Thursday, November 15

"बाल दिवस "14नवम्बर 2018

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बचपन..... एक सुखद अनुभूति
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चलो लौट जाए फिर अपने बचपन में
जब बेवजह चीख़ने,चिल्लाने,रोने पर
कोई रोकता नहीं था
बेसबब हँसने ,नाचने ,गाने पर
कोई टोकता नहीं था!
हम अपनी मर्ज़ी के मालिक थे
अपनी आँसुओं की ताक़त से वाक़िफ़ थे।
ज़िदद पर आजाए तो अड़े रहते थे
बस अपनी बात पर डटे रहते थे ।
शाला जाना भी ख़ूब भाता था
और जब मन न चाहा तो
बहाना बनाना भी आता था।
पेट दर्द सबसे ज़्यादा काम आता था
बिस्तर पर पड़े कराहने में भी 
बड़ा आनंद आता था ।
त्योहारों पर मिठाइयों की भरमार 
और, माँ की आँख बचाकर 
रसोई में जाना बार बार
जल्दी से कुछ टुकड़े बर्फ़ी के हाथों में छुपाकर 
दादी/नानी की पुकार को अनसुना कर
दबे पाँव खिसक जाना
फिर आँगन के किसी कोने में 
स्वाद ले लेकर उसको खाना ।
बडा मज़ा आता था!
गरमी की तपती धूप में 
या, सर्दी की ठिठुरती शाम में 
दोस्तों के साथ खेलों में रम जाना
और कुछ नहीं तो किसी बेसिर पैर की बातों में 
ख़ुद को उलझाए रखना।
एक दूसरे की चुग़ली करना ,
छोटी सी बात पर 
मुँह फुलाकर रुठजाना
फिर , हँसकर उसे ही गले लगाना
बडा अच्छा लगता था।
छोटा बडा कोई न था,
तब मज़हब सबका एक था
मन सच्चा ,इरादा नेक था!
जन्म दिन की तो शान ही निराली होती थी 
दिन होली तो रात दीवाली होती थी।
नये कपड़े पहनकर शाला जाना
और,हाथ में चॉकलेट का डबबा पकड़े 
स्कूल में चक्कर लगाना
होमवर्क न करने पर भी 
मज़ाल कोई डाँट लगाता 
उलटा,हर कोई उस दिन प्यार जताता 
तोहफ़ों की ढेर लगाता ।
दिन भर हमारे उछलकूद से 
माँ,पापा, नाना नानी, दादा दादी परेशान रहते थे
रात वही मुँह चूमकर दुलार करने से नहीं थकते थे।
अब तो काँटों की डगर है
बडा मुश्किल सफर है ।
तब नहीं समझा,तब नहीं जाना
कया होता है बडा हो जाना 
दोस्तों,रिश्तों का छूट जाना 
अपनों से बिछड़ जाना ।
बच्चे थे तो बड़े होने की जल्दी थी 
माँ की तरह साड़ी डालना 
या, पापा की तरह गाड़ी में ठाठ से 
दफ़्तर जाने की जल्दी थी।
अब जाना कितनी उलझनें हैं जीवन में 
मन करता है लौट जाए फिर से अपने बचपन में !
काश! कि ऐसा हो पाता!
सबकुछ भूलाकर लौट जाना अपने बचपन में !
(C)भार्गवी रविन्द्र 




कुछ नमकीन सा आजमाना चाहता हूँ।
लुत्फ़ ए बचपन फ़िर उठाना चाहता हूँ।।

शरारत करते रहो, दिल रहे जवाँ
खर्राटों में दूसरे की नींद भगाना चाहता हूँ।।

चलते चलते बेर खाने का मज़ा कुछ ओर है
झूठी गुठलियाँ तरक़ीब से उड़ाना चाहता हूँ।।

सोयी बहना के भोली सूरत पर
मूँछे बनाकर सताना चाहता हूँ।।

दरवाज़े की ओट में छुपकर सब को
भों करके डराना चाहता हूँ।।

फ़टाकेँ फोड़ने का मज़ा कुछ इस तरह
हाथ में लेकर अनार जलाना चाहता हूँ।।

नाना के सफ़ेद बालों की बनाकर चोटी
बिंदी से उनका माथा सजाना चाहता हूँ।।

पीछे बांक पर बैठे अज़ीब सी आवाज़ निकालना
शिक्षक के नज़र पर हँसी दबाना चाहता हूँ।।

बचपन के दिन थे कितने सुहाने 'नीलांबरी'
फ़िर से एकबार गुज़रा ज़माना चाहता हूँ।।

स्वरचित
डॉ नीलिमा तिग्गा (नीलांबरी)
सर्वाधिकार सुरक्षित



बच्चों के लिए हम बनें उदार
धरा पर हैं यह एक उपहार ।
सृष्टि लेकर आई अपने संग
नन्हें मोतियों का सुंदर संसार ।।

नंद-यशोदा जैसे बनें पालनहार
इनके सपनों को करें साकार ।
राष्ट्र का भविष्य है ये नन्हीं जान
देकर मार्गदर्शन , दूर करें विकार ।।

बच्चों में होती प्रतिभाएं हजार
डांट-डपट से मत करों बेजार ।
जाति-धर्म से नही इनका नाता
भाईचारे के गुण इनमें कई हजार ।।

 गोपाल कौशल
नागदा जिला धार मध्यप्रदेश
99814-67300
©स्वरचित® 13-11-18

(1)
शैतानी खेल
बचपन बिंदास
घर था जेल
(2)
उम्र के घर
बचपन की यादें
हटाऐं जाले
(3)
कबाड प्रेम
बचपन की लारी 
जुगाड़ ढ़ेर
(4)
ख्वाबों से बना
बचपन घरौंदा
उम्र ने रौंदा 
(5)
निश्चिन्त भाव
बचपन सुस्ताता
ममता छाँव
(6)
स्वयं नवाब
बचपन फक्कड़
जेब में ख़्वाब
(7)
ख्वाबों से भर
बचपन की कश्ती
उम्र ले डूबी
(8)
बन के घन 
बचपन आकाश 
तैरता मन 
(9)
बचपन है 
उम्र के ढेर तले 
मुस्काती यादें 

ऋतुराज दवे



बचपन मेरा साथ नहीं है, 
फिर भी अहसास वही है l
उम्र का पंछी उड़ता रहता, 
पर मुझको अहसास नहीं है ll

नहीं होना है बूढ़ा मुझको, 
बस बचपन में जीना मुझकोl
क्यों चिंता करूं इस जीवनकी 
बचपन को ही सीना मुझको l

हँसले और हँसाये जा, 
जीवन धन्य बनाये जा l
जीवन दिन - रैन बसेरा है, 
क्या कुछ तेरा क्या मेरा है l

हँस हँस कर के जीते रहना, 
गमो को भी ख़ुशी से सहना l
दूर दुखो को कर देता है, 
यही है " उत्साही "का कहना l
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून




बच्चे अब बच्चे नही
पहले जैसे सच्चे नही ।।
दोष उन्हे ही क्यों दें
हम भी तो अच्छे नही ।।

हमने कितने बदले रूप
बना दिया समाज कुरूप ।।
वही सोच अनुवांशिक बनी
दिखती अब वह मूर्तरूप ।।

पहले हमें सँवरना है
सोच में रंग भरना है ।।
जो हमें चाहिये भला
उस पर खरे उतरना है ।।

बाल दिवस भी आया है
यह हमने ही बनाया है ।।
मतलब इसका जाना न 
शोर खूब मचाया है ।।

बच्चे तो हैं भविष्य कल का
उन्हे समय दो , दो पल का ।।
हाय तौबा कम करो , संग -
समय बिताओ हल्का फुल्का ।

अभी तो हैं ये कच्ची मिट्टी
है इनके अन्दर कौनसी चिट्ठी ।।
पढ़ो उसे परवाज दो प्यार दो 
मोहलत दो हस्ती बने हट्टी कट्टी ।।

स्नेह के ये हकदार हैं
ये बड़े वफादार हैं ।।
चाहे जैसा मोड़ो ''शिवम"
ये तुम पर ही भार हैं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 14/11/2018


शैली .. लघु कविता 
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🍁

मन के भावों को लपेट कर, शेर पुनः लो आया है।
भूली-बिसरी यादों के संग, बचपन का दौर सुनाता है॥
🍁

बडा ही सुन्दर सुखद था वो दिन, खुद मै खुद का राजा था।
जो चाहे करता था मै , कोई बंधन ना ही बाँधा था॥
🍁

भाई- बहन मे छोटा था तो ,सबका राज दुलारा था।
एक खिलौना सुन्दर सा, जो सबके मन को भाता था॥
🍁

धीर-धीरे खत्म हो गया, बालापन अब यौवन भी।
शेर का बचपन जाग रहा है, पढ कर के इस शीर्षक को॥
🍁

बचपन था तो सोच रहा था, काश बडा हो जाऊँ मै।
आज मगर ये सोच रहा मै, कैसे बचपन पाऊँ मै॥
🍁

बचपन का सम्पूर्ण समागम, सब कविता मे दिखता है।
शेर की कविता पौढ ना होगी, बचपन इसमे रमता है॥
🍁

स्वरचित .. Sher Singh Sarraf


बा
ल किरन जब भी मुस्कराती
हर आयु को तर कर जाती
पीड़ा में मरहम दे जाती
खुशियों की बारिश कर जाती।

निश्छलता का अमर उजाला 
अध्यात्म जगत का खुलता ताला
उत्साह उमंगों की लहरों से
मन हो जाता है मतवाला।

बच्चे हस्ताक्षर हैं भविष्य के
चन्दन हैं मानवता के शीश के 
कन्या भ्रूण भी तो अपने ही हैं
सबमें ही तो अंश बसे हैं ईश के।

बचपन कभी न मुरझाये
बचपन कभी न कुम्हलाये
सबके लिए उन्मुक्त उड़ान हो
इसमें न कोई कमीं आये।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

ऐ ज़िंदगी चल फिर से वही बचपना करते हैं
मिट्टी में लोटते हैं गलियों में भागते हैं।
बचपन की तरह कागज़ की नाव बनाते हैं
बारिश की पानियों में फिर नाव चलाते हैं।
चल फिर किसी के बाग़ से अमरूद चुराते हैं
यारों के साथ मिलकर खाते हैं खिलाते हैं।
फिर चोर सिपाही की वो आँख मिचौली हो
पिठ्ठू के गरम टप्पे फिर छुप्पन - छुपाई हो।
नानी की कहानी में परियां हो खूबसूरत
दादी की कहानी में राजाओं की हुकूमत।
करते हैं चलो फिर से वो मीठी सी शरारत
मीठी शरारतों में भोली सी वो मोहब्बत।
बदमाशियां बचपन की है याद बहुत आती
गुज़री वो मीठी यादें दिल से भी नहीं जाती।
मां की वो गोद प्यारी वो लोरियां वो झूले
पापा के कांधे बैठकर फिर देखते हम मेले।
ये बचपना क्या खोया बस ज़िन्दगी ही खोई
किस्से कहानियों की दुनियां भी सारी खोई।
"पिनाकी"
धनबाद (झारखंड)
#स्वरचित




है कल का सपना बचपन अपना, आइना ये बालमन का, 

चंदा तारे फूल तितलियाँ और गुब्बारे, ये सपना परियों का, 

मम्मी पापा दादा दादी भाई-बहन संग, चलता दौर कहानियों का, 

हमेशा चोरी चोरी करना मनभावन, न जाने कितनी ही शरारतों का, 

हाँ हाँ करना पर न सुनना मन से, अपने बडों की हिदायतों का, 

जब कभी माँ बाबा की डाँट डपट पर, छुप जाना दादी के आँचल का, 

स्कूल के संग संग चला गया वो बचपन, बस रह जाना शेष यादों का, 

कालेज और फिर परदेश चले जाना, और छुपाना अपने आँसूओं का, 

अब फिर से लौटआया है जैसे बचपन, जब आगमन हुआ बच्चों का, 

देखो छल कपट से अलग कितनी , भोली भाली स्नेहिल प्यारी यादों का ,

हम सहेज रखें बचपन बच्चों का , इनमें दिखता स्वरूप है रब का |

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,





बचपन तुम इक बार तो आओ

खेलेंगे हम आँख-मिचौली
मां की लोरी गा के सुनाओ
फिर से बोलें तौतली बोली,
बचपन तुम इक बार तो आओ l

मुनिंयां-धुनिंयां कहां गये सब
चलो रात में तारे गिनते,
चांद देख के कई दिन बीते
आज रागिनी गाएं मिलके, 
"हाड-मिरकली हरियो चोर
हरिये गी मां ने लेग्यो मोर"
ऐसी रागें मिलकर गाओ
आज समय नें करवट ले ली,
बचपन तुम इक बार तो आओ l

चल बसी है दुनिंयां सारी
इक-इक करके अपनें हमराज़,
कितनें रिश्ते याद करूं मै
टूट रहा है मन का साज़,
मिलता नहीं सकूंन जहां में
थोड़ी-थोड़ी यादें बाकी,
चलते-चलते चली गई
रह गई केवल बातें बाकी,
एक रात स्याही सी
जा रही जीवन की डोली,
बांध रहा है सपनों को मन
खेल चुके जीवन की होली,
बचपन तुम इक बार तो आओ l

कितनें बचपन यादों के
रंग, रंग कर भरमाते,
जाते जीवन, उलझे मन को
झलक दिखा कर समझाते,
आँख-मिचौली खेल जिन्दगी
भरती अरमानों की खोली,
ऐसे में मन को भरमानें
आ जाओ ले सूरत भोली,
मां की लोरी गा के सुनाओ
फिर से बोलूं तोतली बोली,
बचपन तुम इक बार तो आओ l

श्रीलाल जोशी "श्री "
तेजरासर (मैसूरू)
9482888215




सीखें दंश को भूलना
विपरीत परिस्थिति में झूलना
हर वक़्त बस खिलखिलाना
अपने ही रंग में सबको रंगना

हर मुसीबत को चिढ़ाना
माँ पापा को गले लगाना
भाई बहन को पुचकारना
दोस्तों में रमें रहना

जब से आई ये समझदारी
बचपन की मौज हारी
अब दुर्गुण सभी के दिखते हैं
स्वयं को ही श्रेष्ठ समझते हैं

चलो फिर मन बच्चा बना लें
जीवन की दुविधा घटा लें
ज़िन्दगी हल्की फुल्की बनेगी
हर संकट से दूरी तभी बनेगी

स्वरचित
स्वपनिल वैश्य " स्वप्न"
अहमदाबाद


बच्चे होते है मन के सच्चे 
गंगा सा पवित्र होता है मन 
फिर से जीने का मन करता 
कोई तो लौटा दे वो बचपन 

सुबह सवेरे सब स्कूल जाते 
साथ में बैठ के टिफिन खाते 
पलभर के होते लड़ाई-झगड़े 
फिरसे हम सब एक हो जाते 

मिलझुलकर सारे खेल खेलते 
कभी हारते और कभी जीतते 
भेदभाव जाति धर्म मिटा कर 
हंसते -खेलते वो दिन बीतते 

कक्षा कक्ष में खूब मस्ती करते 
कागज के हवाई जहाज उड़ते 
चाहे हमेशा गुरुजी डंडे मारते 
पर वो रिश्ते बड़े मजबूत जुड़ते 

सजा एक को मिल जाती तो 
दोस्त भी साथ में सजा काटते 
साथ में मुर्गा बनने का मजा 
और प्यारा सा अहसास बाँटते 

गिल्ली डंडा और कंचे खेलते 
छुपन छुपाई देर रात खेलते
सच्चे मन और यारी दोस्ती से
एक दूजे का दुख सुख झेलते

अब वो प्यारा बचपन नही रहा
डिजिटलयुग ने बचपन खा लिया
मोबाइल खा गया खेल खिलौने
कंप्यूटर ने सारा प्यार खा लिया

बाल बच्चों की सेवा करता और
उनकी खुशियों के लिये जीता है
बच्चों संग बच्चा बन जाता "जसवंत"
जीवन का असली रस वो पीता है

कवि जसवंत लाल खटीक 
रतना का गुड़ा ,देवगढ़ 
राजसमंद ( राजस्थान )



बचपन तुम बहुत याद आए
यादों के झरोखों से तुम मुस्काये
कोशिश उकेरू स्मृति की रेखाएं
स्कूल न जाने के अनगिन बहाने
अम्मा की धौल पर लगते चिल्लाने
कहाँ गई दादी,क्यों आई न बचाने
सुर सप्तम में बढ़ते जाते तराने
फिर दादी का आना,ममता लुटाना
मान-मनौव्वल, आँचल में छुपाना
अम्मा को देती दादी जो झिड़की
मन में थे खुलते खुशियों की खिड़की
दादी के खूंट से निकला चार आना
आँसू को पोंछना, मेरा मुस्कुराना
तैयार सम्मुख मतंगो की टोली
कुत्ते की भो भो,बन्दर की बोली
गाछी बिरछ से अमिया चुराना
पकड़े गए तो मासूम मिमियाना
मेड़ों पे लोटना, पेड़ों से छलांग
गिल्ली औ डंडा,कभी लंगड़ी-टांग
कुत्ते की दुम में बांध, फोड़े पटाखे
ताली बजाते फिर समवेत ठहाके
कांच के कंचे पड़े जो बस्ते में
डबलू ने छीने जबर रास्ते में
पड़ोसी के घर जलेबी पे टूटना
घर आके भैया से मनभर कूटना
सरेराह चिढ़ाए बजाकर के ताली
शिकायत लिए खड़ी बुलकी वाली
गुस्से में बापू खड़े थे ओसारे
दीदी बता देती करके इशारे
पिछले दरवाजे से घर मे धमकना
आँगन में भौजी पर बस तमकना
टिकट फटी गंजी में दिखता था ऐब
पहनता न कुरता अगर न हो जेब
कुरते में पॉकिट का चिप्पी चिपकाना
चुपड़ तेल दीदी का हिप्पी बनाना
कुछ कही, कुछ अनकही कथाएं
मुदित भी है पर मन शरमाए
बचपन तुम बहुत याद आए।

-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित



(विधा- छंदमुक्त स्वतंत्र))

ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं
गरमी की छुटियों को तगङे आलस में जी आऊं
भानुमति के पिटारे से निकलूं छोटी सी छोरी बन 
बाईस्कोप में मुंह ढाँप अपना छुटपन देख आऊं!!

आसमान में आंख टांग के कुछ पतंगे लूट लाऊं
पेङों की फुनगी तक जाकर बादल छू के आऊं
छुपन छपाई खेलूं सखा संग रूठूं और मनाऊं
मेरे दाम की बारी आये तो सब पर रोब जमाऊं
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं!!

लट्टू को रस्सी पे लपेटूं और दुनियां को घुमाऊं
गुल्ली डंडे से खिङकी के कांच फोङ के आऊं
रेलगाङी की पटरी से कुछ गुट्टे बीन के लाऊं
गोल गोल से कंचो में, काल्पनिक संसार बसाऊं
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं!!

हाथ गुलेल लूं निशाना साधूं ,पके आम टपकाऊं
सितौलिये पर गेंद को मारूं जोर जोर चिल्लाऊं
घोङा बादाम छाई के पीछे, सोटे से मार लगाऊं
राजा मंत्री चोर सिपाही सबको ये खेल खिलाऊं
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं!!

खो खो में यूं चौकन्नी हो खुद को ही खो जाऊं
सांप-सीढी पे चढी उतरती जीतूं कभी हार जाऊ
बारिश का पानी गडडों में छपाक छलांग लगाऊं
बरखा के बहते पानी में कागज की नाव चलाऊं
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं!!

रंग बिरंगी तितली पकङूं ,खुद तितली बन जाऊं
साईकिल के पुराने टायर संग जमके दौङ लगाऊं
चिङिया जब उङ जाये अंगुली से, भैंस भी उङाऊं
लंगङी टांग से छपट पटक के पलटी मार गिराऊं
ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं!!

-----डा. निशा माथुर (स्वरचित)

ना कोई बंधन, ना कोई चिंता
ना कोई छल, ना कोई कपट
निश्छल हंसी, सहज मुस्कान
बस ये ही तो है बचपन......

खिलौनो की दुनिया, भोले से ख्वाब
झट से दौड़ना, यहाँ वहाँ से कूदना
तितलियां पकड़ना, पतंग उड़ाना
बस ये ही तो है बचपन.....

हाथ गिल्ली डंडा, कभी बल्ला बॉल
कभी रंगों से, कभी मिट्टी से सने चेहरे
बहती हुई नाक, बिखरे हुए बाल
बस ये ही तो है बचपन.....

कहानियां सुनना, कविताएं सुनाना
गुड्डे गुड़ियां और बंदर भालू का खेल
पहाड़ो और प्रश्नोत्तर का जोर से रटना
बस ये ही तो है बचपन........

दादा दादी की गोदी, नाना नानी का प्यार
चाचा, मामा, बुआ, मौसी की मनुहार
साथ में बीच बीच मे मम्मी पापा की डांट
बस ये ही तो है बचपन.......

सरपट सरपट साइकिल को दौड़ाना
रुपये पैसे थामे गोली बिस्किट लेने जाना
दोस्तों से साथ फिर मिलकर खाना
बस ये ही तो है बचपन......

ये मेरा नही, वो तेरा नही
ना कोई दिखावा, ना कोई माया
सबकों जो अपना माने
बस वो ही है बचपन.......

ओ टी वी मोबाइल की दुनिया
मुझसे मेरा बचपन न छीनना
बस इसी रूप में भी है सुकून बाकी 
बस वो मुझे शान से जीने देना

#सुमन जैन
नई दिल्ली

फिर याद आया मेरा बचपन आज
ईट मिट्टी का घर था मेरा
था पूरा परिवार खुशहाल
भाई बहन हो या माँ बाप
सबका प्यार था बेशुमार

मिलों पैदल चलकर भी
मेला घुमना हमे था स्वीकार
मूंगफली के दानों मे भी
आते थे स्वाद बेशुमार

होली हो या दीवाली
पकवानों की होती थी बौछार
नही किसी से गिला शिकवा
नही ईगो की थी परवाह

कहाँ गया वो मेरा बचपन?
आ,तु,लौट के आ मेरे पास
सुख सुविधा युक्त मकान है मेरा
पर न रहा माँ बाप का प्यार
खाने मे न अब आता स्वाद

माँल ने छिना मेले का आर्कषण
पिजा ने लिया पकवान का स्थान
पैदल चलना तो दूर, स्वचालित
ने किया सीढ़ी का काम तमाम

ऐसे मे मैं अपना बचपन 
ढूंढ रही मैं सारा जहाँ
मन मे है बस एक मलाल
आ ,बचपन तू लौट के आ मेरे पास
स्वरचित-आरती -श्रीवास्तव



आओ सब मिल करके गायें
बाल दिवस हैं आज।
खेलें कूदें धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

चाचा नेहरू जी करते थे
हर बच्चों से प्यार।
मातृभूमि की सेवा हेतु,
हो जाएं तैयार।।
दुनिया मे छा जायें सारें
बनकर के सरताज।
खेलें कूदें धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

भारत माँ के बेटें बेटी
बनें साहसी वीर ।
चलें सत्य की राह सदा ही
रहें धीर गम्भीर ।।
हर चिड़ियों पर पड़ते भारी
ये बनकर के बाज।
खेलें कूदें धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

बेटी लक्ष्मी बनकर उभरें
जीते हर संग्राम ।
आसमान तक चमकें हरदम
भारत माँ का नाम।।
बच्ची बच्ची काली सी हो
बालक हो यमराज।
खेलें कूदे धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

बाल दिवस पर हम करते है
मिलकर यह संकल्प।
मेहनत कर हम हल कर देंगे
मां के सभी विकल्प।।
शिक्षा कृषि सफाई में भी
भारत का हो राज ।
खेलें कूदें धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

बच्चों आज दिवस हैं अपना
करना हैं कुछ काम।
भारत स्वच्छ बनायें जैसे
प्यारा गोकुल धाम ।।
कान्हा जी की भूमि हैं यह
यहां महल हैं ताज।
खेलें कूदें धूम मचायें
बाल दिवस हैं आज।।

स्वरचित
शिव कुमार लिल्हारे,,अमन,,
बालाघाट
मध्यप्रदेश




मेरे बचपन मुझको तेरी
याद बहुत है आती
ग्राम्य बयार और खुला परिवेश
ना क़ाहू से ईर्ष्या ना क़ाहू से द्वेष
मासूम अबोध निश्छल बचपन
ना जाति का बंधन ना धर्म दीवार
सब लागे अपने ना कोई पराया
गलियों के वे खेल और खेतों की मेंढ
रंगीन काँच के कंचे संग लट्टू की डोर
भाई बहनो संग हँसना खिलखिलाना
कभी रूठ जाना तो कभी छोटों को मनाना
कभी घड़ियाली आँसू से ज़िद मनवाना
माँ की ममता का वह आँचल
पिता के लाड़ प्यार का साया
माटी के चूल्हे पर बना फुल्का
माखन की परत दही का कटोरा
आँगन के पेड़ पर झूला ख़ूब खेले
स्कूल की पढ़ाई ना था बैग भारी
ना कोई ट्यूशन ख़ुद की तैयारी
ना कोई चिंता ना मुख पर शिकन
किसी लेनदेन ना खर्चें की भनक
घोड़े बेचकर सोना सपनों की सैर
ज़िंदगी का कहलाया स्वर्णिम काल
अब यौवन ढलकर वृद्ध अवस्था पुकारे
बालों की सफ़ेदी आँखों का चश्मा निहारे
मेरे बचपन मुझको तेरी
याद बहुत है अब आती
बचपन की ख़ुशियाँ बचपन की यादें
रहती अमिट सदा अनमोल लागे
आज मुझको उसकी याद सताती
फिर उस बचपन में मैं लौटना चाहती

स्वरचित
संतोष कुमारी
नई दिल्ली




******हम बच्चे हिंदुस्तान के***

हम बच्चे हिंदुस्तान के, हम बच्चे हिंदुस्तान के।
भगतसिंह की आन के और ऊधम सिंह की शान के।

भारत माँ के आँचल को हम, मिलकर आज सजायेंगे।
बाबू सुभाष, गाँधी और नेहरू, बनकर के दिखलायेंगे।
सपने सब साकार करेंगे, बापू के अरमान के।। 
हम--

हिन्दू मुश्लिम सिख ईसाई, आपस में सब भाई -भाई।
भाई को है भाई प्यारा, हम सबका बस एक ही नारा।
काम करेंगे हरदम मिलकर, भारत के कल्यान के।।
हम ---

देश में फैली हुई समस्याएं, मिलकर के निपटायेगे।
बिखरे बालों वाली माँ के, फिर सिन्दूर लगायेंगे।
मान रखेंगे हम सब मिलकर, वीरों के बलिदान के। 
हम---

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, सब झंडों से है ये न्यारा।
निर्भय होकर इसके नीचे, वन्देमातरम गायेंगे।
अपने स्वराज की लाज रखेंगे, सत्य धर्म ईमान से।
हम---

अपने देश की आजादी के, हम सच्चे रखवाले हैं।
भारत की रक्षा की खातिर, शमशीर उठाने वाले हैं।
आँख उठायेगा जो दुश्मन, निकलेंगे तीर कमान से।
हम ------

सबको मिलाकर एक करेंगे, जाति वाद निपटाएंगे।
ऊँच नीच का भेद मिटाकर, रामराज्य को लायेंगे।
सपने तब फिर पूरे होंगे, शिवेन्द्र सिंह चौहान के।
हम----

स्वरचित 
शिवेन्द्र सिंह चौहान"सरल"
ग्वालियर
मध्यप्रदेश


"'बचपन"'

खुली यादों की पोटलियाँ,
गुदगुदाती नटखट गलतियाँ...

बीते हुए प्यारे पल-क्षिण,
बचपन के वो दिन...

सुख सागर में लेता गोता,
मन स्मृति का मीठा सोता...

बदमाशी में प्राप्त महारत,
तरह-तरह की करे शरारत...

मिलकर साथी उधम मचाते,
खूब चुराकर अमरूद खाते...

पत्थर मार तोड़ते आम,
बाधाएं सब दूर तमाम...

निश्छलता और मस्ती के दिन,
रहे न इक पल मित्रों के बिन...

मन में होता जब अवसाद,
आती मित्र मंडली याद...

बूढ़े हम चाहे हो जायें,
चाहे कितने व्यस्त...

उन लम्हों को फिर से जी के,
हो जाते हैं मस्त...

कभी कहीं गर दोस्त मिल जाए,
फिर से मन बच्चा हो जाए...

हँसता हुआ वो पल मिल जाए,
हर मुश्किल का हल मिल जाए...

स्वरचित"पथिक रचना"


फूलों का वो उपवन,मासूम सा ये बचपन
मिलता नहीं फिरसे , करते रहो मंथन। 

वसुधा की गोद सा ममता का वो आँचल 
उँगली की पोर से सजाया गया अँजन
नजरों से बचाने वो भाल का काजल
माता के वक्ष से पयपान का प्रांजल
पग पग पे नेह का स्नेहिल सघन जतन
मिलता नहीं फिरसे, करते रहो मंथन,,, 

राग ना विराग निश्छल सा वो आनन
क्रीडा करे जहाँ बन जाए वो कानन
अठखेलियाँ,मस्ती उलझन भरी सुलझन
माँ से गुपचुपी,मैत्री भरी अनबन
खीज, रीझ, सीझ माटी सना बदन
मिलता नहीं फिरसे, करते रहो मंथन,,,,,,, 

बनता कली से फूल,बहती बयार सा
पुलकित सुमन सुवन, बदरी फुहार सा
कुंदन बने छुअन, पारस छुआर सापछ
मधुस्मित शुचित मनन,शैशवी तुषार सा
स्वर्गिक सुगंध क्षण, भोला सा वो बचपन
मिलता नहीं फिरसे , करते रहो मंथन,,,,, 

बचपन विभोर शोर, पुलकित वो पोर पोर
बालपन तृषित तृषा, हलचल मचे हर ठोर
छुटपन के छुपे भेद,छू लेते कोर कोर
लडकपन की वो मस्ति, जिसपे चले ना जोर
पितु-मात का चुंबन, स्पंदित श्वसन विलन
मिलता नहीं फिरसे, करते रहो मंथन,,,,,,,,,,
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◆रागिनी नरेंद्र शास्त्री◆
◆दाहोद(गुजरात))◆



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"स्वतंत्र लेखन"26मई 2019

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