Friday, December 21

"पायल "21दिसम्बर 2018

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तेरी पायल की रुनझुन सनम, 
दिल मेरा चुरा ले गई,ले गई... 
दिवाना इस कदर कर गई सनम, 
जादुई हवा दे गई, दे गई..... 

यूँ तो गजरा महकता है बालों में,
आँखों का कजरा भी करता है घायल,
बातों की तुम्हारी हूँ मैं कायल, 
पहन लो गौरी हाथों से मेरे पायल
समां में अजब मिठास घुल गई है, 
तेरे आने की खबर सबको हो गई है.... 
हो हो हो.... 

तेरे पायल का घुँघरू मैं बन जाऊँ,
दिल में न सही पैरों में ही बस जाऊँ, 
तेरे इश्क़ का दिवाना कहाँ जायेगा, 
तेरे पायल की खनक में ही बस जायेगा
सम्भाले नही संम्भलता है ये दिल,
गोरी अपने सजन से तु आ के मिल
हो हो हो........


वो पाँव की पायल कानों में अब भी बजती 
वो महफिल हसीं ख्वाबों की अब भी सजती ।।
रूनक झुनक पायल की छेड़े दिल के तार
उनकी ही सरगम पर यह ग़ज़ल लिखती ।।

वो हूर है मगरूर है बेशऊर है
मेरे लिये 'शिवम' जन्नत का नूर है ।।
बिन पायल ही उसकी आहट होती
दिल से कभी न दूर थी न दूर है ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"


स्वरचित *संगीता कुकरेती*

मुक्तक (1)
सुनी झनकार पायल की हज़ारों मनचले आए ।
कहें अब और की क्या हम भी दिल लेकर बढ़े आए ।
असर बेहद पड़ा उन पर कि जो तस्बीह ख़्वाँ रहते ,
हज़ारों मुत्तक़ी आए हज़ारों सरफिरे आए ।।
तस्बीह ख़्वाँ= माला जपने वाले
मुत्तक़ी=संयमी

मुक्तक(2)
जहाँ पायल झनकती है वहाँ रौनक दरसती है।
उचटती नींद हस्रत की अगर चूड़ी खनकती है।
हज़ारों राग आते हैं हज़ारों रागिनी सजकर,
उमड़ पड़ती है मूसीक़ी घटा बन कर बरसती है।।
मूसीक़ी= संगीत विद्या
स्वरचित -राम सेवक दौनेरिया 'अ़क्स '

पायल ललना का सृंगार है
बिन पायल के पांव अधूरे
छम छमा छम पायल बाजे
राह चलत सब उसको घूरे
पद पायल आकर्षण होता
पुरुष प्रिय उपहार यह बनता
युगों युगों से पायल गाथा
सदा सदा इतिहास दोहराता
पैरों में पायल शौभित हो
वह् चरणों का मान बढ़ाती
रूंन झूंन की प्रिय मधुर ध्वनि
दर्शक का मन सदा लुभाती
नर्तन में आकर्षण लाती है
आली मिलकर सब गाती है
पायल सबको करती घायल
बन जाते सब उसके कायल
पायल सिर्फ नहीं सृंगार है
वह् जीवन मे नयी बहार है
पिया स्वयं पहनावे पायल
धन्य धन्य प्रिया निहाल है
पनघट आंगन सड़क धरा हो
रुनझुन रुनझुन पायल बाजे
गौरी घूँघट गज गामिनी चल
पिया देख मन ही वह् लाजे।।
स्व0 रचित
गोविंन्द प्रसाद गौतम्
कोटा,राजस्थान।

कितना हसीन और मुबारक है दिन। 
आज दोनों जहाँ क्या महकने लगे हैं। 
राज़ की बात मत पूछिए दिल से कुछ। 

बन के अरमान , पंछी चहकने लगे हैं। 

है फूलों की रंगत, बड़ी खुशनुमा सी। 
हवा चल रही है, कि हो दिलरुबा सी। 
रोके रुके न कैसी अजब सरसराहट। 
ताल में ढल के घुंघरू छनकने लगे हैं। 

सजी संवरी क्या सूरत मेरे सामने है। 
अभेदी है मुस्कान जाने क्या मायने हैं। 
मुखड़े पे लो आ गयी हंसी रोशनी सी। 
बैरी पायल के घुंघरू खनकने लगे हैं।

कूक कलरव कहीं, कहीं चहचहाहट। 
ठंडक मे भाती हैं धूप की गुनगुनाहट। 
महीनों से पडे थे घर में सिकुड़े बेचारे। 
आज उनके भी चेहरे चमकने लगे हैं। 

विपिन सोहल


विधा :- लघु कविता 

तेरी पायल की झनकार,
करती है जिया बेकरार।
अब ना आए मुझको चैन,
आ कर ले तू अब इजहार।

तेरी पायल की झनकार,
तेरी ही यादों की दरकार।
बन जा तू मेरी पतवार,
कर लें प्यार का दरिया पार।

तेरी पायल की झनकार,
मन में बजाए वीणा के तार।
मधुरिम सा संगीत सुनकर,
मेरे दिल में मचे हाहाकार।

तेरी पायल की झनकार,
करती है मुझको बेकरार।
अब तो आजा मेरे पास,
तुझे कर लूं प्यार बेसुमार।

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

खनकाती चूड़ियाँ
चाँद सा चेहरा 
बादलों से घने 
काले केशों में छिपाये
पायल झनकाती
गजगामिनी सी
धीरे धीरे
जब तुम करीब आईं थीं
तुम्हारे तन की महक
मदहोश कर गई थी मुझे
बजती पायल के
घुँघरूओं की आवाज
बढ़ा गई थी मन की प्यास
तुम्हारे दहकते अधरों पर
रख दिये थे मैंने
अपने तप्त अधर
भर लिया था
अपने कठोर बाहुपाश में
तुम्हें मैंने
कसमसाती तुम
अचानक हो गई गुम
आंखें खुली
मेरे सीने से चिपकी थी
तस्वीर तुम्हारी
तुम न थीं पर
गूँज रही थी
अब भी कानों में
मदमाती खनक
तुम्हारी पायल की

सरिता गर्ग
(स्व रचित)

रास रचाओ तुम गिरधारी,

पायल की झनकार हो।
राधेजू संग नृत्य करो तुम,
मधुवन में गुंजार हो।

रास रचैया बंशीबजैया,
तनमन सबका झंकृत हो।
केवल नाम तुम्हारे से मनमोहन
मेरा नाम अलंकृत हो।

गुंजित हो बृजमंडल सारा,
बृजमंडल में रास रचे।
गलीगली गुंजित हो मधुवन,
जब बृजभूमि में रास रचे।

रूनझुनिया पायलिया गूंजें,
मनमोही घनश्याम की।
मनमोहक छवि प्यारी लगती,
कृष्ण कन्हैया श्याम की।

तुम रासरचैया मुरलीधारी।
करती झंकृत तान तिहारी।
छुनछुन करती पायल तेरी,
कर दें उपकृत बांकेविहारी।

स्वरचित ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.

पायल की छन छन मोहब्बत की लहरें... 
यूं मिल के समीर संग गुनगुनाने लगे हैं...
हिना-ए-शबाब दिल को महकाएं मेरे...
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं....

है हाथों में कंगन की शोभा निराली..
चमकती हो बिजली यूं सावन सुहानी..
कानों के बुँदे जो हैं हिलते अदा संग...
मेरे दिल में आग और लगाने लगे हैं...
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं...

लंबी चमकती ये माथे पे बिंदिया...
मोहब्बत दिए की लौ बनने लगी है...
ये नैनों के परदे खुले बंद हों जब..
दिल मेरे को और धड़काने लगे हैं...
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं...

महका बदन है खिलता गुलाब सा....
ऋतू बसंत हर और छाई हो जैसे... 
यौवन नहाई चांदनी के जैसे वो... 
दिले चन्दर कलियाँ चटकाने लगे हैं...
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं...

मदहोश हूँ मैं ख़्यालों में उसी के...
यूं बिन पीये बिन पिलाये किसी के...
ज़िक्रे हर बात में आ कर मेरी वो..
चुप्पके मेरा दिल सहलाने लगे हैं...
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं...

आते ही उनके हैं फूल महक जाएँ..
पवन गुनगुनाये ओ पंछी चहचहायें...
ज़मीं आसमाँ भी तो इशारों में जैसे...
मेरे दिल को उसी पे रिझाने लगे हैं....
यूं चुप्पके से वो मेरे दिल में आने लगे हैं...

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा I

श्रृंगार है सजनी के पग का, साजन के मन में बाज रही, 

बना तेरा अंगना सपना मेरा, प्रियतम को समझाय रही । 

पायल का जीवन भी कैसा , होती कुछ अपनी राय नहीं, 

बजते रहना ही काम रहा, सुख दुख की पहचान नहीं। 

चल पड़ी पहन जब ब्याहता, पायल की धुन में बंधी रही, 

जब प्रियतमा की बनी गहना, शहनाई बनकर गूँज रही । 

नगरवधू ने जब जब पहना, धड़कन बनी ये महफिल की, 

मंदिर में पहनकर जब नाचा, ये दासी बन गई ईश्वर की । 

इसको तो पैरों में रहना, रहे शोभा किसी के पैरों की , 

एक एक घुँघरू जब जोडा गया, हुई है रचना पायल की । 

है काम यही बजते रहना,फिर किसके दिल पै क्या बीती, 

सबको अपनी धुन में रहना, चिंता किसको है पायल की। 

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,

पायल तेरे रूप निराले
कान्हा पैरों इठलाऐ वृन्दावन 
राधा पैरों इठलाऐ कान्हा 

दुल्हन पैरो सौभाग्य की निशानी
कुंवारी झम झम मन भाऐ 

माता के पैर नहीं बिन पायल के
अर्धनारीश्वर के चरण निराले

पायल की एक यह भी 
दुःखद कहानी 
कोठे पर बजे तो 
बदनाम नारी

पायल की स्वीकारें उज्वल छवि 
जो करें समाज में बदनाम 
नकारे ऐसी छवि 

स्वलिखित 
लेखक संतोष श्रीवास्तव भोपाल


छोटी सी बिटिया,
चंदन की डिबिया।

चहकती चिड़िया,
डुग-डुग है चलती।

नन्हीं-नन्हीं पैंया,
बाजती पैंजनियां।

घर-आंगन की शान,
मेरे जीवन का मान।

उसकी पायल है खनके,
खिलते फूल मेरे मन के।

ठुमक-ठुमक चलती,
रूक पायल को देखती।

घुंघरू जब बजते,
देखा उसे हंसते।

कूकती कोयलिया,
मेरी प्यारी बिटिया।

मुस्कान उसकी प्यारी,
जाऊं मैं बलिहारी।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

जब आसमान में घटायें छाती हैं 
और बिजलीयां पलकें झपकाती हैं
मौसम की अदायें लुभाती हैं 
हवायें मद भरे गीत सुनाती हैं।

जब सरसों का आँचल लहराता
प्रकृति का स्वरुप भी मदमाता
मन का सोया भाव इठलाता
सपन मिलन का गहराता। 

जब कोयल गाती उपवन में 
सब बंध जाते आकर्षण में 
विरही जोड़ा मग्न समर्पण में
सब हंसते प्रेम के दर्पण में ।

फिर पायल सी बजती है मन में 
गुदगुदी सी सजती है तन में।

विषय:-"पायल"
(1)
बेटी की विदाई 
दूर जाती हुई 
"पायल" की धुन 
और 
मन में.. 
बुझता सा संगीत 
(2)
गाती 
कर्तव्य गीत 
छू के मन 
जगाती,सुनाती 
भोर की मीठी धुन 
तुम्हारी "पायल"
(3)
जब न होती तुम 
खामोश घर गुमसुम 
ढूँढता 
वो भी मेरे संग 
तुम्हारी... 
"पायल"की धुन
(4)
तुम्हारी "पायल"
सुबह की अजान 
खनकता नारीत्व 
पैरों में जान 
है... 
परिवार की मुस्कान 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

==========
(1)शब्द पायल
कविता पग बांध 
मंचन आज

(2)पग श्रृंगार 
पायल के गहने
नारी पहने

(3)कान्हा के पग
बांध रही गोपियां 
छोटी पायल

(4)स्वप्न में आया
पहन के पायल
नन्हाॅ सा कान्हा 

(5)बजी पायल
खुशी छाई आंगन 
नाचे बालक

🌹स्वरचित 🌹
मुकेश भद्रावले
हरदा मध्यप्रदेश 

सुनी जब पायल की झनकार
मन में आए उदगार
बता दो प्रिये तुम बस एक बार
क्या आओगी इस बार।
तुम से है जीवन की आशा
तुम से मिलती है खुशहाली।
तुम राधा मेरे अंतरमन की
मैं कृष्ण तुम्हारे जीवन का।
मुझे प्रीत निभानी है तुमसे
बोलो तुम मौका दोगी क्या?
यदि पल दो पल तुम दे देती
मैं अपना जीवन जी लेता।
इन पल दो पल की खुशियों में
जीवन का हर पल जी लेता।
अपने इस नीरस जीवन में
थोडी सी खुशियाँ भर लेता।
फिर से पायल झनका जाओ
चूड़ी को भी खनका जाओ।
मेरी इस सूनी बगिया को
आकर के तुम महका जाओ।
क्या जाने कल फिर क्या होगा?
इस पल को बस महका जाओ।
इस पल को बस महका जाओ।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित
जयपुर


विधा :-क्षणिका 

( १ )
प्रेम आँक दिया
घुटनों पर रखे पाँवों पर 
चित्रण किया 
महावर से 
पायल थी पहनाई 
वक्ष से लगा लिए 
थे क्वणित नूपुर 
मुझे देते हैं आज भी सुनाई ।
(२ )

उतार दी है मैंने 
पायल 
अब घुँघरू बजते
नहीं है प्रिय 
कराहते हैं तुम्हारे बिना
आह ! यह फिर भी 
बज उठती है नींदों में ।
( ३ ) 

दामिनी सी कौंध 
जाती स्मृतियाँ
मुझे मिलने 
तेरा छत पर आना 
पायल हाथ में पकड़
मुझसे लिपट जाना 

( ४ )
चलना सीखी
मखमली पाँवों में 
बाबा ने पायलिया 
रजत पहनाई 
ठुमकती रुनकती 
माँ तुम्हें देख 
सोच सकुचाई ।

स्वरचित :-
ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

पायल जब बजे बहुत कुछ कहे
कभी छेड़े यह मधुर तान
कभी व्याकुल हो करे पुकार
पायल की मजबूरी है
बजना इसको जरूरी है

घर मे बजे जब नवबधू के पायल
घर आँगन मे खुशियाँ अपार
धीमे बाजे पायल सजनी के
तब सजना मन ही मन हरसे

सभी ललना की होती तमन्ना
सोलह श्रृंगार कर पायल पहन
करें वह अपनी अंतिम यात्रा
रहे पायल साथ हमेशा।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

जब भी देखूं तो तुझे ही देखूं
तेरे चेहरे की मुस्कान को देखूं
साथ सदा तेरा ही चाहूं
तुझको अपना सब-कुछ मानूं
तेरे हाथों का कंगना बन जाऊं
पायल का घुंघरू बन जाऊं
दुःख की तुझ पर परछाईं पड़े न
मैं सुख की बदली बन जाऊं
तुझसे मैं कुछ और न चाहूं
चाहूं मैं बस तुझको चाहूं
तू मेरी प्रीत मैं तेरा जोगी
तुझसे ही मेरी लगन लगी
मैं तेरा श्रृंगार बनूं
तेरे गले का हार बनूं
तेरे माथे का कुमकुम बनकर
रख लूं अपने दिल में बसाकर
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना


पायल सजे तुम्हारे चरण,
जब से पड़े मेरे घर-आंगन
मेरी सुबह की छम- छम तुम
तुम्हीं मेरी शाम का झनकार हुई।
दिन मेरे खुशियों का सौगात
रातें रहीं तुम्हारी कायल
साँसों में बस छम-छम , छम-छम
बजती रही तुम्हारी पायल ।।

ओ प्रिये ! मनवासिनी मेरी,
मुझे अकेला कर के जाना !
जाने तुम क्यों चली गई हो
मुझसे रिश्ता तोड़ गई हो ।
बैठा हूँ बस गुमसुम - गुपचुप
हुआ किया यादों से घायल
कानों में बस छम-छम, छम-छम
बजती रही तुम्हारी पायल ।।

एक आँख अब दिन ना भाता
मन मेरा बस बिरहा गाता
रातें भी है सहमी-सहमी
सन्नाटों की गहमा-गहमी।
लौटआओ ! तुम्हारी याद समुन्दर
जिसका कोई नहीं है साहल
कानों में बस छम-छम , छम-छम 
बजती रही तुम्हारी पायल ।। 

स्वरचित "पथिक रचना"

1
कान्हा पायल 
प्यार से छनकती 
गोपी घायल 
2
करे पुकार 
पायल झंकार 
पिया तरसे 
3
कन्या पायल 
खुशहाली भरती 
माँ इठलाती 
4
बहु है लक्ष्मी 
पायल छनकती 
हिय बसती 
5
तेरी पायल 
करती है घायल 
जब बजती 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून

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