Monday, November 26

"स्वतंत्र लेखन "25 नवम्बर 2018

हाइकु

1
प्रेम संचार
दिल से जुड़े तार
मन की बात।।
2
मन के चोर
दिल की सलाखों में
प्रेम की बेड़ी।।😊
3
मिट्टी सा तन
अहंकार के कण
धूल में उड़ा।।😊
4
संस्कारी नारी
सदन महारानी
हाथों में चाबी।।😊
5
कर्म ही आस
सजे सँवरे स्वप्न
स्वयं के हाथ।।😊
6
प्रकृति लगी
सजी सँवरी कन्या
है मन्त्रमुग्धा।।😊🙏
*****************
वीणा शर्मा वशिष्ठ




दोहा गजल-
आझरणीय मंच को निवेदित

कर्म करो उपकार का,रखिए भाव पवित्र।
चाहे जो भी हाल हो,रखिए नेक चरित्र।।

बैर सभी को बाँटता,करिए सबसे प्यार।
छोड़ो सारी दुश्मनी,बनो सभी के मित्र।।

मन रखिए सद्भाव नित,करिए उत्तम काम।
बार - बार देखे तुम्हें, बनिए सुंदर चित्र।।

बैर भाव सब छोड़कर,निर्मल रखो विचार।
महको तुम संसार में, जैसे महके इत्र।।

इत्र, मित्र,पवित्र ‌सब,होते शब्द समान्त।
मगर अर्थ सबके यहाँ,होते जरा विचित्र।।

स्वरचित
रामप्रसाद मीना'लिल्हारे'
चिखला बालाघाट(म.प्र.)


सालगिरह

ऐ हमसफर याद है वो पल,
जो हमने एक साथ बिताए थे।
क्या याद है तुम्हे वो लम्हे,
जो मिलकर खास बनाए थे।।

हां, आज तारीख वही है लेकिन,
साल का अक्षर एक बढ़ गया है।
आज भी प्यार कम नहीं हुआ,
बल्कि ऒर ज्यादा बढ़ गया है।।

हां, यह तन का रिश्ता नहीं है
दो पाक रूहों का रिश्ता है।
उम्र के इस पड़ाव में भी 
मेरे अन्तर्मन की मधुलिका है।।

ये सालगिरह मुबारक हो प्रिया
कुछ उपहार है तुम्हारे लिए।
मुझे कुछ नही चाहिए ओ प्रिया
तेरा प्यार ही काफी है मेरे लिए।।

उम्र नहीं होती प्यार की दोस्तो
प्यार तो बस दिल से होता है।
दुया करो कि दिल सदा जवां रहे
ये रिश्ता बस दिल से ही निभता है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा # 9460914014
उसका परिचय
🔏🔏🔏🔏🔏🔏

बहार
ें बोली, वह तो स्वयं बहार है,
बसन्ती बयार है, मस्त खुमार है,
अल्हड़ नदिया की धार है, यौवन का उपहार है,
टपटपाता प्यार है, अनुपम श्रंगार है।

सौन्दर्य का सौन्दर्य है,
वेशभूषा भव्य है,
रचयिता का कोई, मन्तव्य है,
उसकी मादक हँसी, श्रव्य है।

वह उमंगों की, अंगड़ाई है,
खुशियों की , बधाई है,
चाँदनी में, नहाई है,
होठों में , ललाई है,
बहती हुई, पुरवाई है,
सुन्दरता भी, इतराई है।

सुरों ने उसकी शान में, महफिल सजाई है,
सरगम ने स्वयं आ , वीणा बजाई है,
कोई अप्सरा,धरा पर, उतर आई है,
नृत्य में डूबी, गज़ब शहनाई है।

कविता ने उपमाओं के, मंडप संजोये हैं,
शब्दों के मोती, चुन चुन पिरोये हैं,
प्रेम भरे अनुपम, रस में भिगोयेहैं,
अर्पण समर्पण की, मीठी भावना से धोये हैं।

बिछाई हैं मैंने भी, अपनी आतुर निगाहें,
फैलाई है अपनी ये, बेताब बाँहें,
तेरे स्वागत को तकती, मेरे दिल की राहें,
तुझ ही तक सीमित, ये मेरी पगली चाहें।

शैली .. लघु कविता 
*********************
🍁
आधारशिला रख दे आओ,
मन से मन का निर्माण करे।
कुछ दिव्य से कण कुछ कंकड ले,
नवभारत का निर्माण करे ॥
🍁
कर शंखनाद भय ताप मिटा,
उज्जवल सा इक संसार गढे।
कुछ सिन्धु समीरण को गुँथ के,
फिर रामराज्य निर्माण करे॥
🍁
कर सुधा निछावर विष पी ले,
समरसता का विस्तार करे।
इस यग्यअग्नि सी तपोभूमि का,
चँहुओर नया निर्माण करे॥
🍁
त्रेता भी नही ना द्वापर है,
कलयुग का सब संताप हरे।
इस दिव्य भूमि भारत मे फिर,
सतयुग का हम निर्माण करे॥
🍁

स्वरचित .. Sher Singh Sarraf

''नजदीकियाँ"

नजदीकियों से डरता हूँ

दूर से मैं निकलता हूँ ।।
नजदीकियों ने लूटा है
कितनी आहें भरता हूँ ।।

जिन्दगी तेरा जबाव नही
तुझ सा लाजबाव नही ।।
हर सवाल का हो जबाव 
ऐसी कोई किताब नही ।।

जीवन के हर रस्ते टेड़े
ये रस्ते सीधे सपाट नही ।।
कितने काँटे बिछे कहाँ 
इसका कोई हिसाब नही ।।

हल निकालते थक जावेगा 
जीवन का पहिया रूक जावेगा ।।
चलने दे ये सफर ''शिवम"
खुदा कसम यूँ कट जावेगा ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 25/11/2018


*

मेरे लिए तुम
मत लाना चाँद तारे तोड़कर
बस ले आना झीनी सी वो पायल
जिसकी झनकार से बज उठें हम दोनों के मन के तार।

उस सूरज की तरह खुद को जलाकर
मुझे रोशन ना करना
बस बन जाना पूरनमासी की वो रात,
जिसमे थोड़ी उजास हो और थोड़ी मिठास।

समंदर से निकले मोती की चाह किसे है,
बस वो नगीना सजा देना मेरी अंगूठी में
जिस से देख सकूं तुम्हारी परछाई, उस भरी महफ़िल में भी
जहाँ तुमसे सीधे संवाद करना मुश्किल हो।

कोई सुपरहीरो ना बनना
बस बन जाना वो हमसफ़र
जिसके सीने पे सर रखकर
दूर उस दुनिया मे जा सकूं
जहाँ बस तुम हो और मैं हूँ........💞

#दीपा_भट्ट
बचपन कहीं ठहर जाता......
----------------------
यादें बन दिन गुज़र जाते ,
दौर बन वक़्त गुज़र जाता ।
काश ! ऐसा भी होता कभी ,
बस ! बचपन कहीं ठहर जाता।

समय-पखेरु पँख लगा उड़ जाते,
मौसम भी दस्तक दे गुज़र जाता।
काश ! ऐसा भी होता कभी ,
वो एहसास पलकों पे ठहर जाता।

तारा कोई फलक से टूटते ,
शबनम से कुछ कहकर जाता ।
काश ! ऐसा भी होता कभी,
वो लम्हा,इक लम्हा तो ठहर जाता ।

यादों का कारवाँ यहाँ से गुज़रते ,
दामन में नई नज़्म टाँक जाता।
काश ! ऐसा भी होता कभी,
खाब कोई आँखों में ठहर जाता ।

दुनिया तेरी तंग गलियों से गुज़रते ,
माज़ी के आयने में झाँककर जाता ।
काश ! ऐसा भी होता कभी,
वो हमसफर सरे-राह ठहर जाता।

ज़िंदगी की जद्दोजहद से उलझते,
मुट्ठी भर धूप हाथों में भर जाता।
काश ! ऐसा भी होता कभी,
सुदूर शफक,कोई अपना ठहर जाता।

काश ! ऐसा भी होता कभी,
बस ! बचपन कहीं ठहर जाता ।
सर्वाधिकार सुरक्षित(C)भार्गवी रविन्द्र 
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उसने पूछा-”कवि हो?”
मैंने कहा-जी,नहीं, कभी-कभी हूँ
पूछा-कब से?
जी,बस अभी-अभी हूँ
क्या-क्या लिखते हो?
कहीं,क्यूँ नहीं दिखते हो?
जी,जो कुछ सीखता हूँ
बस वही लिखता हूँ
अरे वक्त की नब्ज पहचानों
मेरा कहा मानो
मेरे कहे अगर लिखोगे
तो,सच में, खूब बिकोगे
शब्द तेरे पर मेरी वाणी
समझो खत्म परेशानी
तो क्या,जमीर बेच दूँ?
कलम की तहरीर बेच दूँ?
युद्धभूमि में जाऊँ
और गांडीव,गदा,तीर बेच दूँ?
सेनानी को होती परेशानी
फिर क्या कश्मीर बेच दूँ?
तोते-सा करूँ उच्चारण
रह जाऊँ बनकर एक चारण
छोड़ कर शब्द-साधना
किसकी करूँ आराधना?
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित

 हम उनके ही गीत हरदम गाते रहे।
जो भी ख्वाबों की दुनिया दिखाते रहे।।


बैठे थे सब बारिश के इंतजार में,
बादल आने को है वो सुनाते रहे।

अपने वादे सभी भूल गए जो मग़र,
कितना अबतक किये काम गिनाते रहे।

अपनी गलती कभी भी जो माने नहीं,
औरों पर ही उंगलियाँ उठाते रहे।

चालाकियों से जिनके हर कोई डरे,
वे हालाते शहर पे मुस्काते रहे।

अपने घर को सब अपनी जमीं चाहते,
देंगे एक आसमाँ वह बताते रहे।

होता बातों पे उनके यकीं अब नहीं,
बातों का हवामहल जो बनाते रहे।

कमलेश्वर ओझा



तर्ज- मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए

भले हो उजाला भले हो अँधेरा

जहां साथ तेरा वहीं हो बसेरा।

सभी राज दिल के अभी जान लें हम
बँधी डोर तुमसे यही मान लें हम
करो आज वादा न तुम छोड़ दोगे
लगाकर कभी दिल न तुम तोड़ दोगे
जनम तक रहे संग तेरा व मेरा
जहां साथ तेरा वहीं हो बसेरा।

लिखे गीत मैंने सुनो आज तुम भी
हमारे मिलन के बुनो ख्वाब तुम भी
अलग एक गाथा हमारी तुम्हारी
तुम्हीं आज पूजा तुम्हीं हो ख़ुमारी

अभी जिंदगी में हुआ है सवेरा
जहां साथ तेरा वहीं हो बसेरा।

बनी हीर रांझा हमारी कहानी
लिखेंगे नया छोड़ बातें पुरानी
सभी अप्सरा को जमीं पर उतारे
हमारे मिलन की गवाही सितारे

हमेशा बने तू प्रिये साज मेरा
जहां साथ तेरा वहीं हो बसेरा
भले हो उजाला भले हो अँधेरा
जहां साथ तेरा वहीं हो बसेरा

इति शिवहरे




हाथ जोडकर तुमसे भैया

विनती करता बारंम्वार।
नहीं काटो मुझे मेरे पैरों को
नहीं चलाऐं आरी हथियार।

क्या मिलेगा मुझे काटकर,
मै रहा सदा सखा तुम्हारा।
प्राणवायु सबको मै देता,
रखता हरदम ध्यान तुम्हारा।

जंगल काट रहे लगातार सब
मेरे पांवों में कुल्हाड़ी मारकर।
पेड पौधे सब मानवता के पोषक
क्या मिलेगा तुम्हें हमें काटकर।

पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।
वातावरण दूषित हो रहा है।
फल फूल औषधि सब देते,
फिरभी मनदूषित हो रहा है।

ये जंगल आपके हितकारी।
प्रत्येक तरह से सुखकारी।
दृढ संकल्प लें पेड लगाऐंगे,
हम सदा रहेंगे जन उपकारी।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.




तेरी महिमा गाऊँ कैसे
तेरा ही हूँ अंश माँ
अपने सपनों की खातिर
तुझ कैसे भुलाऊं माँ
तुझसे ही मेरा जीवन सिंचित
दुग्धामृत का पान कराया
कैसे ऋण चुकाऊं माँ
हाथ पकड़ कर चलना सिखाया
मुक जुबां को समझ के मेरी
भूख प्यास मिटाई माँ
तेरे चरणों की धूली
निज मस्तक लगाऊँ माँ
देकर अपना रूप सौंदर्य
अपनी कोख में पाला माँ
जब भी कोई दर्द हुआ मुझे
आँख तेरी भीगी माँ
मेरी हर आहट पर 
आह तेरी निकली माँ
अपनत्व भाव क्या होता
तुझसे बेहतर कौन जाने
निस्वार्थ ममत्व भाव
दूजा कौन लुटाए माँ

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

आज के युग के बच्चे

सभ्यता संस्कार भूल रहे
बड़े बूढों का चरण स्पर्श
हाय हैलो में बदल रहे
सदा चहकते रहते थे
मोबाइल लेपटॉप में जकड़ गए
शरबत शिकंजी पीछे छोड़
कोक पेप्सी का दौर चले
दाल रोटी को छोड़ कर घर में
पिज़्ज़ा बर्गर में जुटे पड़े
फटी जीन्स पहन कर घूमें
उसको फैशन बताते है
डिस्को पब की दुनियां
उसको जन्नत बताते है
छोड़ गलियों के खेल
मोबाइल गेम खेल रहे
आधुनिकता का लिबास ओढ़
वास्तविकता को भूल रहे
मंदिरों में हाथ जोड़ना
अब रीत पुरानी लगती है
दिखावे की इस दुनिया में
अपनों की भीड़ बेगानी लगती है
वर्तमान की यह हालत है
फिर भविष्य तो बिगड़ रहा
आज की क्या बात करें
आने वाला कल हाथ से निकल रहा
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना 
*यह स्वप्न भी साकार हो*
०००००००००००००००
पेड़ फलें,बन लगें,स्वर्ग से उपवन खिलें,
आते जाते मौसम में,नित पंछी नई उड़ान भरें।
उद्यम लगें,निर्धन घटें,विज्ञान में प्रधान हों ,
खुदा करे मेरे भारत का,यह स्वप्न भी साकार हो।।

डाल-डाल में,पात-पात में,खुशियों का संचार करें,
धन-धान्य की गंगा बहे, यह संकल्प सर्व-समान बने।
नीड़ में दो सुगवा चहके,सीमित सा आकार हो।
खुदा करे मेरी धरती का,यह स्वप्न भी साकार हो।।

माटी में सब पैदा होते,मन्दिर- मस्जिद के पुजारी,
सीमा में न भाषा बदले,हिंदी सर्व-प्रधान बने।
राष्ट्र प्रेम मानवता पोषक, मेरा भारत महान हो,
खुदा करे फिर गांधी जन्मे,यह स्वप्न भी साकार हो।।

(मेरे कविता संग्रह " अनुगूँज " से )
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी,गुना(म.प्र.)

 छनकते पैर जो रख दो
********************
छनकते पैर जो रख दो,

तो सुर का साज बन जाये,
हिलाकर होंठ कुछ कह दो,
तो सब आबाद हो जाये...

पलक के बीच आंखों में,
कहीं कुछ ख्वाब रहते हैं,
तमामो चोट सह सहकर,
यही दिन रात बहते हैं,
पलक अपनी जरा ढक लो,
सपने महफूज हो जाये..

छनकते पैर जो रख दो,
तो सुर का साज बन जाये,
हिलाकर होंठ कुछ कह दो,
तो सब आबाद हो जाये...

भिगाकर के बदन अपना,
निकलते बारिशों में तुम,
ठहर जाती है कुछ बूंदे,
भिगाती जुल्फ हो जब तुम,
झटक दो जुल्फ तुम अपनी,
तो ये आजाद हो जायें...

छनकते पैर जो रख दो,
तो सुर का साज बन जाये,
हिलाकर होंठ कुछ कह दो,
तो सब आबाद हो जाये...

छुपाकर क्यों रखी अब तक,
दबी जो ख्वाहिशें दिल में,
सुना दो ये फ़साना हर किसी को,
आज महफ़िल में,
तुम्हारे प्यार का सबको,
यहां एहसास हो जाये.....

छनकते पैर जो रख दो,
तो सुर का साज बन जाये,
हिलाकर होंठ कुछ कह दो,
तो सब आबाद हो जाये...

मुझे बेचैन करती हैं,
सुलगती सांस की गर्मी,
मेरा सुख-चैन ले बैठीं,
तेरे महताब की नरमी,
सुलगते होंठ ये तेरे,
मुझे न मोम कर जायें...

छनकते पैर जो रख दो,
तो सुर का साज बन जाये,
हिलाकर होंठ कुछ कह दो,
तो सब आबाद हो जाये...

....स्वरचित...राकेश पांडेय



पुरुष हूं परुष नहीं....
---------------------------
मेरी यह रचना उन पुरुषों को समर्पित है जो अपने परिवार और अपने दायित्व के प्रति पूर्ण रुप से समर्पित हैं । वो भी भावनाओं से परिपूर्ण होते हैं पर अभिव्यक्त नहीं कर पाते ।
**********************
पुरुष हूं परुष नहीं , 
हृदय मैं भी रखता हूँ
हैं मुझमें भी संवेदना
कह ना सकूं कभी मैं, 
अपने मन की वेदना
मुझमें भी हैं भावना,
पर न कह पाऊं ना।
मैं कोई कवि नहीं, 
जो गीत गाऊं नित नया।
बंटा हूं मैं भी रिश्तों में, 
जीता हूं मैं भी किश्तों में।
पुत्र, पति,पिता बना,
दायित्वों का भार घना।
बंटता गया मैं हिस्सों में,
कटता गया रिश्तों में।
यंत्र जैसी जिंदगी, 
अनवरत चलती रही।
जद्दोजहद जिंदगी की, 
और भी बढती रही।
भूलता सा मैं गया,
जूझता ही रह गया।
कह न पाया कभी,
अपने मन की भावना।
दर्द मुझे होता है, 
दिल भी मेरा रोता है।
पर हर दर्द के लिए, 
शब्द कहां होता है।
चुप जो मैं रहता हूं, 
कुछ जो न कहता हूं।
आंक ली गई इससे,
मेरी कठोरता।
पुरुष हूं परुष नहीं, 
दिल तो मैं भी रखता हूं।
करता मैं भी रात-दिन,
सबके भले की कामना।
हूं बडा़ ही एकाकी,
तुम मुझे सम्हालना । 
पुरुष हूं... ।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित



नज़रों से हम तेरी तो आबाद हो गए....


नज़रों से हम तेरी तो आबाद हो गए….
थे रकीब मेरे जो सब बर्बाद हो गए…

दिल रहे बेचैन तेरे दीद के लिए…..
तुम न जाने ईद का क्यूँ चाँद हो गए….

कर वफ़ा दिल टूटना तो आम हो गया….
हम वफ़ा नफरत तेरी नाशाद हो गए….

बन गले का हार मुझको ऐसे तुम मिले…
जिस्म दो इक जान के संवाद हो गए….

ज़िन्दगी ओ मौत की हद्द पार कर गए….
इश्क़ की मंज़िल के हम अनुवाद हो गए….

घास मत डालो कभी उन मंद इंसां को….
इश्क़ के बेवजह जो प्रतिवाद हो गए….

चुप्प तुम ‘चन्दर’ रहो शोर न करो अब….
लो मुहावरे भी ग़ज़ल के स्वाद हो गए….

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२५.११.२०१८



एक विरह गीत सादर समर्पित है जी,,,,,,,,,, 
💔💘💔💘💔💘💔💘💔
क्लात मन के शांत र
स का
क्लेशमय अवसाद लिख दूँ
हां प्रिये! अभिसार लिख दूँ,,,,

द्वय अधर की मौन शुचिता 
हेरति दुर्मिल सजन हित
दृग पटल की आद्रता
चीरती रंजित कपोल
उर जलन की प्यास लिख दूँ
हाँ प्रिये! अभिसार लिख दूँ,,,,,,

रक्त रंजित कोशिकाऐ
रजनी तले अंगडाईयां ले 
वक्ष उर के स्पदनों मे
उष्मिता सांसे रूझाऐ
श्वासो की हर सांस लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूर,,,, 

द्वय उरून के क्षण सुगंधित 
कुटिल कुंतल कपोल कंपित
गात सौष्ठव जीर्ण अपरिमित 
विगलित छुअन छिजन सुभाषित 
सतत साक्षित साक्ष्य लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूँ,,,,, 

होष्ठ कंपन नयन अश्रु
लिपटे प्रणय परिचेतना
सरि तटो सी क्षुब्ध पिपासा 
संतप्त सुधी संवेदनाऐ
अंतस समाहित रुदन लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूँ,,,,,

सद्य पारस रोम कुंदन 
अद्य आलिंगन विवश
चंद अनुरागी विलग क्षण
प्रिय पलाशी प्रीत पतझड
आतप हिय क्रंदन लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूँ,,,,, 

खौलती हृद की ऋचाऐ
अनबुझी अतृप्त विधाऐ
नखशिखत विचलित क्षुधाऐ 
हरसिंगारित वेदनाऐ
अवगुंठ सब अनुबंध लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूँ

प्रिय हित स्वर द्वंद्व सारे
विलय विचलित रागिनी 
उर षडज गंधार धैवत
मद्धम ऋषभ पंचम नीषाद
राग हैरिल नाद लिख दूँ
हाँ प्रिये अभिसार लिख दूर,,,,, 
💔💘💔💘💔💘💔💘💔
स्वरचित:-रागिनी नरेंद्र शास्त्री 
दाहोद(गुजरात)
💔💘💔💘💔💘💔💘💔

कोहरा छाया है इस जग में , जालिम अत्याचारों का |
नासमझी में तिलक किया है ,अपराधी व्यभिचारों का ||

जोत बखर तैयार किया था , खेत अन्न उपजाने को |
खाद बीज मेहनत से डाली , पैदावार बढ़ाने को ||
खरपतवार कहाँ से आये , सुन्दर फसल नसाने को |
न बोया न सींचा हमने , खोजो जरा ठिकाने को |l
रुप बदल झोली घुस बैठे , रहा बीज जो चारों का |
कोहरा छाया .... .... ..... .....

तन मन धन शोषण कर सबका , जड़ें रोज फैलाते हैं |
रहें आश्रित जिनके ऊपर , उनको ही खा जाते हैं ||
चुन -चुन करके इन्हें उखाड़ो ,धुँआ साथ करना होगा |
दरियादिली दिखाना न तुम , पाले से बचना होगा ||
'माधव'मत की ताकत समझो ,दो जवाब व्यवहारों का |
कोहरा छाया ..... ......
.....

#स्वरचित
#सन्तोष_कुमार_प्रजापति_माधव
#कबरई_महोबा_उत्तर_प्रदेश
श्रद्धा अराधना और सम्मान
मन की ये भावनायें 
प्रेम के उच्च स्वरुप हैं

पाने की कुछ चाहत नहीं
और ना ही खोने का डर
मिलेगा मुझे जो मेरा नसीब है

कभी था जो अजनबी
लगते अब वही अपने
किस्मत से नहीं फकीर हैं

आजादी की तमन्ना
हर दिल अजीज है
फिर भी चाहती वही
जैसी तेरी चाहत है

जिद पर अड़ गई कभी तो
ना समझो इसे तकरार है
ये तो प्यारा सा अभिमान है

जिस राह मिले हो तुम
उन राहों के हमसफ़र हैं
फिर भी पूछते हो 
"हम तुम्हारे कौन है"

मन अर्पण चरणों में तेरे
भावना यह बारम्बार है
यह प्रेम नहीं तो क्या है

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल

सद साहित्य
वाल्मिकी कालीदास ने
सद साहित्य प्रेरणा दी
छंद रस अलंकार सृजन की
नयी प्रेरणा सबको दी
तुलसी सूर हिंदी भाषा के
राम कृष्ण हित ग्रन्थ लिखे
मर्यादित रहकर के उनने
जनमानस को क्या न दिये
तुकबंदी कर फूहड़ भाषा
काव्य सृजन नहीं होता
बाहर से वह् खुशी बटोरे
अन्तर्मन से वह् रोता
लिखो काव्य पौरुष रस में
जनहित नयी क्रांति आये
मुर्दे भी चल कर उठ बैठें
युवकों में आक्रोश छा जाये
सड़ी रीत परम्परा को
अब धरा से दूर हटाओ
जनहित के कल्याण हेतु
वीर रस जन हित गाओ
भरो हुंकार मिल सब कवियों
भारत जन उत्साहित करदो
खून पसीना स्वयम बहाकर
विश्व पताका जग फहरा दो
रूस अमेरिका के तलवे को
कब तक मुल्क निहारेगा
भारत भीतर बने माल से
पुनः मुल्क फिर निखरेगा
वीर धीर योग्यता धारी
कब तक हाथ पसारेंगे
उनके सपनों के भारत को
कब तक वे बिसरायंगे
स्नेह सुधा रस बांटो सब मे
सवा अरब इस जनता में
ऐसा सृजन करो साथियों
द्वेष परिवर्तित हो ममता में
तम सो मा ज्योतिर्गमय भरदो
सर्वे भवन्तु सुखिनः नारा
जननी जन्मभूमि गरियसि
पुनः खुले विकास का द्वारा।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


सुबह की बेला
-----------------
सुबह की बेला
उषा की लीला
शान्त बेला
अदभुत लीला

सुबह की बेला
सूर्य की लीला
दृश्य अलबेला
कितना छबीला

सुबह की बेला
अनुपम लीला
लगा है मेला
चित्र सजीला

सुबह की बेला
जीवन लीला
चिड़ियों का रेला
गान सुरीला

सुबह की बेला
बच्चों की लीला
मचा है खेला
रंग रंगीला

मनीष कुमार श्रीवास्तव
भिटारी ,आलमपुर
रायबरेली
स्वरचित

** आज **

होगा सुंदर आज अगर कल भी सुदंर हो जायेगा 
नहीं रहेगा आज अगर कल फिर कैसे हो पायेगा |

तजकर आलस हमें सदा कर्म पथ पर बढते रहना
 काम किए बिन हमको बैठे बैठे कुछ नहीं मिलना |

कल की बात नहीं है करना आज करो जो है करना 
चलता रहे वक्त नहीं रूकता साथ उसी के है चलना |

है जग दिन का सपना सांझ हुई फिर घर को चलना 
झूठे सपने नहीं देखना कहीं आज को भूल न जाना |

गीता का कथन सुहाना जीवन में उसे अमल में लाना 
कर्म पथ पर चलकर ही सुदंर सहज जीवन है बनाना |

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

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