Wednesday, October 24

" स्वतंत्र लेखन "21अक्टूबर 2018

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मैं न कोई धर्म गुरू हूँ मैं न कोई उपदेशक
मैं सबकी भावना का हूँ मामूली अन्वेषक ।।


मुश्किल हर दिल जीतना पर कोशिश करता हूँ
कभी वाह वाही लूटूँ तो कभी आह मैं भरता हूँ ।।

कितना कठिन कार्य एक सूत्र में पिरोने का 
सचमुच यह कार्य है मानो मुफ्त में रोने का ।।

किसे छोड़ूँ किसे समझूँ असमंजस में रहता हूँ
कभी इसकी कहूँ तो कभी उसकी कहता हूँ ।।

बिन पैंदी सा लोटा हूँ सदा लुड़कता रहता हूँ
चोट कुछ ज्यादा खाया अत: बकता रहता हूँ ।।

सुनके टाल दिया करो यारो जो मन न भाये बात
आसां नही लेखन कार्य आती बहुत मुश्किलात ।।

कहकर दिल का हाल ''शिवम"मन हल्का होता है
ऊहापोह न रहती पथ पक्का कल का होता है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"




बुरा वक्त 

अतिशा (छोटी सी बच्ची) सुबह-सुबह बाहर से खेल कर दौड़ती हुई अंदर आई | अंदर आते ही उसने अपनी माँ से खाना माँगा | माँ को पता था कि आज कुछ खाने को नही है, फिर भी वह रसोईघर में गयी और आटे के खाली ढोल को देखकर अपनी आँखों में आँसू भर आई|
माँ को रोते देख अतिशा बोली, ‘माँ तू रो क्यूँ रही है..?’ माँ ने जबाब दिया बेटा कुछ नहीं बेटा थोड़ा सा सर दर्द है | ठीक है माँ मैं अपने आप खाना ले लेती हूँ और आकर तुम्हरा सर दबा दूंगी अभी तो बहुत भूख लगी हुई है | वह रसोईघर में जाती है पहले तो ढ़ोल में, फिर इधर-उधर देखती है, जब खाना कहीं भी नजर नही आता तो वह अपनी माँ के पास वापस जाती है | जाकर कुछ बोलती इससे पहले माँ के आँसू ओर तेज हो जाते है | 
अच्छा ठीक है खाना नहीं देना मत दे माँ ... |
मैं स्कूल(आंगनबाड़ी) में जाकर खा लुंगी पर तूं रो मत माँ ..| अतिशा की ये बात सुनकर उसकी माँ उसे गले लगाकर फुट-फुटकर रोने लगी| लेकिन फिर एक दम चुप हो गयी ये सोच कर कि 'बुरा वक्त है तल जाएगा मैं हिम्मत नहीं हारूँगी।'
बस कर मेरी बच्ची, अब बस कर..... | आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि घर में कुछ खाने के लिए न हो | इतने में दरवाजे की घण्टी बजी। अतिशा की मां ने अपने आँसू पोंछ कर दरवाजा खोला)
एक औरत सामने थी । वह अंदर आयी और कुछ पैसे उसकी माँ के हाथ में थमा दिए | पूछने पर पता चला कि उन्होंने करीब एक साल पहले उन्हें एक सूट सील के दिया था | ये उसी के ही पैसे थे | 
अब अतिशा की माँ खुश थी | अतिशा अपनी माँ को खुश देख कर कहने लगी, 'माँ आपका सर दर्द सही हो गया' | 
'हाँ मेरी बच्ची सही हो गया|' मां ने मुस्कराते हुए कहा 

इस तरह इनका ये बुरा वक्त गुजर गया|

बुरा वक्त तो किसी पर भी आ सकता है | 
किसी का जल्दी तो किसी का देर से बीत जाता है |

लेखक: सुखचैन मेहरा




बेवफ़ाई 

आग़ोश में मोहब्बत की बेवफ़ाई का साया है 
जितना चाहा था तुम्हें उतना ग़म पाया है 
अऐ मेरे खुदा तुमने इस जहाँ में क्यों मोहब्बत बनाया है 
कहा सिर्फ़ बेवफ़ाई है जाने किसने प्यार निभाया है 
फिर भी कहेते है लोग कि प्यार खुदा है 
तो अऐ मेरे खुदा तू इतना बेवफ़ा है 
अब तो लगने लगा है मुझे की तेरी ही करामत में कोई ख़ता आई है 
इसीलिए तो प्यार का दुजा नाम बेवफ़ाई है ....

डॉक्टर प्रियंका अजित कुमार 
स्वरचित





सच्चा सुख बिकता नही बाजारों में,
मंदिर, मस्जिद या गुरूद्वरों में।
वह तो बस,बसा होता है यारों,
मासूमों की किलकारियों में।

जो चाहत है तुझे सच्चे सुख की,
बेशुमार प्यार और अपनेपन की।
तो यारा पाने के लिए सच्चा सुख,
निःस्वार्थ भाव से सेवा कर हर इंसान की।

बड़े -बुजुर्गों को देकर सम्मान
सभी से कर स्नेह का आदान - प्रदान
जो देगा तू बेबस नारी के चेहरे पर मुस्कान
तभी तो सच्चे सुख का तुझे मिलेगा वरदान।
तभी तो सच्चे सुख का तुझे मिलेगा वरदान......

© - सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर ( महाराष्ट्र)




वर्ण-पिरामिड 
रावण

(
1)
है 
राम 
प्रतीक 
धर्म जीत 
सत्य का तीर 
रावण मर्दन 
अहम का पतन 
(2)
है 
क्रूर 
आचार 
धर्म ह्रास 
सत्य लाचार 
पाखंड का नाच 
रावण जिए आज 

ऋतुराज दवे

( प्रतीकात्मक कटाक्ष की रचना है )
हर हाट,हर रात -क्या कहता है घोड़ा?

तगड़ा घोड़ा-
जवान होते ही
नित आ -जा रहा है
पींठ पर बोझा लादे
उसी रास्ते पर
हमेशा ,हर हाट
और-
उसकी नंगी पींठ से
काट रहे है उसे खूंनी डांस
और पी रहे हैं खूंन
हमेशा,हर रात
घोड़ा पैर पटकता है,आजादी के लिये।

भूखा घोड़ा -
पैसे कमवाकर 
तड़पता है वह
व्यापारी खर्राटे भरता है
घोड़ा बेंचकर
हमेशा ,हर हाट
और-
सुबह चल देता है घोड़ा
लादकर हजारों का मुनाफा
जो बोल भी नहीं पाता
चीखकर-दाने के लिये
हमेशा,हर रात
घोड़ा नथुने बजाता है, रोजी-रोटी के लिये।

सच्चा घोड़ा-
जगाता है उन्हें
जो मौन हैं
खटखटाकर ,शंखनाद-सा
क्रांति के लिये
हमेशा,हर हाट
और-
करता है संघर्ष,हजारों के लिये
रातभर जाग कर
जो चीख नहीं सकते
उन्हें नींद से उठाने
हमेशा,हर रात
घोड़ा पूंछ फटकारता है,हक पाने के लिये।
( मेरे कविता संग्रह "अनुगूँज " से )
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी,गुना(म.प्र.)




प्रकृति-अर्ध-आवरित,
सुरम्य मुख तेरा प्रिये,
अरविंद में जलबिंदु सा
घनबीच अर्धचंद्र सा।।

रजत सा शुभ्र मुख तेरा,
सुखद मृदुल वैभव मेरा,
विलोकता हूँ निर्निमेष,
प्रसन्नता उर में अशेष।।

ये मीन से चंचल नयन,
है देख होता उर विह्वल,
इनसे जो बरसे स्नेह,
हो प्राण पूरित देह।।

नयनों में डूबकर नयन,
करते प्रिय मौन सम्भाषण,
स्वत: कही, स्वत: सुनी,
मनभावों की कथा बुनी।।

केशों का बंधन सरस,
कर नैन से स्नेहिल परस,
यह कृष्ण-कोमल-कान्ति,
उर को मिली विश्रांति।।

इस केशपाश-बन्ध में,
तेरे हृदय स्पंद में,
यदि पा लूँ मैं स्थान,
धन्य हो जाऊं हे! प्राण।।
#स्वरचित
-महेश भट्ट 'पथिक
'



मन के अथाह सागर में
जब उठती है विचारों की लहरें
फिर बहुत मुश्किल होता है
यादों के भंवर से निकलना
बाहर निकलते हैं तो सिर्फ दर्द
कुछ बिछड़ी यादों के
कुछ टूटे सपनों के
किनारे खड़ी रह जाती है
मीठी यादें संभालने वजूद को
जिंदगी नहीं चलती
यादों के भंवर में डूब कर
यादों को ताकत बनाकर
चलने का नाम ही जिंदगी है
उम्र नहीं रुकती किसी के लिए
रुक जाती है जिंदगी 
खुल कर जियो उम्र का सफर 
डूबकर भंवर में मौत ही मिलती
थाम लो खुशियों का दामन
तन्हाइयों को पीछे छोड़ कर
छीन कर वक्त से हसीं लम्हे
महका लो मन का आंगन
वक्त के साथ बदलना ही
जिंदगी की रीत है
स्वीकारना सच्चाई को
यही जीवन से प्रीत है
जो बीत गई सो बात गई
कल को लेकर क्या रोना है
जिंदगी को जीना जी भर के
कल जो होना है सो होना है
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित कविता


मानवता है हमें सिखाती नारी का सम्मान करो
ये श्रष्टि की जननी है मत इसका अपमान करो
जन्म हमें देकर नारी माँ का फर्ज निभाती है

रूप बहन का लेकर नारी भाई हमें बनाती है
पत्नी बनकर घर में आये घर को स्वर्ग बना देती
जो बेटी का रूप रखे तो सोये भाग्य जगा देती
हर मजहब सिखलाता है कम से कम इन्सान बनो
मानवता है हमें सिखाती नारी का सम्मान करो
है शर्म हया का पर्दा भी क्योंकि नारी हिन्दुस्तानी है
पर मत समझो नारी को अबला ये झाँसी की रानी है
जब तक पर्दे में है तब तक ही ये नारी है
जब दुष्टों का संहार करे तो ये ही दुर्गा काली है
ब्रह्मा विष्णु शिव शंकर ने भी नारी को सम्मान दिया
जाने क्यों इस मानव ने ही नारी का अपमान किया
जो भी पाप कमाये तूमने उन पापों का उद्धार करो
मानवता है हमें सिखाती नारी का सम्मान करो
आज जमाना बदल चुका है हर विभाग में नारी है
पुरूषों के संग कदम मिलाकर चलती अब नारी है
स्कूटर से लेकर नारी हवाई जहाज तक उड़ा रही
खेलों के मैदान में जाकर कैसे कैसे करतब दिखा रही
देश को मेडल दिलवाकर देश का मान भी बढ़ा रहीं
सेना में भर्ती होकर अपनी जान की बाजी लगा रहीं
ऐसी नारी को यारो सौ सौ बार प्रणाम करो
मानवता है हमें सिखाती नारी का सम्मान करो
अखिल बदायूंनी


लघु कथा:#प्रेम

"जेब से पैसे निकाले हो क्या ? अजीब तमाशा है भाई,,,कभी किसी को मना किया हूं ? किस काम के लिए रखे हैं, किसी को कोई मतलबनहीं?,निकाल लिए उस पर तुर्रा ये की पूछेंगे तो बताएंगे।खुद की कोई जिम्मेदारी नही बनती।जरूरत है तो निकाल लो,पर बता भी तो दो,धोखा होता है भाई!!!" 
बाबूजी बोले जा रहे थे।आवाज में तल्खी थी।अम्मा रसोई में काम कर रही थी।झट से बाहर निकली ।समझाने के अंदाज में बोलेने लगी;"आप भी बिना मतलब बच्चों पर शक करते हैं ?चोरी से अच्छा मर जाना पसंद करेंगे मेरे बच्चे।बिना पूछे हाथ तक नही लगाते किसी चीज पर!!यदि ऐसी ओछी हरकत करेंगे तो धिक्कार है जी ।ऐसे ही संस्कार नही दिए है मैंने।रही बात मेरी तो मैं ऐसा क्यों करने जाऊंगी।ये सब हमारे संस्कार में भी नही है"।
बाबूजी" तुम क्यों नाराज होती हो? "कहते हुए चले गए।
बात सच भी है अम्मा रात को सोते समय अपने किस्से कहानी के माध्यम से इतना संस्कार तो हममें डाल ही चुकी थी,चोरी के बारे में हम लोग सपने में भी सोच नहीं सकते थे।बिना पूछे जेब से पैसे निकालना, एक प्रकार से चोरी ही तो है।
अम्मा कुछ समय के बाद मुझे बुलाई।मनुहार के साथ समझाईश देते हुए बोली थी,," घर मे किसी को मत बताना? ,ये रुपिया ले जा और सुखिया को दे आना।कहना अम्मा ने भेजा है।बच्चों के लिए कुछ खरीद लेगी। बच्चों को शाम को गांव का मेला घुमा लाएगी। कल बच्चे तुम लोगों के हाथ के खिलौने को कैसे टुकुर टुकुर देख रहे थे।" 
और मैं सुखिया दाई के घर की ओर चल पड़ा मन मे आते जाते कई प्रकार के विचारों के ताने बाने में उलझता और उसे सुलझाने की कोशिश करता।
.......✍️शैलेन्द्र दुबे



विधा :- लघु कविता 

तुझसे सजा मेरा घर आँगन
तु मेरे घर की फुलवारी,
तुझ पर लूटाऊं तन मन
मेरी प्यारी राज दुलारी

कहते है बेटी को अभिषाप
करते है वो महापाप
बेटी बिना कुछ भी नहीं
ये हरे हर घर का संताप

होती है घर की शान बेटी
दो कुलों का है मान बेटी
होती है जब रूख्शत घर से
करे सजन का घर आबाद बेटी

लक्ष्मी का अवतार बेटी
भरे धन धान्य भंडार बेटी
करो ना इसकी हत्या कोख में
है हर घर का सम्मान बेटी

स्वरचित :- मुकेश राठौड़



"रफ्तार के दीवाने"

शब्द सीढ़ी: 34
तिथि:20 अक्टूबर
वार: शनिवार
शब्द: नेत्रदान, रक्तदान,अंगदान,अज्ञान, संज्ञान
*************************

रक्तरंजित देख उसकी देह
माँ का उमड़ पड़ा स्नेह

जिन आँखों में सपने थे अपार
नेत्रदान मिला तो हुआ उपकार

जिसे सींचा अपने लहू से नौ माह
उसे रक्तदान दे माँ की निकली आह

जिस भाई ने सदा करी छेड़ खानी 
उसे अंगदान कर बहन बनी दानी

वो बेटा लिये अज्ञान बना रफ्तार दीवाना
क्या होगा उसके पीछे ये न जाना

बेटा अब सम्भल जा
संज्ञान ले और सुधर जा

न चल ऐसी तेज़ चाल
बन जाय जो तेरा काल

मानव देह है नश्वर मैं जानूँ
मौत के मुँह में तुझे कैसे सौपूंँ

जीते जी कर ले इस शरीर का सम्मान
ईश्वर देंगे तभी तुझे अभय वर्दान

बेकार है इस गति का पीछा करना
नौजवानों को पड़ता इससे मरना

(युवकों को तेज़ गति से वाहन न चलाने का निवेदन करती)

स्वरचिय
स्वपनिल वैश्य "स्वप्न"
अहमदाबाद



विषय :- स्वतंत्र लेखन

कैसी उम्मीद में जी रहा हूँ मैं
के हर गम को यूँ पी रहा हूँ मैं
साथ चलने का था वादा तेरा
फिर भी इंतजार कर रहा हूँ मैं

दो कदम साथ तो चलते हमदम
एक बार आजमा तो लेते सनम
साथ चलने का था वादा तेरा
इसी उम्मीद में जी रहा हूँ मैं

अब तो हालात सब बदल चुके,
कैसे कहूँ कि तुम मुझे भूल चुके
धड़कनों से नाम निकलता नहीं
ये दिल है कि तुझे भुलता नहीं
तेरी ही उम्मीद में जी रहा हूँ मै

स्वरचित :- मुकेश राठौड़




"मैं कृष्णा तुम्हारा"
=============

न पुकारो तुम मुझको
करके मेरा पूजन -आराधन
पाना चाहो गर मेरी शरण
जो प्रेम को पहचान सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

शुभ्र हो मन - दर्पण
राधा सा समर्पण
मीरा सा सर्वस्व-अर्पण
जो तुम कर सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

चाहे हो घनघोर अँधियार
या हो पूनों की चाँद रात
मुरली की धुन जो सुन सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

अहंकार को छोड़
सद्भावना की मटुकी फोड़
स्नेह का माखन 
जो बाँट सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

रिश्तों के बंधन
संतुलन का झूला
निश्छल विचारों की सरिता
जो बहा सको तो 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

हटाकर घृणित - भावनाएँ
मिटाकर कुत्सित- कामनाएँ
किसी द्रौपदी का सम्मान
जो बचा सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

हो अंतर्मन - चेतन
मर्यादित - आचरण
निर्मल पावन -ज्योत 
जो जला सको 
तो मैं कृष्णा तुम्हारा।।

स्वरचित'पथिक रचना'



विषय-स्वतंत्र लेखन 
* रूमाल* 


सारा जग एक रेशमी रूमाल है 
फैला मर्मर तिरपाल है
नियंता ने फैला रखा है चँहू ओर 
अवनि से अंबर तक 
बूंद से सागर तक
जहाँ तक भी नज़र जाती 
इंद्रधनुषी रंगों को समेटे
दिखाई पड़ता है
मन को आकर्षित करता 
एक रेशमी रूमाल।

दूर तलक दृष्टि गोचर होते
ख़ूबसूरत एहसासों के फूल पिरोते 
रंगीन सपनों की माला 
विश्व कंठ की गजहार बनी
ओर ना छोर 
पर बाँधती सुदृढ़ डोर
मन करता निहाल 
ये रेशमी रूमाल !

पागल चंचल मन बंधित होता 
साँसों संग भावनाएँ पिरोता 
कभी रोता कभी हँसता
संग उमर ज्वार बहता
सारा जग बाँधकर भी 
छोड़ देता गिरह हार 
वाह ! रेशमी रूमाल !

सुख-दुख अहर्निश पथ पर 
संग हर पल छिन समेटे
नेह दुलार और प्रणय पीर का
बहते विकल अश्रु पोछे
धड़कनों का साक्षी समय 
चुपके-चुपके चलता चाल
छूट जाता रेशमी रूमाल !!
------------------------------------------------------
स्वरचित व मौलिक 
*सुधा शर्मा* 
राजिम (छत्तीसगढ़)



पहली बार की तरह
पहले प्यार की तरह,
इक बार फिर मिलो मुझे

कि मैं नशे में हूँ।

चल पड़ो न साथ में
ले के हाथ हाथ में,
फिर से ना यूँ छोड़ो मुझे
कि मैं नशे में हूँ।

इस दर्द की गहराई से
अजीब सी तन्हाई से,
बस आज बचा लो मुझे
कि मैं नशे में हूँ।

इक रूई की फांह सी
खोखली अफवाह सी,
यूँ ना उछालो मुझे
कि मैं नशे में हूँ।

अब बदल जाऊंगी,
और सम्भल जाऊंगी,
बस आज सम्भालो मुझे
कि मैं नशे में हूँ..


Shilpi Kuldeep Upadhayay 

..जारी है ,
संस्कारो का हनन ,
भाषा का पतन ,
घटते हुए उपवन ,
मुद्रा का अवमूल्यन ,
फोनो से बडता एकाकीपन ,
अंतरमुखी होता मानुष मन ,
विदेशो मॅ पलायन ,
गांवो का बौनापन ,
शिक्षा का व्यवसायीकरण ,
चलचित्रो का फूहडपन ,
कथा पंडालो का बड़ता आयातिकरण ,
राजनीती का ढोंगापन ,
नित नई बीमारियो का जन्म ,
टका पर टिकता सा जीवन ,
जारी हैं .... ....
स्वरचित 
शिल्पी पचौरी



जीवन की राहें नहीं है आसान 
सुख दुःख को साथ ले चलो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो

चाहत ना हो आसमान में उड़ने की 
छोटी छोटी खुशियों को जी लो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो 

खो गया सामान तो खोने दो
पहचान अपनी ना खोने दो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो

नशे में महफ़िल ना रुसवा करो
यारों के संग कुछ पल झूम लो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो 

लड़खड़ाते कदमों को बाँहों मेंथाम लो
अपने ही नहीं गैरों को भी गलेलगालो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो

ख्यालों की दुनिया से हटकर 
तन्हाईयों में भी जी लो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो

खुशियाँ मिले या ना मिले
दर्द में भी प्रेम लुटाया करो
बस थोड़ा सा मुस्कुराया करो

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

संसार कहाँ रह जायेगा-1,
********************
पल-पल-हरपल इस जीवन का,

आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

यह चाँद जो निकला है नभ में,
मन को शीतल कर देता है,
रवि तेज लिये उजला-उजला,
जग का तम हर लेता है,
जो फूल खिले मधुवन में सुन्दर,
कहते है खुश रहना सीखो,
गा-गा कर कोयल कहती,
सदा मगन रहना सीखो,
इस समय हमारे जीवन में--
कितनी खुशियां कितनी राहें,
पर आगे चलकर जीवन का,
व्योहार कहाँ रह जायेगा----

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

जीवन में कितने रस बहते,
बहती कितनी रस की नदियाँ,
स्वर कितने मधुर गूँजते हैं,
कितनी ही गीतों की लड़ियाँ,
स्वर कितने ही प्रवाहित है,
मद्धम-मद्धम-सुमधुर-मंदिर,
हृदय का पुष्प कमल खिलकर,
करते मादक जग का समीर,
पर मोती झड़ते इन अधरों का---
उद्दगार कहाँ रह जायेगा---

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

है जहर अगर ये जीवन,
पर इसको पीते जाना होगा,
जो जन्म लिया धरणी पर,
तो सहकर जीते जाना होगा,
कोई लाख कहे पर कर्मों पर,
स्वाधीन कहाँ रह पायेंगे,
जो लिखी भाग्य में तेरे,
उस ओर कदम बढ़ जाएंगे,
कहने को तो सब कहते हैं,
पर बोझ पड़े फिर जाते हैं,
है नियति के हाथों बंधें सभी,
मन की क्या कर पाते हैं,
थोड़ा सा जो बचा हुआ--
अधिकार कहाँ रह जायेगा--

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

कोई बैर नही जिससे मेरा,
उसने ही पथ काँटे बोये,
कई भार भी उसके कर्मों के,
निज कांधों पर लेकर ढोये,
वो महलों में रहकर भी,
मेरी कुटिया को तोड़ दिया,
इतनी दुविधा भर दी जीवन में,
नीदों ने नाता तोड़ दिया,
तब से इस जीवन में हम,
उसको कोषा करते हैं,
जो घाव हैं अंकित हृदय पर,
हम उसको पोषा करते हैं,
पर जिस दिन पलके ढंक जायेंगी-----
ये घाव कहाँ रह जायेगा------

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

एक बार समय के पहिये पर ,
ऐसा भी मौसम आयेगा,
जब रवि की उज्ज्वल किरण,
तम का साथी हो जायेगा,
जब इस धरती को निशा,
काली चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि से पोषित,
धरती कब तक रह पायेगी,
फिर इस धरती पर कोई,
संसार कहाँ रह जायेगा--

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

ऐसे पतझड़ में फिर,
कोयल की कूक कहाँ होगी,
जीवन की गीत सुनाती फिर,
बुल-बुल की बोल कहाँ होगी,
अलि-दल-बल फूलों पर फिर,
न घेर-घार गाएंगे,
नव-पत्र भरे तरु के सर-सर से,
न प्राणी हूक उठाएंगे---
जब इतनी रसमय गीतों का,
उपहार नही रह जायेगा-----

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

जब काल गुरु बन गरजेगा,
तो झरने क्या गा पाएंगी,
नदियाँ अपनी कल-कल-छल-छल,
में कैसे गीत उठाएंगी,
वह गीतों सुरताज कहीं,
चुप होकर के छिप जायेगा,
है गीत जहाँ से मुखरित होती,
स्वरमान कही खो जायेगा,
फिर प्राण तुम्हारे हृदय का,
गतिमान कहाँ रह जायेगा----

पल-पल-हरपल इस जीवन का,
आधार कहाँ रह जायेगा,
जब नश्वर है तो सब मिटना,
संसार कहाँ रह जायेगा----

फिर उतरेगा धीरे-धीरे,
कोमल फूलों का गहना,
खो जायेगा सृष्टि में कहीं,
श्रृंगार धरा ने जो पहना,
जिसदिन उषा की साड़ी-सिंदूरी,
मैली-धूमिल हो जायेगी,
जब धरती की शोभा-सत्ता,
पथ-पथ पर लुटी जायेगी,
जब इंद्रधनुष का सात रंग,
मिटते-मिटते-मिट जायेगा,
उसदिन कवि के हृदय में फिर---
उद्दगार कहाँ रह जायेगा---

.....स्वरचित राकेश पाण्डेय


लघुकथा
"अंटी देखिये ना दीदी मेरा खिलौना माँग रही हैं"मैं अपना खिलौना दीदी को क्यों देने लगा।"
नेहा के पड़ोस में रहने वाला छोटू नेहा से अपनी दीदी का शिकायत लगा रहा था।पाँच बर्षीय छोटू कभी भी अपना खिलौना,या खाने का कोई भी सामान(कुड़ कुड़े,चिप्स)अपनी दो साल बड़ी दीदी या कोई भी आगंतुक बच्चा से शेयर नही करता था
शैतानियां तो उसके रग रग मे भरी हुई थी, मसलन अपनी मन की नही होने पर घर की समान तोड़ फोड़ करना।नेहा अभी तक उसके सिर्फ इसी गुण से परिचित थी।
एक दिन छोटू नेहा के घर मे उसके शो केस से खिलौनें निकाल कर खेल रहा था।नेहा के दोनो बच्चे नौकरी के सिलसिले में शहर से बाहर ही रहते थे।। 
छोटू जब जी भर कर खेल कर जाने लगा तो उसमे से एक खिलौना छोटू को देते हुए बोली"लो छोटू आज से यह खिलौना तुम्हारा हुआ"।वह बच्चा अवाक हो उसका मुँह देखने लगा तो नेहा बोली "हाँ छोटू तुमनें ठीक सुना आज से यह खिलौना तुम्हारा हुआ।"वह बच्चा खुश होकर तुरन्त अपने घर भागा इस बीच वह सोचती रही उसनें ऐसा क्या दे दिया एक अदना सा खिलौना ही तो ,उसके मम्मी पापा तो कितने मँहगे मंहगे खिलौने खरीदते हैं।
तभी छोटू अपने नन्हे हाथों में छोटे छोटे रंगीन पत्थर भरकर उसे देने लगा,जिसे वह उसे बहुत बार दिखा चुका था,लेकिन कभी उसे या अपनी बहन को हाथ भी नही लगाने देता था,उसे समर्पित करने आ गया, जब उसने पूछा की वह ऐसा क्यों कर रहा है, तो वह बहुत ही मासूमियत से बोला"अंटी आज तक कोई भी हमे सिर्फ बर्थडे मे ही गिफ्ट देता है, और आज मुझे आप बिना बर्थडे के ही गिफ्ट दे रही हैं, इसलिए मैं भी आपको यह पत्थर गिफ्ट करना चाहता हूँ।" 
अचानक छोटू का कद उसके सामने बहुत बड़ा हो गया।
स्वरचित -आरती -श्रीवास्तव।

स्वतंत्र रचना 

कितने लिबास पहनेगा तु कितने चोले बदलेगा
पर रंग बसंती चोला तुझे कभी रास ना आयेगा ।।

सर पे हो जालीकी टोपी या गले में रुद्राक्ष
मंदिर मस्जिद सैर करेगा पर कभी भक्त ना कहलायेगा ।।

गलती तो सभी से होती तुझसे भी होती है
अहंकार के राजा तुम पर कभी इंसान ना कहलायेगा ।।

चाटुकार दरबारी हो जिसके पनाह में
लाख पते की बात हो तब भी बिच्छु बनके कांटेगा ।।

जहां फौज हो कुत्तोंकी चरम सीमा तक भौंकने की
कितनी भी कोशिश कर लें कभी फौजी ना कहलायेगा ।।

आतंक वाद का समर्थन या आतंकी की प्रेम पुजा
कितनी जप ले माला देशकी तु देशप्रेमी ना कहलायेगा ।।

पाखंडी की पूजा अर्चना, अपनी ही झोली भरना
तपस्या में जिसकी निंव ज़हर की वो क्या साधु कहलायेगा ।।

हर पल नज़र आसमां पे, धरती को वो क्या समझेगा
ज़मीनी हकीकत से जो नहीं वाकीफ, वो कैसे धरती पुत्र कहलायेगा ।।

कदर करें ईमान धरम की ,सुनना पड़ेगी आह पुकार
छद्मवेश को त्यागकर दिलको दिल से जोड़ेगा । 

जात-पात के ऊपर उठकर सब को गले लगाएगा
तभी तु महानायक बन पायेगा, जन नायक कहलायेगा ।।

स्वरचित
डॉ नीलिमा तिग्गा (नीलांबरी)

"माँ की स्तुति"
"माँ से प्रार्थना"

मातेश्वरी तुम मुझको इतना सारा काम देना 
निरर्थक मैं भटकू नहीं इस पर तू ध्यान देना 

आया हूँ मैं इस जगत में कुछ नाम करने 
झूठा नहीं पर सच्चा तू मुझे सम्मान देना 

साम,दाम,दंड भेद की नीती ना अपनाऊँ 
सत्यराह ही चलूँ ऐसा तू मुझको ज्ञान देना 

भारतमाँ के चरणों में शीश अपना धरकर 
शहीद हो जाऊँ ऐसा तू मुझे वरदान देना 

स्वरचित कुसुम त्रिवेदी दाहोद


घुसपैठिए कहीं के..
मेरे दिल पे कब्जा के तू ,
निकलता क्यो नही है ।
...
जबरन दिल को, दिल से जोडा।
नींद उडाई चैन को लूटा ॥
.....
ओ संगदिल कही के...
मेरे दिल के टुकडे करके भी,
निकलता क्यो नही है ।
.....
दर्द सहा नही जाता दिल का,
चैन ना मिलता है कुछ पल का।
.......
ओ छलिया कही के....
मेरे दिल मे छुप के छल के,
तू निकलता क्यो नही है।
...
..


स्वतंत्र लेखनविषय, "बेटे की करुण पुकार"
एक दिन मेरी माँ गयी थी टूट
जब मेरे माता-पिता में पड़ी थी फूट
फुट ऐसी पड़ी कि दिल तो गया टूट
और माँ बाप का रिश्ता गया छूट
मैं था माँ के गर्भ मै सब देख सुन रहा था
और मैं भी गया था टूट, की 
मेरे आने की खुशी थी कम
और गम था ज्यादा
चल पड़ी माँ अपने घर संसार को छोड़कर
जो कहते थे पिता तू मेरी प्रिय तू ही लक्ष्मी
आज उसी लक्ष्मी को जाते ना रोक पाये
यह कैसे थे पिता
एक गर्भवती पत्नी को क्यों छोड़ डाला मरने के वास्ते, ना आयी शर्म ना थी कोई लाज उनमे वो तो थे बेशर्म, मैने अपनी माँ को अन्दर से आवाज लगायी
हे माँ तू क्यों रोती है, मुझे धरती पर आने तो दे,माँ तेरी हर खुशियां मै लेकर आऊँगा
जो खोया है तूने उसे वापस लाऊँगा
मैं बोला, माँ तु मर जायेगी तो मैं कहाँ जाऊँगा मैने तो अभी जन्म भी नही लिया मुझे जन्म देकर तो देख, मै बोला ,सभाँल अपने आपको और
मुझे भी चोट ना लगने दे माँ
जब तू मुझे गोद में लेगी तो सारे दुख में हर लूँगा अपनी प्यारी सी मुस्कान से हर घाव भर दुगाँ मै बोला,मेरे लिये तुझे लड़ना है माँ
और तेरे लिए मुझे लड़ना है माँ
हम दोनों हैं एक दूसरे का सहारा
हमें सारी दुनिया से लड़ना है माँ
कुछ समय बाद मैंने जन्म लिया 
तब एक आशा की किरण जगी 
मेरी माँ के अंतर्मन में, तू आ गया मुझे संभालने, तब मैने कहा माँ तू मेरी है मै तेरा हूँ माँ हम दोनो एक दूसरे का सहारा है माँ
हम सारी दुनिया से लड़ जायेंगे जग में कुछ ऐसा काम कर जायेंगे,एक दिन ऐसा कर जाऊगाँ जिसने तुझे रुलाया है माँ उसको सबक सिखाऊगाँ
आज करता हूँ वादा माँ तेरा नाम ऊचाँ कर जाऊँगा, बस माँ का लाल ही कहलाऊँगा 
अपनी माँ का मान में बढाऊँगा
उसका सम्मान में दिलाऊँगा
एक दीपक की भाती तेरे जीवन में 
प्रकाश ही प्रकाश में फैलाऊँगा
🙏स्वरचित हेमा जोशी


*****
रोज सबेरे 

दिखाता समाचार पत्र
समाज का ऐसा भी चेहरा
जहाँ छिपे रहते रावण
अनेक रूपों में
छल कपट
असत्य अन्याय
अत्याचार आतंक
भाई बहन पत्नी माँ बाप
बच्चे बूढे औ जवान
अंतस् की कालिमा
समाज राज्य देश में
घर घर रावण है
मिटाओ मारो भगाओ
तभी होगा पर्व सार्थक
नहीं है सर्व निर्रथक
शुंभ निशुंभ-महिषासुर
प्रतीक हैं अंतस के रावण के
जरूरत इन पडी है
खड्गधारण की
सोच स्वस्थ्य
समाज स्वस्थ्य
सार्थक पर्व
नारी शक्ति
असत्य पर सत्य
अंधकार पर उजास
तो उठो मृदंग उठाओ
थापदो ताल दो
एक रस मे बार दो
दशहरा से दीपावली 
और आगे और आगे
जागें जागें और जागें
फहराएं उजासरंगी पताका
बने ऋतिका
मेरे सभी इष्टमित्रों संबधियो वैचारिक रूप से भे द को अभेद में परिवर्तन की भावना के साथ विजयादशमीपर्व मंगलमय हो।

रंजना सिन्हा सैराहा.. 

🎶
Asha Paliwal Purohit 🎶
मर्य
ादा पुरुषोत्तम श्री राम 🙏
का अयोध्या आगमन 🚶
हर्षित जन हर्षित मन🤠
चहूं और दीपों की कतार,,,,,
घर घर घी के दियों की बहार 🔥
घर-घर लक्ष्मी जी का इंतजार👸
माह पूर्व स्वच्छता 🏢
जाड़-पोंछ कमर तोड़ काम⛑️
करते करते होती शाम 🌒
कभी न थकती नारी 
कभी न भरती आह,,,,🌝
झाड़ बुहार सजा कर 
पुनः पुनःनिहारती घर-द्वार🎋
भांति भांति के दीपों की कतार 
भिन्न भिन्न सजावट का आधार🍁
शुभ शगुन परिवार ♥️
गजानन का चाहती वास🏘
मां लक्ष्मी की कृपा 🙋
मां शारदे की सद्बुद्धि 📝
कभी ना आए मन में कुबुद्धि 
स्वयं जोड़ती परिवार 🙌
ऐसी होती है नारी की चाह 💑

स्वरचित

आशा पालीवाल पुरोहित🙏

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"भाषा"19 जुलाई 2019

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