Wednesday, November 21

"पुष्प"21 नवम्बर 2018

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Arati Shrivastava


Arati Shrivastava

मैं पुष्प
सौंदर्य से परिपूर्ण
शत्रुता को मित्रता मे
बदलने के गुण से परिपूर्ण

वातावरण को शुद्ध करने का
मुझमें गुण है भरपुर।
पर अंहकार होते ही
विनष्ट हो जाऊँ मैं जरूर

एक हवा का झोंका भी
कर दे मुझे अपनो से दूर
तड़ाग मे अंबुज सामान
बने जब कोई

हर्ष विषाद से ऊपर होई
वक्त का असर मुझपे भरपुर
कभी चढ़े देवालय में
कभी पैरो तले रौंदे कोई

पुष्प सामान ही मानव जीवन
सुख दुःख आवे हरदम
बने अंबुज सामान जब कोई
तब उसका महता समझे सब कोई
स्वरचित-आरती -श्रीवास्तव।



Sumitranandan Pant


Sumitranandan Pant


फूल ! तुम इतने मृदु भावों के हो प्रतीक,
कि कोई भी उपमा तुम्हारे लिये नही बैठती सटीक,
तुमसे महकता हर स्थान है,
तुम्हारा होना ही हर ज़गह की शान है ।

तुम सबको महकाते हो,
सबका आनन्द बढ़ाते हो,
हर गौरवमय परम्परा में,
सबसे पहले याद आते हो।

पर जब मैं तुम्हें देखता, मानता भाग्य को सर्वोपरि,
वो भी तो बतला देता, बात सारी खरी खरी,
तुम देव के कंठहार होते, जीवन तुम्हारा धन्य होता,
कपटी के लिये उपहार होते, जीवन तुम्हारा नगण्य होता।

तुफानों की निरंकुशता में, तुम घायल हो जब गिरते,
कितनी विपदाओं से तुम, एकसाथ एकदम घिरते,
कहाँ गरिमामय स्थिति तुम्हारी, और कहाँ यह समय की धूल,
ये ही बस उत्पीड़न भाग्य का, तुम भी तो समझोगे " फूल "।

वीर का शौर्य जब गरजता, तुम्हारी महक का निर्झर झरता,
उसकी यात्रा का पूरा पथ, तुम्हारी सुगन्ध से ही भरता।

प्रिय को जब अर्पित होते, मनोभावों से समर्पित होते,
जब राष्टृ गौरव को अर्पित होते, तो जीवन में तुम गर्वित होते,
लेकिन ये सब भाग्य है, तुम्हारी क्या होगी ऊँचाई,
और ये दुर्भाग्य है, कैसी विकट होगी रूलाई।

Manage


Manish Srivastava


Manish Srivastava 

भोर हुआ रोशनी बिखरी

फूलों की सुंदरता निखरी
अदभुत छटा पड़ी बिखरी
उपवन की शोभा निखरी
चारों और खुशबू बिखरी
धरती की आभा निखरी
बागों में हरियाली बिखरी
पुष्पों की रंगत निखरी
फूलों पर किरणें बिखरी
धरती की सुंदरता निखरी।

मनीष कुमार श्रीवास्तव



Rathod Mukesh


Rathod Mukesh

पुष्प हूँ खूश्बू लुटाता

हर पल मेरा ध्येय यही
अर्थी हो या मुर्ति हो
है मेरा स्वभाव यही
अहं भाव ना मैं रखुं
खिलूं कांटों में सही
प्रभु द्वार तक जाऊँ
लेकर संग खूश्बू वही
खूश्बू का ना छोड़ूं दामन
तोड़ो,मसलों या दो फेंक
तन पर वीरों के सुहाऊं
जिनके बलिदान अनेक

स्वरचित :- मुकेश राठौड़





Munni Kamat


Munni Kamat

चाहत है मेरी की-

पुष्प बन मैं महकूँ 
और अपने रिस्तों के
बगिया को भी महकाऊँ
रंग-बिरंगे बन कर मैं
तितलियों को बहलाऊँ
भर कर स्वंय में मधुर रस
भौरों को रसपान कराऊँ
जीवन सफल हो जाएं मेरा
जब मैं उदास चेहरे पर 
मुस्कान ले आऊँ
फिर नहीं मुझे है भय कोई
हवा के झोंके का
मिट जाउं
या बिखर जाऊँ।
होके विलीन भी
हवा के झोंके संग 
अपनी खुशबू बिखेरते जाऊँ।

स्वरचित:- मुन्नी कामत।





Santosh Kumari


Santosh Kumari

वन पर्वतों की कन्दराओं में

खलिहानों में बाग़ानों में
पुष्प पुष्प खिलता जाता
आँधी तूफ़ानों में भी मुसकाता
अडिग रहकर सबको लुभाए
चित्त संग नयनों को भाए
तुझ में मात्र अढाई वर्णों का खेल
विविध रंग रूपों का तुझ में मेल
पतझड़ ऋतु जब तुझे सताए
वसंत ऋतु में तू उसे हराए
बंद कली में तू मुसकाए
भँवरों का गुंजार शोभा बढ़ाए
डाल से चुनकर माली लाता
आजीविका का साधन कहलाता
बालों में गुँथकर गज़रा बन जाए
वनिता के मन को बहलाए
धागों में गुँथकर माला बन जाए
अभिनंदन का साधन कहलाए
वर वधू के कंठ जब साजे
जयमाला की पावन रस्म निभाए
मंदिर.गिरिजाघर और गुरुद्वारे
श्रद्धा भक्ति के काज सँवारे
आराध्य देव के चरणों में चढ़कर
धन्य तेरा जीवन हो जावे
फाग मास में होली जब आवे
गेंदा गुलाब चम्पा जूही रंग बरसाए
देशभक्ति का पर्व जब आता
युद्धवीरों का मान सम्मान बढ़ाता
मातृभूमि हित जब मिले शहादत
तिरंगे में लिपटकर जयकार कराता
पुष्प तुम सदा खिलते ही रहना
जीवन को सुगन्धित करते रहना ।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

स्वरचित

संतोष कुमारी




Akhileshchandra Srivastava


Akhileshchandra Srivastava

पुष्प की जिंदगी बहुत थोड़ी होती है


और उसमें भी तमाम रिस्क होती हैं


पर वो बिना किसी परवाह लुभाता सबको अपने रँग रूप से मनभावन ख़ुशबू के साथ


बिना अपना हश्र जाने वो आज निभाता है जिंदगी का साथ


और हम हैं कि अनजाने कल की फ़िक्र में आज ही जीते जी मरते हैं


क्यूँ नहीं हम पुष्पों से कुछ अच्छे पाठ ग्रहण करते हैं


(स्वरचित)


अखिलेश चंद्र श्रीवास्तव


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Asha Paliwal Purohit
Asha Paliwal Purohit 


ईश्वर तेरे चरणों में
नित पुष्प सुमन करूं अर्पित 
स्वीकार करो मेरी विनती 
प्रभु यह अर्ज करूं इतनी 

निर्धनों को थोड़ा धन दो
समृद्ध करो उनके दर को 
धनवानों को सद्बुद्धि दो
समृद्ध करो उनकी वृति

ना हो किसी पर अत्याचार
सबके करो सुदृढ़ विचार 
आत्मबल दो सबको इतना 
जिससे हो जीवन का उद्धार

भौंरों को लेने दो पूर्ण परागण
थोड़ी संध्या देर करो
वह छिप जाते आगोश पुष्प
उनका भी उद्धार करो 

मन कहीं ना भटके हमारा
हमको इतना संबल दो 
पुष्प आगोश भंवरे रहते
हम सदा रहे तेरे निज द्वार

पुष्प अभिलाषा पूर्ण करते 
शीश आपके चढ़ने की 
हम तुच्छ प्राणियों की अभिलाषा
पुष्पवत पल्लवित होने की,,,,
यह विनती करते हम बारंबार

स्वरचित आशा पालीवाल के पुरोहित राजसमंद
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Sulochana Singh


Sulochana Singh

खुश्बू हूँ पुष्प की 
सारा जग महकाना चाहती हूँ ।

बस धूल हूँ प्रभु चरणों की 
आसमान छूना चाहती हूँ ।
गुंजन हूं 
प्रेम राग गुनगुनाना चाहती हूँ 
बन राग भैरवी 
धरती से अंबर तक 
गूंजना चाहती हूँ ।
मैं दूत विश्व शांति का 
सद्भाव जगाना चाहती हूँ ।
पुष्प की तरह कांटो भरी
राह पर पर भी खिलखिलाना चाहती हूँ ।
वीरों के पथ पर 
पुष्प सा बिखरना चाहती हूँ ।

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 




Sudha Sharma


Sudha Sharma

निस्तब्ध निशा में अल्कावलि सी,

जगमगाते जूही के फूल।
लाख चाहा भूला ना पाई,
वह महमहाते जूही के फूल।

परकोटे पर फैली -फैली,

लिपटी नाजुक वल्लरियाँ।
झूमती इठलाती जिस पर, 
छू -छूकर रंगीन तितलियाँ। 

छा रही दूर- दूर तलक,

हैं विहँसते खूल- खूल।

बिल्व -पत्र सा पल्लवित त्रिपात,

स्निग्ध कोमल हरित गात।
खिला- खिला सा यौवन, 
सिहरती ज्यूं भरी देह- लाज।

लहराते संग- संग पवन के,

ज्यों कोई यौवना 
चुलबुल। 

नुपुरों सी नन्ही- कलिकाएं,

लगती नभ की तारिकाएं। 
कहीं सप्त, कहीं अष्ट पँखुरियाँ,
खिलखिलाती गुच्छों में कलियाँ ।

भरती सौरभ साँस- साँस में,

उच्छवास प्रवाहित दूर- दूर।

वह नन्ही सी कोमल बेली,

प्रति-पल करती अठखेली।
मासूम बचपन सा मुस्काती,
गुलशन सुवासित कर जाती।

प्यारा रूप धवल शीतल 

महकाते जीवन समूल।

अतीत से वर्तमान तक, 

स्मृतियों में बसी महक।
गजरा बन बालों में महकती,
कभी ईश पाँवों में सजती।

लघु रूप पर वृहत गुणी, 

देते समग्र सुख- समूल।
स्वरचित 
सुधा शर्मा 



Nawal Kishore Singh


Nawal Kishore Singh

नवकुसुमित निर्मल पुष्प खिले हैं

रंग-बिरंगे,मनभावन,बड़े भले हैं
घर आँगन की रक्षित क्यारी में
मृदु महक यौवन की फुलवारी में
सजे-सँवरे कतार से गुलदानों में
परिपोषित,माली के उपादानों से
निशिदिन सेवित,संरक्षित जीवन में
श्रृंगारित,सुशोभित सतत उपवन में
वो,कुछ और पुष्प भी प्रस्फुटित है
इसे किसने बोया?ये तो स्वघटित है
दप-दप विहँसते, झाड़-झंखाडों में
स्वसिंचित,स्वतंत्र, निज अखाड़ों में
कंटनी,छँटनी विमुक्त,मस्त,निर्भय है
नैसर्गिक सौंदर्य-बोध,बहु विस्मय है
लखता कौन?इन कुसुम कुमारों को
करते क्या सज्जित ये बन्दनवारों को
-©नवल किशोर सिंह



Govind Prasad Gautam


Govind Prasad Gautam

कलियां चटके पुष्प महकते

मलय पवन हर ओर चले
माली सींचे हरियाला उपवन
भिन्न भिन्न नव पुष्प खिले
कई पंखुड़ियों से मिलकर के
एक पुष्प का जन्म हुआ
बिखर गई जब वे धरणि पर
मिलती सब से दिव्य दुआ
प्यार करते सब पुष्पों से
दूर रहे हर कंटक से
बड़े स्नेह से हमे उबारे
जीवन के हर संकट से
पुष्प गुच्छ उपहार अनौखा
कर गजरा गल माल सजे
देवालय में देव सृंगारित
शंख नाद प्रिय घण्ट बजे
पुष्प प्रतीक हैं खुश्बू के
पुष्प प्रतीक अर्चन पूजन
पुष्प प्रतीक हंसीखुशी के
पुष्प प्रतीक जीवन अर्जन
सम्मानित पुष्पों से होते
आनंदित नव पुष्प बिछाते
मृत्यु शय्या पर लेटे शव को
नव पुष्पों से उसे मिलाते
स्व0 रचित
गोविंद प्रसाद गौतम



Rita Bisht


Rita Bisht 

 बगिया में सुन्दर सुन्दर पुष्प खिले हैं 
कितने प्यारे कितने अच्छे लगते हैं 
सबको मोहित आकर्षित करते हैं 

अपनी सुगंध से चमन को महकाते हैं .

पुष्प की खुश्बू हर तरफ 
कभी बागों में 
कभी घर के आँगन में 
कभी मंदिर के द्वारे प्रभु चरणों में .

रंग बिरंगे पुष्प सबके ह्रदय को लुभाये 
जिसकी प्यारी कलियों का रूप दिल में बस जाये 
मेरी सुगंध महके हर क्षण हर पल 
चाहे दिन का हो उजाला या हो अँधेरी रात्रि .

हर मौसम में खिलता हूँ 
चाहे ग्रीष्म हो शीतल ठंड हो 
या हो तूफ़ान का हो कहर
हर कदम नवीन अनुभव लेता हूँ .

काँटों के संग भी मुस्कराता हूँ 
सारे भेद भाव मिटाकर सब पर प्रेम रस बरसाता हूँ 
प्रेम प्यार से चमन को खिलकर महकाता हूँ 
हँसकर सबको जीना सिखाता हूँ .
स्वरचित:- रीता बिष्ट




Shambhu Singh Raghuwanshi


Shambhu Singh Raghuwanshi

मै अदना पुष्प भावों के मोती का,
ऐसे ही यहाँ चहक रहा
सभीजनों से खुशबू ले लेकर ही
सचमुच ही यहाँ महक रहा।

अपने उपवन की तारीफ करूँ क्या
इसमें रंगबिरंगे फूल खिले हैं।
एकदूजे से मुखरित होते
जैसे आत्मिक अनुबंध किये हैं।

आज खिला हूँ कल मुरझाऊँ
मेरा कुछ भी पता नहीं है।
मै लूटना चाहूँ खुशबू सबसे,
मै कब झड जाऊँ पता नहीं है।

कलियां महक रही कलमों से यहाँ
बहुरंगी सृजनशीलता देखी।
मधुर मोहनी सुरभित मैने
सुंन्दर महकित आत्मीयता देखी।

रहें पुष्प महकते अपने उपवन के
कुसुमित हों सब आंगन द्वारे।
रंगबिरंगी कलियां महकें
यहाँ भाव मोती हों सब कचनारे।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय





Abhilasha Chauhan


Abhilasha Chauhan


ये मां की कोख में पलती कलियां,
ये पुष्प बनने को आतुर कलियां,
अनमोल उपहार हैं ईश्वर का,
ये हंसती-खिलखिलाती कलियां।

खिलने दो ,मुस्कराने दो इन्हें,
गुलशन में सुगंध फैलाने दो इन्हें,
रौनकें हैं ये इस संसार की
न फेंको,न मसलों,न कुचलो इन्हें।

ये पुष्प महकाते दोनों जहान,
खिलते और सजते हैं ये जहां
बड़े नाज़ुक से होते हैं ये पुष्प
क्रूरता से ये खिल पाते कहां?

खिलने का अधिकार है इनका,
मत समझो इनको सूखा तिनका,
अगर पुष्प ये न खिल पायेंगे,
तो गुलशन महकेगा किनका?

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

Manage



Meena Sharma


Meena Sharma


परहित हो जीवन का मकसद , पुष्प हमें यह कह जाता |


है कांटौ भरी राह, जीवन फिर भी इनका मुस्काता |


छोटी सी है उमर, मगर सुरभित कानन कर जाता |


आभा से अपनी पुष्प सदा, सबके मन को हर्षाता |


अपनी कोमल काया से पुष्प सबको सुकून पहुंचाता |


चाहें मंदिर हो या हो मजार, कोई भेद नहीं कर पाता |


बना प्रेमियों का प्रेम संदेश , ये सुलह गीत भी गाता |


ईर्ष्या बैर घात और नफरत, नहीं इनसे पुष्प का नाता |


बलिदान भावना रखता मन में, जीवन उत्सर्ग करता |


सुदंर मन का परिचायक ये ,इसे "सुमन "भी कहा जाता |


हर घर आँगन की बगिया में,सदा श्रृंगार पुष्प ही करता |


हसते रहो हसाओ सबको, पुष्प सर्वदा सीख यही देता ||


स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,






Rakesh Pandey


Rakesh Pandey 



एक उपवन वाटिका में,
मंजरी की तालिका में,

इक सुमन निस्तेज सी....

घोर चिंता में खड़ी,
ज्यों उसपर दृष्टि पड़ी,

हमने पूछा ये सुमन,
कहाँ खोया है ये मन,

खोया क्यों तेरा कन्त है,
यहाँ हर तरफ वसन्त है,

पुष्प ने मुझसे कहा,
सुनले ये सखा,

जिस दिन यौवन खिली,
एक भौरें से मिली,

ओ नटी नटशाल था,
कुटिल औ वाचाल था,

मैं गिरी उस प्यार में,
खो गयी मनुहार में,

भरके नेत्रों में सपना,
दे दिया सर्वस्व अपना,

जिस दिन वसन्त ढल चला,
मुझसे रस ना मिला,

हो विरक्त मुझसे,मेरे प्रेम से,
गया चला इस उपवन से,

विताये पूरे वर्ष उसके आस में,
कि आयेगा वो लौट मधुमास में,

कल मैं पछताई अपनी भूल पर,,,
ओ निर्लज्ज था पड़ा दूसरे ही फूल पर,,

मैं फूल हूँ किन्तु ,
मेरी कांटों की सेज है,

इसलिये मैं मलिन हूँ,
मुख मेरा निस्तेज है।।।

........राकेश,
Manage


Rituraj Dave


Rituraj Dave


(1)

सौभाग्य मिला
शहीद पर चढ़ा 
"पुष्प " इतरा
(2)
काँटो को सहा
क्षण जिन्दगी, "पुष्प "
खिल के जिया
(3)
देख के "फूल"
दौड़ आती आशाएँ
चिंताए भूल
(4)
पैरों से रूँदा
"पुष्प " ने सहा दर्द 
खुशी में बिछा
(5)
अच्छाई दंड?
"पुष्प " को तोडा जाता
स्वभाव नर्म
(6)
हश्र का पता
जिंदगी चार पल
"पुष्प " तो हँसा
(7)
गहने खीजे
पुष्प के श्रृंगार से
देवता रीझे
(8)
मित्रता सम 
पुष्प का आगमन 
ख़ुशी या गम 

(9)

घृणा है शूल
जीवन उपवन
प्रेम है "फूल"

स्वरचित 

ऋतुराज दवे




Rakesh Pandey


Rakesh Pandey

आंगन की क्यारी में,
कर रोपित एक,
पाटलपुष्प,
निरंतर, दिवस-मास,
सिंचित भू-जल से,
पोषित उर्वरकों से,
हो विकसित,
फैली डाली,
नव- पत्र हरित,
छठा मतवाली,
कर अवलोकन,
बारम्बार-लगातार,
रुककर कुछ देर,
अपलक लेता निहार,
मैं आसक्त उसपर,
उसका प्रीत,
मुझपर अपार,
जब मैं हँसता,
कुछ कहता,
तब झुककर,
करता अभिवादन,
स्वीकार.....
.........
फिर आया,
उसपर यौवन अपार,
कर वसन्त अपना,
सबकुछ न्योछार,
कुछ कली-कुछ फूल,
लगकर रहे थे झूल,
मदमाता अपने में,
इतराता अपने में,
लहराता अपने में,
उन्मुक्त मन,सिहर,
अपने में कहाँ ठहर?
......
पड़ी दृस्टि उसपर,
हुआ मन प्रफुल्लित,
हरे पत्र के संग,
रक्ताभ पुष्प पल्लवित,
मैने कहा,
सुन रे सखा,
तेरे रूप लावण्य की,
अनुपम छठा,
........
पर वो निर्लज्ज,
अपने में मगन,
कहाँ अब सुनेगा,
मेरा अभिवादन,
एक स्नेह उमड़ा,
हृदय से मेरे,
दो बूंद मोती,
पत्रों पर गिरे,
सही बात कहता,
है ये जहाँ,
छिछिले पत्र में,
जल रुकता कहाँ,,,
रुकता कहाँ.....

.....राकेश



Purnima Sah


Purnima Sah

कांटों भरी राहों में भी

मुझे फूलों सा जीवन मिले

ज़ख्मों को झेलकर ही

कर्मों के फूल खिले

जीवन के धूप-छांव में भी

महके और खिलखिलाये

कंकड़ की मार ख़ाके भी

पहचान अपनी ना खोने पाये

सुखते हुए फूलों में भी

महक अपनी छोड़ जाये

डालियों से टूटकर भी

हर दिल की मुस्कान बन जाये

युद्धभूमि को जाते वीरों के पथ में 

🏵️ प्राण न्यौछावर हो जाये🏵️

स्वरचित पूर्णिमा साह 




Rathod Mukesh


Rathod Mukesh

पुष्प हूँ

पर कांटो से घिरा
जीवन मेरा
देवों का गहना
वीरों का आभूषण
समान भावना मेरी
अर्थी हो या बारात
जीवन का संघर्ष
मेरी आत्मियता
भक्ति की आस्था
का प्रतीक मैं
पुष्प हूँ
उपवन की शोभा
सुगंध का पर्याय
प्रकृति का सुंदर 
श्रंगार हूँ
भंवरों का पालक
मधु भंडार हूँ
लेकर गुण औषधीय
मानवता का संहार हूँ
पुष्प हूँ
हर पल महकना 
स्वभाव है

स्वरचित :- मुकेश राठौड़





पुष्प शृंगार कर ऋतुराज आए
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जब धरा पर बासंती ऋतु आए
रंग-बिरंगे पुष्प खिल-खिल जाए
हर युगल के तन-मन में प्रेम पले
चहुँओर रंगीन समाँ घिर आए।

पुष्प बगिया में सौरभ छितराए
गुन, गुन, गुन भंवरा राग सुनाए
मन इस आनंद से हो आनंदित 
रंग- रंगीली तितली मन को भाए।

आम महुआ पर मंजर भर आए
बैठ कोयल मीठी कूक सुनाए
पपीहे की बोली सुन मन बहके
बसंती बयार हर ओर समाए।

पुष्प शृंगार कर ऋतुराज आए
हर मुखड़े पर मुस्कान खिल जाए
बच्चों की किलकार आंगन गूँजे 
सभी सयाने का दिल जीत जाए।

--रेणु रंजन
(स्वरचित )

21/11/2018



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पुष्पों की सुंदर सौगात
करती धरा का श्रृंगार
लाल, गुलाबी,पीले
पुष्प यहां कई रंग के खिलते
लाल पुष्प कुमकुम सी आभा
सबके मन को बहुत लुभाता
पीले पीले पुष्प सुनहरे
सोने सी छटा बिखेरे
सफेद पुष्पों की फैली चादर
जैसे आसमां से उतरा बादल
गाल गुलाबी नवयौवना के
पुष्प गुलाबी कोमल ऐसे
धरती की धानी चूनर भी
सतरंगी पुष्पों से सजी है
करने धरा का यह श्रृंगार
प्रभू की यह अनमोल कृति है
सुंदर सुंदर बाग बगीचे
इनकी खुशबू से महके
बने प्रभू के गले का हार
पुष्प बिना अधूरा श्रृंगार
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना



ना कोई इच्छा 
ना कोई आशा
ना ही कोई अभिलाषा है।
मै पुष्प था 
मै पुष्प हूँ
मैं पुष्प रहूँ
बस इतना अरमान है।
देवों का मान मुझी से है
वीरों की शान मुझी से है
मुझ बिन देवालय सूने हैं
बगिया की शान मुझी से है।
इतना सब होने पर भी
अभिमान नहीं रत्ती भर है
मै जैसा भी हूँ ,वैसा ही रहूँ
अरदास बस इतनी सी है।
मैं पुष्प हूँ
मैं पुष्प रहूँ
अरदास बस इतनी सी है।
(अशोक राय वत्स)स्वरचित

जयपुर 7665994959

==========
चहक रहे
कई रंग के फूल 
स्कूलों के बाग

संतों की वाणी-
भींगता मन जैसे 
पुष्पों की वर्षा

मुर्दों के लिए 
जिंदा फूलों की जान
लेती समाज

स्वरचित 
मुकेश भद्रावले 
21/11/2018


शीर्षक-पुष्प

खिलते पुष्प
महकता जीवन
प्रिय का साथ

प्रेम की भेंट
किताब में सजते
पुष्प गुलाब

देव प्रतिमा
पुष्पांजलि अर्पित
मिले आशीष

पुष्पों की ड़ाली
रूत है मतवाली
फैले खूशबू

स्वरचित-रेखा रविदत्त
21/11/18
बुधवार



प्
रिय !मेरी बगिया में आना,
जहाँ मिलेगा भौंरा दिवाना,
पुष्प खिलें हैं रंग-बिरगें,
कुछ तुम भी ले जाना |

सुगन्ध इनकी महक रही है,
तितलियाँ मधुपान कर रही हैं,
सुन्दर समाँ यहाँ बंध गया है,
मन मेरा यहीं रम गया है |

चलो प्रिय!बगिया की सैर कराऊँ,
गुलदस्ता तुम्हें उपहार दे जाऊँ,
यहाँ बेला है,गुलाब और कचनार,
यही है मेरा सुन्दर सा संसार |

हम-तुम मिलकर इसे ओर सजायें,
कुछ पुष्प-पौध हम ओर लगायें,
पुष्पों की हमेशा रहेगी बहार,
खिल जायेगा हमारा संसार |

स्वरचित *संगीता कुकरेती*

पुष्प सी जिंदगी 
खुशबू बिखेरो 
जीवन चार दिन 
हँस कर गुजारो 
क्यों बर्बाद करे 
जीवन को उत्कर्ष पर लेजाए 
फूलों की बगिया महकाएं l
बनकर पुष्प 
किसी को हर्षाये 
खुशियाँ दे जाएं 
जीवन सफल बनाये 
न जाने माली कब 
ये फूल तोड़ ले जाये, 
आओ शहीदों की माला बन जाये, 
ऐसा पुष्प बने कि 
जगत में इतिहास बनु 
सबके दिल का अहसास 
बनु 
एक ऐसा पुष्प बनु 
एक ऐसा पुष्प बनु 
कुसुम पंत उत्साही





पुष्प तेरी कितनी प्यारी है गाथा
जो तु सबके मन को है भाता 
नारी के बालो मे तू गजरा बनके सुहाता 
और उसके सौंदर्य को तू बढ़ाता 
दो प्रेमियो के बीच का सूत्रधार तू ही तो है
पुष्प देकर प्रेमी के अंदर 
प्रेम का पुष्प तु ही खिलाता 
पुष्प तेरी कितनी प्यारी है गाथा
जो तु सबके मन को है भाता 
ऐ पुष्प तु ही तो है जो विवाह मंड़प 
मे खुशीयो के फुल खिलाता 
जयमाला के रूप मे बंधन
तु बँधवाता 
सुहाग सेज पर तू बिछ जाता 
और नेया पुष्प तु खिलाता 
शकुन्तला के तन पर पुष्पो का श्रृंगार
राजा दुष्यंत ने किया उससे प्रेम विवाह
पुष्प तेरी कितनी प्यारी ह्रै गाथा
जो तु सबके मन को है भाता
पुष्प कही बन जाता तु 
शुभकामनाओ का प्रतीक
कभी तु भगवान के चरणों 
में चढ़ाया जाता है
ऐ पुष्प तेरी ये मुस्कुराहट 
कभी कम नहीं होती
जब बिछड़े तू अपने पेड़ से 
फिर भी तु मुस्कुराता 
काँटो के बीच मे रहकर भी तू
बस मुस्कुराता 
पुष्प तेरी कितनी प्यारी है गाथा
जो तु सबके मन को ह्रै भाता 
स्वरचित हेमा उत्सुक (जोशी)




(1)
मुकुल पुष्प
नयन अभिराम
सुगन्ध प्रद

(2)
मन्दार पुष्पम्
अर्पण भूतनाथम्
प्रसन्न मुद्राम्

(3)
माँ ज्ञानदात्री
धवल पुष्प वारिज
विराजमान
स्वरचित-राम सेवक दौनेरिया 'अ़क्स'
बाह-आगरा(उ०प्र०)




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सजा-धजा कर प्रेम से उसने,
जीवन ये कर दिया अलंकृत
हुआ सुगंधित मेरा तन-मन
नयनों से छलकाया अमृत
साथ मेरे जो रहने का उसे
मिल जाये अवसर पावन
हो जाता वह पुष्प प्रसन्न
खिल उठता है उसका मन

उसकी कोमलता दुर्लभ है
वो लहराये सावन तब है
देखने उसको आतुर सब हैं
रहूँ दूर मैं संयम कब है?
भँवरों में भँवरा एक मैं हूँ
छू लेता जब उसका तन
हो जाता वह पुष्प प्रसन्न
खिल उठता है उसका मन

स्वरचित-राकेश ललित




पुष्प और ओस....
रिश्ता बहुत नाज़ुक है...
एक धूप लगने से...
जीवन खो देती....
दूसरा...
खिल उठता...

अश्कों के पुष्प....
जीवन मिलता है तो भी निकलते हैं...
खुश होते हैं....
अपने किसी का जीवन जाता है...
तो भी निकलते हैं...
दुःखी होते हैं...
बहुत नाज़ुक रिश्ता है...
जीवन और मौत का...
दोनों ही पुष्प के समान...
खिलते हैं...मुरझाते हैं...
जीवन खिलता है तो...
मौत मुरझाती है...
मौत खिलती है तो...
जीवन....

जीवन को खिलने दो...
महकाओ उसे इतना कि...
जब मौत पुष्प खिले...
तो वो भी महके...
सब को महकाये....
महको...
'पुष्प' की मानिंद...
और...
महकाओ...

II स्वरचित - सी.एम्.श


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"स्वतंत्र लेखन"26मई 2019

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