Friday, October 5

"इंतज़ार"04अक्टूबर 2018


"इंतज़ार "
खो जाऊँ बातों में तेरी
उन लम्हों का इंतजार 
करती हूँ 

झुका लूँ जो पलकें अपनी
उन नजरों का इंतज़ार 
करती हूँ 

महका दे जो बगिया मेरी
ऐसी खुशबू का इंतज़ार 
करती हूँ 

भर जाये रंगों से जीवन मेरी
ऐसी सादगी का इंतज़ार 
करती हूँ 

रातों को चुरा ले जो नींदें मेरी
उन सपनों का इंतज़ार
करती हूँ 

सोचते ही खिल जाये होठ मेरे
उस नाम का इंतज़ार 
करती हूँ 
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल





कोई आकर्षण था
उसकी आंखों में
या कोई लगाव
उस अनदेखे चेहरे से
जब भी गुजरती मैं
उसकी गली से
खिड़की से झांकती
उसकी बैचेनी भरी आंखें
जैसे वो मेरा ही
इंतजार कर रहा हो
कोई राज छिपा था
उसकी आंखों में
अक्सर ठिठक जाते थे
मेरे कदम देखकर
उसकी आंखों को
कुछ कहना चाहती थी
पर कह नहीं पाई
कोई बंधन रोके था
अब जब नहीं दिखाई
देती मुझे उसकी आंखें
तो एक बैचेनी लिए
गुजरती हूं अब भी
उसकी गली से मैं
इस इंतजार में शायद
फिर नजर आ जाए
छिपकर देखती आंखें
तो इस बार पूछूंगी
उसकी बैचेनी का राज
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना


🍁
इन्तजार मे आज भी ,,
देखूँ तेरी राह।
क्यो नही आते साँवरे,
राधा देखे राह॥
🍁
उस पथ पे वो आज खडी है,
जिस पथ गए थे श्याम।
निरखत नैना आज भी देखे,
गिरधर तेरी राह॥
🍁
वृन्दावन की कुँञ्ञ गली मे,
दिखता नही है प्यार।
हर नर-नारी वृक्ष पशु सब,
कृष्ण का करे इन्तजार ॥
🍁
शेर की आँखे राह तकत है,
आवत पिय की याद।
कोई कुछ भी आस बँधाए,
पर मिटे ना हिय की प्यास॥
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf



पल पल तेरा इन्तजार है

जाने क्यों दिल बेकरार है ।।

तेरी एक हँसी नजर का
गाया न अब तक खुमार है ।।

तेरी ही यादों में दिल को
जाने क्यों मिलता करार है ।।

क्या दिन महीने बीते बर्षों
जरा भी कम न हुआ प्यार है

जाने कैसी ''शिवम₹ ये उल्फत
बस इन्तजार बस इन्तजार है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 04/10/2018


*******
मेरे साँवरे,

अनथक, अपलक
निहारती हूँ तुम्हारा पथ
लिए हूँ हाथों में पुष्पहार।
कर रही हूँ तुम्हारा इंतजार।।
जा बसे हो तुम परदेश,
न कोई पाती न सन्देश।
बागों में खिल उठी है कलियाँ,
तुम्हारे बिन सूनी हैं गलियाँ।
मेरे मन के अंदर लेकिन,
चल रही है पतझड़ी ब्यार।
कर रही हूँ तुम्हारा इंतजार।।
वादा किया था तुमने,
एक दिन लौट के आओगे।
मेरे मन के मधुवन में ,
फिर से रास रचाओगे।।
आशाओं के दीप जलाकर
कब से खड़ी हूँ द्वार।
कर रही हूँ तेरा इंतजार।।

स्वरचित
रचनाकार 





इश्क़ कर बैठे उनसे बेपनाह, 
इंतज़ार करना जुल्म ढ़ाता है, 
और वो इसे अपनी अदा समझ बैठे, 
इंतज़ार में उन्हें बड़ा मजा आता है |

तेरे दीदार को आँखें बिछाये बैठे हैं ,
इंतजार में बीत गई सुबह से शाम, 
न तु आया न ही आया तेरा पैगाम, 
अब तो बेचैनी हो रही सनम बेलगाम |

कोई ऐसी निशानी दे जा सनम, 
तेरी ग़ैरमौजूदगी में देखें जिसे हम, 
ताकि ये इंतज़ार थोड़ा हो जाये कम, 
दिल को सुकून मिले,गम हो जाये कम

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



खड़ी हूं स्टेशन पर आज मैं तेरे इंतज़ार में
क्या कोई कमी रही प्रियवर मेरे इकरार में

आसमान में देखो काली घटाएं छाई है
याद फिर से आज तेरी बहुत आई है

घर से तो निकल आई सब छोड़ के
जिया नहीं जाता अपनों से नाता तोड़ के

तुम न आए जो तो कहां फिर जाऊंगी
याद रखना फिर कभी नहीं मिल पाऊंगी

किये जो वादे सनम कहीं वो तोड़ ना जाना
मुझे यूं इंतजार करते तुम छोड़ ना जाना

इति शिवहरे
औरैया





है मूक जैसे रमणी,
रजनी पिघल रही है।
अंतर्मन की व्यथा,
शबनम में ढल रही है।

मन का अंबर सूना,
नैना हैं रीते - रीते।
बैठी अकेली कब से,
प्रहर ये कितने बीते।

रात की नीरवता,
तन - मन पर है छायी।
निष्ठुरता प्रिये ये तेरी,
मुझको तनिक न भायी।

मुग्ध होकर कैसे,
हरशृंगार झड़ रहा है।
महकी हुई फिजाएँ,
सौरभ बिखर रहा है।

करता पल को बोझिल,
ये इन्तजार तेरा।
देख टूटती आशाएँ,
आता हुआ सवेरा।

स्व रचित
उषा किरण



दिल की दरीचों से आह निकलती है...
एक खिड़की पुरानी बंद सी पड़ी खुलती है....
रंग रोगन की पपड़ियों में दरारें सी पड़ चुकी हैं...
जैसे बारिश में भीगी सहमी सी खुलती है....
एक खिड़की पुरानी बंद सी पड़ी खुलती है....

पाट हैं कि जरजर से झरते जाते हैं...
एक कुंडा है बस जो अभी भी लटका है ...
शायद…. इंतज़ार में अटका है...
कभी आये कोई संवारने वाला...
ज़िन्दगी मेरी संभालने वाला.....
शायद........

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
०४.१०.२०१८



विधा :- लघु कविता

है इंतजार 
भ्रष्टाचार मुक्त भारत का
रिश्वत की आड़ में होते अत्याचारों से,

है इंतजार
आतंक मुक्त भारत का
रोज शहीद होते जवानों की चित्कारों से,

है इंतजार
सुरक्षित भारत का
रोज होते बलात्कार और घरेलू अत्याचारों से

है इंतजार 
उन्नत भारत का
कर्ज के बोझ से तड़फते किसानों की चित्कारों से

है इंतजार
श्रेष्ठ भारत का
रोज होते जात धर्म के झगड़ों से,

है इंतजार 
उत्कृष्ट भारत का
गरीबी और भुखमरी से लड़ते लाचारों से

स्वरचित :- मुकेश राठौड़





*******
मानव जीवन नदिया धारा सा,
सदा अग्रगामी सुख- दुख संग,
कालचक्र की गति अति द्रुत,
करे कदापि नहीं इंतज़ार।

पल सा लघुतम शब्द मात्र यह,
किन्तु सिन्धुवत गहन अतीव,
इंतजार में निहित धैर्य अति,
फल मधुरिम का चारु प्रदायक।

सदा काल की द्रुत धारा संग,
गतिमय रहना श्रेयस्कर अति,
अनुकूल काल का शान्तिपूर्वक,
इंतजार सर्वोत्तम विकल्प।

कालगति के मध्य मनुज हित,
इंतजार शुचि अल्पविराम सा,
सदुपयोग अनुकूल समय का,
इंतज़ार का शुभतर परिणाम।

मानव जीवन में इंतजार शुचि,
महत्त्वपूर्ण सा पक्ष चारु एक,
परिवर्तन अनुकूल हितैषी,
प्रघटित करता शुचि इंतज़ार।
--स्वरचित--
(अरुण)





(1)
निश्छल मन
इंतजार की हद
प्रेम अगाध।

(2)
है इंतजार 
सुखद एहसास 
प्रिय प्रवास।

(3)
मन व्याकुल 
इंतजार कठिन 
दिल यकीन।

(4)
मन का बोझ
इंतजार अमोघ
हर्षातिरेक।

(5)
दिल की बात 
प्रिय का इंतजार 
धूले जज्बात।

(6)
सागर बीच 
लहरें इंतजार 
प्यासा है मन।

(7)
सुखी भावना 
इंतजार उसका 
होगा सबेरा।

--रेणुरंजन 
(स्वरचित )




इंतजार की घड़िया हूई समाप्त
हम सब मिल करें भक्ति ध्यान

माँ दुर्गा हैं आने वाली
आधि,व्याधि है हरने वाली

पंडाल सजेगें भक्त घूमेंगे
गूंज उठेगा भक्ति गान
पर अभी हमें है इंतजार
उस घड़ी का

जिस दिन होगा वास्तव में बुराई का अंत
और होगा असत्य पर सत्य का विजय
जब दिखावे व आडंबर से दूर होगी हमारी पूजा
और हम करेंगे सिर्फ भाव से पूजा

जब नारी को सचमुच देवी मानेंगे
सिर्फ पन्नों में नही वास्तव में उन्हें
सम्मान देगें
हमें इंतजार है उस काली रात की सुबह का
जब होगी भूर्ण हत्या बन्द
सबको होगा जीने का समान अधिकार

इंतजार है मुझे उस घड़ी का
जब सबका लक्ष्य सिर्फ एक होगा
सबका साथ सबका बिकास
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव



नारी का खास 
रिश्ता है इससे 

कभी पति 
तो कभी बच्चो 
कभी बच्चे की नौकरी का 
कभी बहु का 
तो कभी दामाद का 
कभी सास -ससुर 
तो कभी माँ -बाप 
की अच्छी सेहत का 
सदा रहता इंतजार 
औरत की जिंदिगी 
इंतजार का ही नाम है 
नव वधू बनने से लेकर 
बुढ़ापे तक करती है 
वो सिर्फ इंतज़ार 
स्वरचित 
शिल्पी पचौरी





इंतजार की चाह अब मिट गई हैं 
तन्हा और खामोश रहने की आदत सी बन गई हैं 
ना किसी सी कोई शिकवा हैं ना शिकायत 

बस जिंदगी बेरुखी सी हो गई हैं .

इंतजार हैं मुझे उस शाम का जब याद तेरी आती हैं 
बरसों से आँखें बिछाये बैठी हूँ राह में तेरे आने की 
एकटक निहारती हूँ उस दीवार को जब तेरी याद आती हैं 
इस राह में अभी इंतजार में बैठी हूँ .

तेरी राह तकती हूँ 
एक कदम तो आगे बढ़ो बेखौफ होकर 
बाकी फासले खुद मिट जायेंगे 
क्योंकि मैं खड़ी हूँ तेरे इंतजार में .

एक युग गुजर गया 
कई सदियाँ बीत गई 
चली इश्क की हर ओर पुरवाई फिर चली जाती हैं 
मैं फिर भी तेरे इंतजार में आँखे बिछाई खड़ी हूँ .

नजर चाहती हैं सूरत तेरी देखना 
दिल चाहता हैं इश्क करना 
क्या बतायें हाले-ऐ -दिल 
नसीब में लिखा हैं इंतजार करना .
स्वरचित :- रीता बिष्ट




"इंतज़ार "
हाइकु 
♥️
बेबस खड़ी 
इंतजार की घड़ी 
तपस्या बड़ी 
♥️
प्रेम की आशा
मन में इंतजार 
मिली निराशा
♥️
प्यासे नयन
चाहत इंतजार 
है ऐतबार 
♥️
माँ दुर्गा आई
दिन का इंतज़ार 
खुशियाँ लाई
♥️
विद्यार्थी शिक्षा 
भविष्य की परीक्षा 
फल प्रतीक्षा 
♥️
स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल





प्रिय का करती इंतजार

हृदय हो रहा बेकरार

इक पल को नहीं करार

कब पूरा होगा इंतजार।

धीरे-धीरे गई रात गुजर

दिन के बीत रहे प्रहर

प्रियतम की नहीं कोई खबर

कैसे करूं उनका इंतजार !

घर-बाहर कहीं चैन न आवे

राह तकूं मेरा जी घबरावे

अब तो आओ प्रियतम प्यारे

अब और न होगा इंतजार।

तभी ईश्वर ने सुनी पुकार

प्रियतम छवि प्रत्यक्ष साकार

प्रेम मिलन ने लिया आकार

अब खत्म हुआ था इंतजार।

अभिलाषा चौहान

स्वरचित




मानव जीवन
कभी प्रसन्न 
कभी उन्मन
सतत अपूरित मन
इंतजार ही धन
इंतजार किसी का
फिर उससे मिलन
सतत मिलन बने
ऊब का कारण
किसी और का इंतजार 
कुछ और का इंतजार 
इंतजार ही इंतजार 
जीवन बस इंतजार। 
-------सुरेश------




पिया जाये रहे समुन्द्र पार, 
आऊंगा जल्दी से इस बार, 
माँ बाबू का रखियो ध्यान, 
उनके आशीष मे ख़ुशी अपार l

अभी ना जाओ इस बार, 
ख़ुशी कर रही इंतजार, 
उसको मिल कर ही जाना, 
आने वाली आंगन मे बहार l

परदेश जाकर भूल जाते, 
यहाँ सुध बुध भी न मेरी लेते,
ख़ुशी तुम्हारे बिन बेकार, 
पांच साल मे सुध तुम लेते l

पिया चले गये फिर इस बार, 
दिया जन्म प्यारी ख़ुशी बहार, 
पर जान उसकी नहीं बच पायी, 
नैनो मे ले गयी पिया का इंतज़ार l 
कुसुम पंत 'उत्साही '
देहरादून 
उत्तराखंड



भीगी पलकों की कोरों से ,छलकती यह कहानी
आने वाले पल को बाँधे, जाती है पेशानी।

माता शिशु के इंतज़ार में,नौ महीने बिताती।
प्रेम पुष्प जब खिल कर आता,बगिया झूमे गाती
मात-पिता की पलकें गीली,इंतज़ार नूरानी।
भीगी पलकों की कोरों से ,छलकती यह कहानी
भीगी.........पेशानी।

सीमा रक्षक जब सीमा पर,चौकस रहता जागे।
इंतज़ार में नौजवान के,व्याकुल कुटुंब लागे।।
सैनिक प्राण करे न्यौछावर,देश कहे बलिदानी
भीगी पलकों की कोरों से ,छलकती यह कहानी
भीगी.........पेशानी।

जीवन की जब काल परिधि भी,लीलाएँ रच जाती,
इंतज़ार की घड़ियाँ हरदम,हँसकर कभी रुलाती।
अंत काल के इंतज़ार की,घड़ी सदा अनजानी,
भीगी पलकों की कोरों से ,छलकती यह कहानी
भीगी.........पेशानी।

स्वरचित
रचना उनियाल
बैंगलोर





इंतजार नहीं होता मुझसे ,
आ जाओ मेरे प्यारे सनम ।
दिन भर में राह तकु मै ,
मत तड़पाओ मेरे सनम ।।

इश्क़ का रोग लगा ,
मुझे सपने सुहाने आते है ।
साजन तेरी याद में ,
ये आँसू रोज आ जाते है ।।

सीमा पर तैनात हो आप ,
दिल मेरा धड़कता है ।
अजीब सा डर लगता मुझे ,
ये मन बहुत तड़पता है ।।

तेरे प्यार में पागल हूँ मैं ,
ये हिचकियाँ बहुत सताती है ।
तेरे मेरे मिलने के सपने ,
ये पगली बहुत सजाती है ।।

इंतजार मैं कर लूंगी सजना ,
भारत माँ की रक्षा करना ।
भले टूट जाए मेरी चूड़ियां पर ,
देश के लिये ही जीना मरना ।।

कवि जसवंत लाल खटीक
स्वरचित



" इंतजार"
मुझे इंतजार अपने उन दिनों का,
जिसमें पिया तेरा साथ हो,
उतरे चाँदनी मेरे अँगना,
और हाथों में तेरे मेरा हाथ हो,
बजे शहनाई मेरे अँगना,
खुशियों की बारात हो,
तेरे हृदय पटल पर नाम मेरा,
और बिन शब्दों के बात हो,
इंतजार ये हो गया लंबा,
कर कदर मेरे जज्बात की,
प्यार हमारा होगा ऐसा,
खाई जाएँगी कसमें अपने साथ की।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
4/10/18
वीरवार




इंतजार इंतजार हर कोई कर रहा है इंतजार
माँ कर रही है इंतजार पुत्र के आने का
जो विदेशी गलियों में कहीं खो गया है
वो तो अब विदेशी हो गया है।
प्रेमिका कर रही है अपने प्रेमी का इंतजार
जो उसे धोखा देकर हो गया है फरार
फिर भी कर रही है इंतजार।
माँ के गर्भ में बच्चा कर रहा है इंतजार
बाहर आने का रिश्तो को अपनाने का।
भक्त कर रहा है इंतजार कब मेरे प्रभु दरश दिखायेगे , और मेरी नैया पार लगायेंगे।
माँ कर रही है बेटी के विवाह का इंतजार
कब वो विवाह बंधन मे बंध जायेगी
और सुखद संसार बसायेगी ।
अस्पताल में मरीज कर रहे हैं इंतजार
कब मैं ठीक हो जाऊंगा और अपने घर को जाऊंगा।
जेल में कैदी कर रहे हैं इंतजार
कब जाऊंगा मैं बाहर।
इंतजार इंतजार हर कोई कर रहा है इंतजार।
पशु पक्षी भी कर रहे हैं इंतजार
कब हम चोला छोड़ जायेंगे और मानुष जन्म पायेंगे।
चाँद कर रहा है इंतजार अमावस के चले जाने का, ताकि वह भी चमक सके।
इंतजार इंतजार बस इंतजार
हर किसी को किसी ना किसी का है इंतजार।
कुछ ऐसा सच हो जाने का जो हमारी
कल्पनाओं मे व सपनो मे है।
इंतजार इंतजार बस इंतजार
हवाये करती है इंतजार किसी सुंगध के आने 
का ताकि वो भी सुगंधित हो सके।
मैं भी कर रही हूं इंतजार किसी अपने का
तुम भी कर रहे हैं हो इंतजार किसी अपने का
ये इंतजार ही तो है एक दूसरे के प्रेम का आधार है 
इंतजार दर्द है खुशी है गम है हम सबका हमदम है 
स्वरचित हेमा जोशी





भाग्य से अधिक व समय से पूर्व ना किसी को मिला है ना मिलेगा,,, लेकिन "इंतजार "
बिना जीवन अधूरा****
इंतजार ही जीवन है

कदमों को मंजिल का
छात्रों को परीक्षा फल का 
जीवन मे कर्मफल का 
धन को भलाई/दान का
इंतजार रहता है****
पक्षी को स्वच्छ गगन का
भौंरे को प्रभात का
वाहन को मुसाफिर का 
मुसाफिर को गंतव्य का
इंतजार रहता है****
धन को भलाई का 
भूखे को रोटी का
मुसाफिर को छांव का
सुखे में बरसात का 
इंतजार रहता है ****
अंधेरे में उजाले का 
मुसीबत में सहारे का
इंतजार रहता है****
मां को बच्चों का
पति को पत्नी का
पत्नी को पति का
भाई को बहन का
बहन को भाई का 
इंतजार रहता है ****
मनुष्य को सुंदर
सुखद जीवन जीने का
इंतजार रहता है ****
इंतजार की घड़ियां
कभी पूरी नहीं होती
जैसे भावों के मोती में 
सृजन का
इंतजार रहता है ****
इंतजार ही जीवन है****

स्वरचित आशा पालीवाल पुरोहित राजसमंद 04 /10/2018





अब अवकाश होके भी, अवकाश कहाँ रहता है? 
अब वो सुकून वाला, इतवार कहाँ रहता है? 

कामों की फ़ेहरिस्तें भी मुँह चिढ़ाती है मुझको, 
ढूँढ़ता हूँ यादों में, वो पुराना यार कहाँ रहता है? 

खुद से मिलने का भी बहाना लगा रहता है, 
खो ना जाऊं दुनिया के मेले में 
ये डर बना रहता है,
समय का हर पल भी, होता गया महँगा, 
इक सस्ते अवकाश का "इंतजार" बना रहता हैl

स्वरचित 
ऋतुराज दवे





इंतज़ार
हाथ में लेकर खड़ी 
द्वार पर 
प्रीत से पगा
प्रेम के रंग में रंगा
एक सुकोमल गुलाब 
सुबह से शाम
शाम से रात 
निहारती रही 
तुम्हारी राह 
किंतु खड़ी हूँ
अब भी वहीं 
जहाँ की तहाँ 
सूख गया 
मेरे रेशमी एहसासों सा 
सुकोमल , मुलायम गुलाब
रख लिया सहेज कर 
उसे अपने अन्तर्मन् की 
किताब के खाली पन्नों के बीच
कुछ निशान छोड़ दिये हैं उसने अपने होने के एहसास के साथ
जब भी खोलकर 
देखती हूँ उन खाली पन्नों को 
हो जाती हूँ सराबोर 
उस मखमली गुलाब की मदमाती महक से 
जिंदगी की अंतिम सांस तक
रहेगा जो बरकरार 
तुम्हारा इंतजार। 

पुनीता भारद्वाज भीलवाड़ा

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