Tuesday, November 27

"आत्मा "26नवम्बर 2018






ये शरीर नश्वर है पर,
आत्मा अमर है,
आज इस घर है तो,
कल उस घर है |

आत्मा है तन का दर्पण,
सच्ची छवि दिखती है हरपल,
शरीर साथ छोड़ देगा एकदिन,
आत्मा साथ रहेगी हरदम |

कर्म अच्छे होंगें अगर तो,
आत्मा को मुक्ति मिलेगी,
बुरे कर्म हुए अगर तो,
आत्मा कैद में रहेगी |

जीवन में अच्छा करें सब,
भूखे,गरीब असहायों की,
दिल से मदद करें सब,
आत्मीय सुख,इसी में रब |


स्वरचित*संगीता कुकरेती*




अजर अमर अविनाशी आत्मा, इसका ही हरि से नाता है,
शरीर हमारा है नश्वर जग में , आता और जाता रहता है, 
राग व्देष और भौतिक सुख का, नहीं आत्मा से कोई नाता है, 
लोभ मोह लालच और कटुता, इनको मन ही बस अपनाता है , 
भाई बंधु और सखा पडोसी, इनका आत्मा से कोई नहीं रिश्ता है, 
अपने पराये दोस्त और बैरी, चंचल मन इनमें ही भटकता रहता है, 
दिल की बात नहीं सुनता ये , मन अपने ही मन की करता है, 
आत्मा पडी शरीर की कैद में, तन को चमकाया करता है, 
भगवान बसे शरीर के अंदर,मन ये संसार में ढूढा करता है, 
लौ लग जाये जब मन की हरि से,आत्मा का पता चल जाता है । 
स्वरचित, मीना शर्मा, 


सत्य जीवन मृत्यु अटल। 
संघर्ष अग्नि सत्य अनल।
मन देह है जीव और वन।

फलित विचार और स्वप्न। 
पुष्प ह्रदय की प्रसन्नता। 
कंटक अहित सी व्यग्रता। 
निर्धन, तप्त, संतप्त, मन।
संतोष, उच्च , स्वर्ण, धन।
सुसुप्त जीवन, भंग तंद्रा। 
मृत्यु , मुक्ति, गहन निंद्रा।
जगत जीवन आहूति सम। 
आत्मिक है शाश्वत हवन। 

विपिन सोहल



नश्वर काया नश्वर माया
तू परमपिता परमात्मा।
जीते जी प्रभु जी भजलें
कब देह त्याग दे आत्मा।

मोह माया में फंसे हुऐ हैं।
दलदल में हम धंसे हुऐ हैं।
आत्मा आवागमन करती,
क्यों जानबूझकर डरे हुऐ हैं।

स्थान बदलती रहती माया।
देह त्याग मिले दूजी काया।
आत्मानुभव हम जो करते,
है सब परमपिता की माया।

मन की बात सुनें नहीं कोई,
बात सुनें जो आत्मा बोले।
कर्म करें हम सदा ही सुंदर,
अजरअमर जीवात्मा बोले।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय



मरने लगी है आत्मा,
जिस्म मरा तो क्या ।
जिन्दा को ही नोचते,
मरे हुए का क्या ।
🍁
राजनीति कर रोटी सेंके,
भूखो में हाहाकार ।
कितना नीचे और गिरोगे,
छोड के तुम आधार॥
🍁
शून्य पराक्रम झूठा वैभव,
लच्छेदार है बात।
भोली जनता मूर्ख बनी है,
समझ ना उनकी बात॥
🍁
शेर की कविता इंकित करता,
नेताओ की जात।
आत्म शून्य इन पर क्या लिखूँ
ढाक लिखूँ या पात ॥
🍁
Sher Singh Sarraf




वेदों का आधार यही है
गीता का सार यही है।
शरीर तो यह क्षण भंगुर है,
आत्मा अजर अमर अनश्वर है।।

त्रिविध ताप का नहीं असर,
आत्मा में ही रहता परमेश्वर।
परम् पिता की अंश यही,
जगत नियन्ता जगदीश्वर।।

मानवता का धर्म यही है,
आत्मा किसी की नहीं दुखाये।
परहित में सर्वस्य निछावर कर,
आत्म तत्व को सुख पहुचायें।।
रचनाकार
जयंती सिंह



आत्मा
प्रातः प्रस्फुटित प्राच्य-प्रभास्वर
दिव्य ब्रह्म-ज्योतिर्कण,अनश्वर
आत्मा,चेतन,जीवन के पर्यायी
पवन,स्पंदन,अवलंब,अनुयायी
जीवन-सांध्य विलय विभावरी
तन-तन-विचरण,अति यायावरी
मानव-तन-अरण्य,चल वनवासी
आत्मा-अजर,अमर, अविनाशी।
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित



यही है जीवन की मूल
जिसे हम जाते भूल
भगवान ने भी यह कहा
नर इसमें तू सदा नहा। 

आत्मा पर प्रवचन हो गये
इसकी आड़ में व्यसन हो गये
चोले धारियों की करतूत देखो
वो कैसे निर्वसन हो गये।

आत्मा गहन अनुभूति है
ईश्वर की ही सच्ची स्तुति है
ये दोनों मिलने के बाद 
सारी ही बात झूठी है। 

ईश्वर में डूबा एक गहरा ध्यान 
उसमें ही रमता हुआ ये प्रान
पोर पोर से होता उसका गुणगान 
अन्य बातों से बन्द होते कान। 

कवि भूल जाये अपने शब्द 
हो जाये पूरा एकदम नि:शब्द 
भाव विह्वलता की एक ही शैली
जिसमें आॅख ही होती मात्र सहेली। 

बस यही है आत्मा का चरम
यहीं टूटता है सारा भरम
और वह भी पड़ जाता नरम
जिसे कहते हैं हम परम
हम परम हम परम हाॅ परम। 

कृष्णम् शरणम् गच्छामि



कौन कहता है
अमर है आत्मा
मरते देखी है हमने
जनमानस की आत्मा
बढ़ते पापाचार धरती पर
देते उदाहरण
मरती आत्मा के
आत्मा तो संवेदनशील है
पर आज हर कोई
संवेदनहीन है
कट रहे मूक प्राणी
मिट रहे भ्रूण कोख में
मर रही आत्मा
चंद नोटों लालच में
बढ़ रहा भ्रष्टाचार 
बिक रही आत्मा
नारी अत्याचार की हो रही अति
अब लूट रही अस्मिता
मूक बन सब 
देख रही आत्मा
मर रही आत्मा

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

जब तक शरीर में 
आत्मा है
यह चलती मशीन है
जब हुई मशीन बंद
यह नश्वर शरीर है
अब चाहे इसे जलाओ
गाडो या 
बहाओ नदी में 
सब मिट्टी में मिल जाऐगा
धन दौलत औलाद
ऐशो-आराम सब यही रह जाऐगा
चाहे घर सोते हो 
मखमली शय्या पर
या टूटी-फूटी खाट , जमीन पर
पर वहाँ घास-फूस 
लकडी पर ही लेट कर जलना है
चाहे खाते हो 
खीर पूरी दूध मलाई
या सूखी रोटी रोज
पर यहाँ कर दिया जाऐगा 
मुँह बंद दो घूँट गंगा जल 
डाल कर
देखी हो दुनियाँ की
रंगरेलिया जिन आँखो से
बंद कर दी जाऐगी
आत्मा शरीर से निकलते ही
नाते रिश्ते सब 
बेगाने हो जाते हैं 
शमशान घाट भेजने की
सब करते है जल्दी 
मरे को घर में रखते नहीं 
पैसे वाला अपने को 
कहता हो कोई 
अमीरों की जात 
बताता हो कोई
जाता वही है वह भी
जहाँ गरीब भिखारी या 
जो हो फटेहाल 
सब है आत्मा का 
खेल दोस्तों 

जब तक आत्मा शरीर में 
कर लो अच्छे कर्म
जी लो ईमानदारी भाईचारे 
से चार दिन
समझ लो धर्मशाला है 
ये दुनिया 
स्थाई पट्टा किसी को नही है
फिर क्यो करते हो
हाय हाय, घोटाले,भरष्टाचार 
जिन्दगी में 
शरीर से आत्मा 
निकलने के बाद कहाँ गयी
पता नहीं 
सब जब तक हम चल रहे है,
लिख रहे है , बोल रहे है , 
देख रहे है 
तब मानो 
आत्मा हमारे साथ है 
 
स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव




1.
आत्मा रब प्रतिरूप है,
यही जानना ज्ञान ।
स्त्री पुरुष सब ईशमय,
सदा रखें ये ध्यान ।।
2.
वैभव अपार हो भरा,नहीं लोक हित भाव ।
आत्मा महान है वही , संकुचित नहिं स्वभाव।।
3.
आत्मा सो परमातमा, यह भारत की साख ।
सकल विश्व को ज्ञात है,
हम जन हित में दाख।।
4.
रखिए स्वस्थ शरीर,पर
धन निबाह के योग्य ।
बड़प्पना व्यवहार में,
आत्मा ईश्वर जोग ।।

**********************
प्रबोध मिश्र 'हितैषी'





"आत्मा"
दुनिया की भीड़ में
खो जाती हूँ जब भी
मन के कोने से
पुकारती है आत्मा
देख इस जगत में
इंसानों की हैवानियत
मन के सागर में
उफनती है आत्मा
गैरों की जुबान से
सुन मिठे दो बोल
मन के आँगन में
झूमती है आत्मा
देखकर अपनों के 
बदलते रूप को
अन्तर्मन को
उद्वेलित करती है आत्मा
किसी बेबस की
बनती जब बैसाखियां
मन के आकाश में
चमकती है आत्मा
इस जीवन सफर में
सुकर्मों से ही महकती
है आत्मा

स्वरचित पूर्णिमा साह 




विधा भजन
रचयिता पूनम गोयल

बसो मेरे मन-मन्दिर में श्याम ।
मेरी आत्मा में रहो श्रीराम ।।
१)-तुमको पुकारे तुम्हारी पुजारन ।
विनती सुन लो , ओ’मेरे भगवन ।।
दर्शन दो घनश्याम ।
मेरी आत्मा में रहो श्रीराम ।।
बसो .........
२)-सूना है इस मन का आँगन ।
प्रेम से अपने , कर दो रोशन ।।
भक्ति करूँ अविराम ।
मेरी आत्मा में रहो श्रीराम ।।
बसो............
३)-तुम बिन जीवन , कैसे बिताऊँ ?
सोच-सोच के , मैं घबराऊँ ।
पार लगा दो नाव ।
मेरी आत्मा में रहो श्रीराम ।।
बसो.........





सुन्दर ये संसार है, सुन्दर पाया शरीर,
पंचतत्व से है बना,आत्मा का है नीड़।
वस्त्र बदलती आत्मा,रखती प्रभु से नेह।
मूढ़ मति मानव सदा, करें देह से नेह।
मद,माया,मोह में,मानव उलझा जाए।
आत्मा की करें उपेक्षा,सुख में भटका जाए।
आत्मा विरहिणी बनी,पिय-पिय करती जाए।
मूढ़ मति मानव, अनसुनी करता जाए।
मानव इस संसार में,सदा नहीं तेरा वास।
इक दिन पंछी उड़ जाएगा,लगा प्रभु से आस।
आत्मा-परमात्मा एक हैं,कुछ दिन का है वियोग।
एक दिन हो जाएगा, दोनों का संयोग।

अभिलाषा चौहान




आत्मानुभव आत्म परीक्षण।
रोज करें हम आत्म विवेचन।
सत्य उवाच आत्मा करती,
मिलता हमें आत्म संम्प्रेषण।

डूबे रहें आत्म सुखरंग हम,
करते रहें आत्म मनोरंजन।
सब विफलताऐं भागेंगी जी,
निश्चित होगा सबका भंजन।

आत्मरूप को हम पहचानें।
यहाँ क्यों आऐ हैं हम जानें।
अहम छिपा है अंतरतम में,
क्या वास्तविकता हम जानें।

आत्मस्वरूप अंदरखाने में।
क्यों डरें हम अंन्दर जाने में।
आत्मानुभूति करें अगर हम,
कैसा भय अंतर्मन जाने में।

सबसे पवित्र आत्म बंधन है।
बाहर तो क्रंन्दन ही क्रंन्दन है।
संग सभी के मनोरंजन करलें,
यही ईशभक्ति भजन वंदन है।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय


आत्मा की मौन महत्ता ही,
ज्योतित शुचिता संधान लिए।
जग - जगड्वाल में विहर रही,
लोकोत्तर रूप - विधान लिए।

जिसकी जागृति से आकांक्षा-
संसृति में नव -नव आवर्त्तन।
छिड़ते अभाव में भाव ,भाव-
में परम - भाव के सम्मेलन।।
-डा.उमाशंकर शुक्ल'शितिकंठ'

No comments:

"भाषा"19 जुलाई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-452 San...