Wednesday, September 26

"तृष्णा"26सितम्बर2018





मेरी रचना 'बढ़ जाती है और तृष्णा
तृषित चातक सम मन

भटकता सदा इस संसार में

तृषा स्वाति बूंद की

है कभी मिटती नहीं

बढती जाती तृष्णा नित

अग्नि सम धधकती हुई

अनभिज्ञ है मन उस ज्योति से

जो हृदय में है जल रही

नहीं मिलता वह ज्योति पुंज

जो हृदय में है छुपा

ढूंढता फिरता उसे मन

ऐसे इस नश्वर संसार में

जैसे कस्तूरी मृग वन में

फिरे कस्तूरी को ढूंढता

मोह का अंधकार घना

लोभ का बढा मायाजाल है

संतोष और धैर्य से

मन हुआ कंगाल है

ध्यान की बात मन में कभी आती नहीं

तृष्णा से मुक्ति तभी तो मिल पाती नहीं

ढूंढती ही जा रही होके मैं बावरी

डूबकर माया में तृप्ति रस की गागरी

सांसारिकता की मृगमरीचिका

ध्यान अपनी ओर खींचती

बढ जाती है और तृष्णा

जब तक ज्ञानज्योति जलती नहीं।

अभिलाषा चौहान (स्वरचित)



हावी न होवे मन में तृष्णा
ओ मेरे राम ओ मेरे कृष्णा ।।
यही एक वर मांगूँ मैं तुमसे
सीखें सदा संतोष में हंसना ।।

तूँ ही मेरा आधार है
मन में हजार विकार है ।।
वशीभूत न हो मन उनमें
बन कर रहना पतवार है ।।

मृग तृष्णा में है हर कोई
संतो ने भी संतई खोई ।।
मेरी क्या विसात ''शिवम"
माया नाच नचावन होई ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 26/09/2018


रश्मि रथी की ज्योत्सना ने ,
उर अंतस मे जगायी सोयी तृष्णा ।
हिय मे व्याकुल सारस ,
प्रिय प्रवास को ।
ज्यों बौराया चातक स्वाति नक्षत्र की 
एक बूँद को ।
बावरा पथिक मृगतृष्णा मे ,
पाकर राह ,अपनी ही सुध खोता है ।
दिनकर संध्या की बाहों मे घिर ,
विश्राम पल भर पाएगा ।
अतृप्त तृष्णा अनंत यात्रा पर फिर निकलेगी 
ईच्छा का नहीं कहीं ,
कोई ठौर है ।
(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई, दुर्ग



ये जीवन एक छलावा है, 
तृष्णा का बडा दरिया है, 
डूब गया जो इसमें कोई, 
कहाँ फिर वो निकल पाया है |

मरूस्थल की मृगमरीचिका, 
तृष्णा को बहुत बढ़ाती है, 
गागर भरने जायें जब, 
बस रेत ही हाथ आती है |

ये तृष्णा तो है भ्रम का सागर, 
जिसमें डूबा जीवन सारा, 
क्या कुछ पा लूँ उसके बदले, 
बस मन में संघर्ष चलता है |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



मोहमाया तृष्णाऐं सभी,

हैं सब जीवन के जंजाल।
लिपटा रहता मन सदा,
ये हैं सबसे बडे भ्रमजाल।

आज चाहता खडा हो पाऊँ।
कल सभी सोपान चढ जाऊँ।
मिले मुझे आज घर बंगला,
कल सुंन्दर सी कार चलाऊँ।

नहीं छूट सकते तृष्णाओं से,
जबतक अपने प्राण नहीं छूटें।
कितना भी हम नकारें सच्चाई,
ये तृष्णाऐं तो सबके मन लूटें।

चैन कहाँ मिलता है जबतक,
अपनी इच्छाऐं पूरी नहीं होती।
फंसते मकडजाल में तृष्णाओं के,
मरते दम तक पूरी नहीं होती।

स्वरचित ः
इंंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

हाइकु 
1
संतान तृष्णा 
मातृत्व की गरिमा 
तृप्त आँचल 
2
ये मरीचिका 
नयन भ्रम जाल
अतृप्त तृष्णा 
3
मायावी तृष्णा 
ये नश्वर जगत् 
है मरीचिका 
4
भौतिक जग
है आजीवन तृष्णा 
माया छलना
5
धर्म की तृष्णा 
जगत् कल्याणार्थ 
सेवा निःस्वार्थ 
6
अध्यात्म तृष्णा 
दैविक आशीर्वाद 
जीव उद्धार 
7
रेत का महल
जीवन मृग तृष्णा
झूठी है आशा 


 भिक्षुक मानिंद मनस हो जाता,
तन भिक्षा के पात्र सदृश,
गहन सुतल पर मानस के यदि,
तृष्णाओं का वास सघन।

आशान्वित उत्कट इच्छा,
आकांक्षा मन की तनिक प्रबल,
रुप अंतरित करे स्वयं का,
तृष्णा तनिक सघन हो जाती।

आसक्ति का पर्याय मात्र,
तृष्णा कष्टों का मूल जगत में,
मानवीय जीवन पर्यन्त,
अन्तहीन तृष्णा अस्तित्व।

एक निबन्धनी के समान,
सहज सकल भूमण्डल मे,
सम्बद्ध सदा रहती यह तृष्णा,
अत्याकर्षक से अर्थ लोभ में।

आकंठ डूबता जो भी मानव,
तृष्णा की इठलाती सरिता मे,
जन्म -मरण चक्रानुक्रम से,
मुक्ति कदापि नहीं पाता वह।
--स्वरचित--
(अरुण)


जाने कौन तृष्णा थी मन की
मंत्र मुग्ध हुआ तुम्हें पाकर
जीवन सुशोभित किया मेरा
जीवन संगिनी बनकर,
सदियों से था प्रतिक्षीत जीवन,
तृप्त कर दिया तुमने आकर

भर अश्रुधारा नयनन में,
प्रवेश किया इस जीवन में,
भ्रम के अंधियारे थे जीवन में
दूर हुए अब भ्रम के अंधियारे,
सास्वत साथ तुम्हारा पाकर

साथ अपना देकर मन को
तृप्त कर दिया तुमने आकर
सदा रहो मेरे अंतर्मन में
तुमसे ही प्रीत है जीवन में
हुआ धन्य जीवन तुमको पाकर

जब आयी तुम मेरे जीवन में
गूंज उठी दशों दिशाएं,
भर आये रंग चमन में,
जब तक सांस है मेरे इस तन में
सदा रहूंगा साथ इस जीवन में

स्वरचित :- मुकेश राठौड़



तुम्हारे सिवा नहीं कोई तृष्णा 
-----------------------------------------

मोहब्बत है मुझे 
तो सिर्फ तुमसे,
दिल में बसाया अपने
तो सिर्फ तुमको,
अब जीना है तुमसे 
और मरना भी तुमसे,
दिल में भरे उमंग 
मन की चांदनी तुम, 
गम का सैलाब, 
खुशी का तूफान तुम, 
जिंदगी की हर एक 
हकीकत तुम, 
होंठो की मुस्कान 
और हर ख्वाब तुम, 
तुम्हारे सिवा चाहत नही मुझे 
किसी और वस्तु की,
तुम हो जीवन में तो 
भ्रमित नही कर पाएंगी
जगत की कोई भी मृगतृष्णा।

--रेणु रंजन
(स्वरचित )


मन की तृष्णा 

क्या हैं मन की तृष्णा हर मानव की अलगअलग होती हैं तृष्णा 

कोई एक जल की बूँद से हो जाये पूरी कोई सागर से भी ना भर पाये.

हर पल जीवन में भर्मित होती हैं तृष्णा 
जिसे रोक पाना हैं मुश्किल जाने ये कैसी हैं तृष्णा .

लिखना ही मेरी तृष्णा हैं लिखना ही जूनून हैं 
लिखकर अभिव्यक्त करना तृष्णा हैं .

तृष्णा मन की चाहत बन गई मेरी 
आरजू बन गया हैं प्रयास कैसी हैं ये मन की तृष्णा जो एक बूँद जल से दरिया बन गया हैं .

तृष्णा हैं जीवित हर पल मन में 
जल रही हैं दिल के महखाने में दीप की तरह .

विस्मित हूँ कैसी जागी हैं ये मन की तृष्णा 
क्या बन गई हैं मोहमाया ये मन की तृष्णा .

एक पल मुझे उधार दे दो ऐ जिंदगी सवंर जाऊँगी
नहीं हैं मन तृष्णा सागर को पाने की एक बूँद जल से भर जायेगी मन की तृष्णा .

मन की तृष्णा हर राह देखती हूँ 
कभी तो पूर्ण होगी मेरा खुद का वजूद और पहचान बनाने की तृष्णा .
स्वरचित:- रीता बिष्ट



जाए जाते है
एक 
अतृप्त "तृष्णा" लिये
मरीचिका के पीछे
एक 
हताश दौड़ 
लिए भय मृत्यु का 
ढ़ोते हुए जीवन 
जिए चले जाते है 

खो रहे सब कुछ
कुछ पाने के लालच में
दबाये प्रसन्नता मिथ्या
खींचे चले जाते है

न जानते स्व को 
न जानना चाहते हैं 
लिए कल्पनाएँ असीम 
खोये चले जाते हैं 

लब है गुलिस्ताँ से
है 
सोतों से छलकता जीवन
समझे रेगिस्तां इसे
भटके चले जाते है

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


सब कुछ है तेरे पास
भटक रहा क्यों मनु तु आज
और और की चाह में
भटक रहा तु र्माग से

तृष्णा रूपी वेताल को
घुम रहा क्यों पीठ पर लादे 
थोड़ी देर के लिए यह हट भी जाये
लौट तुरंत यह फिर आये भागे

सब कुछ पाने के बाद भी
तृष्णा के होके वशीभूत
हो रहा तु सुख के अनूभूति से वंचित
क्यों न समझे मनु तु?

असली खुशी तो अंदर है
नही है वो बाहरी परिवेश
तृष्णा है मन की नशा
और और की चाह है ये

चुनाव हमें ही करना है
अपनाना है आनंद का र्माग
या अपनाना है तृष्णा का र्माग
राग विराग भरा जीवन में

तृष्णा जन्म लेते अनेक
पथभ्रष्ट होते देर न लगे
स्वविवेक न खोये हम
तृष्णा के वशीभूत होकर

जयचंद्र न बने कोई आज
लाजिमी है तृष्णा होना
पर थोड़ी सी संयम से
बाहर निकल आये हम

नाश्वर है जग अपना
क्षणभंगुर हैं जीवन ये
स्वविवेक जगा ले हम तो
भाग जाये तृष्णा ये आप।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।


पल-पल फिसलती जिंदगी से
मोह क्यूँ बढ़ने लगा
लालसा जीवंत होती 
साध कुछ पलने लगा

बढ़ रही इस उम्र में क्यूँ 
कामना की तिश्नगी
हो रहा व्याकुल हृदय क्यूँ 
भावना कैसी जगी

चाहतों की मस्तियों में 
भांग सा चढ़ता नशा
हर घड़ी बढ़ती रही
कुछ प्राप्त करने की तृषा

आँख में भर कर उमंगे
ले रही तृष्णा हिलोर
कल्पना की क्यूँ तरंगे
कर रहीं मन को विभोर

मीठी-मीठी अभिलाषाएं 
विहँस रही हैं चारों ओर
कितनी मधुर मंगल आशाएंं 
चूम रहीं हैंं पथ चहुँ ओर

माना टूट जाना है इक दिन
जीवन का यह कोमल तंतु
हुई दग्ध इस पीड़ा से मैं
क्षीण हो गया देह परन्तु

जीवन की यह अगणित तृष्णा
प्रतिपल बढ़ती जाती है
जन्म मिला है मानव का 
तब प्यास नहीं बुझ पाती है...
******************
स्वरचित 'पथिक रचना'


विषय- तृष्णा
1

तृष्णा बंधन
जीवन है सागर
खोजते सुख
2
तृष्णा का रूप
भ्रम का अंधियारा
जीवन सारा
3
प्रेम तृष्णा
करती आनंदित
भ्रमाती मन
4
करती व्यक्त
प्रणय की तृष्णाएँ
दुल्हन नई
5
दामिनी घन
तृष्णा बनी बरखा
कृषक दुखी

स्वरचित-रेखा रविदत्त



हे कृष्ण!!अजब मन तृष्णा जाल में फंसा
कुछ अस्पष्ट इच्छाओं में मन है रमा
जानते,समझते भी, लहरों में हम फंस रहे
गज़ब का मायाजाल है इसका ,चाह कर भी इससे न निकल रहे।
हे कृष्ण!!तृष्णा की लीला बड़ी बेमानी है
अंधकार है आगे,तब भी जाने की लालसा प्रबल हमारी है।
हे कृष्ण!!हम वैरागी कहाँ जो तृष्णा से निकल पाएं?
कुछ अतृप्त आकांक्षाओं की 
तृप्ति की खातिर
मकड़जाल में इसके हम फंसते चले जाएं।
हे कृष्ण!!गहन विचार -विमर्श मैंने तुमसे किया
अथाह पोथियों,वेद-पुराणों के ज्ञान को
समाहित खुद में किया
परन्तु हे कृष्णा!!
सच कहें.....
कलयुग की मार में,तृष्णा हावी है
अनगिनत अभिलाषाओं को तादात बढ़ती हमारी है।

वीणा शर्मा
स्वरचित


सबके मन मे हे कृष्णा, 
बसती है मृग तृष्णा, 
कैसी मन मे ये प्यास है, 
समझ नहीं पाया प्राणी कृष्णाl

तृष्णा थी एक सुंदर कन्या, 
पिता की नहीं संतान अन्या, 
बहुत प्यार से रखते उसको, 
कभी नहीं दुःख देते उसको l

उसके मन मे थी इक प्यास, 
जीवन बने मधुर और खास, 
राजकुमार से ब्याह रचाउ, 
जीवन के हर सुख पा जाऊंl

एक दिन गावँ मे एक युवा आया, 
देखा तृष्णा को मन ललचायl
बोला उसको प्रेम करे है, 
उसी से गठबंधन चाहे है l

तृष्णा फंस गयी प्रेम जाल मे, 
खुश हुवा वो देख इस हाल मे, 
माँ बापू नहीं मानेगे तो, 
भाग चलो अब इस जनजाल से l
दूर कहीं जंगल मे लाया, 
अपने मित्रो को भी बुलाया, 
उसकी इज्जत कर दी तार तार, 
प्रीत को भी बदनाम करवायाl

सुनलो मेरी बिटिया प्यारी, 
माँ बाबा की राज दुलारी, 
हम नहीं है शत्रु तुम्हारे, 
करेंगे तेरी ही रखवाली l
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित 
देहरादून

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