Sunday, November 18

"तपन"16नवम्बर 2018

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सर्द रातों में भी रहती तपन है

ये जो तुम्हारे प्यार की अगन है ।।
देती है एक गर्म अहसास दिल को
रहती सदा मिलन की लगन है ।।

तुम रहो न रहो पास 
अब नही है यह खास ।।
तुम्हारा महताबी चेहरा 
ही देता दिल को उजास ।।

कहने को चाँद शीतल कहाये
मगर जो करीब है तपन पाये ।।
ऐसी ही ये करीबी दिल की
''शिवम्" अगन सी लगाये ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 16/11/2018


बदलते मौसम ने
मिजाज बदल दिया
कल तक जिसकी तपन
बेचैन करती थी
आज वहीं सबको भा गया।
वही तेज
वही चमक
वही उनका प्रकाश है
पर बदलते हालात
और इस कपकपाती ठण्ड में
हर जीव-जंतु के लिए
सूर्य, राहत की आस है।
ऐसे ही जिंदगी में
हर रिस्ते सब्र और वक्त मांगता है
जो कटुता की हर तपन मिटाकर
शीतलता बिखेर सकें।

स्वरचित:- मुन्नी कामत।

विधा-चोका
विषय-तपन

बेबस मन
बेताब धड़कन
प्रेम अगन
पुरजोर तपन
कोयल कूक
दिल में उठी हूक
विरह राग
आया फिर फाग
नीर नयन
झर झर सावन
बरस बीता
मन-गागर रीता
तुम न आये
कितना तड़पाये
आकुल जिया 
परदेस में पिया
आ जा मनबसिया।

-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




तपन में ही तपकर मै पला हूँ।

तपन में हो मगन आगे चला हूँ।
जमाने की नहीं परवाह की मैने,
लगन में ही लगकर मै फला हूँ।

तपन मे ही तपकर सोना चमकता।
श्रम से वतन का हर कोना दमकता।
प्रकाशपुंज में अगर तपकर निखरें,
तपन में तप नवनीत लोना दहकता।

संसार सागर में डुबकियां लगाऐं।
तपाने गुरु हमें झिडकियां लगाऐं।
निखार जीवन में आऐ जब हमारे,
प्रसन्न मन से हम फुदकियां लगाऐं।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



मीरा के मन लागी लगन,
कृष्ण प्रेम में हो गई मगन,
जग से हो गई बेगानी,
भूल गई वह सारी तपन।

प्रेम का बैरी बना जमाना,
मीरा को सब देते ताना,
भक्ति का मर्म न समझे कोई,
पल-पल दुख देते थे राणा।

विष का प्याला मीरा को भेजा,
फूलों की टोकरी में सर्प भेजा,
हर -पल मीरा को रहे देते तपन,
कृष्ण भक्ति ने मीरा को सहेजा।

जितना तपती उतना निखरती,
ऐसी थी मीरा की भक्ति,
कृष्ण बिना उसका न कोई,
सबने देखी भक्ति की शक्ति

प्रेम की लागी थी ऐसी लगन,
मीरा हो गई कृष्ण में मगन,
भूल गई सब दुनिया दारी,
सहनी पड़ी उसे कितनी तपन।

अभिलाषा चौहान



विषय :-"तपन"
हाइकु
(1)
दर्द रिसते 
मामूली सी "तपन" 
पिघले रिश्ते 
(2)
बाण अगन 
रवि ने बरसाए 
शोले "तपन"
(3)
जन्म यूँ दुखा 
गरीबी की "तपन" 
भविष्य सूखा
(4)
मन टूटते 
क्रोध "तपन" हाथ 
झुलसे रिश्ते 
(5)
सिकती उम्र 
समय की "तपन" 
पिघला तन 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे



------------------
क्रौध की तपन से
न जलाओ तन और मन
जीवन सफल बनाओं
करके कुछ अच्छे कर्म
शीतल रखो वाणी
शीतल रखो मन
भरलो अपने जीवन में
तुम प्रेम के रंग
कौध की तपन से
जलते जीवन के रंग
दूर होते हैं रिश्ते
नीरस होता है मन
काटने को दौड़ता
केवल अकेलापन
क्रौध की तपन से
यूं न नष्ट करो जिंदगी
अच्छे कर्म के बदले
मिलती है यह जिंदगी
क्यों इस तपन में
खोते हो वजूद अपना
रह जाओगे अकेले
खुशियां बन जाएंगी सपना
करो प्रीत की बारिश
तपन मिटा दो मन की
गले लगा लो सबको
यही पूंजी है जीवन की
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना






(1)ज्ञान तपन
बन जाता कुंदन 
कर सहन
(2)क्रोध तपन 
करने से पहले
कर मनन
(3)देह तपन
औषधि ले ग्रहण 
होगी शमन
(4)इश्क तपन
करे ना वो मिलन
बता जतन
(5)होती तपन
आध्यात्म है जतन 
लगा ले मन
♨️♨️♨️♨️♨️♨️♨️
स्वरचित 
मुकेश भद्रावले 






तपन जिंदगी की है बहुत ही जरूरी, जब तपती है माटी बन जाती है सुराही, 
बुझती रहे प्यास हर आदमी की, सदा ख्याल रखती यही है सुराही, 
बजी बांसुरी मन सभी के है भायी, तपन उसकी हमको पडी न दिखायी, 
सजीं कितनीं महफिलें उसके दम पर, तालीं भी सब ने हैं खूब बजायीं, 
तपन सोने ने अधिक जितनी पाई, चमक उतनी ही अधिक उसने पायी, 
आभूषण पहनकर इतरायी नारी, घर घर में बहुत अपनी धाक जमायी, 
दिन भर तपा जब सूरज भारी, पदवी देवता की तभी उसने पायी, 
आदमी को जीने की ताकत मिली, हमारा बना हर तरह से सहायी, 
मानव ने जब जब लगन है लगायी, मुश्किल कोई फिर ठहरने न पायी, 
अविष्कारों की झड़ी है लगायी, पताका चाँद पर भी है लहरायी, 
देखो जिधर पडेगा दिखाई, तपने वाला ही बन गया कुशल राही, 
जीवन है जो एक बड़ी है लड़ाई, जो थका ही नहीं है विजय उसने पायी, 
हम बढते रहें राह देगी दिखाई, जरूर मेहनत हमारी रंग लाएगी भाई 

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,





तपन का हो रहा विस्तार है
तपन की हर क्षेत्र में मार है
कोई कुछ कर नहीं पा रहा
हर कोई ही दिख रहा लाचार है। 

जंगल कटे बढ़ी सूर्य की अगन
युवा में है बेरोजगारी की तपन
राजनीति अपने स्वार्थ में मगन
हिंसा हो गई बिलकुल नगन।

तनाव की बढ़ रही है तपन
सपन भी हो रहा है दफ़न
जो मिटाता पेट की अगन
वही चुन रहा अब कफ़न।

तपन में हर कोई जल रहा
तपन में हर कोई गल रहा
आग की तरह बात फैल गई 
अजीब तपन में पूरा दिल्ली पल रहा। 

स्वरचित 
सुमित्रा नन्दन पन्त 






आकाश की उँचाइयाँ थामने
जब भी आगे बढी
ना जाने पीछे आते कदमों से
तपन सी अनुभव हुई
मेरे आत्म बल को तोडती
मेरे आगे बढ़ते कदमों को
पीछे दूर तलक घसीटती
उफ ..ये तपन
तपन मेरे वजूद से
तपन मेरी खिलखिलाहट से
तपन मेरे हाथों की लकीरों से
और....ये क्या !
पीछे मुडकर जो देखा
चौंक उठा मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व
हाँ..कोई अनजानी भीड़ नहीं थी
ये मेरे अपने ही लोग थे ।
..बेपनाह स्नेह का मुखौटा ओढे ।
........










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