Wednesday, December 19

"देशप्रेम "19दिसम्बर 2018

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देशधर्म पर बलिदानी।
वीर पुर
ूष नमन तुम्हें।
सिंहगर्जना समरभूमि।
अडिग रहे अचल रहें।
संमुख प्रहारों से।
तीक्ष्ण शूल भालों से।
रं उगलती भुसुण्डी ।
वीरोंविचलितकरपाई।
कठिन वायु प्रहार में।
हिमाच्छादित दुर्गम पथ।
अग्नि उगलती मिशाले।
वीरों को कब विचलिता।
कर पाऐ कब विचलित।
एटम और परमाणु ।
सामने हर प्रहार सहें।
बढते रहे चलते रहें।
देशप्रेम की देश भक्ति।
देशरक्षा स्व धर्म सदा।
पाठ पढे है सदा पढेगे।
बलिदानी हम बलदानी।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
स्वरचितः
राजेंद्र कुमार अमरा



उठो बनके ज्वाला तुम 
और परहित का काम करों
लहरा के परचम देश का 
ये चर्चा तुम सरेआम करों
अपने मन से मिटा के द्वेष
बदलिये अपना क्रूर भेष
होके बलदानित प्रिये
तुम देश का कोई काम करों 

शशि कान्त पाराशर
नारी प्रधान लेखक



🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
जिस देश की माटी है चंदन,
जुडतें जहाँ दिलो के बंधन ,
नदियों का होता जहाँ संगम,
उस भारत देश का मैं वासी हूँ |

देश प्रेम ही जहाँ मजहब है, 
बड़े-बुजुर्गों का जहाँ अदब है,
इंसानियत ही जहाँ सबका रब है,
उस भारत देश का मैं वासी हूँ |

जहाँ सूरज सबसे पहले आता, 
भारत भूमि सबकी है माता,
भाईचारे का है सबका नाता,
उस भारत देश का मैं वासी हूँ |

जहाँ महिला थी झांसी की रानी,
दुश्मनों संग लड़ी जैसे मर्दानी, 
पवित्र है जहाँ गंगा का पानी, 
उस भारत देश का मैं वासी हूँ |

देश प्रेम जहाँ सबसे महान, 
भारत की आजादी की ख़ातिर, 
लाखों वीर हो गये कुर्बान,
उस भारत देश का मैं वासी हूँ |
🇮🇳🇮🇳जय हिंद 🇮🇳🇮🇳
स्वरचित *संगीता कुकरेती 

हर मुल्कों से न्यारा है
ये हिन्दोस्तां हमारा है ।।
हमें गर्व इस मिट्टी पर
जग का ये सितारा है ।।

जहाँ ज्ञान की ज्योत जली
सभ्यता सबसे पहले फली ।।
सोने की चिड़िया कहलाया
ये गरिमा भारत को मिली ।।

धीर वीर गम्भीर हुये हैं
दुश्मन को शमशीर हुये हैं ।।
विश्व गुरू का खिताब मिला
दुनिया की तकदीर हुये हैं ।।

विश्व पटल पर नाम लिखा 
हमने अपना काम लिखा ।।
आज नही कई सदियों से 
विश्व को हमने पैगाम लिखा ।।

निज मातृभूमि हमें है प्यारी
चाहे ये जान जाये हमारी ।।
शान न ''शिवम्" घटने देंगे
सौ जन्म इस पर बलिहारी ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 19/12/2018



एक गीत लिखा है मैंने ,
एक गान लिखा है मैंने।
शहीदों को श्रद्धांजलि और,
भारत माँ को प्रणाम लिखा है मैंने।।

एक बात सुनी है मैंने,
दुश्मन लगा है कहने ।
मैं हूं घर के अंदर ,
बाहर लगा लो कितने पहरे ।।

पहले की तरह नहीं है ‘भारत’,
आँसू क़लम में भर के कोहराम लिखा है मैंने।
देख रहे होंगे वो आजादी दिलाने वाले पुतले ,
जल रहा होगा फिर उनका सीना।

रो रही होंगी उनकी आँखें,
टूट रहा है अखण्ड भारत का सपना।
बंट रहा है देश जात पात में ,
कैसे मनाऊं आज़ादी ज़ुल्म की काली रात में।।

सरहद पर मर जाते हैं वीर -वीरांगना,
लाशें आती हैं अंगना ।
कुछ बोल दो उनके लिए भी,
कुछ अनमोल भी दो उनको तुम “भारत”।।

खोये हैं सरहद पर जिसने अपने बेटी -बेटे
उस माँ के दिल पर जो गुज़री।
वो हाल लिखा है मैंने,
उस माँ को अपना सलाम लिखा है मैंने।।

एक गीत लिखा है मैंने ,
एक गान लिखा है मैंने।
शहीद को श्रद्धांजलि और,
भारत माँ को प्रणाम लिखा है मैंने।।

स्वरचित 

-कल्पना'खूबसूरत ख़याल'
पुरवा,उन्नाव (उत्तर प्रदेश)



न तो कोई सिख इसाई
न हिन्दू मुसलमान हैं
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

न तो खून किसी का नीला
न ही किसी का पीला है
जो दिमाग में घुसकर बैठा
वो भेद भाव का कीड़ा है

इस कीड़े ने कुतर कुतर कर
किया देश वीराँन है
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

एक ही पेड़ पत्ते हैं हम
एक पेड़ की डाली हैं
जिसनें हमको सींचा है
वो एक हमारा माली है

जाति धर्म को हम क्या जाने
केवल हम इंसान हैं
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

आसमान पर ये तिरंगा
यूँ ही नहीं लहराता है
साहस और बलिदान सच्चाई
शान्ति का पाठ पढ़ाता है

भारत माँ का बच्चा बच्चा
गाता इसका गान है
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

सत्य अंहिसाका देश हमारा
न हिंसा की बात करो
संसकार के सेवक हैं हम
संसकार की बात करो

दुनियाँ के हर कोने में
अपनी ये पहचान है
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

न ही किसी से बैर करो
न ही किसी को गैर कहो
एक देश के वासी हैं हम
सब आपस में मिल के रहो

ये धरती अपनी माँ है 
और भारत अपनी जान है
न मजहब की बात करो तुम
हम सब हिन्दुस्तान हैं

अखिल बदायूंनी




जिस माटी में जन्म लिया, उसे शिरोधार्य करके रखना, 

कर्ज अदा करने को इसका, तन मन न्यौछावर करना |

सदा याद रहे गौरव देश का, तुम राष्ट्र गान करते रहना , 

जाति धर्म की बात न करना, एकता को कायम रखना |

होता रहे विकास देश का,सदा प्रयास यही करते रहना , 

भ्रष्टाचार से दूर ही रहना, खुद्दारी को बनाये रखना |

स्वर्णिम अतीत जो भारत का, भूल नहीं उसको जाना, 

सम्मान सुरक्षित रहे बना, दुश्मन पर भारी ही रहना |

अपनी सेना के जवानों का, सहयोग हमें करते ही रहना, 

उत्सर्ग प्राण का जो करता,सम्मानित उसको करते ही रहना |

अपने आप को भूल सदा, सर्वोपरि हमें देश रखना होगा, 

जो कभी वक्त आ जायेगा, न्यौछावर खुद को करना होगा |

------------------------
सन् सत्तावन का युद्ध हुआ
जली अलख आज़ादी की
सीने में देशप्रेम की ज्वाला ले
रणभूमि में उतरी रानी थी
मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी
हुंकार लगाई रानी ने
खूब लड़ी मर्दानी थी वह
बिजली बनकर चमक उठी
बन काली कल्याणी वह
दुश्मन के ऊपर टूट पड़ी
तन से थी वह नार नवेली
सीने से फौलादी थी
काली कजरारी आंखों से
वह शोले बरसाती थी
थी बिजली सी तेजी उसमें
दुश्मन के छक्के छुड़ाती थी
रग-रग में देशप्रेम की भावना
हृदय वात्सल्य से भरा हुआ
पुत्र पीठ पर बांधकर अपनी
रणभूमि में सेना में जोश भरा
शीश काट दुश्मन के उसने
मातृभूमि को भेंट किया
लड़ते-लड़ते घायल हो गई
अंत समय तक युद्ध किया
भस्म किया तन को अपने
दुश्मन के हाथ न लगने दिया
आजादी के लिए देकर प्राण
रानी ने एक इतिहास रचा
जीते-जी झांसी को अपनी
अंग्रेजों को छूने न दिया
खूब लड़ी मर्दानी थी वह
झांसी वाली रानी थी
शत् शत् नमन हम करते
वो वीर वीरांगना रानी थी
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

(1)देश की शान
लहराता ही रहे 
तिरंगा प्यारा 

(2)करे नमन
उन्हें त्यागे है प्राण 
देश के लिए 

(3)बोई कुर्बानी 
जन्मी है स्वतंत्रता 
छाई खुशियाँ 

(4)फर्ज निभाती
धूप-छाँव झेलती 
सेना हमारी 

(5)आतंक आग
देशप्रेम ख़ातिर 
करती खाक

(6)आजादी पेड़ 
पूर्वजों का आशीष
झुकाएं शीश 

(7)रखे सम्हाल 
वतन को अपने
घर भेदी से

(8)छलके आंसू 
देखते ही ताबूत
शहीद बेटा 
🇨🇮🇨🇮🇨🇮🇨🇮🇨🇮🇨🇮
🌹स्वरचित 🌹
मुकेश भद्रावले 
हरदा मध्यप्रदेश 



लघु कविता

जागो उठो नौजवानों
देश की बागडोर
है तेरे हाथों
अपने ताकत की 
पहचान बनों

जागो उठो नौजवानों
जात-पात को भूलकर
भाईचारे का गुणगान करो

जागो उठो नौजवानों
देशप्रेम ही अपना धर्म है
इस भावो का आह्वान करो

जागो उठो नौजवानों
नई तकनीक का सृजन कर
विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति करो

जागो उठो नौजवानों
अपने कर्मों से नव सृजन करो
देश के सर्वांगीण विकास
में सहयोग करो

जागो उठो नौजवानों
पूरे विश्व में भारत की
शान बनो
नशे मुक्त भारत का
नव निर्माण करो

जागो उठो नौजवानों
अपने ताकत की
पहचान करो।

स्वरचित पूर्णिमा साह पश्चिम बंगाल
🇮🇳🇮🇳 जय हिन्द 🇮🇳🇮🇳


युगों युगों से देश प्रेम हित
मंत्र श्लोक ऋषियों ने गाये
मङ्गल भाव भरा जगति में
चरेवेत्ति नित गीत सुनाए
निज कर्तव्य देश हित है
स्व तजना परम् रीत है
सर्वे भवन्तु सुखिनः पंक्ति
मानवता मंगल गीत है
जन्म जीवन मृत्यु इस पर
शैशव यौवन वृद्धावस्था
जल थल नभ अनल वायु
अति सुंदर प्रकृति व्यवस्था
मातृभूमि सब कुछ देती है
बदले में वह् क्या लेती है
वंदे मातरम,जय हिंद कह
क्या ऋण से उऋण हो लेते
देश प्रेम तन मन धन अर्पण
देश प्रेम निज हित समर्पण
देश प्रेम जग नहीं दिखावा
निरखे सदा समर्पण दर्पण
तजना होगा छल कपट को
हरना होगा असत्य लोभ को
बन शहीद सा जीना होगा
छोड़ो चञ्चल माया मोह को
स्वहित ऊपर देश प्रेम है
स्वसंघर्ष मङ्गल गीत है
विश्व पटल भव्य सुशोभित
देश प्रेम की यही जीत है।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।


कहाँ गया वो देशप्रेम 
"जब सरफरोशी की तमन्ना 
हर दिल में थी"
हर युवक बोलता था ।

जब लहूलूहान होने पर भी
वीरों की देह
सिर्फ यही बोलती थी
वन्देमातरम 

चाहे सिर कट जाऐ या
शरीर गोलियों से छन जाऐ
एक एक वीर 
सैकड़ों दुश्मन को 
मार कर कहता था
"खुश रहना देशवासियों 
अब हम तो सफर करते है ।"

आज लड़ते हैं हम
क्षेत्रवाद पर
धर्म जाति भाषा के नाम पर
आरक्षण के नाम पर 

देशप्रेम 
सिर्फ़ जवानों की 
जिम्मेदारी नहीं है
देश के अंदर के दुश्मनों को
भी पहचानो मेरे दोस्तों 

देशप्रेम की अमृतधारा में 
बंध कर
एकता , राष्ट्रवाद की 
पहन माला 
आतंकवाद ,नक्सलवाद की
चुनौतियों का कर सामना
दुश्मन को दिखाए 
उसकी औकात का आईना 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल




देशप्रेम-
भावना के संग डाल गलबाहें
मिलता चौक चौराहे
चाय की दुकान में
नन्हें मुन्नों की मुस्कान में
रिक्शे वाले की लगन में
माताओ के कंगन में
ललनाओ की
चूड़ियों की खनखन में
सपूतों की धड़कन में
किसान के खेतों में
मजदूरों के आधे भरे पेटों में
नीरव रात्रि मे
चमकते जुगनू के प्रकाश में
सन्नाटे को चीरती
सीमा पर खड़े
सैनिकों की साँस में
देशप्रेम,बसता
वीरों की तलवार में
लेखनी की धार में
भाव प्रबल बन सतत
उजियारे,अँधियारों में 
पर,आहत देशप्रेम
क्षुद्र स्वार्थ,अनाचारों से
हो जाता न्योछावर
सत्ता के गलियारों में
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




मेरे भारत की महिमा अपरंम्पार।
इसकी मिट्टी से ये सोने सा संसार।
तम नाश करें सूर्य रश्मियां प्रथम,
चरण पखारते सरिताऐं महासागर।

बखान नहीं कर पाऊँ गरिमा का 
स्वधन्य समझूं सुन महिमा का।
बलि बलिहारी जाऐं भारतवासी,
सुन सुखद सुंदरतम गरिमा का।

मुकुट हिमालय अपने भारत का।
नाम संस्कृति संस्कार भारत का।
विश्वगुरू सोने की चिडिय़ा भारत,
था कभी नाम आर्यवर्त भारत का।

अलख यही सब मिलजुल जगाऐं।
प्रेमभाव और हम सौहार्द बढाऐं।
नाम स्वदेश बन जाऐ गौरवशाली,
क्यों ना देशप्रेम देशभक्ति जगाऐं।

स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



हाइकु
**
राष्ट्र का प्रेम
कारगिल संग्राम
रण बांकुरे
**
नींद न आई
राष्ट्र हित सिपाही
सर्व अर्पण
**
शान में सत्ता
देश प्रेम गुमान
अतृप्त गण
**
रंजना सिन्हा सैराहा...




स्वर्णिम रहे भाल,
देश रहे खुशहाल,
वन्देमातरम कहो,
राष्ट्र गीत गाइये।

देशप्रेम देशभक्ति,
जीवन हो देशहित
उत्सव प्राणों का कर
जीवन संवारिए।

जाति धर्म भूल कर,
देश की सेवा तू कर,
दुश्मन खड़ा सामने,
सीमा से भगाइये।

सैनिक अरमान है,
ये देश के सम्मान है,
न है पीछे नारी अब,
बलि बलि जाइये।

ऐसे कुछ काम कर,
देश का तू नाम कर
ये कर्ज मातृभूमि का
कर्म से उतारिये।

शत्रु पर वार कर,
हटना न हार कर,
शत्रु बड़ा चालबाज,
आँख न हटाइये।

भारत बदल रहा,
अंदर से जल रहा
भेदभाव दूर कर
आजादी मनाइये।

सरहद पे खोये है,
जो वृक्ष माँ ने बोये है,
सूनी हुई कलाइयाँ 
श्रद्धा गीत गाइये।

गगन में तिरंगा हो
आचमन को गंगा हो
भूमि भारत स्वर्ग सी,
और क्या चाहिए।

गीता गुप्ता "मन"



मेरे देश की है ये पहचान
देशप्रेम और नारी सम्मान
ऐ पाक यहां कमजोर ना समझो बेटी को
ये ही कत्ल कर देती है तेरे भेजे घुसपैठी को
लक्ष्मीबाई बन मैदान में जब वो जाती है
उसकी प्यासी तलवार देख दुश्मन सेना थर्राती है
जिस और दौड़ता है घोड़ा सेना को बांटती जाती है
दुश्मन की सेना को गाजर मूली सी काटती जाती है
खून नही देशप्रेम दौड़ता है भारतवासी के सीने मे
बिना देशभक्ति के यारो फायदा क्या है जीने में
पाक तू कितने भी आतंकी ला हम भी मारते जायेगे
एक दिन तेरी छाती पे आकर अपना तिंरँगा लहरायेंगे
भूल गया तू सिर ढ़कने को तिरपाल हमीं ने डाली थी
अहसान फरामोश पाक तब तेरी झोली खाली थी
आज भी तू कंगालों का सरदार बना हुआ है
इतनी बेइज्जती करवाकर भी सीना तेरा तना हुआ है
जिसदिन दिमाग गर घूम गया तू पल में खो जाएगा
संसार के नक्शे से भी गायब हो जाएगा....
""जय हिंद जय अखण्ड भारत""
स्वरचित--विपिन प्रधान




देशप्रेम की लौ सदा
जन मन में जलती रहे
लेकर ध्येय देशहित का
भावनाएं उमड़ती रहे

ये देश है वीर जवानों का,
आजादी के मस्तानों का।
सरफरोशी की तमन्ना ही,
था गीत उनके तरानों का।

देशप्रेम की एक परिभाषा,
दे गए वो अपने वतन को।
खेलकर अपनी जान पर भी,
वो आजाद करा गए वतन को।

सरफरोशी के नारों से,
डोल रहा था सिंहासन।
देख जोश जवानी का,
कांप उठा ब्रिटिश प्रशासन।

है दिवस आज बलिदान का,
क्रांतिकारी "बिस्मिल,अशफाक"का
नमन इस "राम,रहिम "की जोड़ी को
ये जीवन ऋणी रहेगा सदा आपका

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


शीर्षकः- देशप्रेम 

सरकार को टैक्स देने वाले शायद जागरूक हो गये है।
अब से पहले लगता है, संभवतया वह सो ही रहे थे ।।

उद्योगों के विकास हेतु सरकारें रियायतें देती रही है।
कई कई वर्षों सरकार उन्हें करों पर छूट देती रही है।।

इन जागरूक करदाताओं की नींद तब भी नहीं टूटी ।
जब इनसे लिये करों पर पड़ती रही थी ऐसी डकैती।।

पहले भी सरकारों ने किसान कर्ज माफी घोषणा की है।
पर उस पर अमल ही नही किया उनको धोखा दिया है।।

जब कुछ सरकारों ने किसानों का कर्ज माफ किया है।
अब तक सोने वाला करदाता, अचानक जाग गया है।।

उद्योगपतियो के कर्ज माफ करने पर, फर्क नही पड़ा।
शाबाश किसानों के कर्ज माफ करते ही वह जाग पड़ा।।

किसानो को लाभकारी मूल्य दिलाने को नींद नही खुली।
किसानो की आत्महत्याओं पर भी गहरी नींद नहीं टूटी।।

75% जन संख्या की श्रीमान, जो भी उपेक्षा करेगा ।
वह तो शायद प्रभु राम से भी संजीवनी नहीं पायेगा ।।

जो देश की तीन चौथाई जनता को कष्ट पहुँचायेगा ।
अपने देशप्रेम पर भी प्रश्न चिन्ह ही वह लगवायेगा।।

डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
“व्यथित हृदय मुरादाबादी
स्वरचित



लघु कविता

देश प्रेम का भाव लिए
सैनिक सीमा पर जाता है।
आएं कितनी भी बाधाएं
वह तनिक नहीं घबराता है।
भारत माँ के खातिर वह
सर्वस्व न्योछावर करता है।
जब भी संकट की आहट हो
वह झट से आगे बढ़ जाता है।
उसके कारण ही भारत का
हर कण कण गौरव पाता है।
सर्दी गर्मी या हो बारिश
वह तनिक नहीं घबराता है।
मातृ भूमि की सेवा कर
वह मन ही मन हर्षाता है।
इस देश प्रेम के कारण ही
वह लिपट तिरंगे में आता है।
ऐसे सच्चे जन नायक को
यह वत्स शीश नवाता है।
बस यही एक सच्चा सेवक है।
बस यही एक सच्चा सेवक है
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर



देशप्रेम का ढोल बजाते,
देश में भ्रष्टाचार फैलाते।

आरक्षण की आग लगाते,
जनता को हैं उल्लू बनाते।

देशप्रेम है इनको कितना,
सत्ता का जो देखे सपना।

अपनी-अपनी डफली बजाते,
घर को अपने भरते जाते।

महंगाई नित बढ़ती जाती,
भूख गरीब की न मिट पाती।

रोजगार को फिरते युवा,
हृदय में उनके उठता धुआं।

सैनिक अपनी जान गंवाते,
देशप्रेम पर बलि हो जाते।

उनके नाम पर होती राजनीति,
देश की रक्षा पर करें अनीति।

देश प्रेम का गाते गाना, 
देश का खुद ही लूंटे खजाना।

कुर्सी केवल इनको है प्यारी,
नीति-अनीति भी इनसे हारी।

जाति-धर्म को मुद्दा बनाए
जनता में हिंसा भड़काएं।

देश की लिए जो हुए बलिदानी,
वे बन गए बस एक कहानी।

अब सब करते हैं मन मानी,
देश प्रेम की बस यही कहानी। 

अभिलाषा चौहान
स्वरचित



नमन मेरे देश की पावन माटी को 
वंदन मेरे देश की पवित्र धरा को 
चाँद सितारों से नभ में ऊँचा नाम हैं मेरे देश का 

त्याग तपस्या शूर वीरों का देश हैं मेरा .

इस देश के कण कण से बेहद प्यार हैं मुझे 
हर युग में जन्म मिले इस भारत भूमि पर मुझे 
भारत भूमि की बलिदान की कथायें हैं महान 
मेरे देश की जग में एक अलग हैं पहचान .

इस पावन धरा पर हैं सभी धर्मों का संगम 
हमें जान से भी प्यारा हैं अपना वतन 
हिमालय सा अडिग हैं देश मेरा 
मोती उडेलता हैं सिंधू भी खारा .

अलग अलग संस्कृतियों का मिलन हैं देश मेरा 
जिसका मुरीद हुआ विश्व में जग सारा 
ये देश हमें हैं सबसे दुलारा .
ये देश भारत हैं हमारा .
स्वरचित:- रीता बिष्ट



"देशप्रेम"
्षणिका
(1)
देशप्रेम के तमगे,
मन से लापता।
मेरा,मेरा,मेरा,
बस...मेरा....
आह!हृदय द्रवित,
देशप्रेम,
नारों में,
स्वाहा....



(2)
देश प्रेम!
याद नही क्या...
मिला था कभी,
फंदो पर झूलकर।
वो फंदे,
आज,
ठहाका लगा रहे है।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित मौलिक



विधा:-हाइकु 

(1)
लड़ते धर्म 
देशप्रेम जागता 
मात्र दो दिन 
(2)
कर्तव्य धर्म 
देशप्रेमी की स्तुति 
आहुति कर्म 
(3)
तिरंगा दर्श 
देशप्रेम दौड़ता 
धमनी पथ 
(4)
भ्रष्ट से नाता 
देशप्रेम क्या होता 
स्वार्थ विधाता 
(5)
सीमा पे गोली 
देशप्रेमी ने खेली 
खून की होली 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे


देश प्रेम 
शोभा किताबों की,
विचार गोष्ठियों में

जोशीले संवाद,
फिल्मों की पटकथा,
हिमालय की गोद में
खड़े वीरों में
सिमट कर रह गया 
है आज
विडंबना है
स्वार्थ हावी है,
सत्ता की गलियों में
बेच डालते है 
चन्द पलों में 
अपनी आन , मान
और हाशिये पर 
चला जाता है
देश प्रेम।

स्वरचित
गीता गुप्ता "मन"





जब मचा हो देश में उथल पुथल
तब मन क्यों न हो बेचैन
हमें तो है देश से प्यार
कैसे सोये हम चादर तान।

जब आये सदभावना मे कमी
भाई से भाई लड़े जब देश के जमीं
तब कैसे हमें चैन आये
जब हमें हो देश से प्यार,
जब मचा हो हाहाकार

दुश्मन दे रहा हो ललकार
तब कैसे विचलित न हो हमारा मन
करना होगा दुश्मन से दो दो हाथ
हमें तो है देश से प्यार

जब देश में मची हो अस्थिरता
दोषारोपण हो एक दूसरे पर
हमें करना होगा जरूरी मंथन
हमें जो है देश से प्यार

नही भरना है अपना झोला
नही करना है देश को खोखला
जो सुप्त पड़े हैं देश प्रेम से
उन्हें आज झंकझोड़ना होगा

हमें मिलकर कुछ करना होगा
"अभी नही तो कभी नही"
हमें यह स्मरण रखना होगा
उठो जागो देश वासियों

देश की रक्षा करना होगा
जब आया है देश पर संकट
निश्चित नही हमें बैठना होगा
हमसब को यह निर्णय लेना होगा

देश हित का बात करना होगा
देश हित सोचना होगा
देश से प्रेम हमें हमें करना होगा
देश से प्रेम हमें करना होगा।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।


^^^^^^^^^^^
जो देश के लिए
कुर्बान हो गए
बस था उनके 
ही दिल मे ,देश प्रेम
अब दिखता है 
तो सिर्फ 
सैनिकों 
में जो न्योछावर 
हो जाते हैं
आज भी खड़े रहते हैं
सीमापर 
बिना इस बात 
की परवाह 
के,,, कि
उनका क्या होगा??
जब तथाकथित
",देश प्रेमी'
आराम से 
रजाई सेवन
में लिप्त हो..
सच्ची देश सेवा
कर रहे हो...।
^^^^^^^^^^^^^^
स्वरचित
उपमा आर्य,लखनऊ



कितने जाने ना जाने कितने अनजाने
आज़ादी के दीवाने वे परवाने
दिल में केवल एक अरमान पाले
धरती माँ के सपूत थे वे निराले
जवानी का त्याग कर उर फूले
फाँसी के फंदे उन्होंने चूम डाले
देश हित में ख़ुद को झोंक चले
अमरता का पानकर फिर वे चले
उनकी कुर्बनियों को हमारा सलाम
उन वीरों को शत शत प्रणाम
उनकी शहादत पर हो आता गुमान
पर देना होगा सभी को प्रमाण
देश हित को प्राथमिकता बना लो
देशप्रेम का पुनीत भाव दिलों में जगा लो
जननी जन्मभूमि की धूल माथे पर सजा लो
माँ के लाड़ले दुलारे बनकर दिखा दो
शक्तिबोध,सौंदर्यबोध का कर लो सम्मान
अपने तिरंगे का मान और जन गण मन का गान 

स्वरचित
संतोष कुमारी


वीर जवान
देश-प्रेम प्रधान
जान कुर्बान।
*****************

अंतस:भक्ति
देश-प्रेम का भाव
धूप में छाँव।
*****************

युवा सबल
देश-प्रेम प्रबल
शत्रु निर्बल।
*****************

रहो सप्रेम
हृदय देश-प्रेम
करिए प्रेम।
*****************

स्वरचित
रामप्रसाद मीना'लिल्हारे'
चिखला बालाघाट (म.प्र.
)


देश प्रेम
जन्मभूमि से प्रेम निभाने को,
अपना प्रेम त्याग दिया,
देश प्रेम जगा मन में,
सरहद पर डेरा जमा दिया,
घर मे थे जब तक,
थे हम शहजादे,
अब करने है पूरे,
देश से किए वादे,
देश प्रेम का पहन चोला,
दुश्मनों को ललकारा,
ओढ़ कफन जब आएँगें,
सलामी देगा जग सारा ।

स्वरचित-रेखा रविदत्त
19/12/18



तांका 
1
देश से प्रेम 
केवल है दिखावा 
सिर्फ छलावा 
राजनीती की रोटी 
नेता रहे सेकते 
2
कश्मीर घाटी 
सेना रक्त बहाती 
पत्थर खाती 
खोखला देशप्रेम 
नेता देश लूटते 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 



विधा - दोहे

देश प्रेम सच्चा वही, जीवन धन दे वार
मन भावों से हो भरा ,बहती हो रस धार

जिसके मन गौरव नही,नहीं देश अभिमान
देश प्रेम जिसमें नही , वह है मृतक समान

जिस माटी पैदा हुए,अन्न जहाँ का खाय
मात हमारी है वही ,उसका कर्ज चुकाय

पहनावा इस देश का ,सबके मन को भाय
देश प्रेम दिल में बसा,सुंदर , सरल सुभाय

सरिता गर्ग
(स्व रचित)

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"स्वतंत्र लेखन" 14जुलाई 2019

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