Wednesday, December 26

"किवाड़"26दिसम्बर 2018

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             ब्लॉग संख्या :-249

Hari Shankar Chaurasia


बिन किवाड़ के आज दिल का ये हाल
करता हूँ अब मैं यह खुदा से सवाल ।।
क्यों आखिर तूँ ने यह कमी कर दी
दिल बना के क्यों न रखा यह ख्याल ।।

काश दो किवाड़ दिल में लगाता 
नाजुक ये दिल न आँसू बहाता ।।
देकर के दस्तक वो रूख़सत 'शिवम'
याद में उनकी न अब छटपटाता ।।

रोकता उन्हे बन्द करके किवाड़ 
आयी थी दिल में जिनसे बहार ।।
आज अब उन्हीं का दर्द बना है ,
रहता है हरदम यह दिल बेकरार ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"

दिल रूपी किवाड़ को, 
ऐसे ही न खोला कीजिए, 
सुना है आजकल इंसान, 
हर दिन रंग बदलता है, 
कब किस रंग में दाखिल हो,
गिरगिट समान हो गया वो |

आपो हवा मैं भी अब कहाँ, 
वो बात रह गई जनाब! जब, 
किसी के आने की आहट से, 
खुद ही खुल जाते थे किवाड़, 
तूफ़ान-ऐ- बेवफाई फैल गई है, 
ईमानदारी की कद़र न रह गई है|

स्वरचित *संगीता कुकरेती*
मन के किवाड़ पर,
जब तुमने दी दस्तक,
सच मानों प्रिय,
अनुपम तरंगे बज उठी....

दोनों पल्ले,
खुले धीरे-धीरे,
मलयनील सी पवन
मन को बहका गई.....

दिल के रंगीन दरवाजे,
क्यों न अब,बंद कर लूँ.....
आशंकित हूँ,
कहीं बहका कर चले न जाओ...
बदरा बन आए हो अभी,
फिर न सुखें में छोड़ जाओ।

धक-धक धड़कन,
धीरे-धीरे बज रही,
श्वासों में,
धौकनी सी,लहर रही....

किवाड़ों को ,
अब है बंद कर लिया,
चंदन ,सुमेरु सा,
तुमको नज़रबंद कर लिया।

महक गई है ,
दिल की गलियाँ,
घर,आँगन प्रफुल्लित हर बगिया।

सुनो सजन.......
तुम अब , बंदी बन चुके,
सुर,साज,लय बद्ध,
तूम अब सज गए।

किवाड़ों की वो,
खिलखिलाती दस्तक,
जीवन की अनमोल,
धुन बन गई।
तरंगित हो गई,
मन की सोई हर गली....

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित,मौलिक

शैली... लघु कविता 
**********************
🍁
मन किवाड को खोल कभी, 
हमको भी अन्दर आने दो।
नही अगर तो शुद्ध हवा से,
तुम मन को महकाने दो॥
🍁
बन्द रहेगा जब कपाट,
अन्तर्मन को क्या जानोगे।
जब तक कोई मिले नही,
क्या लोगो को पहचानोगे॥
🍁
खोल हृदय के हर किवाड,
हर सूक्ष्म झरोखा खुलने दो।
मन मन्दिर मे प्रभु बसेगे,
सुर झँकार खनकने दो॥
🍁
दीप जलेगा शब्द मिलेगा,
भाव जगेगा कविता का।
शेर कहे है मन मन्दिर बने,
खुले किवाड जो कविता का॥
🍁

स्वरचित ... Sher Singh Sarraf


लघुकविता
----------*----------
खोल मन के किवाड़
आने दो प्रेम की बाढ़
सब विषाद बह जाने दो
खुशियों को लहराने दो
क्या रखा अकेले जीने में
घुट-घुट कर दर्द सहने में
बीत चली अब साल पुरानी
नई साल की करो अगवानी
नववर्ष की जब मचेगी धूम
बुरी बातों को जाना तुम भूल
द्वार दिल के रखना खोलकर
खुशियां न लौटे मुंह मोड़कर
देख दिल के बंद दरवाजे
किसी को भी नहीं लगते प्यारे
चलो मिटाएं मन से द्वेष
बना रहे सभी का मनप्रेम
***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित रचना

बैर भाव के मन पट खोलो
स्नेहसुधा गागर छलकाओ
जीवन जग आना जाना है
जब तक जीओ नेह बरसाओ
छल कपट असत्य कपाट को
पहले खोलो फिर तुम जी लो
परहित गरल पीना पड़ता है
हँसते हँसते सहज हित पी लो
मायाजाली इस किवाड़ में
सत्य कुछ भी नहीं दिखता है
अज्ञानी अंधकारी होकर जन
कोल्हू बैल हर ,नर पिसता है
घूंघट पट स्नेह से खोलें हम
चंद्रमुखी सुन्दर मुख दिखता
करें प्रयास सतत जीवन भर
क्या ऐसा जो,जग नहीं मिलता
हिय हनुमंत कपाट खुले जब
सिया राम प्रभु सबने देखा
काम क्रोध मद लोभ हटे जब
सबने जीवन निरखा परखा
बंद कपाट देवालय सूने हैं
बंद नयन पट क्या हम देखें
मोह कपाट जो जग खोले
मन निश्छल जीवन को परखे।।
स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।

विधा: छंद मुक्त कविता
आज दिल का किवाड़ 
खोल दिया है ओह, प्रिय
अब जल्दी आ इस दिल मे
देर ना लगा।
मनमोहनी सूरत तेरी 
मदमस्त अदाएं लिए 
दूर रहकर मुझे यूं न सता।
तू क्या जाने पीर पराई ? 
जल्दी आ
अब कोई बहाने मत बना।
सुध बुध सब खो बैठी मैं,
आज तेरी हो बैठी मैं,
आ आकर ले मुझे अपना।
ओह! जब पास आओगे, 
मेरे दिल मे उतर जायोगे
आ प्रिय तू जल्दी आ।
किवाड़ दिल का बंद कर लूं गी
फिर न तुझे जाने दूँगी,
बस दिल मे मेरे एक बार समा।
हा, अब जाकर मुझे कुछ मिला है
तुझे पाकर मेरा रोम-रोम खिला है,
बस यूं ही रहना मेरे दिल में, 
और किसी से नही मिलेगा 
सकून जो तुम्हें पाकर मिला है।

स्वरचित
सुखचैन मेहरा


बंद कमरे
सीलन भरे
गर्द गुबार
दीमक पनप रहा
रंग बदरंग दीवार
अब इस तिमिर को
धुलने दो
अक्ल का किवाड़
जरा खुलने दो
आएगी अंदर
अलौकिक रश्मियां
खोलेगी
मन की खिड़कियाँ
डरो मत
ज्ञान-संपदा अकूत
दस्यु-चोरों से अछूत
उन्मुक्त पवन संग
निज ज्ञान-गंध को
घुलने दो
अक्ल का किवाड़
जरा खुलने दो
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित


खोल दो कपाट !
जो बंद कर लिए हैं हमने,
आने दो ताजी हवा।
निकल जाए दुर्गंध,
जिसने बना दिया ,
जिंदगी को जहन्नुम!!
अपने ही दायरे में,
सिमट गए हम-तुम।
खोल दो कपाट!
कि मिट जाएं दूरियां,
न रहें मजबूरियां।
मिल जाएं मन,
दूर हो अनबन।
भावनाएं हैं बंदी,
बहने दो उन्हें।
वर्जनाएं जो लगी,
अब टूटने दो उन्हें।
क्यों रहें बंद ये कपाट?
जाति-धर्म-सम्प्रदाय
के नाम पर!
क्यों न खोलकर,
नफरतों की धूल झाड़ दें।
क्यों न फैलने दें,
अब प्रेम की सुगंध।
क्यों रखें हम खुद को,
पिंजरे में बंद??
क्यों न करूणा के फिर से,
बादल बरसें??
क्यों हम खुलकर,
हंसने को तरसे ??
बहुत हुआ अब,
अब और न होगा!!
इन किवाड़ों को,
अब खुलना होगा।
बीत गया है जो,
उसको हम बिसार दें।
आने वाले पल को,
हम फिर संवार दें।
जिंदगी के उपवन,
को फिर से बहार दें।
मानव बन कर,
मानवता का प्रसार करें।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित


कैसे खोलूँ हृदय कपाट मै

जब भरी दुर्गंध मेरे अंतस में।
कैसे किबाड़ खोलूँ प्रभु जी,
जब घिरा स्वयं असमंजस में।

अंतरतम से मै लडता रहता हूँ।
खुशियों में खुद ताले जडता हूँ।
नहीं किसी से मिलता जुलता,
किऐ बंद किबाड़ पडा रहता हूँ।

ऐसा क्या कुछ दुर्भाग्य घटा है,
जो जीवन मेरा कबाड हुआ है।
बीज अंकुरित हुऐ वैरभाव के,
सबसे शायद बिगाड़ हुआ है।

बहुत सब्जबाग देखे थे मैने ,
पट प्रेमप्रीत के खुले मिलेंगे।
संघर्ष हमें नहीं करना होगा,
खुले किबाड सब गले मिलेंगे।

स्वरचितःःः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय
मगराना गुना म.प्र.



पहले किवाड़ के दोनों भाग जब खुलते थे।
खिलखिलाने के स्वर हवा में गूंज उठते थे।

खुशियाँ आँगन में बच्चों के रूप में हँसती थी।
बहन, भाभियाँ आपस में करती खूब मस्ती थी।

किवाड़ों के पीछे संयुक्त परिवार रहता था।
जहाँ अपनापन भाइयों में खूब बसता था।

हर दिन होता था घर में त्यौहार,
खूब सजता था हँसी- ठिठोली का दरबार।

किन्तु अब किवाड़ बन गए दरवाजे।
जो बड़े- बड़े घरों में खूबसूरती से साजे।

अब दरवाजों का सिर्फ एक पट खुलता है।
सारे घर - भर में तो सन्नाटा पसरा रहता है।

लोगों का आना- जाना नही सुहाता है।
अब एकल परिवार ही सबको खूब भाता है।

इस तथाकथित समाज में किवाड़ के दोनों पट।
अब मिलते है बस बंद होने पर ही झट।

अपनी लाचारी और बेबसी पर वो खूब रोते है।
बस उन्मुक्त रूप से खुलने के लिए तरसते है।
............खुलने के लिए तरसते है।

@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"
नागपुर (महाराष्ट्र)


घर की इज्जत होते है किवाड़ 
किवाड़ के पीछे की दुनिया 
होती है वास्तविक

लड़ते है पति पत्नी 
मन का निकाल फिर 
हो जाते हैं एक

लड़ते है भाई बहन
एक कट्टी एक मिट्ठी 
में छिपा है प्यार अनूठा

किवाड़ की मजबूत 
बुनियाद होते है 
चौखट , साकल और कुन्डी 

किवाड़ के बदल रहे हैं 
रूप अनेक 
आधा किवाड़ खोले प्रेयसी 
प्रीतम की प्रतीक्षा में 
लिख गये ग्रन्थ अनेक

बंद किवाड़ है बंद मुट्ठी 
इसलिए 
किवाड़ खोलने की
आज ज़िद न करो

स्वलिखित 
लेखक
संतोष श्रीवास्तव भोपाल

विधा :- छंदमुक्त 
दिलों में बढ़ती कड़वाहट,
बयां करते नये किवाड़।
एकल परिवार की तर्ज पर,
बनते कई नए किवाड़।
छोड़ दिये बिलखते,
पुराने किवाड़।
राह तकते अब वही किवाड़।
जिन किवाड़ के पीछे,
छुपा छुप खेले होंगे,
भाई,बहनों के संग।
अब बुलाते है वो किवाड़।
जिन किवाड़ों के खटकाने से,
हो जाती थी हर जिद पूरी।
आज वही किवाड़ तरसते होंगे।
जिन किवाड़ो पर खड़े रहकर,
किसी माँ ने राह तकी होगी।
आज वही किवाड़ सिसकने लगे।
आज वही किवाड़ तड़फने लगे।

स्वरचित :- मुकेश राठौड़


एक पर्दा ही तो किवाड़ का रहता, आवरण हीन कोई जी नहीं सकता । 

होती हर किसी की अपनी मर्यादा, होगा सम्मान बिना भी कैसा जीना । 

पीछे किवाड़ के रहे छुपी गरीबी,इससे कभी जीत सकेगी नहीं अमीरी । 

रहें कुरीतियाँ बंद किवाड़ के भीतर , बातें विकास की होती रहतीं जर्जर । 

रंग ऐसा राजनीति के किवाड़ पर , कभी अश्क अपना नहीं दिखता उम्र भर । 

प्यार पिया का बंद मन के किवाड़ में ,फिर आजादी नहीं मिलती जीवन में । 

बंद रहतीं सांसे मन के किवाड़ में ,इसी से जले जीवन ज्योति इस संसार में । 

बंद किवाड़ लगते तभी तक अच्छे , जब तक उनमें गुनाह नहीं पलते । 

वे लोग किस्मत के किवाड़ बंद करते, यहाँ पर जो भी शिक्षा से दूरी रखते । 

खोलो किवाड़ नयी रोशनी आये अंदर , कोई भी विकार रहे न मन के अंदर । 

अब किवाड़ हृदय के खोलो दो सारे , इससे फैलने लगेंगे प्रेम भाव के उजियारे । 

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,
शोभा जग की देखिये, खोल नयन के द्वार
आलोकित मन को करे, हो आनन्द अपार

द्वार हृदय का खोलिये, सब जग लेय समाय
सुख दुख सबका बांटकर,आपहु भी सुख पाय

दरवाजा मन का खुला,प्रिय उर लियो बसाय
प्रणय बेल रस सींच के,लिय परवान चढ़ाय

मति द्वार सब खोल कर,करो विचारो काम
भला बुरा सब सोचिये,सुखद होय परिनाम

ठंड लगे इस शीत में,लो सिगड़ी सुलगाय
गरमाई तन को मिले,हवा न पट खड़काय

सरिता गर्ग
(स्व - रचित)

हाइकु

ठंढ बहुत
दरवाजा बंद है
बदन कांपे

किवाड़ खोलो
गरीब की पुकार
भूखा है पेट

फकीर भूखा
दरवाजा खोलिये
जाड़ा कँपाये

किवाड़ खुला
जाड़े को निमंत्रण
कलेजा हिले

किवाड़ बंद
लाचार राहगीर
सर्दी सताये
(अशोक राय वत्स)
स्वरचित , जयपुर

्षीण पड़ते दुलार लाड़
अब कहाँ खुलते किंवाड़
पडो़सियों में दूरी है
न जाने कैसी मज़बूरी है।

किवाडो़ की संख्या बढ़ गई
लोगों की नाक चढ़ गई
सम्बन्ध किवाडो़ं में बन्द हो गये
विकास की सीमा लड़ गई।

किवाडो़ं में जालीदार किवाड़ जुड़ गये
लोग बाहर ही बाहर मुड़ गये
भीतर आईये कहने की प्रथा छूट रही
रिश्तों की लडी़ दिनों दिन टूट रही।

दिल के किंवाड़ भी जर्जर हो रहे
रिश्तों रिश्तों में अज़ब डर हो रहे
एक गुरु ने शिष्या का दामन फाडा़
लोग कितने गन्दे और बर्बर हो रहे।

किवाड़ 

टूटे किवाड़
इज्जत का सवाल
पर्दा पैबन्द।

राह निहारे
व्याकुल चिंतित सी
ओट किवाड़ ।

बंद किवाड़े
अजनबी आहटें
भय होता क्या??

कुंडी खटकी
खुलते है किवाड़
स्वागत करें।

दाखिल हुए
खुले मिले जिसके
उर के द्वार।

ऊँची डेहरी
धरोहर किवाड़
कंगूरे सजे। 

स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन'

विधा-हाईकु
विषय- किवाड़/दरवाजा


छुपे रहस्य
दरवाजों के पिछे
खुलते राज

घर मंदिर
संस्कार है किवाड़
ऊँचे विचार

निकले भाव
विपिन की लेखनी
खुले किवाड़

धैर्य किवाड़
सफलता मंजिल
मिले संतोष

स्वरचित-रेखा रविदत्त
26/12/18

बुधवार

शहर की उजली रोशनी मुझे बेकार सी लगती हैं 
वैसे तो खुला खुला सा हैं शहर का सारा उन्मत गगन 
फिर भी दिल में कुछ उदास सा लगता हैं 

ये शहर की भीड़ भाड़ मुझे बंद किवाड़ सी लगती हैं .

इस चकाचौंध में जिंदगी जंजीर जकड़ी कैद सी लगती हैं
बंद किवाड़ में मन की हसरत बाढ़ में डूबी हुई लगती हैं 
उलझा हुआ हैं मन मेरा ना जाने ऐसे क्यों 
बंद किवाड़ में खुशियाँ मेरी उजाड़ सी लगती हैं .

कहने को खुशियाँ हैं जमाने भर की 
लेकिन ख़ुशी का वास्तविक किवाड़ बंद हैं 
संग हैं सब अपने मेरे साथ कदम कदम चलने को 
पर बेबस और बेखुदी का किवाड संग लेकर .

लगता हैं जिंदगी की किवाड़ मुझे राह में भूल गई हैं 
मैं उसकी गलियों से गुजरती हूँ जिंदगी की चाह में 
मैं उसकी दहलीज पर ख़ुशी की चाह में दस्तक देती हूँ 
वो हर बार मुझे राह में छोड़कर किवाड़ बंद कर देती हैं .
स्वरचित :- रीता बिष्ट

दिल के किवाड़, सबके बंद मिलते हैं।
मुश्किल के वक्त, दोस्त चंद मिलते हैं।।
भाई भी भाई का, ना रहा अब तो,

बुढ़े मां बाप बोझ, लगने लगे सबको,
सब अपनी दुनिया में, मस्त मिलते हैं।
रूठों को आगे बढ़ कर मनाए कौन,
सब अपनी ही खोल में बैठे हैं मौन,
जमाने के यहां अलग ही ढंग दिखते हैं।
निलम अग्रवाला, खड़कपुर

विधा- छंद मुक्त

किवाड़ की ओट से 
झाँकती चंद्रमुखी के
झील से गहरे दो नयन
उतर गए कटार से
सीने में
गुजरता रहा रोज
उसी गली से
जहाँ करती थी
मेरा इंतजार
किवाड़ थामे
झील सी गहरी आंखों से
मुझे निहारती
चुपचाप निकल जाता
कुछ न कहता
वो ख्वाबों में आती
मेरे सिरहाने बैठती
बाल सहलाती
सोने न देती
चुपचाप चली जाती
बताया किसी ने
वो नीम पागल है
खड़ी रहती है यूँ ही
किवाड़ की ओट से झाँकती
और मैं
थके कदमों से
निढाल सा लौटा घर
फिर गुजर न सका
उस गली से
नींद में आज भी खड़ी है
किवाड़ की ओट से झांकती
वह दस्यु सुंदरी

सरिता गर्ग
(स्व - रचित)
दिल के किवाड़ 
दिल के किवाड़ों पर न ताला लगाइये, 
थोड़ा मै झुकूँ थोड़ा आप झुक जाइए, 
जीवन को यूँ सरल बनाइये 
थोड़ा मै मुस्काऊँ थोड़ा आप मुस्काइए l

जिंदा है तो. जिन्दा दिली दिखाइए, 
थोड़ा मै भूलूँ,.. थोड़ा आप भूल जाइये, 
खटाई में क्या रखा है जनाब, 
थोड़ा मै मीठी बनु, थोड़ा आप बन जाइये ll

रो रो कर क्यों काटते हो जिंदगी, 
थोड़ी मै हँसू, थोड़ा आप हॅंस जाइये, 
हँसी अगर नहीं है आपके पास, 
तो "उत्साही "से उधार ले जाइये 
कुसुम पंत उत्साही 
स्वरचित 
देहरादून
घर के बाहर का किवाड़
घर के भीतर का किवाड़
बातें करें वो बार बार

हम दोनों जो भी जाने
बाहर न जाये घर की बातें
घर की इज्ज़त, घर की सुरक्षा
यह सब है हमारी जिम्मेदारी

जब हो जरूरत, तभी हम खुले
बिन जरूरत हम मुँह न खोले
आवरण है हम इस घर के
मूल्य बनाये हमें है रखना

प्रतियोगी नही, सहयोगी है हम
बच्चे बूढ़े सभी हैं अंदर
कुमकुम लगा ले हम माथे पर
आधि व्याधि न आये अंदर

है हमारा एक ही लक्ष्य
सुरक्षित रहे सब अंदर
घर सुरक्षित तो हम सुरक्षित
सुन किवाड़ की ऐसी बात
मैंने ली चैन की साँस।
स्वरचित-आरती-श्रीवास्तव।

अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं।
एक तुम ही नहीं जवां और भी हैं।


जिससे मैं मिला वो रोता ही मिला। 
तुम ही तन्हा नहीं परेशां और भी हैं। 

मुश्किलों से हौसला बडी चीज है। 
न डर ए दिल किश्तियां और भी हैं।

अब क्यों आईने से डरने लगे तुम। 
दूर हो जायेंगे जो गुमां और भी हैं। 

कर आजमाइश हवा के पैतरों की। 
सितारों के आगे जहां और भी हैं।

तरक्की की कोई हद हो तो बता दो।
तय करने अभी आसमां और भी हैं।

रुका तेरे दर पर तो तेरी ही खातिर। 
वरना इस शहर में मकां और भी हैं। 

विपिन सोहल


"किवाड़"
(1)
बटते लोग
किवाड़ खा गए हैं
घर का चौक
(2)
बच्चों में मन
किवाड़ पे चिपके
बूढ़े नयन
(3)
एक ही घर
किवाड़ मिले गले
भाई क्यों अड़े?
(4)
टूटते घर
डरते हैं किवाड़
आहट स्वार्थ

स्वरचित
ऋतुराज दवे
राजसमंद





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"स्वतंत्र लेखन"26मई 2019

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