Sunday, September 23

"स्वतंत्र लेखन "23सितम्बर2018



हे कलम की रानी जगा दो मुझमें नयी चेतना,
मेरे ग्यान चक्षु में ग्यान का सागर भर देना,
हे! कलम की रानी पथ -प्रदर्शक बन जा मेरी,
मेरे संग रहकर संवार दे लेखन शैली मेरी,

अनुशासन की शिक्षा देकर,हम सबको श्रेष्ठ बना देना,
जीवन की राह को अग्यानता के कांटों मुक्त कर देना,
भष्टाचार की अग्नि को खत्मकर,शिष्टाचार फैला देना,
शासन-प्रशासन को भी, सभ्य आचरण सिखला देना,

हे कलम की रानी तुम ,ऐसा रच डालो,
काव्य में तुम ऐसा, मधुर रस भर डालो,
मानुष के चित के तम को, तुम हर डालो,
जन-जन के मन में,सुन्दर वचन भर डालो,

हे कलम की रानी वर दे!संग न छूटे तेरा,
तेरी-मेरी शक्ति से सभ्य समाज हो हमारा,
प्रकाश फैला दो ग्यानकी ज्योति जलाकर,
द्वन्द्व मिटा देना, समाज मे प्रेमरस भरकर, 

हे कलम की रानी जगा दो मुझमें नयी चेतना,
मेरे ग्यान चक्षु में ग्यान का सागर भर देना,

सुनीता पंवार (बी. ए. द्वितीय वर्ष,२००७,प्रेरणा) 
(प.ल.मो.श.रा.महाविद्यालय ऋषिकेश


मेरा लाल गया सरहद पर अब तक ना आया है
रो-रो कर उस बूढ़ी मां ने यह हाल बताया है


जब वो निकला था घर से आने को उसने कहा था
मेरी गीता रामायण लाने को उसने कहा था
डाकिया भी देखो कोई संदेश ना लाया है
मेरा लाल गया सरहद पर अब तक ना आया है

रस्ता उसका देख देख आंखें भी अब थकती है
आंखों में जल भरकर वो राहें उसकी तकती है
क्यो ना बात करी उसने आज समझ ना आया है
मेरा लाल गया सरहद पर अब तक ना आया है

कुछ देर बाद उसका पार्थिव शरीर आता है_

देश के लिए आज जो तुमने दी है ये कुर्बानी
अब सच धन्य हुई है बेटा तेरी आज जवानी
जब मैं तुझ पर गर्व करूं आज वो दिन आया है
देखो मेरा लाल तिरंगे में लिपटकर आया है

स्वरचित
इति शिवहरे


यादों के तानेबाने 
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उदासी छोड़कर जरा-सा मुस्कुरा तो ले
देखना दिल में उमंग-ही-उमंग खिलते हैं।

लबों पर प्यारी-सी मुस्कान बिखरा तो ले
देखना तन-मन की सारी थकान मिटते है।

भूला दे उन्हें जो वक्त-बेवक्त याद आते हैं 
तेरे तन-मन को दुख से आहत करते हैं।

बस याद कर लेना सिर्फ उन यादों को 
जो तन-मन में मीठी-मीठी सिहरन भरते हैं।

संजोए रखना हर खूबसूरत पल यादों में
जो तेरे घर प्रेम पियूष की बारिश करते हैं।

इंसानो की हमेशा से यही फितरत रही है 
अक्सर यादों के तानेबाने बुना करते हैं।

--रेणु रंजन
( स्वरचित )


कुण्ठा से ग्रसित आज हर इंसान है
बदल रही आज मानव की पहचान है ।।

हीन भावनाओं का कोई न निदान है
भडा़स भरी सब में जग शमशान है ।।

जिसे देखो तनावमय तप का न प्रावधान है
देख तरक्की औरों की तोड़े मर्यादा आन है ।।

ज्यादा दौलत कोई न पाया अपनी की भान है
जो सुझाये हल उसी पर खोले अपनी म्यान है ।।

मूढमति अब हुआ ''शिवम" पूरा ही जहान है
ज्ञानी ज्ञानी झगड़ जायें ऐसे तप और ध्यान है ।।

शिष्य गुरू से पंगा ले ले देखा न जाये मान है
ईश्वर भी न कर पायेगा ऐसों का कल्यान है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 23/09/2018


मन्दिर के घण्टी की आवाज
दूर कहीं मन्दिर में घण्टा बजता।
शंखनाद है हो रहा।
कीर्तन की आवाज है आती।
मन हर्षित है हो रहा।
मुझे है लगता राम नाम का।
भजन यहाँ है हो रहा।
सब जुटे हैं कीर्तन,भजन में।
भीड़ यहाँ पर हो रहा।
हे राम दया करना इतनी।
खुशियाँ उनको दे देना।
खुशियाँ हो या गम हो।
मेरे हिस्से में भी दे देना।
मुझको चाहे थोड़ी सी खुशियाँ।
मेरे हिस्से की दे दो जी।
उनको सारी खुशियाँ दे दो।
जिनको मिलती कभी नहीं।
मुझको चाहे भूखा हीं।
एक दिन गर रहना पड़े।
वो भी है मंजूर मुझे।
पर भूखा कभी वो ना रहें।
मेरे हिस्से का खाना,कपड़ा।
लेकर उनको दे देना।
फुटपाथ पर सोये बच्चे।
सबकुछ मेरा दे देना।
वे अक्सर हीं रातों को।
भूखे पेट सो जाते हैं।
हमको दूध,मलाई मिलता।
बड़े प्रेम से खाते हैं।
वो हैं इन्सां जो खुद जियें।
और औरों को भी जीने दें।
मैं तो कहती खुद कम खाकर।
औरों को भी खाने दो।
मेरा तो जीवन बीत गया।
कल का भविष्य हैं वे।
मैं भी देख मुस्काउंगी।
जब बच्चे मुस्कायेंगे वे।।
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी


आज माँ -बाप से ही परवरिश
का हिसाब मांगने लगे, 
वो तो प्यार मे अंधे है 

तुझे अपना संसार मानने लगे, 
और तुम 
जरा सी दाद क्या मिली तो 
खिताब मांगने लगे, 
स्वार्थ को ही अपनी 
धर्म जानने लगे, 

पुश्तैनी घर को खण्डर बताकर 
फ्लैटो को आलीशान मानने लगे,
चंद डिग्रियां पाकर खुद को 
नवाब मानने लगे,
लहजा बदल गया खुद का 
तो सबको गवार मानने लगे 
जरा सी दाद.....
स्वरचित 
शिल्पी पचौरी


 जीवन के इस पावन पथ पर,
सुख-दुख को ढलते देखा है,
जीवन को चलते देखा है....


प्रकृति के इस मधुर खेल में,
निशा-दिवस के सुघर मेल में,
अंगनाई की उस अमरबेल को..
गिरते और उठते देखा है...
जीवन को चलते देखा है.....

पल-छिन-पल का शरण कहां पर,
जीवन है जहाँ मरण वहां पर,
साश्वत का है हरण कहां पर,
मृग-मारीचिका जीवन सपना,
जो उसका था ही नही अपना....
उसके लिये रोते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

जिसे यौवन खूब लुभाती है,
निज- लावण्य पर इतराती है,
जो रति देवी कहलाती है,
ऐसे अभिमानी नारी को,
यौवन पूर्ण सुकुमारी को...
दर्पण में छलते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

पंख कट गये तो फिर क्या है,
सांस थम रही तो फिर क्या है,
रक्त जम रही तो फिर क्या है,
साहस के उदगारों से
जन के जय-जयकारों से,
विना पैर के प्राणी को,
पर्वत पर चढ़ते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

एक राम एक कृष्ण धरा पर,
एक प्रेम एक शक्ति उपासक,
दोनो है नर श्रेष्ठ चराचर,
अपने स्वार्थ साधन हेतु,
अलग-अलग जनमानस को,
परिभाषा गढ़ते देखा है...
जीवन को चलते देखा है....

जननी-जनक आधार हमारे,
दोनो ही हैं जीवन के प्यारे,
करुण-रुदन में जिन्हें पुकारें,
जीवन के इन अमोल निधियों को,
तपो-भूमि की पावन सिध्दियों को..
रोटी को रोते देखा है...जीवन को चलते देखा है...
भारत की इस अमर भूमि को..
धु-धू कर जलते देखा है...
जीवन को चलते देखा है...

....राकेश स्वरचित


अहो भाग्य !मुरली 
किया क्या कुछ ऐसा 
जो कैशव के अधरों पे 
जा तू समायी 
मुरली कहे सुन 
बाँसिल सा डंडा, भरा गांठो से था 
अयोग्य था फिर भी, प्रभु ध्यान में था 
द्वापर में कान्हा ने, मुझको निखारा 
गांठे हटा, खोल सादा बनाया 
कर छेद इसमें, सुरों से सजाया 
कोई मुरली होती है सात छिद्र वाली 
धुन उसकी बुलाती, गैयाँ, संसार धारी 
नौ छिद्र वाली है, वेणु कान्हा मतवाली 
रास ये कराती, राधा, गोपी संग प्यारी 
बारह छिद्र वाली ये, अनुपम वंशिका 
लुभाती है ये, पेड़, जंगल और नदियां 
जीवन का सार, छुपा है मुरली में 
गांठों को जीवन में पालो नहीं तुम 
हमेशा सँभल कर शब्दों को बोलो 
बोलों की कीमत बहुत कीमती है 
ज़ब भी बोलो मीठी वाणी निकालो 
कर्कश वाणी से ना जीवन बिगाड़ो 
मीठी वाणी से,मैंअमृत पिलाती 
कान्हा की पर्याय, फिर मैं कहलाती 
तभी तो मैं अधरों पे, उनके समाती 
मुरली हमें सप्त ज्ञान से है भरती 
आगम निगम भेद ये खोल जाती 
आत्मा को अमृत पिला तृप्त करती 
गूँज इसकी, ये सृष्टि आलोकित है करती 
मन शांत,स्थिर कर,दिशा नई देती 
ज्ञान रत्नों से झोली, ये भरपूर भरती 
पर आज 
ये कलयुग भरा है, गलत आदतों से 
नहीं जागता कोई, मेरी स्वर लहरीयों से 
मुरली अब मौन, एकाकी हो गयी है 
कृष्णा की यादों में, ये भी खो गयी है 
स्वरचित सीमा गुप्ता 
अजमेर 


साहब ,बीबी और गुलाम
होते हैं ठीक उस तरह
जौसे होता 

तीर-कमान ।

साहब-
धनुष के कमान हैं
जो दौनों सिरों से
अंदर को झुका है
समर्पण की मुद्रा में !

बीबी-
धनुष बीच बंधी डोरी
दौनों सिरों के समानांतर
खिंची वह सरल रेखा
जो अपने आप में तनी है
कुचिपुड़ी की मुद्रा में !

गुलाम-
धनुष-डोरी बीच झूलता बाण
ठीक नब्बे अंश के कोंण से
दौनों को ,बीचों-बीच
काट रहा हो लम्ब से
खलनायकी मुद्रा में !
( मेरे कविता संग्रह से )


🍁
मिलते नही है अब मुझे, जो अपने मेरे थे।
ढूँढा बहुत बाजार मे,जो अपने मेरे थे।
🍁
जाने कहाँ वो चले गये, मुझको छोड के।
मिलने के सारे कसमें-वादें, रस्में तोड के॥
🍁
एहसास मेरा अब उन्हे , लगता की नही है।
ना खोज-खबर ली मेरी, ना याद मुझे की॥
🍁
जीवन को ढँढने मै, घर को छोड के आया।
सब रिश्ते-नाते, साथी-संगी, छोड के आया॥
🍁
अन्जाने शहर मे भी, बडा काम किया है।
सब कहते है की मैने, बडा नाम किया है॥
🍁
धन-धान्य, गाडी बंगला, बडा नाम कमाया।
पर अपनी जवानी, सभी रिश्तो को गँवाया॥
🍁
अब बैठ के चुपचाप , शेर सोचता रहता।
क्या कितना पाया मैने, क्या-क्या है गँवाया॥
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf
देवरिया उ0प्र0
मो0 - 9450671293


त्रास्दी केरल 23सितंबर 2018
हे.... विधाता ये कैसी विपदा भारी, 
पहले उत्तराखंड अब केरल की बारी, 
केरल हुवा है जलमग्न, 
फैल रही महामारी l

सुनलो हिंद के नर और नारी, 
पड़ गयी तुम पर जिम्मेदारी, 
वो भी हिंद के बच्चे है, 
बनो थोड़ा सा दिलदारी l

गर हम ही ना आगे आएंगे, 
ऋण लेने पड़ जायेंगे, 
उस ऋण के लिए भी हम तो, 
सूद देकर मर जायेंगे l

क्यों मांगे उधार किसी से, 
क्यों ले अहसान किसी से, 
पूरा हिंद परिवार हमारा, 
करेंगे थोड़ा दान यही से l

इक बात और सुनो ध्यान से, 
प्रण लो न काटे वृक्ष आज से, 
प्रकृति प्रकोप को जानो तुम, 
इक इक वृक्ष लगालो आजसेl
कुसुम पंत 'उत्साही 'स्वरचित
देहरादून


ढूँढती मैं स्वयं को 
**************

अब क्या गिला करूँ
ऐ किस्मत !
ये जो मेरे हिस्से आई
आँखों में शून्य और
होठों पर फीकी हँसी.... 
दो रुख हैं 
मेरी जिंदगी के
आधे में धूप और
आधे में नमी...
आशाओं के सभी
नवल पल्लव
एक - एक कर
झर से गए
ठहर सा गया तो
एक विरान सन्नाटा भर
स्तब्ध हूँ
मैं स्वयं भी
कि कैसे
आवरण चढ़ाया इन पर
फीकी सी मुस्कुराहटों का
हार कर बैठना
कब गवारा था मुझे
क्योकि लांघने थे अभी
कितने पड़ावों को
उम्मीद की एक
झीनी सी डोर के सहारे
चलती रही हूँ
इन विसंगतियों के बीच
ढूँढती सी मैं 
कभी मार्ग को
तो कभी
स्वयं को.... ! 

स्व रचित 
उषा किरण


हे उम्र तु सुन जरा,
दो पल ठहर रिश्ते निभा लूँ जरा,
जिसने मुझे जन्म दिया
पाल पोस कर बड़ा किया,
उनको याद कर लूँ जरा,
हे उम्र तु सुन जरा,
दो पल ठहर रिश्ते निभा लूँ जरा,

जिनसे मेरी यारी थी,
कुछ यादें बहुत प्यारी थी,
उनसे आखिरी मुलाकात कर लूँ जरा
हे उम्र तु सुन जरा,
दो पल ठहर रिश्ते निभा लूँ जरा,

जिसको आधा अंग सौंपकर,
अर्धांगिनी स्वीकारा,
अंतिम बार उसकी मांग सजा लूँ जरा,
हे उम्र तु सुन जरा
दो पल ठहर रिश्ते निभा लूँ जरा,

सारी उम्र तो भटकता रहा
बनावटी उसूलों पर,
आज चलूंगा साथ तेरे,
तु ले चल चाहे चिता के फूलों पर
हे उम्र तु सुन जरा
दो पल ठहर रिश्ते निभा लूँ जरा..........

स्वरचित:- मुकेश राठौड़


वसंत,
चोका,गीत,

फूल हँसता,
सूर्य चमकता है,
चंद्र हँसता,
नदी दौडतु सदा,
पवन बहे,
तरुवर झूमते,
पंछी चहके,
सागर भी लहरें,
मे रा निवास,
सागर की विशाल,
गहराई में,
मै जहाँ नही होता,
घना अंधेरा,
उदासी औ रुदन,
छाया रहता
ज्ञानी मनुष्य मुझे,
आत्मानंद ही,
ऋतु में वसंत हूं
देवेन्द्रनारायण दासबसना, 
स्वरचित चोका वसंत।।


॥ रे परिंदे ॥
आसमां में विचरते-विचरते
धरती को मत भूलना
जल जाएं पंख तेरे
ऐसी उड़ान मत भरना ।
छुट न जाएं अपने तेरे
दुनिया के इस भीड़ मे
खो न देना कहीं सबकुछ
अपनी मतलबी जिद्द में ।
जब कहोगे अलविदा
तो संग कुछ न जाएगा
तेरे अच्छे-बूरे याद और 
जीवन भर की कमाई
यही छूट जाएगा।
तब पछताओगे,रोओगे
पर हाथ खाली होगा
कुछ न कर पाने का सोचो
दर्द कितना गहरा होगा.......।

स्वरचित :- मुन्नी कामत ।


"लघुकथा"बदलते-रिश्ते"

""भाभी जी आपके छज्जे पर तो एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ निकल आया है, आपने कभी ध्यान क्यों नही दिया"।जब से पड़ोस में रहने वाली नेहा ने पूनम को बार बार टोकना शुरू किया, तो पूनम ने सोचा कितनी अचछी है नेहा, कितना ख्याल रखती है, कही पीपल का पेड़ बड़ा होने पर छत न टपकने लगे,सबसे ऊपरी तल्ला पर ही तो घर है उसका, यही सोचते हुए वह अपने घर की छत पर चढ़ी,देखी वाकई पेड़ बहुत बड़ा निकल आया था, उसे तुरंत ही कटवाना पड़ेगा, वरना छत टपकते देरी नही लगेगी, फिर न जाने क्या सोचते हुए उसने अपनी पड़ोसिन की छत की ओर देखा और यह देख कर आश्चर्य चकित रह गई कि उसके छज्जे पर उसके छज्जे से भी बड़ा पीपल का पेड़ निकला था,और उसका छत भी जल्दी ही टपकने वाला था।
अःत,उसने नेहा को बताने के लिए जल्दी जल्दी सीढियां उतरने लगी,वह पड़ोसी की घंटी बजाने ही वाली थी कि अंदर से आती आवाज सुन कर उसके हाथ वही रूक गये।नेहा अपने पति को बड़े गर्व से बता रही थी ।"मैं ने पूनम भाभी को उनके छज्जे के पेड़ के विषय में बता दिया है।अब अवश्य ही भाभी भैया को बोलकर पेड़ कटवाने के लिए किसी मिस्त्री को बुलाये गी।तभी हम अपना पेड़ भी कटवा लेगें।"
अब पूनम समझ चुकी थी कि उसकी पड़ोसन को उसके प्रति चिंता व्यक्त करना उसका अपना स्वार्थ था।और उसने दोस्ती के रिश्ते को स्वार्थ के रिश्ते में बदलते पहली बार देखा था।
स्वरचित व अप्रकाशित आरती श्रीवास्तव।


जो मैं पूछूगां कुछ सवाल,जवाब दे देना । 
क्यूं दिये जख्म थे इतने, हिसाब दे देना ।


वो जो पूछेगें मेरा हाल फुर्सतो मे कभी । 
उनके हाथों में ये मेरी , किताब दे देना ।

मेरे कातिल की न हो पहचान से रुसवाई । 
वो जब गुजरेगें इधर से , हिजाब दे देना । 

वो ढलती उम्र मे और भी जवां लगने लगे । 
जाने किसकी है कोशिश, खि़ताब दे देना ।

विपिन सोहल



हे राम आपको कैसे हम अपनी व्यथा सुनाऐं।
अपने मुँह से कैसे अपनी दुखद कथा बताऐं।
हमने अपने अंतस में केवल वैरभाव ही बोया।
आत्म प्रशंसा में शायद ये वोधभाव ही खोया।

अपना अपनों के लिए किया सिर्फ अपना है।
अपनों द्वारा किया गया परोपकार सपना है।
कभी अपने मन को वशीभूत नहीं कर पाया,
राम नाम जपूँ यह सिर्फ जपना ही जपना है।

जो तेरा है सो मेरा है और मेरा है सो तेरा है।
पहले मेरा है सो मेरा था अब तेरा भी मेरा है।
मैने सारे सिद्धांत ताक में रख दिऐ हैं भाईयो,
जो सिर्फ मेरा है सो मेरा बाकी सब झमेला है।

काम क्रोध मोहमाया में घूमता हूँ जकडा।
झूठा दंम्भ साथ में लेकर फिरता हूँ अकडा।
क्षणभंगुर जीवन है मेरा ,मै ये जान रहा हूँ,
फिर भी अंधा होकर स्वयं मानता हूँ तगडा।

स्वरचितः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



"तिरंगे का सेहरा"
मोहब्बत -ए - वतन के जज्बात बताऊँ,
देश की खातिर मैं मर जाऊँ,
माँ झूकने ना दूँगा सिर ये तेरा,
बना तिरंगे को अपना सेहरा,
देता आशीष माँ-बाप का मन,
रोती है छुपकर छोटी बहन,
सिंदूरी तिलक से दमकेगा मेरा चेहरा,
बना तिरंगे को अपना सेहरा,
भारत माता से किया वादा निभाऊँगा,
दे प्राण अपने दुश्मन को ढ़ेर कर जाऊँगा,
लगा सरहद पर सख्त पहरा,
बना तिरंगे को अपना सेहरा,
जीवन मेरा देश की खातिर,
छुपकर बैठे हैं देश में शातिर,
खोलूँगा उनका राज ये गहरा,
बना तिरंगे को अपना सेहरा,
दे प्राण कर्ज चुकाया है,
तिरंगे को सदा शीश नवाया है,
ले लिया मौत के संग फेरा,
बना तिरंगे को अपना सेहरा।

स्वरचित-रेखा रविदत्त


आज फिर तुमने, दिल मेरे पे, दस्तक दी है....
मेरे बालों में, तेरी उँगलियों ने, हरकत की है...
एक सिहरन सी, बदन मेरे में, लहराई है......
ठहरे पानी में हलचल ने ली अंगड़ाई है

है हवाओं का रुख भी, मेरी साँसों की तरह....
तेरे अहसास से धीमा सा, कभी तेज ज़रा...
झूल रहे पते लटके हुए, हवा से कुछ ऐसे...
वक़्त जाने का तेरा, सांस मेरी भटके जैसे....

लोग कहते हैं हम तुम से, जुदा रहते हैं...
एक दूसरे से अलग और ही, जहां रहते हैं...
आज तुम आयी हो, इन सब को,बता कर जाना...
प्यार मोहताज नहीं, बंधन का, बता कर जाना...

किस तरह इनसे कहूँ मैं, तुमसे रोज़ मिलता हूँ...
कब से हूँ तेरा किस जन्म से मैं यूं मिलता हूँ....
तुम ही बोलो क्या तुम थी जुदा, मुझसे कभी....
मेरी साँसों में नहीं और कहीं, बसी थी कभी.....

II स्वरचित - सी.एम्. शर्मा II 


घर से निकल गए घूमने
खर्चे लगे जेब को चूमने

घरवालों की मर्जी के खिलाफ गए 
जेब के पैसे घटते देख हांफ गए
बेपसन्द चीज की ओर भी ललचा रहे थे
पर जेब की हालत देख सस्ता खा रहे थे
गाड़ी ऑटो रिक्शा छोड़ पैदल नापते रहे
खाने की चीज खरीदने में हाथ कांपते रहे
बिन खर्च के भी जेब लुटती दिख रही थी
पता नही किस्मत क्यों इतना संघर्ष लिख रही थी
सही दाम भी महंगे जचने लगे
बाजार की तरफ से भी बचने लगे
घूमने में भी मन नही लग रहा था
मैं खुद खुद ही को ठग रहा था
आज एक पाठ पढ़ लिया
खुद को गढ़ लिया
माँ बाप बच्चो के लिए क्या क्या करते है
हमे हर कीमत पर खुशी दे खुद पल पल मरते है
आज हो गया पैसे की कद्र का अहसास
समझ गया क्या है मेरे पापा के पास
खाली जेब का खजाना रखते है
मेरी मुस्कान से ही माँ बाप के दिल धड़कते है।।
स्वरचित--विपिन प्रधान




दरिया दिल
सम्मानित है कोख
शहीद की माँ।


गृह मंदिर
विश्वास की माला
प्रेम की घंटी


संस्कारी नारी
सदन महारानी
हाथों में चाबी।



प्रेम संचार
दिल से जुड़े तार
मन की बात।



 मन बसंत
पुलकित है अंग
घृणा का अंत।




ये!प्यार है प्रेम पथ की, अहेतुकि संवेदनाऐं,
सौम्य शुचित स्नेह सरित, युग्म हेत की चेतनाऐं।
मृदु प्रीत मोल अमोल,हिय मे हेरती स्पंदन नवल, 
वेदना परिहारती ये, नेह की अभिव्यंजना।

मृदु नेह पगे शुचि सेवित गे,
अमूल धरोहर सेव्य सखे।
हिय कि अंजुरी भर प्रेम सुधा
,मही आभ समाय लिए सुमुखे।

गीत कि गितिका,गेयता ना घटे,
प्रीत मे पात्र की प्रेयता ना खुटे
जीत मे जश्न की जेयता ही डटे,
जीव जग यक्ष का प्रश्न फिर क्यो हटे,

मृदु स्वप्न सरोजित नैनन मे, 
पियु प्रीत पलाश लिए स्नेहिल। 
मन मंदिर नेह की ज्योति जगा, 
द्युति मौन हिये खिलती स्वप्निल। 

#स्वरचित:-रागिनी शास्त्री #



*****************
पल पल मरता रहा नित्य,
कैसे कह दूँ मैं जीवित हूँ,
ब्रह्मांड विराट सकल देहांतर्गत,
कैसे कह दूँ मैं सीमित हूँ।

मस्तिष्क विलक्षण नियति से,
गात रहस्यमय प्रकृति से,
भौतिकता में आसक्ति नित्य,
कैसे कह दूँ मैं शाश्वत हूँ।

इस बसुंधरा के प्रांगण में,
छलबल की शतरंज चहुँदिशि,
आकंठ डूवता पाप--पुण्य में,
कैसे न कहूँ मैं पीड़ित हूँ।

परमब्रह्म का अंश चारु मैं,
सर्वशक्ति संपन्न धरा पर,
संव्याप्त सृष्टि के कण- कण मे,
कैसे कह दूँ मैं असीमित हूँ।
--स्वरचित--
(अरुण)



विषय-बेटी

बेटी नयन
बन अंतरज्योति
शक्ति स्वरूपा

है अभिमान
दो घरों का सम्मान
बेटी संतान

बेटी अंगार
संग लिए संस्कार
नही लाचार

बेटी है बीज
दे रिश्तों को आकार
सृष्टि उत्पति

भागिनी, भार्या
सम्पूर्ण परिवेश
वंश बढ़ाती

बेटी रौनक
बन आँगन शोभा
पाती दुलार
स्वरचित-रेखा रविदत्त
23/9/18
रविवार


उदास दिलो की बगावत हो तुम , 
बेजान धडकन की राहत हो तुम , 
किस किस नजर से देखूं मै तुम्हे , 
हर नजरिए से सिर्फ मोहब्बत हो तुम ।
फूलों की नजाकत हो तुम, 
बचपन की शरारत हो तुम, 
यूँ संवर कर आयी हो आज , 
सर से पाँव तक कयामत हो तुम ।
(स्वरचित ) सुलोचना सिंह



विधा:- दोहा छंद
विषय :- देशप्रेम
__________________________
दोहे-
__________________________
जिसकी मिट्टी ने रचा, मुझ जैसा इंसान।
उस मिट्टी पर है मेरा, जन्म-जन्म कुर्बान।।1।।

देश प्रेम की भावना, कण-कण में है व्याप्त।
भारत माता के लिए, जन्म न ये पर्याप्त।।2।।

माता छाती से लगा, खिला रही आहार।
उस मिट्टी पर मैं भला, कैसे सहूँ प्रहार।। 3।।
___________________________
✍️ मिथिलेश क़ायनात
बेगूसराय बिहार



मेरी बिटिया प्यारी सी
गुड़िया है तू
दुनियादारी अभी कुछ ना
समझती है तू
पापा की बातों से अभी भी
रुठ जाती है तू 
बातों को मेरी ना कभी 
सुनती है तू
मुझसे बातें बड़ी
बनाती है तू
भाई के संग खूब 
लड़ती है तू
लड़कर फिर उसी से
प्यार जताती है तू
नाजों से पली घर की
कलि है तू
तुझसे अँगना मेरी 
मुस्काती है खूब 

स्वरचित पूर्णिमा साह बांग्ला


बेटी दिवस पर चंद हाइकु बेटियों को समर्पित
(1)
अजब मूढ़ें
बिटिया फेंकी कूडे
बहु को ढूँढ़े
(2)
हत्यारे हाथ
रोज कुचले कली
पैसा है बाप
(3)
चीखता भ्रूण
मानवता के आँसू
स्वप्नों का खून
(4)
यादें समेट
"बेटी" जो हुई विदा
कलेजा फटा
(5)
"बेटी "चिरैया
कर्तव्य के तिनके
बुने घरौंदा
(6)
"बेटी" विश्वास
पल्लू से बंधी आस
पिता की खास
(7)
"बेटियाँ" पली
मोम की गुडिया सी
साँचो में ढ़ली
(8)
घर महका 
बिटिया की उर्जा से 
चूल्हा चहका 
ऋतुराज दवे

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"रात/रजनी "15जुलाई 2019

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