Wednesday, October 24

"भाव/भावों के मोती"22 अक्टूबर2018















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"भाव/भावों के मोती"
1
🎉🎉🎉🎉
भावों के मोती
सर्वोत्तम शिखर
लेख प्रखर।।
🎉🎉🎉🎉
भावों के मोती
सुगंधित बयार
मन का हार।।
3🎉🎉🎉🎉
भावों के मोती
लेखनी अंशुमाली
महाविभूति।।
4🎉🎉🎉🎉
भावों के मोती
शैली में अनुराग
स्याही पराग ।।
**************





ग़ज़ल


बड़ी चोट खाई दवाएँ दिए जा ।
मेरे पास आकर सदाएँ दिए जा ।।

न हारूँ कभी भी ए मालिक जहाँ में ।
लड़ूंगा मैं हरदम ज़फाएँ दिए जा ।।

जहाँ तक चलेंगे कमर कस रहेंगे ।
परखना हमे मत वफ़ाएँ दिए जा ।।

बड़ी दूर फैले ये शुहरत हमारी ।
खुदा के करम में हवाएँ दिए जा ।।

करें देश खातिर बड़े काम सुंदर ।
वो ऐसा हुनर दे अदाएँ दिए जा ।।

सदा दूर तक हो इरादा तरक्की ।
हो मंगल की बारिश घटाएँ दिए जा ।।

सभी लोग मिलकर रहें साथ ' शेखर ' ।
खुदा अब मुकम्मल दुआएं दिए जा ।।

शेखर
22 अक्टूबर 2018

🍁
दिप्त भाव संतृप्त हृदय से,
वर्णो के मधुवन आया हूँ।
भावों के मोती गुँथ करके,
शब्दों का महल बनाया हूँ॥
🍁
भावों का मोती वो उपवन,
रसभाव मंजरी खिलते है।
कवियो का ऐसा दिव्य समागम,
कहीं-कहीं ही मिलते है ॥
🍁
आओ इस उपवन मे विचरें,
कवियो की कविता को पढें।
भाव अगर दिल को भाये तो,
मुक्त कंठ से वाह वाह करे॥
🍁
निःर्स्वाथ भाव की सेवा है,
कविता कवियो का जीवन है।
इस शेर हृदय से झलक रहा,
भावों का मोती जीवन है ॥
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf



भावों में दोजक भावों में जन्नत 

जानों मनोभाव बदलें ये रंगत ।।

भावों में बहकर धर्मात्मा बने
भावों में बहकर दुरात्मा बने ।।

भावों में बहकर काव्य हैं लिखे
भावों में बहकर युद्ध हैं लड़े ।।

भाव हैं अच्छे भाव हैं बुरे 
भाव मे यहाँ कौन न कुढ़े ।।

भावों पर पूर्ण अधिकार नही
भावों में हरेक लाचार हैं कहीं ।।

छुपे न ''शिवम" ये छुपाये से 
प्रकट हो जायें बिन बताये से ।।

भावों को रखो सदा शुद्ध पवित्र
मँहकेगा जीवन ज्यों मँहके इत्र ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 22/10/2018



हृदय सागर के
गहरे तल में
दूर दूर तक
बिखरे
भावनाओं के सीप।

उन 
अनन्त सीपों के
गर्भ में
सृजित होते हैं
#भावों_के_मोती।

अनवरत
उतरते हैं
डूबते हैं
गोता लगाते हैं
गहरे सागर तल में।

कभी आकुल ब्याकुल
तो कभी
हर्षित 
आल्हादित
मनोभाव।

चुन लेते हैं
मोती।
पिरोते हैं
मनोयोग से 
एक एक मनके।

गूंथ जाती है माला
उसके लिए
जो
मोल समझे
मेरे भावनाओं की।
🌷🙏🌷
स्वरचित:शैलेन्द्र दुबे


दिल में उल्फत का दिया जलाकर तो देख ,
कोई गैर नहीं है तू अपना बनाकर तो देख,,

इन्सानों के बीच हैवान बना फिरता है क्यों,
तू भी इन्सान है इन्सानियत जगाकर तो देख

बेकार ही कहता नफरत मिटती नहीं जहाँ से
दिल में लगी बदले की आग बुझाकर तो देख

झोंपड़े उजाड़ कर महल तो बना लिए तूने
जो उजड़े हैं कभी उनके घर जाकर तो देख

जन्नत की तलाश में क्यों भटकता है दरबदर
कभी माँ के चरणों में सर झुका कर तो देख

नाकामियों के डर से दिल में छुपाये बैठा है क्यों?
अपना हुनर तू दुनियाँ के सामने लाकर तो देख

स्वरचित अखिल बदायूंनी



" भाव/ भावों के मोती "
हाइकु 

"भावों के मोती "
अनूठा परिवार 
प्यारा संसार

"भावों के मोती "
स्वर्णिम पथ ज्योति 
मन की शक्ति 

"भावों के मोती "
सपनों को सजाती 
दिल चुराती

मन सागर
भाव हैं लहराते
मोती ढूँढते

शब्दों के मोती
रचना को सजाते
भाव पिरोते

भाव विभोर 
खुशियाँ सराबोर
भिगते कोर

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल



1)
प्रीत के भाव

मोती स्नेहोदगार
प्रेमोपहार।
2)
मोती भावों के
सुखी साहित्यकार
सद् विचार।
3)
शब्द सागर
मोतियों की गागर
मनोभावना
4)
भावों के मोती
रचनाकार ज्योति
सृजनकर्ता
5)
साहित्य ज्योति
अंतर्मंथन मोती
भाव विभूति

स्वरचितःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.




सरीता प्रवाहित हो सागर में
रचना जन जन के मन में
हृदय डोल रहा मेरा भी अब
अर्पण #भावों के मोती करने ।।

हो गए पुलकित
शब्द प्रवाहित
संगम हुआ भावों के साथ
कलम चले अब अबाधित ।।

सुख, दुःख या परी कल्पना
सृजन करे हर एक भावना
शब्द अधूरे कभी आघाती
चाह रहे मनो भावना ।।

प्रेरित होकर दृष्य पटल पे
साकार करते अपनी क़लम से
अथाह गहराई में जा के
खोजते मोती भावों के ।।

स्वरचित
डॉ नीलिमा तिग्गा (नीलांबरी)


हृदय भाव बहते निर्झर,

भावों की भूमि सदा उर्वर।

भावों के मोती चुन-चुनकर,

शब्दों की माला में ढ़ल कर।

सुंदर बनता है काव्य सदा,

मन आनंदित रहता सदा।

अविरल पथ है भावों का,

सुंदर - सुंदर सद्भावों का।

भावों की माला में गुंथकर,

सृजन काव्य का होता है।

भाव काव्य का होता प्राण, 

शब्द शरीर का करे निर्माण। 

तब उत्तम काव्य सृजित हुआ, 

रसमय सारा संसार हुआ,

क्लेश-विकार का नाश हुआ।

अब जीवन आलोकित है,

जीवन उद्देश्य भी लक्षित है ।

काव्यामृत से जीवन सिंचित है,

अब यही पथ हमें वांछित है। 

यह यात्रा ऐसे ही चलती रहे, 

नित पुष्पित - पल्लवित होती रहे। 

अनमोल भावों के मोती का, 

विस्तार सदा होता ही रहे ।। 

अभिलाषा चौहान 

स्वरचित


रमते बसते हृदय में,करते भाव उछाल।
“भावों के मोती “कहें, हूँ रचना का ताल।।

नव रस के नौ भाव में ,डूबे कवि हर बार।
“भावों के मोती “कहें, पहनूँ रचना हार।।

रहता भाव प्रधान ही,हर मोती के संग।
लघु कविता की साधना,करती सबको दंग।।

“भावों के मोती “सदा, मन में भरें उमंग।
पूर्ण कवि का कवित्य ही,भरता जीवन रंग।।
स्वरचित
रचना उनियाल
बैंगलोर


साथ रहे और साथ चले,
सदा मधुर मय भाव रहे।
भावों के मोती की माला,
का सदा स्नेह प्रभाव रहे।।

मानवता का सूत्र यही है,
प्रेम पूर्ण बर्ताव रहे।
नफरत के सब बीज जलें
समता और सद्भाव रहे।।

भावों के सुरभित पुष्प खिलें,
द्वेष दंभ और अनाचार मिटे।
प्रेम की सरिता बहे अविरल,
दुर्भावों का सदा अभाव रहे।।

रचनाकार
जयंती सिंह


भाव का प्रभाव ही सृजन करता
माॅ सरस्वती को पहले नमन करता
फिर शब्दों की अलंकृत मण्डली लेकर
काव्य उपवन की ओर गमन करता। 

भाव प्रधान होता है जब मन
अंकुरित होने लगता अर्पन
जब भी चरम पर होता यह सब
गीत गाने लगता है समर्पन। 

भावों की सुन्दर ज्योति 
सबका अन्तर्मन भिगोती
हर मन में फिर प्रस्फुटित होता
एक सुन्दर अनुपम मोती। 

ये मोती भावों के मोती बनते
छ: माह से ये रहें हैं छनते
ऋतुराज और वीणा की
इच्छा यही निकली थी मन से। 





भावों के मोती, 
नित नव सृजन, 
समूह शक्ति ।

कथ्य अभिधा,
भाव काव्य का प्राण,
कृति समिधा ।

उत्तम कृति, 
भावों का समुन्दर,
हो कालजयी ।

-- नीता अग्रवाल 
स्वरचित




अँजुरी भर संवेदन भाव मात्र,
अंतस के शुचितम गहन सुतल में,
परन्तु प्रभावी तनिक अतीव ये,
हृत परिवर्तन मे श्रुत सक्षम अति।

सीप सदृश आवरण चारु हृत,
पोषित अन्तर्गत भावों के मोती,
ज्ञान-ज्योति आलोक सशक्त में,
द्मुतिमान उरभावों के ये मोती।

चारु बसुन्धरा के प्राँगण में,
पहचान अनूठी मानवता की,
ब्रह्म अंश यह मनुज वस्तुतः,
संज्ञान कराते भावों के ये मोती।

भावविहीन मनुज पशु मानिंद,
संवेदन उदगार अपेक्षित,
आधार मूल आस्था स्नेह के,
भूतल पर केवल भावों के मोती।
--स्वरचित--
(अरुण)



वर्ण पिरामिड 
1
है 
भाव 
समुन्द्र 
मोती तुल्य 
ह्रदय गूँथे 
सुंदर सा हार 
जन्म रचनाकार 
2
ये 
पुत्री 
समूह 
जन्मभूमि 
लेखनी माता 
ह्रदय पालता 
भाव है जन्म दाता 
कुसुम पंत उत्साही 
देहरादून 
उत्तराखंड


भाव प्रधान होते मानस के,

हम परमार्थ में इन्हें लगाऐं।
शक्ति ,सामर्थ्य शांति चाहें तो,
हम अपनी अंतरात्मा जगाऐं।

संसार को धोखा दे सकते हम
मगर आत्मा को नहीं दे सकते।
सम्मति अंतरात्मा की पाई तो,
स्वविवेक भाव मोती ले सकते।

संजोऐं सुविचार मनमंदिर में तो
जाग्रत मानवीय भाव होता है।
समझें श्रेष्ठ अद्वितीय स्वयं को ,
मानें आध्यात्मिक पतन होता है।

जहां अहंकार की भावनाऐं होंगी
वहां त्याग भावना उदय नहीं होगी।
प्रेम भाव मोती माला पहनाऐं तो,
दूषित भावनाऐ उदय नहीं होंगी।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



🌹🎊🎊🌹🎊🎊🌹🎊🎊🌹
भांति भां
ति के भाव सब जुदा जुदा
ठोस तरल पदार्थ भाव सब भूला भूला

सुंदर सुसंस्कृत शिष्टता से समृद्ध
भावों को व्यक्त करने को मन आबद्ध

चलता रहे कारवां भावों के मोती का 
मन के सुंदर भावों को सजाने का 

अनजान राहों में अनजान मित्र मिले 
ना पहचान फिर भी सबके मन मिले 

लघु भ्राता बहीने विद्व जनों का साथ
यूं ही बढ़ता रहे सबका कलमी हाथ

मुक्त कंठ ह्रदय तल-प्रशंसा करूं 
यथा नाम तथा काम जानूं

न वेर वैमनस्य दिल की गहराई 
सुंदर सहज बजे भावों की शहनाई

अंतरात्मा से उपजे मन के भाव
तहे दिल से गिरती स्वागत गाज

भाव हम सब के सबसे जुदा 
यह सब जाने ईश्वर और खुदा 

सुसंस्कृत ज्ञानी लघु वय न जानी
वरद हस्त की कोई यहाँ न सानी 
🙌🌿🌹🌿🌹🙌🌹🌿🙌
🎶🎶भावों के मोती का 🎶




भाव दिल के
कलम पतवार
कागज नैया

भाव के मोती
समूह विचारों का
है अग्रसर

उचित भाव
बने जीवन ढ़ाल
पाए सम्मान

सुखद भेंट
खुशियों का संसार
भाव स्वरूप

बालक रूप
बटोरता है प्यार
निश्छल भाव

भाव विभोर
मित्रता भरपूर
कृष्ण सुदामा

निश्छल प्रेम
मिटते बैर भाव
सिमटे दूरी


(1)
है सुकोमल 
'भावों के मोती' दल
हृदय तल।

(2)
मैलों को धोती
एक माला पिरोती
'भावों की मोती'।

(3)
दिल में गड़ा 
सागर-सा गहरा
'भावों' से भरा।

(4)
लेखन कला
सिखाती है बहला 
'भावों' को मिला।

(5)
भरे जो प्यार 
है निश्छल उद्गार
'भावों' का सार।

(6)
है अनुभूति
देती सहानुभूति 
'भावों की मोती

प्रदत्त विषय- भाव/भावों के मोती

हाइकु -
(१)
श्रद्धा सहित
भावों में पिरोकर
शब्द अर्पित
(२)
जीवन ज्योति
दिप-दिप करते
भावों के मोती
#
माहिया -
मोती भाव के बने
शब्द बनकर झरे
समूह यह सदा चले
#
सेदोका -
रिक्तिता हरे
भाव भरे सृजन
अति मनभावन
हर्षित करे
नवरस घोलते
शब्द-शब्द बोलते
#
वर्ण पिरामिड -
ये
मोती
भावों के
जीवन में
रंग भर जाते
पिरोकर शब्दों को
एक नई माला
अर्थ दे जाते
उदासी को
खुशी में
ढाल
के
#
"स्वरचित"
- मेधा नारायण,

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