Sunday, October 7

"ऋतु"06अक्टूबर 2018

ऋतु कलाएं जीवन महकाएँ
हर ऋतु नव मकसद बतलाए
धूप-छांव सी बन यह आती
नित -नित नव सृजन बतलाती।

जीवन ऋतु समान रूप में

बाधा से लड़ना सिखलाती
जेठ दोपहरी सहन जो कर ले
वसंत ऋतु आगे आ जाती।

मर्म ऋतु का जानो मिलकर

सदा न जीवन रहता मधुकर
सीखो सब इनसे अठखेली
जीवन ऋतु बनी अलबेली।

तपना, खिलना और सँवरना

मंत्र ऋतु का यही समझना
समझ परिवर्तन जो यह जाता
जीवन उत्तम वही बनाता।

भूत,भेद,मंत्र,मधु और मान

ऋतु चक्र में सदा रहता विधमान
जान ज्ञान जो इसका जाता
जीवन ऋतु रूप सदा महकाता।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ

स्वरचित



ऋतु🌻🌻
ऋतु जनित।
अनुपान सदैव।
स्व
ास्थ्य प्रद।
🌻🌻🌻🌻
षष्ठ ऋतु में।
बसंत ऋतु सदा।
मनमोहक हैं।
🌻🌻🌻🌻
ऋतु ऋतय।
सत्य सनातन का।
पर्याय रहा।
🌻🌻🌻🌻
ऋतुचर्या में।
भोजन प्रबंधन।
हितकारी है।


ऋतुओं की आवाजाही
करती है हमको उत्साही ।।
कुदरत को भी नगवार है

सदा एक सा रहना भाई ।।

मानव कुदरत का अभिन्न अंग
क्यों न बदले ऋतुओं सा रंग ।।
क्यों हम उल्टी चाहत रखते 
क्यों आखिर ये सोच है संग ।।

जो सम्भव ही नही ''शिवम"
उस सोच में क्यों करे है गम ।।
भूल नही तो क्या कहें यह
क्यों आखिर नादान हैं हम ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 06/10/2018



मनभावन ऋतु सावन आई
संग अपने खुशहाली लाई
चहुं ओर बिखरी हरियाली
हरियाली की देख के शोभा
मस्त मगन सब झूम उठे
देख के उनका यह नर्तन
थिरक उठी नन्ही बूंदें भी
चली पवन पुरवाई
गाए कोयल मतवाली
सुन कोयल की तान
दामिनी तड़ तड़ तड़के
दामिनी की तड़क से
सावन भी जम कर बरसे
चली नदियां इठलाती
मोर पपीहा नाच उठे
करने वसुंधरा का श्रृंगार
इंद्रधनुष निकल के आया
देख धरा की धानी चूनर
झरनों ने सुमधुर राग सुनाया
यह सुंदर छवि देख
तरुवर झूम के गाएं
विरहणी को यह संदेश सुनाएं
पिया मिलन की ऋतु आई
सखी पड़ गए झूले
सावन ऋतु आई
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना



***********************
ऋतु अाये ,ऋतु जाये,
अपना स्वभाव दिखाती जाये, 
कभी सूरज संग खूब चमके, 
गरमी का एहसास कराये, 
शीतलता की अहमियत बताये, 
ऋतु आये, ऋतु जाये |

ऋतु शरद की जब आये, 

सर्दी संग त्यौहारों की सौगात लाये, 
दशहरा, दिवाली देखो आने वाली, 
खुशियाँ खूब घरों में छाने वाली ,
खेतों में धान की बाली पकने वाली,
ऋतु आये ,ऋतु जाये |

लो अब आ गया ऋतुराज बसंत, 

महक जाता है हर घर का आँगन, 
खेतों में पीली सरसों लहरायें, 
खुशियों के संदेशे लाये,
ठंडी धूप मन को खूब भाये,
ऋतु आये, ऋतु जाये |

मानसून की ऋतु जब आये, 

मेघराज खूब गरजाये,
रिमझिम बारिश की बौछार हो जाये, 
मन मयूरा मस्त नाचता जाये,
धरती की प्यास बुझाये ,
ऋतु आये, ऋतु जाये |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*



(ऋतु)
****

प्रक्रिया प्रकृतिगत परिवर्तन,
शुचि भूमण्डल के अन्तर्गत,
शिशिर ऋतु से सुखद बसंत तक,
मात्र षष्ठ ऋतु स्वदेशान्तर्गत।

कामदेव सुत ऋतु बसन्त सम,
ऋतुराज चारु बसुधातल पर,
अवतरण धरा पर ऋतुराज का,
पुलक विकीर्णित भू कणकण मे।

तरुवर के नव -पल्लव विहँसित,
वल्लरी लिपटती द्रुम हरित वक्ष,
भ्रमरावलियाँ मकरंद आस में,
व्यस्त तनिक पुष्पों के रसपान में।

पुलक प्रकट करती प्रकृति नित,
भूगर्भ सुसंचित अतुलित कंचन,
मलयानिल शीतल मंद सुगंधित,
पुष्प सुवासित अवनी उर अंचल।

निर्झर के मनभावन सुखदा स्वर,
मधुस्वर कोकिल के पंचम से,
सागर की सुर लय में सरगम शुचि,
ऋतुराज अवतरण समवेत बधाई
--स्वरचित--
(अरुण)




Renu Ranjan
ऋतुराज का आगमन
---------------------

फिजाओं में,
हर जगह
हर दिशा
हर कोने-कोने में
बसंती बयार बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

ऋतुराज के आते ही 
हर ओर अजब-सी
सुगंधी फैली है 
मदहोश करने वाली 
रंग-बिरंगी समां
चारों ओर बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है।

पुष्पलता के 
ढेरों परिवार 
रंग-रंगीली रूपों में
अवतरित होकर
अवनि के आंचल में
सौरभ बिखेरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

ऋतुराज की रानी
सज-धज कर
सबको खुब लुभाती
जीव-जगत में
मधुर मिलन की आस जगाती
सब ओर महक बिखरी है,
करके सोलह श्रृंगार 
अवनि खुब निखरी है ।

रेणु रंजन
(स्वरचित )
06/10/2018


ऋतु शरद मन मोहिनी

मम मन हरषाये,
कान्हा की सांवली सूरत,
प्रीत उमंग जगाये,

निशा शरद पूनम की धौली

रास रचाऊं सांवरे कान्हा संग,
जाकर संग गोपीयों के,
मन में भरे उल्लास के रंग

प्रकृति भी मनमोहक छटा

बिखरे ऋतु शरद में अपनी,
धुन बंशी की सुनकर,
महक उठे मस्ती में अपनी

फूले कलियां भंवरे गाए

धुन बंशी की सबको लुभाये,
पशु पक्षी भी दौड़े आए
संग कान्हा के मन बहलाये

मंद मंद पवन के झोंकों से,

प्रकृति नव यौवन पर ईठलाये,
मधुर मधुर कलरव से,
मधुवन को चहकाए,

सरीता बहे सर सर सर

झरने झरे झर झर झर
वन कानन भरे सुर
बहे पवन सर सर सर

स्वरचित :- मुकेश राठौड़




ऋतु प्यास बढ़ाती है अपनी |
ऋतु प्यास बुझाती है अपनी |

जीवन में हो खुशियाँ तो फिर ,

ऋतु तान सुनाती है अपनी |

घुटने लगता है दम अपना ,

ऋतु जान बचाती है अपये जीवन भी ऋतुओं की भांति,
कभी पतझर कभी बसंत हो जाऐ।
मानव भी बन जाता खलनायक,
पता नहीं कब निष्ठुर महंत हो जाऐ।

आज शरद ऋतु आई मानें तो,
ग्रीष्म ऋतु कल आ जाऐगी।
कभी बर्षा पावन ऋतु आती,
परसों अन्य बदल आ जाऐगी।

ये आवागमन होता ही रहता है
यह प्रकृति ने नियम बनाया।
नित प्रयास इसे तोडने हम करते,
जिसे परमेश्वर ने स्वयं बनाया।

अपने पैर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।
बृक्षों को हम नित काट रहे हैं।
कहाँ रह पाऐ हम स्वयं संतुलित,
क्यों अपने गले ही काट रहे हैं।

संस्कृति संस्कार हम भूले तो,
ऋतुओं ने भी मर्यादाऐं तोडीं।
पर्यावरण प्रदूषित किया हमने
प्रकृति ने सब मर्यादाऐं छोडीं।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.नी |





देखो न!
सावन का ऋतु आ गया है... 
तुम्हारे प्रेम से भींगा मन!
छंदानुवाद करने लगा है....
धूप से जले वन-उपवन में अब, रंगबिरंगा रंग समा गया है...
तुम कब आओगे...!

बादलों से होड़ 

लगा बैठी हैं मेरी पलकें...
आँसुओं से धुलकर यादें और भी ताज़ा हो गईं हैं
बाकी सब धुंधला गया है
बताओ न !
तुम कब आओगे...!

मेघ की गर्जनाओं का है शोर,

या कि मेरी धड़कनों का जोड़-तोड़...
है बन गई मेरे हृदय की पीड़,
हाए!तुम्हारी सुधियों की जंजीर...
मन बंधने लगा है
कहो न!
तुम कब आओगे...!

स्वरचित 'पथिक रचना'


ऋतु
रतिपति ऋतु पति के कंधों पर।

चलता था डाले बांहे,
छककर बैठ गया छाया में।
भर रहा देख लो आहें,
लिए अंक में उष्मायित, रति
अंचल वायु दुलारे,
क्यों न विजन में यह हम,
मनुज जीवन में पाये।
सांसो की भेरियां बज रही,
वक्ष नगाड़े नाच रहे,
ऋतु पति द्वारा गीतो की कुछ,
मादिन हेराफेरी हो।
अनजाने रागो से हमने,
गीत बहुत गाडाले।
अनपाये भावो के हमने,
प्राप्य सभी कुछ पा डाले।
चार दिनो की जीवन सरिता,
सूख चली अब गाना क्या,
जितना पाना था प्राप्त हुआ,
कुछ न रहा, अब पाना क्या।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण दास बसना।




सावन की ऋतु मन भावन

सावन के गीत लुभावन

मेरा तन,मन डोले ऐसे
सावन के झूलों जैसे
हरी धरती लगे सुहागन
सावन की ऋतु मन भावन
सावन के गीत लुभावन....

तन तरसे,मन तरसे
अखियां ही, अखियां बरसे
आ जाओ, तुम न जाओ
तुम बरसों बनके सावन....
सावन की ऋतु मन भावन
सावन के गीत लुभावन....

माधव बिन, मधुवन कैसे
मोहन बिन,सावन जैसे 
सावन है तुम बिन सूना
राधा है बिरहन जैसे
मेरे मोहन तुम आ जाओ
मेरा तरसे तुम बिन सावन

सावन की ऋतु मन भावन
सावन के गीत लुभावन....

मेरा तन,मन डोले ऐसे
सावन के झूलों जैसे
हरी धरती लगे सुहागन
सावन की ऋतु मन भावन
सावन के गीत लुभावन.... 
.......
राकेश चतुर्वेदी'राज'


वसंत ऋतु आई

चल रही मदमस्त पुरवाई 

आई आली, वसंत ऋतु आई।

महक उठी महुआ मतवारी 

बौरा गए आम्र की डारी
ओढ़कर वसुधा नवल चुनरिया 
ले उठी पोर पोर अंगड़ाई

आई आली वसंत ऋतु आई


नव कोपल हैं पल्लवित किसलय

झूम उठे ज्यों हो मदिरामय 
तन मन रेशमी चुभन जगाती
महक महक उठी पुरवाई 

आई आली वसंत ऋतु आई


नूतन उल्लास उमंगों का पलना 

ले आया फागुन अंगना अंगना
मादक गंध ले उठी अल्हड़ता
नवयौवन की तरुणाई 

आई आली वसंत ऋतु आई 


स्वरचित 

सुधा शर्मा 
राजिम (छत्तीसगढ़)

6-10-2018

ऋतु चक्र में आया परिवर्तन,

रौद्र रूप में प्रकृति करे नर्तन। 


बसंत ऋतु नहीं सुखद सुहावन, 


जबसे कट गए हरे भरे वन। 


न अब भंवरे करते गुन गुन, 


न तितलियां अब करती नर्तन। 


ग्रीष्म ऋतु धरती तपे ऐसे,


जलती हुई भट्टी हो जैसे। 


विकल हुए हैं नभचर-थलचर,


करते रहते हैं पीड़ा हर हर। 


बर्षा ऋतु अब है दुखदायी, 


ऐसी बर्षा किसे सुहाई। 


कहीं डूबे हैं पूरी नगरियां, 


कहीं बूंद को तरसे अखियाँ । 


रे मानव तूने क्या कर डाला। 


ऋतु चक्र ही बदल दिया सारा । 


अभिलाषा चौहान 


स्वरचित






अजब सी ठंडक हवाओं में हैं।
मिजाजे़ - मौसम बदल रहा है। 
है धडकनों में ये कैसी हलचल। 

करारे दिल क्यों मचल रहा है। 

तुम्हारी आंखें, तुम्हारा चेहरा। 
गुलाबी गालों पे है शर्म पहरा। 
सम्हालो फिसला है ये दुपट्टा। 
न तुमसे ये क्यों संभल रहा है। 

तुम्हारी यादों के आईने में । 
हजारों मौसम हैं दिल्लगी के। 
तड़पते साहिल की गोदियों में।
बरसता सावन उछल रहा है। 

विपिन सोहल






नमन मंच"
"शीर्ष क"ऋतु"
एक ऋतु आये, एक ऋतु जाये

यह जीवन में विविधता लाये
जब आये जाड़े की बात
गरम रजाई, सुखद एहसास

गुनगुनी धूप सबको लुभाये
पर्व-त्योहार उंमग जगाये
प्यारी प्यारी शब्जी हमारी
भोजन की थाली का शान बढा़ये

जब आये गर्मी की बात
अपलक निहारे गगन की ओर
गरम हवा हमें खूब सताये
पर गर्मी की छुट्टी बच्चों को मन भाये

जब आये बरसात की बात
अंमृत बूंद गिरे धरती पर
निष्प्राण जग मे न ई चेतना आ जाये
मेघखंड से आच्छादित नभ देख

झींगुर, मेढ़क टर्राये दिन रात
ज्यों वेद पढ़ें सारी कायनात
जब आये बसंत की बात
मन हरषाये, उमंग भर जाये

सभी पेड़ पहने नये परिधान
भौरों की गूंज ज्यों शहनाई
राधा संग कृष्ण रास रचाये
अपने श्री मुख से बात बताये

"मैं बसंत हूँ",जानो सब भाई
ऋतुओं मे श्रेष्ठ ऋतु आईं
स्वरचित-आरती श्रीवास्तव।






 नमन भावों के मोती 
विषय ऋतु
विधा कविता

दिन शनिवार 
दिनांक 6.10.2018

ऋतु 
🔏🔏🔏🔏

ऋतु का आॅचल विस्तृत होता
इसमें प्रकृति का सुर झंकृत होता
सबकी अपनी अपनी खूबियां होतीं
जिनसे सारा संसार उपकृत होता। 

गर्मी सर्दी और बरसात 
सबकी अपनी अलग बिसात
अलग अलग है धूम मचाती
इनकी सुबह दुपहर और रात। 

सर्दी की है धूप सुनहरी
गर्मी की गन्दी दोपहरी
अति वृष्टि दे देती है
प्राणियों को वेदना गहरी। 

फिर भी तीनों की है अपनी बात 
इनसे ही मिलती हमको सौगात 
तीनों ही तो देतीं हमको
फल सब्जियों की पूरी जामात।

बचपन यौवन और बुढ़ापा
जीवन और झुलसी मौत का छापा
इनको भी ऋतु ही समझ लो
इन्होंने सबका है जीवन नापा। 

स्व रचित 

सुमित्रा नन्दन पन्त







 नमन मंच को 
विषय ऋतू 
6अक्टूबर 2018

प्रस्तुति 1
विधा पद्द 
कविता 
ऋतू आती है ऋतू जाती है, 
हर ऋतू सन्देश देकर जाती है, 
ग्रीष्म ऋतू की गर्मी हमको, 
दुःख मे जीना दिखलाती है l
ऋतू आती..... 

फिर वर्षा ऋतू इठलाती आतीहै, 
गर्मी के प्रकोप से बचाती है,
फिर रोज रोज बरस कर,
प्रियसी को ख़ूब तड़पाती है l 
ऋतू आती.... 

शरद ऋतू जब आ जाती है, 
हमको बड़ा तड़पाती है, 
शीतल ठन्डे हाथ शीत के, 
सबको जीना बतलाती है l
ऋतू आती.....

अब बसंत ऋतू आती है, 
हरियाली चहुँ और छाजाती है, 
पशु पक्षी हो या मानव, 
सबको खुशियाँ दे जाती है l
ऋतू आती.... 
कुसुम पंत 'उत्साही '
स्वरचित 
देहरादून 
उत्तराखंड







 ❤️🙏🙏❤️
नमन भावो के मोती 
दिनांक 6/10/2018
ीर्षक, ऋतु
यह एक गीत बनाने की प्रथम कोशिश हमारी

ऋतु आये , ऋतु जाये, जाये जाये 
पिया मिलन की आस मुझे तड़पाये
आ आजा ओ,आ जाओ, ओ ओ
अब ना मुझे विरह अग्नि में यु जलाओ
सावन बीता, बीता बीता
शीत ऋतु भी आयी
पर पिया तेरी कोई भी खबर ना आयी
ऋतु आये, ऋतु जाये ,जाये जाये
ग्रीष्म ऋतु जब आये, मुझे और भी यू ,जलाये
अपने प्रेम की मुस्कान से मेरा मन शीतल कर जाओ, अब तो तुम ,आ जाओ,
पिया यु ना देर लगाओ
पतझड़ आया, उदासी लाया, लाया लाया
मेरी जवानी भी हो गयी अब तो
पतझड़ सी वीरानी
आ जाओ प्रीतम आ जाओ जाओ
ऋतु आये ऋतु जाये जाये जाये
बसंत ऋतु भी आयी, आयी
पर मेरे जीवन में कोई बहार न लायी
तुझ बिन सारी ऋतु लगे मुझे बेगानी
मेरे मन का कोई तो एहसास तुम जगा जाओ 
आ जाओ पिया अब तो आ जाओ 
ऋतु आये, ऋतु जाये ,जाये जाये 
❤️स्वरचित हेमा जोशी ❤️


























No comments:

'''धोखा/फरेब/विश्वासघात " 22मार्च 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |                  ब्लॉग संख्या :-335 ...