Monday, November 19

"स्मृति "19नवम्बर 2018

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स्मृति पटल पर बन गई जो तस्वीर न गई मिटाई 
आज भी दिल के कोने में बजती है शहनाई ।।
जादू कर गई जादूगरनी बिन कुछ बोले
वाबस्ता एेसे हो गई वो जैसे कि हो परछाई ।।

हैं सैकड़ो स्मृतियाँ पर नही हैं वो खास 
एक यही स्मृति जिसकी रहे सदा तलाश ।।
सुना है स्मृति के साये में जीते हैं लोग 
ऐसे ही ये ''शिवम" शगूफ़ा है अपने पास ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 19/11/2018

🍁
विस्मित करके स्मृतियो को,
छोड के जो जाते है।
यादों के आरण्डय मे वो,
यायावर बन जाते है॥
🍁
ऐसी ही स्मृतियो के,
कुछ भँवर जाल मे फँस के।
शेर हृदय भी सिसक रहा है,
यादों मे यू बँध कर॥
🍁
अच्छी थी या बुरी कहेगे,
मन के पटल से ना उतरे।
पलकों के झुकते ही स्मृति,
आँखो के आगे उभरे॥
🍁
क्या बतलाए स्मृतियो मे,
द्वंद बहुत ही ज्यादा है।
शेर की ये जो कविता है,
इनमे स्मृतियाँ ही ज्यादा है॥
🍁

स्वरचित .. Sher Singh Sarraf

स्मृति पटल को जब खोलू,
वो रात सुहानी याद आती है।
तुझ संग मेरा हंसना रोना,
हर बात तुम्हारी याद आती है।

भरे पूरे परिवार में दादी,
एक मैं ही तुमको भाती थी।
जहाँ कही भी जाना होता,
तूम अपने संग ले जाती थी।

जब दिखती बदली छोटी सी,
डरकर तेरे पीछे सोती थी।
जिसदिन पास नही होती ,
मैं फुट फुट कर रोती थी।

तेरे हाथों से छाछ दही माँ,
रोटी पर मक्खन का टुकड़ा।
डाँट प्यार बस तुझसे पाया,
अब दिखता है तेरा ही मुखड़ा।

याद आती है तुमने दादी,
जब ली अपनी अंतिम सांसे।
सबके आंखों में आँसू थे,
चौपाये भी हुए थे रुआंसे।

बालपन तब जान न पाया,
क्यों जमी पर तुझे सुलाया है।
क्यों सबने अपने बाल कटाये,
क्यों काँधे पर तुझे उठाया है।।

जब बात समझ ये आई तो,
खत्म कहानी याद आती है।
स्मृति पटल को जब खोलू,
दादी तुम्हारी याद आती है।।

रानी सोनी 'परी'
Bhargavi Ravindra
स्मृति पट जो खोलकर बैठी मैं आली,
महक उठी सदाबहार यादों की डाली ।
वो मुखरित सुंदर बचपन
चहकता घर का आँगन,
रिमझिम रिमझिम फुहार
गीत गाता अल्हड़ सावन ,
मेंहदी के रंग से फैली उषा की लाली ।

वो लंबी चौड़ी पगडंडियाँ 
ऊँचीनीची घुमावदार गलियाँ
नभ निहारती क़तारें पेड़ों की
हवा से करतीं अठखेलियाँ ,
तुहिन कणों से सजी चमकती हरियाली ।

वो सूखे से फूल किताबों में
उलझते वो सवाल जवाबों में
झुकी पलकें नींद से बोझल
पिरोती मोती ख़्वाबों में ,
रात का घूँघट उघारे झाँके चाँदनी मतवाली ।

वो सखी सहेलियों की टोली
मनुहार,तकरार,आँखमिचौली 
अधूरी,अनसुनी अनकही बातें
इशारों में आँखों की बोली ,
बौराये से दिन,वो चंचल,चपल रातें निराली।

स्मृतिपट जो खोलकर बैठी मैं आली,
महक उठी सदाबहार यादों की डाली !
...... स्वरचित (c)भार्गवी रविन्द्र .........

स्मृतियों में जिंदा सदा,
जीवन जो हमने जी लिया।
खट्टी-मीठी यादों का,
अनुभव हमने संजो लिया।

छीन सकता नहीं कोई,
हमसे हमारे पल वो।
जिनको माला के समान,
बीते कल में संजो लिया।

बचपन की वो नादानियां,
घर-आंगन और गलियां।
वो सारे खेल-खिलौने,
संगी-साथी सहेलियां।

वो भाई-बहन का प्यार,
था जिस पर जीवन निसार।
वो रूठना-मनाना,
माता-पिता का दुलार।

वो बेफिक्री वो आजादी,
वो खुशियां वो मस्ती।
राजा थे हम अपने मन के,
सपने बड़े थे जीवन के।

मीठी-खट्टी स्मृतियां,
यादों की सुन्दर गलियां।
मनचाहे तब विचरण करलो,
हैं जीवन की अनुपम घड़ियां

अभिलाषा चौहान
स्वरचित




यूँ तो जिंदगी के सफर में कितने
ही लोग मिलते , बिछड़ जाते हैं । मगर
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमारे जीवन में अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं । हमारे हृदय आसन पर सदा के लिए अपना प्रभुत्व जमा लेते हैं और हम उन्हें कभी नही भुला पाते । ऐसे लोग हमारा दामन भर जाते हैं,उन खुशियों से , जिनमें हम जीवन भर डूबते - उतराते रहते हैं । जीवन किताब के पन्नों पर दिल की स्याही
से लिखी इबारत अक्सर मन पढ़ता रहता है।
ऐसी ही एक शख्सियत थी मेरी मुँह बोली दादी । सगी दादी मैंने कभी नही देखी । हमारे घर की ऊपरी मंजिल पर रहने वाली एक एक गरीब मगर प्यार के खजाने से भरपूर बाह्मणी ने अपने प्यार से मेरा हृदय आप्लावित कर दिया । मैं बचपन में कभी विश्वास नही कर पाई की यह मेरी सगी दादी नहीं । जो भी उन्हें पराया बताता, मैं उससे लड़ने पर आमादा हो जाती ।मेरे माता पिता और भाई बहन भी वो प्यार नही दे पाए जो दादी ने दिया ।उनके हाथ से ममत्व से खिलाये चने - मुरमुरे भी मेरे लिए अमृत थे। उनका हर शब्द मेरे लिए पत्थर की लकीर था । उनके बिना जीवन की कल्पना असम्भव थी । उनका असमय अचानक अवसान मुझे मूक कर गया था। उस आघात को आज भी महसूस करती हूँ । चालीस बरस गुजरने के बाद भी आज उनकी बरसी के दिन उनकी स्मृति मेरे हृदय को विचलित कर रही है ।कुछ अश्रु - कण मेरी पलकों पर उनकी यादों को सँजोये बहने को आतुर हैं। उनकी स्मृति सदा मेरा मार्ग प्रशस्त करती रही । नमन ऐसे व्यक्तित्व को जिसने मेरा जीवन सुवासित किया ।

भर दिया अपनी महक से
तुम चमन का फूल थीं
प्यार की खुशबू से भीगी
फूल का मकरन्द थीं
मन के आंगन में महकती
याद है अब भी तुम्हारी
तुम गईं तड़पाती अब भी
शेष है स्मृति तुम्हारी

सरिता गर्ग
आज भी मेरी समृति मे है
माँ,बिताये समय ,तेरे साथ
नही विस्मृत होती माँ
तुम्हारी यादों की सौगात

जब तक सर पर था 
माँ ,तुम्हारा हाथ
दुनिया के झमेले का
नही था एहसास

जब छूटा तुम्हारा साथ
पल पल आये तुम्हारी याद
हम है अनेति, नही नेति
मैं भूलना चाहूँ आज

कुछ खट्टी कुछ मिट्ठी यादें
चलते सदैव साथ साथ
मानव मन तो है स्मृतियों
का खाजाना अपार 

भूलना और याद करना
जीवन भर चलते साथ साथ
मानव तु है चतुर सुजान
रखना स्मृत बस अच्छी। बात।
स्वरचित -आरती -श्रीवास्तव।







जगती-स्मृति पूर्णिमा चंद्रिका सी,
उर-सिन्धु में ज्वार जगाती हुई।
अवगाहती ज्यों रतनाकर की ,
रतनावलि ले , इठलाती हुई।
चुपके कभी आँख चुराती हुई,
छुपके कभी आँख मिलाती हुई।
लता-बाहु पसारती सम्मुख आ,
भर अंक लगी , मुसकाती हुई।।
-डा.उमाशंकर शुक्ल'शितिकंठ'







चोखा जापानी गीत विधा,
नेह की बाती,

विरह का घनेरा,
अश्रु का जल,
भावना है प्रबल,
मन विकल,
गहरी अनुभूति,
स्मृति मिलन,
नंद भरा यौवन,
नैन चंचल,
स्मृतियां सुगंध,की,
अन्र्तमन में,
हर पल लहरें,
स्मृति लहर,
मधु मधुर मास,
अमित प्यास,
नज़रें ढूंढ ती है,
प्रियतम को,
बहता समीरण,
प्रेम भाव का,
शुभ्र आंचल फैला,
स्वर्णसुधा भूतल।।।
स्वरचित देवेन्द्र नारायण 






स्मृति पटल धूँधला सा
अब प्रतीत होने लगा
रक्त से सींचा उपवन
शनै शनै उजड़ने लगा
पंछियों का ठौर अब
कहीं और लगने लगा
जीवन की आपाधापी में
हर कोई लगा अपना 
उपवन सजाने में
एक नया उपवन सजने लगा
जिस वृक्ष पर लदते थे
फल कभी 
अब वही अखरने लगा
गूँजती थी किलकारियाँ कभी
इस आँगन में
अब ये आँगन ही अखरने लगा
स्मृतियों के पन्ने
हल्की हवा के झोंको से
स्वतः ही बिखरने लगे
स्मृति पटल धूँधला सा
अब प्रतीत होने लगा

स्वरचित :- मुकेश राठौड़





मानस ह्रदय सागर....
हलचल असीम होती... 
विकल स्पंदन यादें...
तट इसके टकराती...
उच्छल कोई वेदना... 
आँखों से आ निकलती...

निश्वास प्राणों में कभी... 
ज्वाला बन धधकती... 
काया हिमशिखा सी... 
अणु अणु बन पिघलती... 
व्यग्रता चिंता कटुता...
विष की नदियाँ बहती.... 

कीचड बाहर भीतर...
भीषण आग व्यथा की...
अजगर सी मुँह फैलाये…
होठों पे आ भभकती...
अपना पराया निगलती… 
नीयत कहाँ बदलती...

मंथन हो चिंतन का...
आईना चमक जाता...
विष भी अमृत बनता...
निस्वार्थ प्रेम रस बहता...
गुलशन महक उठता...
हर मन चन्दन बनता...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 






स्मृति बनी मन का आकाश 
कुछ खट्टे मीठे एहसास 
बन जाते मन के चिराग 
सुखद स्मृति बनती प्रकाश 
बन गयी धुऑ दुखद याद 
स्मृति पट पर अंकित बात 
कभी रहस्य तो कभी घात
आंसू कभी कभी पश्चाताप 
मन से युद्ध हो दिन रात 
स्मृतियों का रहता है साथ 
बन गयी स्मृति यादगार 
कहीं बन गयी ये त्यौहार 
बनी प्रेरणा श्रोत स्मृतियाँ 
बदल गयी कितनों की दुनियाँ 
जीते हम स्मृतियों के सहारे 
कितने दर्द स्मृति में छुपाये 
ज्ञान का स्मृति ही खजाना 
ये जीवन एक पाठशाला 
पढते जाओ बढते जाओ 
सबक स्मृति में रखते जाओ |

स्वरचित, मीना शर्मा, 






हल्के हवा के झोखे ने
स्मृति के पन्ने खोल दिया
धुंधली परी थी जो यादें
आज फिर मुझसे रू-बरू हो गया।
वक्त की रफ्तार नें
जिसे था पिछे छोड़ दिया
फिर वहीं स्मृति है पटल पर छा गया।
सुखी गुलाब की पंखुड़ी
मुझे है बेचैन किया
यादें तेरी और गहरी हुई
सामने खड़ा हो गया अतीत
जिसे था मैं दफन किया।

स्वरचित:- मुन्नी किमत।





कुछ शेष नहीं रहता है,
यादें ही रह जातीं हैं बाकी
कुछ शेष नहीं रहता है ः
ऊंचे महल प्रासाद सभी ढह जाते हैं
रह जाते हैं खंडहर 
बनकर गाथाऐं इनकी।
हमें कहने सुनने को ।
बाकी कुछ शेष नहीं रहता है यादें.........

हम तुम आज मिले कल बिछुडेंगे
कभी मिलेंगे जीवन में जब मुक्त हृदय से
बीती खुशियाँ घूमेंगी
मिलने को दिल मचलेंगे रह जाऐंगी यादें
कुछ मीठी तकरारें बाकी
कुछ शेष नहीं रहता है।यादें ही रह..........

तुम्हें कशम है आज ,
आज के इस गौरव की
खोल आज दो गांठ
इस अवधि इस अंतराल की
छुटपुट अर्थहीन बातें आपस की
नहीं छोड पाऐं कोई कांटा बाकी।
कुछ शेष नहीं रहता है यादें ही रह ..........

गर थोडा भी प्यार किया है तुमने
अपनों को अपना कहने का 
अधिकार लिया है तुमने
तो मै सच कहता हूँ करता हूँ आज वादा
तुम्हें हमारा प्यार,
प्यार दिनरात मिलेगा कबतक
जबतक तन में एक बूंद भी है बाकी
कुछ शेष नहीं रहता है
यादें ही रह जाती हैं बाकी कुछ शेष नहीं.....

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय









बंद खिड़कियाँ
गर्द पड़े परदे
इन खिड़कियों को मत खोलो
परदों को मत सरकाओ
इनसे जो सूरज की रोशनी
छनकर आती है
झाँकती है उनमें कुछ स्मृतियाँ
फिर वही सर्द हवाओं का छुअन
तन में सिहरन
विकल मन में कुछ चुभन
ये वे स्मृतियाँ हैं
जिन्हें
क्षितिज के उस पार
अस्ताचलगामी सूरज के साथ
दरिया में डुबोये थे
वे स्मृतियाँ
जिनके लिये
जागती आँखों से सोये थे
या वे
जिनके लिये
मुस्कुराते हुए अंतस भिगोये थे
उन विस्मृतियों से गर्द न झड़ने दो
उन स्मृतियों को पुनः न उभरने दो।

-©नवल किशोर सिंह






बिन तेरे कुछ ना भाता
तेरी याद सताए,
वो स्मृतियाँ आती याद,
ये नयन फिर आँसू बहाए,
उन्ही समृतियों के सहारे,
वक्त ये कटता जाए,
बंद करूँ नयन जब,
दिल तुझे पास ही पाए,
लगूँ टूटने जब मैं,
यादें सहारा बन जाएँ,
अदृश्य होकर तू,
साथ मेरा निभाए,
कुछ हंसकर, कुछ रोकर,
जीवन पथ पर कदम बढ़ाए,
तू है समृतियों में साथ मेरे,
हट जाएँगे दुख के साये।

स्वरचित-रेखा रविदत्त





स्मृति विशेष होती है
रोकती, टोकती है हमें
अनुचित क्रिया कलापों पर।
जो कर चुके अनुचित हम
उसकी सलाहकार बन जाती है।
बिन सीखे,सिखाएँ
स्मृति हमें शिक्षा दे जाती है।
भूत में मस्त थे न कोई खबर थी
भविष्य को हमारी ही स्मृति
हमें सँवार जाती है।
साथ-साथ चहलकदमी करती 
पटल,हृदय को आगाह करती है।
सूखी रेत के टीले पर न चढ़ना
स्मृति याद दिला देती है।
मन तो सदा बच्चा ही रहता
उम्र ही बड़ी हो जाती है।
स्मृति ही सँगी-साथी है
जो उचित-अनुचित बतलाती है।🙏

वीणा शर्मा वशिष्ठ





मन के आकाश में
तरंगित करती स्मृतियां

कुछ सुखद कुछ दु:खद
है ये अनुभूतियां
हृदय पटल पर चमकते
बनकर बिजलियां

एक भी ना भूली
बचपन की कहानियां
याद आती है सारी
सखि सहेलियां

आज खूब हंसाती
वो अनसुलझी पहेलियां
खुशियों संग मिला
ग़म की परछाईंया

धरोहर बनकर रह गई
पिता की उंगलियां
मन के मंदिर में है
उनके कदमों की निशानियां

स्वरचित पूर्णिमा साह 






 मिलना हमारा तुम्हारा 
कुछ इस कदर हुआ 
जैसे रजनी और प्रभात का संगम 

ह्रदय में बस गई ये मधुर स्मृति और मिलन .

पल भर का था अनमोल संग 
खुशियाँ थी जिसमें अपार 
मधुर ओस की बूंदों जैसे उषा की भोर थी 
साँझ की मधुर स्मृति की बेला थी .

अधरों में झलकता था उमंग और निश्छल प्रेम 
पतझड़ का मौसम भी लगता था सावन की हरियाली 
प्रेम से झलकते थे तुम्हारे मेरे नैन 
जीवन की कितनी प्यारी थी स्मृति .

मन था प्रेमलय स्नेह भरा 
तब जीवन लगता था कुछ ख़ास 
बिना फ़िक्र के थामे थे हम दोनों एकदूसरे का हाथ 
तुम्हारे संग थी वो मेरी सतरंगी प्यारी स्मृति .

प्रेम की प्यारी ये स्मृति कभी बीते ना 
मन के दर्पण में बसी हैं सूरत तुम्हारी 
इस मिलन को यादों के झरोखे में बसा लिया हैं 
ये मधुर स्मृति को मैंने बस जीने की राह बना लिया हैं .
स्वरचित:- रीता बिष्ट






स्मृति पटल पर अब भी प्रिये छवि तुम्हारी अंकित है ।
बचपन की सीधी सादी सूरत प्यारी अंकित है ।।
क्या तुमने जगह दिया मुझको स्मृति के इक़ कोने पर ।
मन इस शंका के कानन में आज तलक शंकित है ।।

,,,,,,,,
मन की स्मृति के जब भी पट खुलते हैं ।
कुछ लम्हे हमको वेहद खलते है।।
एक सूरत झलके नयनों में और ।
अश्क़ हमारे फिर बहने लगते हैं ।।

स्वरचित 
देवेंद्र देशज 






सजल नैन 
महोगनी कानन 
स्मृति महकी 

मन आकाश 
स्मृति के बादल 
छाए बरसे 

स्मृतियों संग 
गठबंधन है जुड़ा 
व्याकुल मन 

स्मृति सुमन 
खिलते मुरझाते 
मन बगिया 

स्मृति पटल 
जमे तुहिन कण 
मन पंखुरी 
(स्वरचित )सुलोचना सिंह 



मन को देख अकेला,
स्मृतियाँ देती दस्तक,
कहे दिल दरवाजा खोल,
संग बैठें कुछ पल तक l
क्या खोया क्या पाया,
क्या बदला है अब तक,
स्मृतियों का केनवास,
कर्मों के दृश्य नर्तक l
स्मृतियों की कक्षा में,
कुछ सबक से देते रिश्ते,
जीवन को बदल गए,
कुछ बन के आये फ़रिश्ते l
नयनों के आकाश में,
स्मृति बादल घुमड़ते हैं,
मन हल्का हो जाता हैंl
दर्द के आँसू बरसते है,
स्मृति की गोद में बैठ,
बचपन के नज़ारे दिखते हैं,
उम्र ठहर जाती है क्षण भर,
ये सोच के कि फिर हँसते है l
स्वरचित अभी
ऋतुराज दवे





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