का कभी उधर लुढ़का...
जानवर हो या इंसान...
सब के पाँव तले दबला-कुचला गया....
मल से कभी किसी की गाली से वो धुलता रहा...
निदा पत्थरों की बन गयी.... *निदा* की निदा...
जब उसने अपनी कलम से लिखा...
“पत्थरों में भी जुबां होती है दिल होते हैं....
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो"...
एक दिन एक मस्त निगाह ने उसको छू लिया...
कोमल मखमली स्पर्श ने उसको सहला दिया...
अपने साथ ले गया वो इसको उठा के….
दिन बदल गए उस पत्थर के नाज़ुक स्पर्श पा के....
रोज़ रोज़ के अहसास से उस में भाव जागे...
कभी इधर तो कभी उधर मटकने लगा....
बहुत रोका उसको पर वो न रुका...
पत्थर तो आखिर पत्थर है...
कितना रोको तुमको कुछ फर्क नहीं पड़ता...
यह कहके एक दिन उन्हीं हाथों ने उसको फेंक दिया....
वो रास्ते में पड़ा हुआ किस्मत को देखता है....
कल था यहाँ पड़ा आज भी वहीँ है....
लगती थी ठोकर जो पहले...वो आज भी सही है....
फर्क मगर यह की अब दर्द महसूस होता है....
पत्थर को तराशने में..अपने हाथ भी छिलेंगे ...
यह सब जानते हैं...फिर भी...
पत्थर तो आखिर पत्थर है...
उस शायर का कलाम गुम सा हो गया...
“चन्दर” फिर से...रास्ते का पत्थर हो गया...!!

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 

*निदा* - जनाब निदा फ़ाज़ली साहब 

"“पत्थरों में भी जुबां होती है दिल होते हैं....
अपने घर के दर-ओ-दीवार सजा कर देखो"
जनाब निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल का एक शैर

निदा = आवाज़ / पुकार
दबला-कुचला = पैरों तले रौंदना/दबाना




पत्थर बरसाऐ प्रकृति ने तो

मानव तराश दिऐ ईश्वर ने।
कैसी अजीब बात है देखो,
तेरी मूर्ति गढी शिल्पकार ने।

सृष्टि रचियता अपने बृह्माजी ,
हैं लक्ष्मीनारायण पालनकर्ता।
पाषाणों के शिल्पकार मानव,
बुद्धिदेवा हैं श्रीगणेश दुखहर्ता।

शंकरसुवन श्रीगणेश लंम्बोदर,
जय मात शारदे प्रज्ञा प्रदायक।
पत्थर हृदय को जो पिघला दे,
ऐसी माता है दुर्गा सुखदायक।

ये नटवरनागर है मुरली बजैया।
श्री राम पत्थर से नारी बना दें।
शिल्पकार यहाँ वही बडा जो,
अद्भुत प्रजातियां सारी बना दे।

स्वरचितः ः
इंंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



 पत्थर की दास्तां , 

ऐ शिल्पकार तुझे नमन, 

तूने ही बनाया मेरा जीवन, 
मुझे पत्थर बनाती प्रकृति, 
पर तुम बदल देते मेरी सम्पूर्ण आकृति, 
कभी 
ईश्वर का दर्जा दिलाकर, 
भवन का कँगूरा बनाकर, 
इमारत की नींव रखकर, 
तो कभी, 
सेतु व बांध बनाकर 
और तो और 
शहीद स्मारक मै गढ़कर,
मुझे गौरवशाली बनाते, 
ऐ शिल्पकार 
अगर तुम न होते 
तो पत्थर बेशकीमती 
कभी न होते, 
ऐ शिल्पकार ....
शिल्पी पचौरी 
स्वरचित



नाजुक सा दिल था मेरा
तन्हाईयों ने मार डाला

फूल सा दिल था मेरा 
हवाओं ने कुचल डाला

मोम सा दिल था मेरा
संवेदनाओं ने पिघला डाला

राह चलते बेदर्दी दुनिया नें
इस दिल को पत्थर बना डाला

बनकर पत्थर इतराने लगा दिल मेरा 
लोहे से प्रहार कर इसे भी तोड़ डाला

टूटकर बिखर गया पत्थर दिल मेरा
टुकड़ों की चूभन से इल्जाम मुझपे ही
दे डाला

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला



ना मैं नदी हूँ 
ना मैं पत्थर हूँ
क्यूंकि पत्थर

या नदी होना
कोई सरल प्रक्रिया नहीं
जैसे ईश्वर का होना 
सरल सीधी बात नहीं
गहनता से जीना पड़ता है 
विशालता को धारण करना पड़ता है
तरलता के बहाव में 
अन्तर्मन को बहा ले
जाना पड़ता है 
तब कही जाकर 
सागर की प्यास बुझती है 
और ये सब संभव है
पत्थर और पानी के स्पर्श से .....
स्वरचित (मन) मनु



नारी और पत्थर 

नारी हूँ मैं जगत जननी हूँ कई रूप हैं मेरे 
पर पत्थर की मूर्त बनकर सदियों से समाज के बंधन से जकड़ी हूँ मैं 
हर पीड़ा और दर्द को सहना आदत हैं मेरी 
तभी तो पत्थर की बुत प्रतिमा बनकर खड़ी हूँ .

जिन्दा लाश बनने से पत्थर की बनना बेहतर हैं 
क्योंकि जीवित होने पर मवेशी से दुर्दशा मेरी बत्तर हैं 
मंदिर में देवी की प्रतिमा बनकर पूजी जाती हूँ 
हर दुःख दर्द और प्रताड़ना से दूर रहती हूँ .

अपने नैनो के अश्क खुद ही पीती हूँ 
हर पल घुट-घुट कर जीती और मरती हूँ 
हर दिन ह्रदय में एक नया भारी पत्थर रखती हूँ 
दुनियाँ के हर नये रंग में मजबूर होकर ढलती हूँ .

शिल्पकार की कला से पत्थर से तरासी जाती हूँ 
उसके हस्त कौशल से नये रूप रंग में उभरती हूँ 
पत्थर की मूर्त बनकर मंदिर की शोभा बनती हूँ 
खण्डित होकर एक दिवस मिट्टी में मिल जाती हूँ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट




बहरूपिए बन फिर रहे, करते कितना ढोंग

आईने के रूप में, पत्थर जैसे लोग

खड़े हैं यूं मुकद्दर के सामने
हो आईना जैसे, पत्थर के सामने

कब तलक दें, इम्तहान वफ़ा का हम
के पत्थर भी टूट जाते हैं, चोट लगने पर

देखते ही देखते वो,हद से गुजर गया
आईना था और पत्थर से लड़ गया

झूठ को बेनकाब करने की तैयारी करते हैं
आओ चलो के सच की तरफदारी करते हैं
उस शहर में बेचना है आईना हमको
जिस शहर के लोग पत्थरों की खरीदारी करते हैं

जला जला के बुझाया गया
बुझा बुझा के जलाया गया
इस कदर उम्र भर तड़पाया गया
के इंतहा की हद तक पिघलाया गया
जमाने के हाथों एक बार फिर से
एक मोम को पत्थर बनाया गया

स्वरचित-अभिमन्यु कुमार



लेकर हौसला पत्थर ,साहस घर बनाता हूँ कंटीली राह पे चलने का, मैं अपना मन बनाता हूँ l

दर्द की गली खोया, विश्वास जगाता हूँ 
बाँटकर कर्म के बीजों को,प्रेम को धर्म बनाता हूँ l

सितारे देख कर के मैं, अरमाँ को सजाता हूँ
फटी झोली भले मेरी, मैं आशा चादर बनाता हूँl

गले लगा के फूलों को ,काँटे भी उठाता हूँ
पत्थर तोड़ के रस्ता, मैं अपना खुद बनाता हूँl

सब भूल के नफरतें, दिल को मनाता हूँ
जब दिल से पास वो आये,दिल का बनाता हूँl

स्वरचित 

ऋतुराज दवे


"पत्थर"
कहाँ से कहाँ आ गये हम

चकमक पत्थर घिस कर 
आग जलाये भोजन खाये हम
आदिम युग से सभ्य युग मे
आ गये हैं हम।

युग बदला, जमाना बदला
बदल गया हमारा पैमाना
"स्व" तो जिन्दा रखे हैं
पर मर गई है संवेदनाएं
इंसान से पत्थर बन गये हैं हम

किसी के साथ गलत होते देख भी
रोकते नही है हम,आँख तो है
पर पत्थर के मान लिये है हम
इंसानियत को खोते जा रहे है हम

जंगल काट कर सुंदर महल बना लिए है हम
कंक्रीट पत्थर से बने घर में
पत्थर दिल होकर रह रहे है हम

ये कहाँ से कहाँ आ गये हैं हम
ईट का जवाब पत्थर से देने
लगे है हम
क्यों इतना पत्थर दिल हो गये है हम

पत्थर अगर खाने मे आ जाये तो
मूड खराब कर लेते है हम
पेट या किडनी का पत्थर
जीवन कर देते हैं दुःश्वार

पत्थर तो मंदिर के अच्छे होते है
जो होते है हमारे भगवान
शिल्पकार के पत्थर तो मन
मोह लेते है।

माना पत्थर का है हमारे जीवन में बड़ा महत्व
पर स्वयं पत्थर दिल न बन जाये हम।
स्वरचित ,अप्रकाशित -आरती-श्रीवास्तव।




पत्थर से सर टकराना क्या। 
है जीते जी मर जाना क्या।


जब कश्ती ही छूट गयी तो।
फिर लहरों से घबराना क्या। 

सूख गए हैं आंसू अरमां के। 
फिर बादल का बरसाना क्या।

सीखा चाहत में आज सबक। 
है अपना क्या बेगाना क्या।

भवंरे के मन की तुम जानोगे।
है कलियों का खिल जाना क्या।

खेत चर गये खूब गधे जब। 
फिर अब पीछे पछताना क्या।

शर्म करो कोई जुर्म हो सोहल़। 
है प्यार मे यूं शरमाना क्या़।

विपिन सोहल


सृष्टि के आरंभ से, अंत की कहानी पत्थर है कहता,
कठोर है पर क्रूर कतई नहीं,
पत्थर के भीतर बड़ा कोमल हृदय है धड़कता। अहिल्या का करून क्रंदन, इंद्र का सारा छरछंद फिर राम से कौन कहता।
वीरों की अमर गाथा सीने से चिपकाए युगो अटल खड़ा रहता,निर्झर भी तो इसकी छाती चीर है जग की प्यास बुझाता।
पानी भी इस की गोद में निशान अपने छोड़ जाता, अजब बात है ना! पानी पर को कठोर पत्थर अपना निशान नहीं छोड़ पाता।
ठोकरें कई उलाहने अनेक चुप सहता,तराश दे कोई तो हीरा बन चमक उठता पत्थर।
यूं तो ठोकरों में रहता,मूर्ति बन फिर पूजा जाता पत्थर।
( स्वरचित )सुलोचना सिंह



पत्थर में भगवान बसे
और पत्थर सी लकीर कहा

देशभक्त तो लाखों है
पर भगतसिंह सा वीर कहाँ
पत्थर से ठोखर खाते
फिर भी पत्थर पूजने जाते है
पत्थर में बसती है शक्ति
तभी तो पत्थर भगवान कहाते है
लोग जिसे पानी कहते
हम गंगाजल कह देते है
पूजते है गंगा माँ कहकर
फिर भी गंद इसी में बहते है।।
भगवान से बढ़कर माँ 
माँ से बढकर वतन मेरा
भारत को विश्वगुरु बनाने को
जारी है हर जतन मेरा।।
""जय हिंद जय अखण्ड भारत"'
स्वरचित--विपिन प्रधान







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