Monday, September 24

"ख़ामोशी "24सितम्बर2018





मदहोशी सी हालत, खामोश नजरें
उनकी खामोशी शोर मचा रही थी ।
जब गुजरा था उनकी गली से मैं तो
अंतरंग में एक कहानी रचा रही थी।।

हाल इशारे से पूछा, वो फिर खामोश ! 
खामोश निगाहों में नीरसता नजर आई।
खामोशी पढ़ मन व्याकुलता से भरा..
कह रही थी, तू क्या जाने रे पीर पराई।।

आँखो में आँसू लिए, चले गए वो भीतर
बैचेनी ने घेरा मुझे आगे ना जाने दिया..।
सुन्न हुआ मन, मस्तिष्क, पैर ही जम गए
रब ने खामोशी का कहर कैसा बरपा दिया।।

फिर कुछ हुआ ऐसा, बस चमत्कार जैसा
बाहर घर से आ उन्होंने हमें चोंका दिया।
झट से गले लगाकर, थोड़ा सा सहलाकर 

खामोशी तोड़ी कहा, था अभिनय किया।


ये खामोशी कभी-कभी,
बहुत अच्छी सी लगती है,
हाले दिल बिन बोले ही,
खूब बयान करती है |

एक अजीब-सा सुकून, 
दे जाती हैं ये खामोशी, 
दिल के जज़्बात समझा, 
जाती हैं ये खामोशी |

इतनी भी खामोश नहीं,
होती है ये खामोशी, 
टूटे रिश्तों के घावों पर, 
मरहम बन जाती है खामोशी |

इनका भी अपना एक, 
ठोस वजूद होता है ,
तभी तो खामोशी को,
खुदा भी समझ लेता है |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



*********************
🍁
खामोश जुँबा बेबस सी नजर,
खामोश मुझे तुम रहने दो।
इस भीड मे भी मै तँन्हा हूँ,
तँन्हा ही मुझे तुम रहने हो॥
🍁
गिरती हुई दीवारो की तरह,
नजरो से ना मेरे गिर जाओ।
चाहत का समुन्दर बहने दो,
खामोश मुझे तुम रहने दो॥
🍁
आँखो से ही पढ लेना चेहरा,
खामोश जुँबा को रहने दो।
आँखो को मिला कर आँखो से,
जज्बात का सागर बहने दो॥
🍁
खामोश जुँबा कर ली मैने,
कविता ही मुझे अब लिखने दो,
गर शेर हृदय को पढना है,
कविता ही उसे मेरा पढने दो॥
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf
देवरिया उ0प्र0
मो0 - 9450671293



खामोश निगाहें जाने क्या क्या कह गईं

वीरान से इस दिल में बस कर रह गईं ।।
जाने क्या नाता था इस दिल से उनका
अजीब सा अहसास दिल को दे गईं ।।

आज तलक न लिख पाया वो अहसास
दूर रह कर भी लगे जैसे हो पास ।।
बीते बर्षों मगर आज भी है वह जादू
सदा अँधेरों में मिलता उससे उजास ।।

लब्ज खुले न कभी यही एक रंज है
या खुदा यह।कैसा तेरा शतरंज है ।।
चाल थी ये कौन सी समझ न पाया
यही कशमश ''शिवम" हरदम संग है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम"
स्वरचित 24/09/2018



कभी खामोश है लेकिन। 
कभी कितना गरजती है। 


कहीं सैलाब है पलकों पे। 
अांखे कितना बरसती है। 

कहीं कतरा नहीं हासिल। 
जमीं सदियों तरसती है। 

जुदा होता है जब पानी। 
बिजली कैसे तड़पती है। 

जुबां कहती न हो चाहे। 
निगाहें सब समझती है। 

कभी बेबाक हो कितनी। 
कभी खुशियां लरजती है। 

हरेक पल एक मौका है। 
जहाँ किस्मत चमकती है। 

विपिन सोहल




तुझे चंडी बननी होगी 
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उसकी खामोशी मुझे अक्सर डराती रहती है
कौन-सी आग उसके अंदर भड़कती रहती है 
गुमसुम बनकर आकाश की ओर दृष्टि जमाए
न जाने अंदर-ही-अंदर क्या घुटकती रहती है।

उसके चेहरे की मासूमियत कहीं खोने लगा है
उसकी सजल आंखों में पीलापन पड़ने लगा है
लाख शोर-गुल हो पर उस पर कोई असर नहीं
नहीं जाने उसका दिमाग क्यों अब सोने लगा है।

किसी को देखती तो आंखों में हजार सवाल होते,
आए दिन लड़कियों के अस्मिता पर बबाल होते,
गंदी नजरों से नारी देह का क्यों होते अवलोकन, 
क्यों नहीं उन्हें अपनी बहन-बेटी जैसे ख्याल होते?

जमाना बहुत सभ्य होने लगा है और लोग भी 
पशु, पशु ठहरे, पशु बनने लगे हैं अब लोग भी
आज अपने घर में भी महफूज नहीं है लड़कियां
चारों ओर फैले मिलते मानव दरिंदे से लोग भी।

मासूम बेटियों अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी 
मानव भेड़ियों से निपटने को हिम्मत रखनी होगी 
सबक ऐसा मिले कि भूल जाए लड़की कमजोर है 
ऐसे दरिंदों का संहार करने को चंडी बननी होगी।

तोड़ अपनी खामोशी आगे तुझे अब बढ़नी होगी 
लेकर प्रण मन में दरिंदों को धरा से मिटानी होगी 
फिर किसी मासूम पर उनका कहर नहीं टूट पाए
शस्त्र अपने हाथों में लेकर हुंकार तुझे भरनी होगी। 

---रेणु रंजन 
(स्वरचित )

खामोशी ऐसा शस्त्र है
जो बिना हथियार के
वार कर जाता है
और खुद तो मर ही जाता है
वो आस-पास के लोगों को
जो उस से स्नेहप्रेम करते हैं
उन्हें भी शव बना जाता है
इस चुप्पी से ना जाने
कितने घर टूट गये
इस चुप्पी से ना जाने 
कितने अपने रूठ गये
इस टूटी हुई खामोशी को रुलाना है जरूरी
इस रूठी हुई खामोशी को मनाना है जरूरी
ये ख़ामोशी जो अपने आप को जलाने लगे
अपने ही प्रिय रिश्तो को हमसे दूर भगाने लगे
उस दिन खामोशी को तोड़ जाना है जरूरी
स्वरचित हेमा जोशी



खामोशी 
मेरे साथ साथ चलती है, 
आज भी कुछ खामोश परछाइयाँ ।
जो निकल गये दूर बहुत , 
मुझे छोड़कर मजबूर बहुत 
उन हमशक्लों की याद दिलाती है 
आज भी कुछ खामोश परछाइयाँ।
शोरगुल से दूर चली आई मै, 
बीती बाते सारी भुला आई मै 
कभी-कभी शोर मचाती है 
आज भी कुछ खामोश परछाइयाँ ।
ख़ता क्या थी जो माफ न हुई, 
बात क्या थी जो साफ हुई, 
मुझसे रूठती और मनाती है 
आज भी कुछ खामोश परछाइयाँ ।
(स्वरचित ) सुलोचना सिंह



तेरी खामोशी इस कदर छा गयी
जिसकी चीख मेरे दिल तक आगयी
खामोशी कभी कभी समझदार होती है
ज्यादा खामोशी की भी हार होती है
हर वक़्त की खामोशी छोड़ दो
जब उचित लगे तो चुप्पी तोड़ दो
खामोश रहो तो खामोशी दहाड़ सी हो
बोलो तो शब्दमाला भी पहाड़ सी हो
स्वरचित--विपिन प्रधान



डबडबाई है आँखें
लव सिल गए
क्या बताऊँ
माँ तुझे क्यों हम खामोश हो गए ।
ये खामोशी 
अंदर ही अंदर कचोटता है
सच कह रही हूँ माँ
बहुत पीड़ा होता है ।
चाँदनी रात थी
दिख रहा था सब साफ
अपनों के हाथ मैं
रैंदी गई
बन गया जीवन अभिशाप ।
कैसे कहुँ की कभी
उसी ने हमें गोद में उठाया था
प्यार से सीने से लगा
पुचकारा था
और आज....
उसी से बेआबरू हो गई
क्या बताऊँ माँ तुझे
इसलिए मैं खामोश हो गई .......॥

स्वरचित:- मुन्नी कामत।




इंसान के अल्फाजों की,जुबां होती है ख़ामोशी 
प्यार के अंकुरण में, खिलखिलाती है ख़ामोशी 
विरह की वेदना में, तड़पाती है ख़ामोशी 
गमों की इंतजा में, झकझोरती है ख़ामोशी 
नाराजगी के प्रतिकार में, आक्रोषित होती है ख़ामोशी 
गहराई में जाकर, एक राज बनती है ख़ामोशी 
तीर की चुभन बन, घायल करती है ख़ामोशी 
भाषा का सागर बन,अभिव्यंजना बनती है ख़ामोशी 
स्व आत्मावलोकन कर, रौशनी भरती है ख़ामोशी 
सच्चाई का उदघोष कर, सरताज बनती है ख़ामोशी 
जुबां की पहरेदार बन, सब अंदर रख लेती है ख़ामोशी 
चेहरे का दर्पण बन,अपनी जुबां कह देती है ख़ामोशी 
ख़ामोशी से पहले चलता बड़ा शोर है..... 
सब्र सेतू टूटता है ज़ब कभी 
ख़ामोशी का तूफ़ा चढ़ता है परवान तभी 
तब जज़्बात बह जाते हैं 
नजदीकियां ढह जाती हैं 
रिश्ते घायल हो जाते हैं 
फिर ख़ामोशी एकांत में मचल कर 
शून्य में बिखर जाती है 
स्वरचित सीमा गुप्ता 



चलो हम,
आज एक घर बनाऐ,

उस वादी में,
जहां हमारी भेड,बकरियां,
चरने जाती,
जहां हिरनें खेलती,
जहां झील में,
हंस तैरते,
और फूल खिलते,महकते,
जिस वादी में,
सपने आते,
आज सूरज ने,
किरणें बादल हवादी,
सूरज ने,
अपनी धूप बिछा दी है,
चलो हम,
आज घर बनाए,
जहां पवन महकती,
पुरवइ या प्रेम के गीत गाती है,
जहाँ सोने के जैसे,
रेत चमकती है,
पतो की छाती में,
कली खिलती है।
पेड की शाखा की तरह,
तेरी कमर लजकती है,
तेरे गालो पर,
गुलाब खिलताहै,
जहां तेरी आँखों में,
प्यार जागता है,
उसवादी में
जहां रात में तारे बांटती,
जहाँ चाँद की चाँदनी बरसती,
जहां तुम चहक सको,
जहां खामोशी सी,
शांत वातावरण हो।
उस वादी में,
चलो हम घर बनाए।।
स्वरचित देवेन्द्रनारायण दास बसना।




जरा ठहरो अभी थोड़ा, नए हालात करती हूं
सुनो मैं गीत ग़ज़लों की,अभी बरसात करती हूं
नहीं आसान है इतना कि तुम मुझसे उलझ पाओ
अधर खामोश रखकर के नजर से बात करती हूं

मोहब्बत एक हिमालय है यहां सब चढ़ नहीं सकते
मेरे जीवन की गाथा को कभी तुम गढ़ नहीं सकते
करो वादे भले कितने ही ,,,,,मुझको जान लेने के
मेंरे खामोश लफ़्ज़ों को कभी तुम पढ़ नहीं सकते

इति शिवहरे

खामोशी की अपनी जुबान होती है

बिन कहे बहुत कुछ कह देती है ।

दिल का दर्द छलकता है खामोशी में

आंखें चुपचाप रोती रहती हैं।

सौ फसादों को मिटा देती है

क्रोध की अगन बुझा देती है

नफरतें रहती इससे दूर सदा

स्नेह बंधन को बांध देती है।

आंखों की बनके जुबां खामोशी

बिन कहे हाले दिल बता देती है ।

मजबूरी का बनके आईना जब

लबों को सिल देती है खामोशी

तब उमडता है दर्द का जो सागर

खामोशी बड़ी खामोशी से बता देती है।

कभी बन के कटार चुभती है

कभी रस की धार लगती है

कभी लगती किसी की बेबसी

कभी चुपचाप हंसती रहती है।

लफ्जहीन होकर ये खामोशी

अपनी ताकत को पता देती है
अभिलाषा चौहान
स्वरचित



तेरी ये खामोशी!! चुभती शूल सी बेखुद भूल सी यूँ कसकती सी 
किरचें चुभती सी 
तेरी ये खामोशी!! चटकते आईने सी 
मन के बेगाने सी रूह टीसती सी आत्मा नोचती सी 
तेरी ये खामोशी!! शब्द ढूंढती सी आँख मूँदती सी कलेजा काटती चीख चीत्कारती 

तेरी ये खामोशी!! 
नैना नीर बहती हदय आग दहति मन शिथिल करती 
तन वीथिल करती 
तेरी ये खामोशी!! 
तुझसे दूर करती कितनी मौत मरती सांस सांस तड़पती बेजान लाश पड़ती तेरी ये खामोशी!!
--डा. निशा माथुर स्वरचित



##############
खामोश ये दिन हुए 
रातों को मुलाकात हुई 
ऐसी क्या बात हुई 
उषा क्यों खामोश हुई 

खामोश ये नजारे हुये 
धरती संग आकाश मिले 
ऐसी क्या बात हुई 
सांझ क्यों खामोश हुई 

चाँद जब खामोश हुआ 
सितारों संग बात हुई 
ऐसी क्या बात हुई 
चाँदनी क्यों खामोश हुई 

खामोश ये वसंत हुआ 
पतझड़ में मन भीग गया 
ऐसी क्या बात हुई 
खामोश क्यों बरसात हुई 

खामोश जब जुबान हुई 
नजरों से बात हुई 
ऐसी क्या बात हुई 
दिल क्यों खामोश हुए 


स्वरचित   पूर्णिमा साह   बांग्ला




ओठ अगर खामोश रहे तो
मन ही मन चलता वार्तालाप
चिल्ला चिल्ला कर थक जाये तो
खामोशी छा जाती अपने आप

भार्या गर खामोश रहे तो 
गृह कलह भले टल जाये
पर जब चहकती है नारी
तभी खिलती है घर की फुलवारी

अनल धधक रहे जब सीने में
खामोशी क्यों बरतें हम
दनुज जब अस्मिता पर चोट करें
भला क्यों खामोश रहे हम

इल्जाम गलत लगे किसी पर
खामोश रहना है गुनाह
अत्याचार न सहे स्वयं
और न सहने दे किसी को

खामोशी हरदम काम न आवे
शोर मचाना भी जरूरी है
पर अधीर न होये हम
असत्य बोलने से तो आच्छा है

खामोशी ही बरतें हम ।
अनभिज्ञ है यदि कोई बातों से
बेवजह न बोले हम
तब खामोश ही रह जाये हम

परन्तु रिश्तो के मामले में
खामोशियाँ ही बेहतर है
नजरअंदाज कर दे हम क ई बातो को
और रिश्तो को बचाने के लिए खामोश ही रह जाये हम,तब सहज सरल

हो जाये जीवन अपना
जब रिश्तो मे अटूट स्नेह बंधन हो
खामोश गर रह जाये हम तो
रिश्ते टूटने से बचा ले हम
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।




मेरी कलम से....
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रुका बहुत, देखे सपने फिर
शिद्दत से ये ताज बनाया,
भला हुआ या बुरा सभी कुछ
अपने मन का राज बनाया,
मुद्दतों तक मैनें अपनी
ख़ामोशी को आवाज बनाया।

खुश रखने मन को बहलाया
उलझन को तरंगित साज बनाया,
हो पाया,ना हो पाया वो
हर कोशिश में काज बनाया,
मुद्दतों तक मैनें अपनी
ख़ामोशी को आवाज बनाया।

दूर ही रहना भला है उससे
जो मेरी नज़र से टूट चुका,
यही रहेगा जीवन का नियम
वो कल भी था जो आज बनाया,
मुद्दतों तक मैनें अपनी
ख़ामोशी को आवाज बनाया।

क्या बोलूँगा मैं उस बधिर को
सुनना, न सुनना एक बात है,
भूल हुई जो मैंने उसको
इस मन का सरताज बनाया,
मुद्दतों तक मैनें अपनी
ख़ामोशी को आवाज बनाया।

स्वरचित-राकेश ललित






मैं और तुम चुपचाप रहे
और करती रही चाँदनी बात...

थे खामोश सितारे भी
और चलता रहा चाँद चुप साथ
बारिश की रिमझिम भी चुप थी
नदिया बहती थी चुपचाप...

लब तेरे खामोश रहे 
और बोल पड़ीं आँखे सब बात
मैं और तुम चुपचाप रहे
और करती रही चाँदनी बात...

खामोशी है कोई साज
हम तुम कोई धुन बन जाऐं
खामोशी में है अल्फाज
आओ हमतुम मिल कर गाऐंं...

बेकरार है बात करने को 
जुगनू की आ गई बरात
मैं और तुम चुपचाप रहे
और करती रही चाँदनी बात...

रजनी भी खामोश रही
और चुपके प्रात चली आई
सूरज की बाँहों से पिघली
किरण बहार चली आई...

शब्द रुके से है होठों पे
आँखों से होती बरसात
मैं और तुम चुपचाप रहे
और करती रही चाँदनी बात...

चुपके से दिल मिल जाते है
खामोशी से हो जाता प्रीत
मधु कलश ले खिल जाते हैं
भ्रमर सदा फूलों के मीत...

चुप चुप दिया बाती जलते
जलता रहा पतंगा साथ
मैं और तुम चुपचाप रहे
और करती रही चाँदनी बात...

स्वरचित 'पथिक रचना'





#खामोश लफ़्ज और बोलती निगाहें।
न कह कर भी बहुत कुछ कहती है।
तेरे मन की अनकही परतों को यूँ ही,
अनायास मेरे सामने खोल देती है।
तेरा-मेरा रिश्ता है यूँ कुछ खास,
बिन अधरों को खोले #खामोशी से,
कह जाता मुझे तेरे दिल का हाल।
हाँ!.... ...ये एहसास ही तो है,
तेरे लिए मेरे जज़्बात ही तो है।
#खामोश निगाहों को मैं पढ़ सकूँ।
अनकही बातों को मैं, समझ सकूँ।
भावों से भरा है मेरा अंतर्मन,
ईश्वर ने जोड़ा तुझसे यूँ संग,
#खामोशी से पढ़ रहा हूँ मैं,
तेरे भावों को, अनकहे अल्फाज़ो को।
तुझ पर भी चढ़ रहा मोरा रंग,
आज नही तो कल तेरे अधर खुलेंगे,
#खामोश लफ़्ज भी यह कह उठेंगे।
अपने आप से मैं अब बेगानी हुई
प्रेम में..... मैं तेरी दीवानी हुई,
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....
जैसे श्याम दीवानी मीरा जोगन हुई....

©सारिका विजयवर्गीय"वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)





झूठ के शिकंजे में कहीं 
जब आत्मा घबराती है 
शब्द हो जाते अर्थहीन 
"खामोशी" उतर आती है 

छुपाती है आँसू कहीं 
जब दर्द में भी मुस्काती है
कड़वे घूँट पीकर भी 
"खामोशी" रिश्ते बचाती हैं 

ईच्छा या कामनाएं कहीं 
जब बाहर ही रह जाती है 
निर्विकार द्वार खुलते ही 
"खामोशी" भीतर आ जाती है 

हैवानियत के हाथों कहीं 
जब लुटती है अस्मिता 
गरिमा बलि चढ़ जाती है 
"खामोशी" खल जाती है 

देश की गरिमा कहीं 
जब दाँव पे लग जाती है 
देशभक्त जिन्दा हो उठता है 
"खामोशी" मर जाती है 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे




"खामोशी"
छोड़ गया है तू जबसे,
आँसू बने गमों की दवाई हैं,
झूठा साथ सभी का यहाँ,
सच्चे साथी खामोशी और तन्हाई हैं,
हर जज्बात उतार कागज पर,
हर रोज एक नग्मा तैयार किया,
रहकर हमने खामोश,
हर दर्द अपना बयाँ किया,
इन खामोश निगाहों को,
पढ़ले ऐसी कोई नजर नही,
तेरी यादों के रंग में रंगी हूँ आज,
मिटा दे इन्हें किसीकी बातों में वो असर नही।

स्वरचित-रेखा रविदत्त



मूक अधर वाचाल निगाहें,
अजब ग़जब खामोशी चारु,
कठिन ज़रा खामोश जुबाँ,
अभिव्यक्ति करें खास निशाँ।

शब्दहीन खामोशी अन्तर्गत,
नीरवता में उद्विग्न अधीरता,
एकटक देख शून्य की ओर,
आकुलतामय तनिक प्रतीक्षा।

खामोशी चारु विलक्षण अति
किंचित रहस्ययमय भूतल पर,
नाराजगी तनिक हदय संचित,
अपनत्व भरी यह खामोशी।

दिल में एक शोर बना रहता है,
खामोशी के भी आलम में,
तूफ़ानों के पहले जैसी ही,
दस्तक निश्चित खामोशी में।

इज़हार प्यार का खामोशी में,
ढूँढा जाता है प्रायः धरा पर,
पर हर खामोशी के अन्तस में,
कहाँ छुपा होता इकरार।
--स्वरचित--
(अरुण)



दिल की बात को हमने कोरे कागज पर लिख दिया 
खामोश भी रहे और बहुत कुछ कह भी दिया .


ये ज़रूरी नहीं हैं हर बात जबां से की जाये 
ख़ामोशी भी कभी कभी दिल की बात बयां कर देती हैं .

मोहब्बत की गलियों में जिस दर्द-दे दिल 
ने कोहराम मचाया था 
बेवफा होकर वो दिल खामोश हो गया .

उसने जब अपने इश्क का ईजहार किया 
तब हमारे लबों में ख़ामोशी छा गई .

हमारी इस ख़ामोशी का दुनियाँ वालों 
ने ऐसा तूफ़ान मचाया 
हमारी ख़ामोशी ही इश्क की गलियों में बदनाम हो गई .

हमने जो किया खामोश होकर किया 
हमारी ख़ामोशी ही इश्क का अल्फाज बन गई .

खामोश होकर कुछ कह भी नहीं पाये
और उनके इश्क में ख़ामोशी से दूर हो गये.

उनकी जुदाई के गम में हमने अश्क बहाये
खामोश होकर हर दर्द को सहा.

दिल भी टूटा हमारा जब वो किसी और के हो गये
हमारी ही ख़ामोशी ही हमारी दुश्मन बन गईं और 
दर्द ख़ामोशी का हमें उम्र भर का दे गईं.
स्वरचित: - रीता बिष्ट

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