Saturday, December 15

"साक्षात्कार "15दिसम्बर 2018

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार  सुरक्षित हैं एवं बिना लेखक की अनुमति के कहीं भी प्रकाशन एवं साझा नहीं करें | 
ब्लॉग संख्या :-238
दिन शनिवार
विषय साक्षात्कार
रचयिता पूनम गोयल

ईश्वर के कार्यालय में ,
हुआ आज साक्षात्कार ।
अमीर-ग़रीब 
हर प्रकार के ,
व्यक्ति की 
लगी भीड़ अपार ।।
आवेदन-पत्र लेकर ,
मैं भी पहुँची
समयानुसर ।
और कुछ ही क्षण बाद ,
लगी मेरे नाम की गुहार ।।
भीतर एक विशालकाय कुर्सी पर ,
भारी-भरकम पुस्तिका लिए ,
अध्यक्ष महोदय थे विराजमान ।
शायद सभी के लेखे-जोखे ,
जिसमें थे विद्यमान ।।
दाएँ-बाएँ अनेकों ,
कार्यकर्त्ता वहाँ उपस्थित थे ।
उनके हाथों में भी ,
विभिन्न कार्यपत्र थे ।।
थर-थर काँप रहा था हृदय ,
एवं जिह्वा भी लड़खड़ाई ।
पर तभी क्या देखा
कि माननीय अध्यक्ष जी ने ,
मेरी पीठ थपथपाई ।।
कहा कि आवश्यक नहीं ,
यज्ञ-तप व दान करना ।
जीवन में किसी के 
काम आ सको ,
है उसका अर्थ भी ,
मुझे ही प्रसन्न करना ।।
फिर कहा उन्होंनें ,
जाओ , वत्स , जाओ ,
अपना जीवन खुशी से बिताओ ।
और सम्पूर्ण धरती के वासियों को , 
तुम यूँ ही अपना बनाओ ।।
"""""""""""""""""""
प्रकृति का है वैभव अपार
चहुँ ओर दृष्टि गत रम्यद्वार
अवनी तल के आलोकों में
निज प्रकृति का साक्षात्कार
प्रातः की रक्तिम अरुणाभा
झोली में लाती है अनंद
धीमे से मलयानिल स्वयं
पुष्पों की बगराती सुगंध
रागिनी सुभग खग नीड़ों में
भरती अमोद नंदन वन का
पुष्पों पर आश्रित अलिगुंजन
खोलता द्वार नंदित मन का
निःसृत बुभुक्षु वत्सक पुकार
सब प्रकृति के साक्षात्कार
आमोदन के निर्झर प्रहार
ये सब कुछ हैं साक्षात्कार
स्वरचित-राम सेवक दौनेरिया
बाह-आगरा उ.प्र.


लीजिये मेरा साक्षात्कार मैं हूँ तैयार 

एक शायर एक आशिक हूँ दिलदार ।।

बिना बने आशिक आसां न बनना शायर
पहले इस हकीकत को कीजिये स्वीकार ।।

माना कि मैं गलत हूँ पर यही हकीकत
हर हालात बने ऐसे मिला हसीन यार ।।

जब तक न खुद पर बीते न कलम चले
चले तो लगे बनावटी न हो वो निखार ।।

कवि के न डिग्री होती हो जाये अच्छा है
मगर हृदय हो अच्छा वरना डिग्री बेकार ।।

कवि पहले होता होती बाद में कोई डिग्री
बिना हृदय के न निकलते मन के उदगार ।।

कितने ही उदाहरण बिखरे पड़े हैं यहाँ 
जो सापेक्ष हैं इस कथन के जाना संसार ।।

कीजिये ''शिवम" इस हकीकत पर विचार
यही आज का एक सुन्दर सुखद सुविचार ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 15/12/2018



विधा लघु कविता
कुम्भकार ने रचना करदी
भरते हम सद् संस्कार
जो जितना परिश्रम करता
उतना सुन्दर साक्षात्कार
अनुभव योग्यता व्यर्थ नहीं है
जीवन को करता साकार
विद्व जनों के नित सत्संग से
निखरित होता साक्षात्कार
दोहरा जीवन जीवन नही है
मिथ्या फरेब पड़े फटकार
खुद बदलोगे जग बदलेगा
वृद्ध बड़े का करो सत्कार
साक्षात्कार प्रदर्शन निज है
प्रभावित करदे दुनियां को
त्याग विनम्र सादगी से ही
करें याद श्रम स्व महिमा को
खुद जीना भी क्या जीना है
संस्कार हित मोती जड़ लो
अंधकार अज्ञान हिय में
ज्ञान ज्यौति अंतर में भरलो।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

दीवारें मेरी तरह ही सहमी सी थीं....
उनको लगा की मैं चिलाऊँगा....
पर मैं उनको और वो मुझे...
घूरती रहीं....
चुप्पचाप...

मैंने हाथ बढ़ा कर छूआ एक दीवार को...
पपड़ी सी यहां पर थी....
स्पर्श पाते ही मेरा...झर गयी....
भीतर सीलन थी...
न जाने कब से सिसक रही थी...
मेरी तरह....

मैंने रंग रोगन से पुताई की...
पर वो चमक न पायी...पहले जैसी...
बार बार पुताई की...पर...
वैसी की वैसी रही....
अक्स अलग अलग से उभर आये थे....
दीवार पर जगह जगह....
ऐसे लगा मैं अपना ही साक्षात्कार कर रहा हूँ....

न जाने लोग कैसे कहते हैं की पत्थरों में...
न जुबां होती न दिल...
परिवार के बिना वो भी उदास...ग़मगीन होती हैं....
संग सब के वो खिलती हैं बोलती हैं....

अब न वो बोलती हैं न मैं बोलता हूँ....
मौन से एक दूसरे को ताकते रहते हैं...
साक्षात्कार दोनों एक दूसरे में....
अपना ही करते हैं....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
१५.१२.२०१८

जीवन का एक परिणय बंधन,
जिसमें बँधना था मुझको,
लिखित परीक्षा उसमें दो-चार,
उसके बाद था साक्षात्कार |

प्रथम भाग में जन्मपत्री जुडा़ई,
घरवालों को चिंता सताई,
जन्मपत्री जुड़ गई भाई,
अब शुरू आगे की कारवाही |

लड़के वाले मुझे देखने आये,
माता-पिता संग दो-चार ओर लाये,
चाय-पकौड़े उन्होंने दबाकर खाये,
थोड़े से नखरे भी दिखाये |

सखियों ने किया मुझे तैयार,
आज था मेरा साक्षात्कार,
दिल की धड़कन बढ़ी कई हजार,
सब कर रहे थे मेरा इंतजार |

हिम्मत जुटा,लो मैं भी आ गई,
परिचय संग सबको किया नमस्कार,
विचारों का हुआ आदान-प्रदान,
पास कर लिया ये साक्षात्कार |

कुछ महीनों बाद बजी घर शहनाई,
धूम-धाम से मेरी शादी रचाई,
बाबुल का घर हुआ पराया,
पिया का घर मैनें अपनाया |

हर क्षेत्र में साक्षात्कार जरूरी,
विपरीत विचारों की मिटाता ये दूरी,
ये प्रक्रिया रखें बरकरार,
बुद्धिमता दर्शाने का ये आधार |

स्वरचित*संगीता कुकरेती*

साक्षात प्रभु के दर्शन क्या कर पाऊँ जब
साक्षात्कार स्वंय से नहीं कर पाया मैने।
पहले स्वयं से साक्षात्कार कराऐं भगवन,
तब मानूं क्या सुख नहीं भर पाया मैने।

साक्षात सभी का हो जाऐ अगर जो
आत्मानुभाव से स्वअंतर्मन में झांकूं।
कलुषित हृदय निर्मल हो जाऐ मेरा,
सचमुच यदि खुद अंतरतम में झांकू।

कलुषित तन कलुषित मन मेरा।
काली रात रोज नहीं होत सबेरा।
शुद्ध भावनाओं की प्रविष्ट नहीं तो,
धवल कामनाओं का नहीं बसेरा।

पहचान मेरी मुझसे नहीं हो पाई।
मै कहाँ ढूंढूं क्या जानूँ प्रीत पराई।
साक्षात्कार कैसे क्या कर पाऊँ,
जब तक दर्शन नहीं देते हैं रघुराई।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय



भीड़ भरे बाजार में
पहली बार
एक अजनबी से
साक्षात्कार
तन-मन उष्ण
बेताब हुस्न 
एकटक ताके 
लिए गर्म उसांसें
मृदु मुस्कुराए
बैठा मैं,नजरें झुकाये
होठों से
मिलने को बेकरार
तन उष्ण संचार
मन बहकाय
अजनबी वो
एक प्याली चाय।
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




क्षणिका

गरीब के गाल
तांकते
मुस्कान,
जीवन की
अट्टालिकाओं में।
काश !
आज,
संजीवनी से,
साक्षात्कार हो।

वीणा शर्मा वशिष्ठ

मौलिक,स्वरचित 



साक्षात्कार हमारा हमसे कभी जो होने पाया होता ,

सूने जीवन आँगन में फूल खुशी का खिलने पाता |

खूबियाँ हमें फिर सबकी कितनी ही दिखने लगतीं, 

इसी तरह कमियाँ अपनी कुछ तो कम होने लगतीं |

आत्ममंथन कर पाने का साहस जो कभी करने पाते, 

घृणा द्वेष लालच जैसे कोई अवगुण नहीं रहने पाते |

आशय अपनी वाणी का हमें विदित अगर होने पाता , 

कोई किसी को जिव्हा से कड़वे बोल न कह पाता |

साक्षात्कार हृदय से अपने जो कभी हमारा हुआ होता, 

दिल को दुखाने का साहस क्या कोई कभी करने पाता |

जीवन पथ की दुर्गमता को कभी कोई नहीं समझ पाता, 

जो होते न काँटे राहों में परिचय फूलों से नहीं होने पाता |

देखो परिस्थितियों से जीवन में साक्षात्कार हुआ ही करता , 
जो खुद सम्हले सम्हाले सबको मानव वही हुआ करता |

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,
हे प्रिये! 
आज कर ही लूँ मैं 
तेरे कण - कण से 
साक्षात्कार.......! 
अपनी आकांक्षाओं को 
आज लगा दूँ मैं पर 
और दे दूँ 
अपनी कल्पनाओं को 
अनन्त विस्तार..... 
आखिर कब तक 
मुक देखूँ तुझे 
तेरे में ही मग्न...... 
युगों तक का सफर 
कैसे करूँ तय 
थकने लगे हैं पाँव अब 
पर हार कैसे मान लूँ 
कब तक रहूँ 
खोई मैं 
जैसे बाँसुरी में रागिनी 
विस्तृत नीले वितान तले 
पंक्षियों के संग 
उड़ लूँ मैं भी 
आँखों से नाप लूँ 
नीले समन्दर को 
तेरा विराट सौम्य सा रूप 
भर लूँ दृगों में...... 
बुझा लूँ युगों की 
चिर प्यास......! 

स्व रचित 
उषा किरण



निराश, उदास, जीवन से रूष्ट,
भोग रही थी नियति का दिया कष्ट।

छीन लिया जिसने प्यारा छोटा भाई,
जीवन में आई असमय ही तनहाई।

तब ही मिला मुझे मंच एक प्यारा,
भावों के मोती से भावों को मिला सहारा।

हुआ मुझसे ही मेरा साक्षात्कार,
कभी नहीं भूलूंगी ये मंच का उपकार।

सुहृद,गुणीजनों का हुआ साक्षात्कार,
जीवन में जैसे हुआ कोई चमत्कार।

भावों का भावों से हुआ साक्षात्कार,
अनुभूतियों को मिल गए उद्गार।

बंध गई एक डोर प्रेम और विश्वास की,
रख गई जो नींव जीवन में आस की।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित





क्षणिका

पहले करो साक्षात्कार
बाद मे करो विश्वास
साक्षात्कार
व्यक्तित्व बताए
करीब लाए
गुत्थी सुलझाए।

साक्षात्कार मंजिल दिलाए 
परिचित बनाए
साक्षात्कार
इश्वर से मिलाए
सही ना हो साक्षात्कार
तो मन करे निराश ।
(अशोक राय वत्स) 
स्वरचित , जयपुर

क्षणिका 
(1)
दूसरों की 
आत्मा में झाँकते 
कोसते बार-बार 
क्या होगा जब? 
स्वयं की आत्मा से 
"साक्षात्कार"

(2)

चढ़ाओ लाख 
दया न करुणा 
मन में बसे 
शोषण के भाव 
कैसे हो प्रभु से 
"साक्षात्कार"

(3)

निकले भाव 
पँख पसार 
कल्पना ने 
भरी उड़ान 
जब हुआ कलम से 
"साक्षात्कार"

(4)
मंदिर नहीं 
हर बार 
उतरा गहरा 
मन भी ठहरा 
प्रकृति से हुआ जब 
"साक्षात्कार"

ऋतुराज दवे


ओ इंसान 
क्यों भटक रहा 
इधर उधर 
डगर डगर 
ढूंढता फिरता 
उस परमात्मा का आकार 
जो है अक्षुण व निराकार 
कहाँ भटक रहा नादान 
झांक ले अपना अंतर्मन 
आत्मा का कर साक्षात् कार 
मिल जायेंगे निराकार 
मिल जायेंगे निराकार 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित



सबसे बेहतर मौनालाप
स्वयं स्वयं को जांचें आप
खुद से खुद के स्वगत कथन
धागे में 'भावों के मोती' पिरकर होते बड़े मगन
गहराई से करो विचार 
यही है सच्चा #साक्षात्कार 

अपने दोष दीखते पल-छिन
दूजे के गुण लगते अनगिन 
दिल दरिया होता है जिसका
खुली किताब का हैअशआर 
यही है सच्चा #साक्षात्कार 

व्यक्त करें खुल स्वविचार
मोहित तन-मन का संसार 
प्रथम मिलन का वार्तालाप
छोड़े अपनी अमिट छाप 
पता लगें आचार-विचार
यही है सच्चा #साक्षात्कार 

____
#स्वरचित
डा. अंजु लता सिंह 
नई दिल्ली

विधा - छंद मुक्त

कोमल ,भावुक बालक गौतम
था बहुत संवेदनशील
एक दिवस घायल पंछी पा
मन व्याकुल था, उठती पीर
चुभा हुआ था जिसके तन पर
एक विषैला तीखा तीर
सुन न सका करुण क्रंदन वो
उठा हाथ में किया उपचार
पहला पहला इस जीवन का
मृत्यु से था साक्षात्कार
एक बुढ़ापे से पीड़ित तन
दिखा राह में था लाचार
उसे देख हिल गया हृदय था
हुआ पुनः एक साक्षात्कार
देखी अर्थी एक अभागी
कंधों पर थी चढ़ी हुई
नम आँखें दे रही विदाई
लोगो की थी भीड़ बड़ी
मन में फिर से उथल पुथल थी
जीवन का क्यों अंत हुआ
जीवन मरण का प्रश्न जटिल था
मंथन मन में बड़ा हुआ
सुबह सैर पर देख तपस्वी
एक सुखद आश्चर्य हुआ
मुख पर तेज ,कण्ठ में भगवन
विरत भाव का उदय हुआ
तजा पुत्र, दारा को उसने
खुद से साक्षात्कार हुआ
आत्मबोध के लिए जरूरी
खुद से खुद का साक्षात्कार
खुद को जानो ,परखो तब ही
होंगे भवसागर से पार

सरिता गर्ग
(स्व रचित)

निकली आईने के सामने से,
देख मुझे वो हंस रहा था,
दिखाकर चेहरा मेरा मुझको,
मेरा ही साक्षात्कार पूछ रहा था,
हो गई मजबूर सोचने को,
क्यों हूँ मैं आज खोई-खोई,
टिकते नही थे पाँव जमीं पर,
आज ठिकाना है बस रसोई,
समझा सबने बेवकूफ मुझको,
है भरपूर मुझको व्यवहारिक ज्ञान,
भूल कर पीड़ा अपनी,
सबको करती सुख प्रदान,
हर नारी की यही कहानी,
परिवार को मानें जीवन का सार,
शर्मा गया आज आईना,
जग जननी का लेके साक्षात्कार।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
15/12/18
शनिवार


सर्द मौसम में 
रिश्तों में गर्माहट
तन में उष्णता
मस्तिष्क को शीतलता
कुशल क्षेम जानने के बहाने
अपनत्व का अहसास कराती
जाने कितने रंगों से रंगी
जीवन का अटूट अंग
न कोई जाति 
न धर्मसंकट
बनी जीविकोपार्जन का आधार
खुशियाँ बिखेरती,
सहेजती,
यादों की चित्र मंजूषा से
कराती साक्षात्कार
अक्सर अपनों के संग
एक कप चाय।
एक कप चाय।
स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

#चाय दिवस...


पेड़ कहलाता प्रकृति का सुंदर उपहार
मानव की अज्ञानता संग उसका साक्षात्कार
हरा भरा मैं रहता हूँ
फल फूल तुझे देता हूँ
थके पथिक को छाया भी देता
पर बदले में कहो क्या कुछ लेता ?
तुम्हें जीवनदायिनी वायु भी देता
तेरी साँसों की डोरी भी झलता
मानव होकर पशु प्रवृत्ति दिखलाता
स्वार्थलिप्सा में निज हित बिसराता
लिया कुलहाड़ा ना तनिक विचारा
मेरे अस्तित्व को मिटाने तू आया
भयातुर आत्मा मेरी चीत्कार उठी
पीर घनेरी आहत हो पुकार रही
मेरा क़सूर तुम इक तो बतलाओ
मुझसे होने वाली कोई इक हानि तो गिनाओ ?
मुझे काटोगे बदले में तुम क्या पाओगे ?
क्या बिना आँकसीजन जीवित रह पाओगे ?
अपना जीवन ख़ुद अपने हाथों मिटा रहे
मुझको क्यों निर्ममता से यूँ काट रहे ?
प्रदूषण की मार अभी जो झेल रहे 
भावी पीढ़ी हित पीछे धकेल रहे
मानव तू तो कहलाता बड़ा ज्ञानी
मेरी उपादेयता तूने अब तक ना जानी !
मेरे अपने प्रश्न है बहुतेरे
पर तूने जवाब दिए ना पूरे

स्वरचित
संतोष कुमारी






No comments:

"रात/रजनी "15जुलाई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें   ब्लॉग संख्या :-448 Sri...