Saturday, October 27

"चुनाव "26 अक्टूबर2018


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"चुनाव"

दी चुनाव ने दस्तक प्यारे।
‌ चर्चा चली गली गलियारे।
चिंता में नेता हैं सारे।
जनता के हैं वारे-न्यारे।
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मौसम देख चुनावी आया।
नेताओं का मन हरसाया।।
रोज करेंगे झूठा वादा।
मुद्दे कम अरु बक-बक ज्यादा।।
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जाति-पाति की बात करेंगे।
इक दूजे पर दोष मढेंगे।।
जनता को भगवान कहेंगे।
हँसकर उनके दर्द सहेंगे।।
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बड़ी-बड़ी डींगे हाकेंगे।
इसके उसके घर झाकेंगे।।
पाने वोट करेंगे अनशन।
अर्पित कर देंगे तन-मन-धन।।
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माँगे मत सब जाकर घर-घर।
इसकी टोपी उसके सर पर।।
हाथ जोड़ सब पूजन करतें।
जनता को सर आँखो धरतें।।
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बात करेंगे लोक लुभावन।
सबको दोषी खुद को पावन।।
खोलूँ गाँवों में विद्यालय।
घर-घर में होगा शौचालय।।
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गठबंधन के होंगे चर्चे।
खूब करेंगे पैसे खर्चे।।
आरोपों की झड़ी लगेगी।
देशभक्ति की लगन जगेगी।।
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वादों की होगी बौछारें।
दिन में दिखलाएंगे तारें।।
दौर चुनावी होगा जब तक।
बात चलेगी बस यह तब तक।।
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जीतेंगे सबको भूलेंगे।
वादों को जुमला बोलेंगे।।
यही चुनाव रीति है यारो।
दाना फेंको चिड़िया मारो।।
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स्वरचित
रामप्रसाद मीना 'लिल्हारे'
चिखला बालाघाट(म.प्र.)



बेटा- पापा पापा ये चुनाव क्या होते हैं

बेटा इसमें जनता हंसती नेता रोते हैं ।।

इसमें नेता बहुत व्यस्त होता है
तनावमय और त्रस्त होता है ।।

पाँच साल फिर हँसता है 
करता वही जो जँचता है ।।

मगर वो नेता अंकल हँस रहे थे
खूब ठहाके और व्यंग कस रहे थे ।।

बाप - बेटा यही तो कमाल है
ये पर्सनाल्टी का धमाल है ।।

वो इसमें कमाल ढाते हैं 
उन्हे बहुत पेंतरा आते हैं ।।

ऐसे ही नही है उनकी जीत 
बीसियों साल से है पक्की सीट ।।

पापा मैं भी नेता बनूँगा
चुनाव चिन्ह अच्छा चुनूँगा ।।

बेटा ये पीढ़ियों की कमाई है
ये पर्सनाल्टी एक दिन में न आई है ।।

तूँ कवि के यहाँ जन्मा है
कवि नही तो टीचर बनना है ।।

केरियर का सवाल है
जन्मों का करना ख्याल है ।।

नेता बनना आसान नही 
इस बात पर करना यकीं ।।

चल छोड़ ''शिवम" खाना खाले
नेता भी हैं आज आने वाले ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 26/10/2018



26/10/2018
हाइकू 
1
चुनावी मेला 
मतदाताओं ने झेला 
नेताजी रेला 
2
चुनाव पास 
नेता बंधाते आस 
तोड़े विश्वास 
3
चुनावी मंच 
नेताओं का प्रपंच 
वादे प्रत्यंच 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून 
उत्तराखंड


विधा .. लघु कविता 
**********************
🍁
लोकतंत्र का उत्सव कहते है जिसे चुनाव।
आओ सब मतदान करे चुने अच्छी सी सरकार॥
🍁
बडे-बडे वादें भी होगे भाषण सुबहो शाम।
नेताओ की नौटंकी से पकोगे जैसे आम॥
🍁
जात -पात की बात भी होगी भूली बिसरी बात।
चरण चटोरे बन जाएगे जिसे कहते हो नेता आप॥
🍁
जनता के निर्णय से बनेगी योग्य सफल सरकार।
शेर कहे तैयार रहो आ रहा 2019 का चुनाव॥
🍁
स्वरचित .. Sher Singh Sarraf

देखो फिरसे आवा चुनाव 
नेता भागे गाँवे - गाँव
पहुचे घर औ हमसे बोले , 
बूड़ै न देव भैय्या हमरी नाँव
देखो फिरसे आवा........
भैय्या हमहूँ बोल पड़ेन , 
बहुतै लूटेव अब न खाव,
औ 5 साल बाद फिर आएव है,
शुक्र यही है , की चलेन जाव
हम बोलेन की वोट न देबै ,
का कै लेहव हमका बताव ,
हम वोट तौ वहका देबै ,
जे सुध लिहिन ही ठाव - कुठाव
इतना सुनकै मुँह वै फेरिन ,
जुरतै भागे दुसरे गांव ,
अब जनता से अपील है हमरो
ये जनता का चाहे वहिक जिताव।
देखो फिरसे.....
स्वरचित
कवि देवेश "निर्मल"

विधा-कविता 

***********
राजनीति में हो रहा तनाव, 
लगता है आ गये फिर चुनाव,
नेताओं की कसरत हो रही, 
गरीबों की खूब सेवा हो रही |

नेता जी के जुड़े दोनों हाथ,
चुनाव जीतने तक जनता के साथ, 
वादे करेंगें बड़े वो खास, 
वाणी में है उनकी बड़ी मिठास |

पाँच साल पहले आये थे, 
ख्वाब बड़े सुन्दर दिखाये थे, 
रोजगार की कही थी बात, 
युवाओं के कंधे मे रखा था हाथ |

चुनाव जब नेता जी ने जीता, 
जनता से मोह एकदम छूटा, 
अपनी ही झोली भरते जनाब, 
इनकी नहीं होती कोई जुबान |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



*****
अति श्रेष्ठ संकलन की प्रक्रिया,
चयन कठिन शुचि उचित प्रक्रिया,
बहुविकल्प उपलब्ध धरा पर,
चुनकर पृथक्करण प्रक्रिया।

उचित और अनुचित का अन्तर,
तनिक सिखाती चयन प्रक्रिया,
मार्ग उचित का चयन सदैव शुचि,
आधारमूल होता भविष्य का।

प्रबल प्रेरणा आत्मिक एवम,
भाव और श्रंखला विचार की,
विवेकपूर्ण चिन्तन उपरान्त,
उचित कराते चयन संकलन।

सांसारिक नश्वरता आसक्ति,
मनभावन एवम आकर्षक अति,
दुख कष्टों का मूल सर्वथा,
चयन हेतु मानवता उत्साहित।

माया एवम ब्रह्म शक्ति के,
युगल विकल्प धरातल पर शुचि,
मानव विवेक आधिरित मात्र,
करे चयन जीवन के हित में।
--स्वरचित--
(अरुण)


"चुनाव "
देखकर चुनावों का मंजर
दिल में पड़ते हैं खंजर 

आम जनता है बेहाल
नेताजी के वादे नाकाम 
पाँच सालों के बाद 
दर्शन देते आज

उम्रभर जो भूखे सोते
मिलते उन्हें चुनावी पेड़े
जनमानस हैं बहुतेरे
सदैव रहते उनको घेरे

जनसभाओं में देते भाषण
दिखाते हैं खूब अनुशासन 
विपक्ष का मुद्दा उछाल
बतलाते स्वयं को महान

कार्यों की नई नई आधार शिला 
चुनाव में गाँव व शहरों को मिला

प्रलोभन देकर भीड़ बटोरना
रैली की है चुनावी शैली
नेताजी के बड़े उपकार
चुनाव में करते सबके सपने साकार

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल




आये है चुनाव अब हर नेता नजर आयेंगे
आज वोट मांग लेंगे ये कल फिर भुल जायेंगे

आज छुएंगे ये पैर भी कल नजर नहीं आयेंगे
आयेगी विपत्ति कोई तो ये उल्टे पांव भाग जायेंगे

ऐसे है ये नेता हमारे हमें ही बरगलायेंगे
एक दुसरे की जान के ये प्यासे बना जायेंगे

घोल देंगे जहर ऐसा कि हम संस्कार भुल जायेंगे
धर्म की आड़ में ये दंगों के गंदे खेल खेल जायेंगे

जात पात पर ये फिर हमें ही आपस में लड़ायेंगे
देख दंगे भड़कते ये उल्टे पांव भाग जायेंगे

फिर पक्ष विपक्ष पर आरोप ये ही लगायेंगे
अपनी राजनीति को ये लाशों पर भी चमकायेंगे

आये है चुनाव अब हर नेता नजर आयेंगे
झूठ के पुलिंदो से ये वादे कई कर जायेंगे

अपनी ही धुन में ये सबकुछ भुल जायेंगे
कल फिर ये मंत्री बन भ्रष्टाचार कर जायेंगे

आमजन की कमाई से अपनी जेब भर जायेंगे
प्रचार प्रसार के नाम पर करोड़ों फूंक जायेंगे

स्वरचित :- मुकेश राठौड़
 कुछ वादों की हवा चली
कुछ मुलाकातों की हवा चली
कहीं तानाकशी का दौर है
कहीं झूठी अफवाहों का जोर है

अब बेरोजगारों का आया ध्यान
लगता है पास में है चुनाव
पेट्रोल के दाम कुछ कम हुए
लगता है अब दिन ठीक हुए

अब हर जाति धर्म की चिंता
उनके हितों का उठता मुद्दा
तब तक सबको गले लगाते
जब तक चुनाव निकट नहीं आते

वोटों की यह कैसी माया
यह कोई अभी तक जान न पाया
वोटों के लिए घर-घर जाते
फिर सालों तक नजर नहीं आते

मंहगाई बेरोजगारी इनका मुद्दा
ऊपरी मन से करते हैं चिंता
असल में यह है वोटों की प्रीत
फिर सब भूल जाते चुनाव बीत
***अनुराधा चौहान*** मेरी स्वरचित कविता


सपनों का चलचित्र,
और यथार्थ की गच्चा-गीरी है,

ये चुनाव-उनाव कुछ नही साहब,
बस लोकतंत्र की टुच्चा-गीरी है,

फन स्वेत वस्त्रों में लपेटे,
घूमते विषतन्तु-विषधर,
हो रहा लज्जित गिरगिट,
इनके रंग परिवर्तन पर,

करवद्ध होकर है खड़े,
उसी 'लोक' के सन्मुख,
पा आशीष जिनसे 'तंत्र' का,
थे बने राजा हुये थे विमुख,

है विवश जनता चुने किसको,
है जो कम अयोग्य या,
जो विल्कुल अयोग्य उनको,

है कौन जो जिसे चुने हम,
कुछ चोर-उचक्के, चमचे,
और उनकी चमचा गिरी है----

ये चुनाव-उनाव कुछ नही साहब---
बस लोकतंत्र की टुच्चा-गीरी है----

पर नेता भी कहाँ दोषी है,
हमारे यहां तो मत-दान होती है,

अब दान का एहसान कैसा,
त्याग का अभिमान कैसा,

जब दे दिया तो दे दिया,
अपना धर्म समझ कर,
अब वो लूटेंगे देश को,
अपना कर्म समझ कर,

होने दो उन्हें धनिक,
अपने हिस्से तो फकीरी है----

ये चुनाव-उनाव कुछ नही साहब---
बस लोकतंत्र की टुच्चा-गीरी है----

वो डाकू है तो क्या?
हम दूध के धुले थोड़े हैं,
हमने भी तो रोटी-बोटी-
मदिरा के साथ तोड़े हैं,

जब हम चुनाव में,
अपने स्वार्थ साधते हैं,
तो वो भी वर्षों अपनी,
मर्यादा को लांघते हैं,

जाति-धर्म का,
आधार चाहिये,
सबको अपने बाप की,
सरकार चाहिये,

जब तुमको बटना है,
तो टुकड़ों में बटते रहो,
बकरे हो नियति यही तुम्हारी,
जात-पात के नाम पर कटते रहो,

तुम्हे अगर शौक है,
हर शै से चिता जलाने का,
तो उन्हें हुनर है,
रोटियां बनाने का,

चुनाव उत्सव नही सबक है,
अपनी गलतियां सुलझाने का,
लोक ही स्वामी है तंत्र का,
यही मौका है बताने का,

सम्भल जाओगे,
तो बच जायेगा,
नही तो लोक बिना,
तंत्र का हो जायेगा---

यही इसका तत्व,
यही जागीरी है---
नही तो------
ये चुनाव-उनाव कुछ नही साहब,
बस लोकतंत्र की टुच्चा-गीरी है,

.....स्वरचित, राकेश पांडेय

चुनाव की चक्की फिर से चल पडी है
भाषणों की आंधियां फिर से चलने लगी हैं
घोल रहे नेता आश्वासनों में मधुरता,
सबको ही महीन पिसाई करने की पडी है।
अब सब पांच साल बाद आ रहे हैं। 
आपके श्री चरणों में निशदिन 
अपना मस्तक झुकाने और 
झुका कृष्ण मुख दिखाने आ रहे हैं।
आप बस तैयार रहें अपना अमूल्य मत देने
और जिताऐं चुनाव 
अपने धुरंन्धर नेताओं को निरंतर पांच बर्ष
सिर्फ़ हरा चारा चरने अपनी जेबें भरने
और आराम से टांगे पसारकर सोने।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.





विधा :: दोहे 

नेता भाषण दे रहा, चुनाव का अभियान...
झांसे से बचना सभी, बोल रहा शैतान....

चुनाव की महिमा बड़ी, नेता मुख गुणगान...
नेता वो ही तुम चुनो, जिसकी हो पहचान... 

सेवा मेरा कर्म है, सेवा ही अभिमान.... 
वोट मुझे ही दीजिये, जन-हित मेरी शान...

जन इक उठ बोला तभी, सच्ची तेरी बात...
पांच वर्ष पर थे कहाँ, कहाँ तेरी जमात....

मत पीटो अब ढोल तुम, न करो अपनी बात....
वोट न होगी धर्म पर, अरु जात नहीं पात...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२६.१०.२०१८


Nawal Kishore Singh चुनाव
रीति-नीति सब कर निषिद्ध
मसतायेंगे चील,गिद्ध
कौओं के काँव काँव होंगे
जो माननीयों के चुनाव होंगे
एक बार फिर से देश में
घूमेंगे भेड़िये भी सफेद वेश में
उड़ेगी कड़क नोटों की गड्डियां
बंधेगी गांधारी-सी पट्टियाँ
आमजनों के सरल नेत्र में
कुछ गुमशुदा भी, दिखेंगे क्षेत्र में
वोट मांगेंगे हाथ जोड़कर
धरम,जाति का भाव मरोड़कर
चन्द दिन में वे चले जायेंगे
लोग तो वैसे ही,छले जायेंगे
फिर भी हमें इसपे गर्व है।
ये लोकतंत्र का पर्व है।

-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




पांच साल के बाद
लगी है दिल पर
जो गहरी चोट ।
आगये सहलाने 
फिर वह घाव
कर रहे झूठे
वादों के साथ 
जोड़कर अपने 
दोनों ही हाथ
चिरौरी विनती 
करते.हैं साथ 
देना हमको ही 
फिर से वोट ।
मुखौटे बदले
धरे स्वरूप 
नही है कोई 
अपने रूप ।
चुनावी बदलें 
सबने हैं.रंग 
नही अब कोई 
किसी केसंग ।
उषासक्सेना/स्वरचित
हो गयी चुनाँव से पहले आचार संहिता लागू
अब दुश्मन भी कर रहा पाँव लागू ।।

मक़सद एक ही ,कुर्सी उसे मीले
शरारत भी शरीफ़ होकर मिल रही गले ।।

वादों की फुलझड़ियाँ भी तड़क रही
सत्ता मिलते ही यादें गुम हो रही ।।

कोई कसर नही बखांन खुद का करने
उलजुलूल बातों से सत्ता हथियाने ।।

पैदा होती है चमचों की भी अजीब सी नस्ल
स्टील, प्लास्टिक, लोहा, सोना, सबकी भाषा जैसे मुस्ल ।।

गढ़े मुर्दे कहाँ कहाँ से उकर के आते
कुछ नही तो करें छिछोरी बातें ।।

गोरख धंधे सालों से है अपनाए
मैं नही तो परिवार का कोई तो आए ।।

ग़ैर को अपनाकर स्नेह को देते धक्का
माँ बाप को भी नहीं छोड़ते मारने तमाचा, मुक्का ।।

सयानों के दम पर वतन में ख़ुशहाली
उल्लू तो जमूरा बनकर बजा रहा थाली ।।

स्वरचित
डॉ नीलिमा तिग्गा (नीलांबरी )

शुरू हुई सर गर्मी चुनाव की
ऋतु आ गयी मोल भाव की

सौदेबाजी चल रही जोर से
हर दल गुजरे डर के दौरसे
घड़ी आ गई बड़े तनाव से
शुरू हुई सरगर्मी चुनाव की
ऋतु आ गयी मोल भाव की

माना दल बहुमत से कम है
किन्तु कहीं कोई न गम है
न बात लेनदेन के अभाव की
शुरू हुई सर गर्मी चुनाव की
ऋतु आ गयी मोल भाव की

जनता ही यह पद है दिलाती
अपने किए पर वो पछताती
सहती मार बदले हावभाव की
शुरू हुई सर गर्मी चुनाव की
ऋतु आ गयी मोल भाव की

सियासी चूल्हे की तप्त देख
हर नेता रहा अपनी रोटी सेंक
स्थिति बनी जबर्दस्त खिंचाव की
शुरू हुई सर गर्मी चुनाव की
ऋतु आ गयी मोल भाव की

रंजना माथुर
जयपुर (राजस्थान )
मेरी स्व रचित व मौलिक रचना
©

चिंतन मनन करो समुचित,

चयन करो जो पथ है उचित।

हो गए तुम यदि दिग्भ्रमित,

हो जाओगे सफलता से वंचित।

चयन लक्ष्य जो है अपेक्षित,

परिश्रम हो सदा वांछित।

श्रम से भागे जो किंचित,

फल न मिलेगा कभी इच्छित।

त्याग वासनाएं सदा अनुचित,

सत्पथ, सत्कर्म सदा ही उचित।

आकर्षण यौवन का किंचित,

कर देता है सदा पथ से भ्रमित।

चयन उचित जीवन हर्षित,

चयन सत्संगति जीवन गर्वित।

चयन प्राप्ति सदा मनोवांछित,

चयन सुधर्म जीवन पुष्पित।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

विषय-चुनाव
लघु कविता
जब से घोषित हुई तिथि है,
नेता जी की जान फंसी है।
बैठे सोच रहे चुनाव की,
बिसात फिर से बिछी हुई है।

तड़के वे घर से निकलेंगे,
झोली अपनी फैलाएंगे।
हर घर की दहरी पर जाकर के,
वो राग वोट का ही गाएंगे।

भूलेंगे वह भूख प्यास को,
भूलेंगे सब जात पात को।
अपने झूठे वादों के बल,
बिछवाएंगे वोटों कि बिसात को।

आओ सबको सचेत करें हम,
नेताओं से बच कर रहें हम।
इन पर ना विश्वास करें
बस वोट काम के नाम करें हम।।
(अशोक राय वत्स) जयपुर
स्वरचित 7665994959

शब्द भले ही कहलाए सीमित
सक्रिय बनकर एक महाभियान
दम पर इसके सत्ता की क़ीमत
लोकतांत्रिक भारतवर्ष महान 
रैली पोस्टर नारो की कहानी
वोटिंग कर्तव्यबोध निशानी
प्रांत अलग पार्टियों में भिन्नता
अपनी ताक़त का भेद बताता
सबका अपना चुनाव चिह्न
वोटर उस पर मोहर लगाता
धन बल का ख़ूब मचता शोर
किसी दंगल से कम ना लगता
छद्म रूप का तीर लगाता
वोटर की जब आती बारी
असमंजस में लगती मति बेचारी
उसके वोट का कौन अधिकारी ?
यह निर्णय बहुत कष्टकारी
भाई भतीजावाद बाहुबली लगाए घात
वोटर की सुनते ना कोई बात
आधी जनता करती मतदान
आधी जनता रहती अनजान
वोटों की महत्ता कैसा अज्ञान
इठलाती उसको नगण्य मान
चुनाव में अपने मत का रंग भरो
नर नारी मिलकर वोटिंग करो
उम्मीदवार की योग्यता पहचानो
रामराज्य स्वप्न साकार बनाओ।
स्वरचित
संतोष कुमारी



फिर आया चुनावों का मौसम
ये मौसम बहुत रंगीन हैं
रोज नये नये नेता, लड़ रहे जंग हैं।

कौन असली है कौन नकली
भेद न कर पाये हम
उनके लच्छेदार बातों से
फिर से पिघल जायेंगे हम

एक बार मतलब सध जाये तो
आँख उठा कर न देखेंगे
चुन कर हम उनको अपना नेता
अपना भविष्य हम सौंपते हैं

परवाह नही उन्हें हमारी भविष्य की
अपनी झोली वे भरते हैं
एक ही थैली के सब चट्टे बट्टे
बेकार ही हम सिर धुनते है

उन्हें करनी है अपनी मनमानी
सौ दाँव पेंच वे खेलते हैं
चुनाव जीत जाने पर
अगली चुनाव तक चुप रहते हैं

पर जो अपनी वादों के पक्के रहते
जनता का प्यार वे पाते है
नही तम्मना उन्हें धन दौलत की
नही नाम के लिए वे जीते हैं

जो होते है सच्चे नेता
चुनाव जीत कर देश की सेवा वे 
करते हैं।
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।




 बज गया चुनाव का डंका
समय आ गया नेताओं का वोट माँगने का 
देश हित की झूठी बातें करने का 

चिकनी चुपड़ी बातें करके जनता को मूर्ख बनाने का .

चुनाव और राजनीति की अलग हैं कथा जबानी 
लिखे जो वायदे पुरे करने के उनको हाँ ना समझना 
नये लोग आते हैं नये रंग ढंग में किरदार पुराने हैं
नई हैं जनता नये हैं नेता पर बातें वही झूठी पुरानी हैं .

चुनाव और राजनीति ने नेताओं को क्या सीखा दिया 
बड़े बड़े नेताओं को जमीं पर पहुँचा दिया 
चुनाव और राजनीति में हर रंग अपनाया जाता हैं 
वक्त आने पर शत्रु को मित्र बनाया जाता हैं .

चुनाव की लहर कुछ कदर आती हैं 
जनता में मीठे वादों का जहर फैलाती हैं
दुश्मन को दोस्त दोस्त को दुश्मन बनाती हैं 
हर कदम झूठे वादों का पुलिंदा बनाती हैं .

चुनाव और राजनीति के रंग में ना डूबो
वीरों की कुर्बानी को भी याद कर लो 
झूठे वादे छोड़कर जग भलाई कर लो 
सियासत के हमदर्द बनने से पहले किसी के दिल का दर्द जानो और समझो .
#स्वरचित :- रीता बिष्ट




चुनाव एक अति कठिन प्रक्रिया
जन्म से पूर्व हीहो जाती है सकिरय
माता पिता करते हैं चुनाव
बेटी हो कर पैदा होने का चुनाव
अगर न चला ये तीर
जीवन मिल भी गया 
तो लालन पालन के ढंग का चुनाव
कुछ दूर चले तो फिर बढा चुनाव
विद्यालय के नामों की बढी पंक्ति
फिर शुरू चुनाव की कठिन प्रक्रिया।
बचपन इस परीक्षा से निकला
लो शुरू हो गई चुनाव कीकठिन प्रक्रिया
महाविद्यालय का चुनाव
व्यवसाय के चुनाव की कठिन प्रक्रिया

कुछ बदल गया कुछ बदलेगा
पर नहीं छूटेगी चुनाव की कठिन प्रक्रिया
जीवन के रिश्ते चुनने की कठिन प्रक्रिया।
बस यही है जीवन का सत्य
जीवन है इक कठिन चुनावी प्रक्रिया।
स्वरचित
सुषमागुप्ता




🎊चुनाव 🎊

जी
वनसाथी 
समुद्र वृत गहरा 
सही चुनाव 
🌹
मान सम्मान 
राजनैतिक बल
शानो शौकत
🌹 
देश भविष्य 
डकैत अपराधी 
चुनाव हाथ 
🌹
जन सुजान
आटा दाल पेट्रोल
लड़े चुनाव
🌹
चुनावी मोड़ 
खूंटी धरे सिद्धांत
नियम तोड़
🌹
निरक्षरता
चुनाव प्रचारक
सुंदर स्वप्न
🌹
स्वरचित-आशा पालीवाल पुरोहित राजसमंद



विषय,चुनाव
बजा दिया है बिगुल ,
समय चुनाव का आया है
दोगले नेता मुख पर मुखौटा लगाये
अन्याय और अनैतिक के खातिर 
घमासान मचाने आये है
चिकनी चुपड़ी बातें करके
जनता के मन को लुभाने आये हैं
नेताजी कुर्सी पाने की खातिर
क्या क्या ढोंग रचाये है
नेता तो वादे पे वादे करते
झूठे ख्वाब दिखाते है
जहाँ नही गये वर्षी से
उन झुगी झोपड़ीयो मे आते है
जनता की देख दुर्दशा 
घड़ियालीअश्रु बहाते है
उन गरीबों के दिल में जगह बनाने को
सूखी रोटी तक खा जाते हैं
हर पाँच साल के बाद
इन्हें रिश्ते नाते याद आ जाते हैं
अब तो इन्हें चाचा चाची बुआ
मौसा मौसी ताऊ ताई सारे 
रिश्ते याद आ जाते है
देख जनता को अब तो 
इनके भाव यू बदल जाते हैं
यदी भिखारी भी सामने आ जाये
तो चरण भी उसके तबाते है
शर्म लाज छोड़ कर ये
तो वोटो मे जुट जाते है
इनके बहकावे मे आकर 
गलत निर्णय मत लेना
आज आया समय फिर 
झ्न पाँच वर्ष को मत खोना
जो भी करना तुमको करना 
अपने विवेक से तुम करना
याद रहे ह्रै प्रश्न राष्ट्र का 
गलत नेता तुम मत चुनना 
स्वरचित हेमा जोशी



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"स्वतंत्र लेखन"26मई 2019

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