Wednesday, December 5

"स्वतंत्र लेखन "02 दिसम्बर 2018


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मिट रहा हूँ प्रेम की वीथी में पग पग क्षुब्ध मन से।
तप रहा लेकर पिपासा नेह की अपनी तपन से।।
मत असमवेती अलापो राग मन का मीत मेरे।
ध्वस्त हो जाये न यह रिश्ता मिलन का मीत मेरे।
कब नियति से साथ का सरगम मिला विच्छेद पन से।।1।।
फूल वह जो शाख पर मुरझा गया हो अधखिला हो।
नीर का सानिध्य कहने को उसे भरसक मिला हो।
लेकिन न उस का रब्त यूँ निर्भीक बनता है चमन से।।2।।
मीत,इतना द्वेष क्यूँ पाला है तुमने नित निरन्तर।
मैं उड़ानें भर रहा हूँ चूमने को भाल अम्बर।
अब बताओ क्या मिलेगा फल तुम्हें ऐसी जलन से ? 3।।
प्रेम नित बौछार है मन की धरा पर रस भरी यह।
निर्झरी की धार है कल कल निनादों से घिरी यह।
प्रेम में ही मन रमा आरम्भ यौवन के सदन से।।4।।
स्वरचित-राम सेवक दौनेरिया 'अ़क्स'




प्रश्न पूछ लें हम अपने मन से,
क्यों घिरे हुऐ हैं उदासीनता में
गर मिलजुलकर प्रफुल्लित हम 
क्या किसी की है पराधीनता।
नहीं बनें गुलाम किसी के
जब हम स्वयं स्वतंत्र हैं
फिर क्यों किसी से डरते
बुद्धिमान हैं यदि हम तो
नहीं उदासीन रहें कभी भी
सुखदुख लाभ हानि हो सकते हैं
कोई निवाला नहीं छीने अपनों के
हम सदा रहें सहयोगी एकदूजे के
नहीं रखें चरित्रहीनता कोई,
दीन दुखियों की करें सहायता।
बहुत मिलें जब आत्मिक खुशियां
दूर करें हम अपनी उदासीनता।
कर्महीन नहीं बनें सज्जन सदकर्मी
छोडें अगर हम अकर्मण्यता।
नहीं रहेंगे कभी उदासीन हम ,
सुखी रहें हम नहीं हो उदासीनता।
स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय








आत्मा का परमात्मा से 
हो रहा मिलन
चल रही है दिल में
अजीब सी उलझन
सिमट रहा जहां
चंद क्षणों के दामन में
आंसुओं की बारिश 
हो रही आँगन में
जा रहा जग छोड़ के
है कोई पिता
चल पड़ा अंतिम सफर में
छोड़ संसारिक बंधन
है दिल में आज 
अजीब सी उलझन
निश्तेज सा होता वो तन
मंद होता श्वसन
यह देख देख मेरी
बढ़ रही धड़कन
आत्मा तो है अमर
बस जल रही चिता
बढ़ रही धड़कन
निःशब्द होता मन

स्वरचित :- मुकेश राठौड़

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कभी सुनी थी
एक कहानी
क्षितिज के पार
एक दुनिया सुहानी
सुंदर सुंदर
बाग बगीचे
उड़ते सब और
उड़न खटोले
कल कल करती
नदियां बहती
आसमां से
चाकलेट गिरती
स्वर्ग से सुंदर
उस दुनिया में
रहती है एक
परियों की रानी
न मचता कोई
कोलाहल वहां
न कभी होती
कोई मारामारी
क्षितिज के पार
की उस दुनिया में
छाई रहती
हरदम खुशहाली
नहीं रहना मुझे
अब इस दुनिया में
कंक्रीटों के इस
जंगल में
खुशियों की है
तलाश मुझे भी
ले जाए कोई
उस पार मुझे भी
जहां होती है
खुशियों की बारिश
कल की रहती
कोई फिकर नहीं
बहुत सुंदर है
और न्यारी
क्षितिज के पार की
दुनिया सुहानी
***अनुराधा चौहान**





प्यार एक खुबसूरत एहसास,
प्यार जीवन की आस और विश्वास !!
प्यार प्रभु की अनमोल नियामत,
प्यार शीतल हवा का झौंका,
पुष्पों की भीनी-भीनी सुगंध है।।
प्यार दीपक की लौ, मंदिर की घंटी,
पायल की खनक,नुपुरों की झनक है!
प्यार में बसे सतरंगी सपने,
कुछ मेरे कुछ तेरे सबके अपने।
प्यार में रचा-बसा सारा संसार,
प्यार जीवन में भावों का हार।
प्यार में समर्पण,त्याग,दीवानापन,
आनंद,मधुरता,सहज अपनापन।।
क्रोध ,राग,द्वेष ,ईर्ष्या से परे,
सुन्दर,सरल,सहज जीवन।।
प्यार दिलों को जोड़ता है,
प्यार जीना सिखाता है।।
प्यार राह दिखाता है,
इसमें समाहित हो जाते 
'मैं 'और 'तुम'रह जाता 'हम'
यही वसुधैव कुटुंबकम् का आधार है।।

अभिलाषा चौहान




बेईमानी के दौर में,
ईमान कहाँ बचा है, 
झूठे का बोलबाला है, 
सच्चा होना गुनाह है l

कुछ जयचंदों के हाथों, 
मुल्क का सौदा होता है, 
उसूलों की बोली लगती है , 
ईमान आहत होता है l

ईमानदारी कमज़ोरी है, 
सच का मज़ाक उड़ता है, 
बेईमानी की राह पे चल के, 
गधा च्यवनप्राश चखता है l

मोह ने पट्टी बाँधी है , 
ज़मीर हाथों से गिरता है,
क्षुद्र स्वार्थों के खातिर, 
व्यक्ति बेईमान बनता है l

बेईमानी को तज कर, 
जिस दिन ईमान जग जायेगा, 
पुरुषार्थ के हाथों से फिर, 
व्यक्तित्व महान बन जायेगा l

स्वरचित 
ऋतुराज दवे




सुराख, 
सुराख स्वत:नहीं होते
ये तो किए जाते है 
दीवारो पर 
उसे सजाने के लिए 
कभी घड़ी तो कभी 
बड़े -2 छायाचित्रो द्वारा 
एक -एक सुराख 
गहरा दर्द देता है 
दीवार को 
उसे सुन्दर 
बनाने के लिए 
रंग बदलते है 
दीवारो के किन्तु 
सुराख वही रहता है 
एक सुराख मानव 
हिय मे भी होता है 
जब कोई अपना 
थाली मे छेद करता है 
पर वो छेद 
मानव को सुंदर 
नहीं बनाता 
वो छेद देता है 
सिर्फ खेद.......
स्वरचित 
शिल्पी पचौरी





बावन पत्ते ताश के खेल बडा अजीब
इसमें क्यों दिखता हमें जीवन का ही रूप।
शतरंज की गोटियां चलती सदा यहां
जातपात में हमें लडाऐं नेता कहें या भूप।

महल हमारे ढह जाते जब आता है भूचाल
बिखरे पत्ते ताश के नीचे पडा गुलाम।
ऐसा ही ये जीवन अपना समझ न पाऐं चाल
बादशाह राज करें तो जोकर का क्या काम।

एक हवा के झोंके से हम बिखर जाऐंगे।
गर मिलजुलकर रहें तो कुछ संभल जाऐंगे।
जानबूझकर क्यों उलझें हम एक दूजे से
एकदिन सब तिनके तिनके बिखर जाऐंगे।

सिखा रहे ये ताश के पत्ते नश्वर है जीवन।
नहीं पडें ऐसे खेलें में सुखद बनाऐं जीवन।
महाभारत है हमें उदाहरण इस खेल का,
टूटें सब रिश्तेनाते अभी बचाऐं ये जीवन।

स्वरचितः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय




ज़िन्दगी में किसी के आशियाँ हम थे
कभी ऐसे किसी के मेहरबाँ हम थे

हालातो से अपने वो जूझता रहा
उसकी जिंदगी की दास्ताँ हम थे

बदगुमानी उसने की औरों के साथ
ज़िन्दगी में सलीके की जुबां हम थे

ये तख़्तों ताज हुकूमत कब तलक
वो सब भी वहाँ है जहाँ हम थे

नफ़रतों की भीड़ में कहीँ गुम हो गया
वो बढ़ते भाईचारा का गुमाँ हम थे

कभी एक मरता है वो दूजा मारता है
रोको उनको सब आग है धुआँ हम थे

-आकिब जावेद




पहले जहाँ थे शब्दों में भावों को सहेजते ।
आजकल तो लोग बस इमोजी ही भेजते।
तकनीक की भाषा या लिपि कीलाकार ।
कुछ कूट है, कुछ गूढ़ है,जटिल उदगार ।
मैं अबोध,इनका न बोध,इन्हें देख परेशान।
ठेंगा है या ठुल्लू ,कोई कराये इसका भान।
यद्यपि सम्प्रेषण का सूक्ष्म रूप इमोजी है।
पर क्या भावों का भी प्रतिरूप इमोजी है।
शब्दों के संपूरक रूप में इसका प्रयोग हो।
स्थानापन्न बनाकर, शब्दों का न लोप हो।
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




कोई ऐसा हो जग में
मैं प्यार जिसे देदूँ सारा।
फिर वो मुझे इतना प्यार करे,
जिसे देख जले ये जग सारा।।

वो कैद रहे इन पलकों में,
एहसास नही खोने पाये।
जब नींद भँवर में खोऊँ मैं,
तो प्रेम भरे सपने लाये।।

फिर भोर मेरी मूंदी पलको पर,
मीठा सा चुम्बन दे जाये।
फिर भोर मेरी पलकों पर,
मीठा सा चुम्बन दे जाये।।

फिर आकर झांके खिड़की से,
रवि मन्द-किरण पावन न्यारा।
फिर मैं फैलाकर बाहों में,
भर लुँ ये सुन्दर पल प्यारा।।

कोई ऐसा हो जग में
मैं प्यार जिसे देदूँ सारा।
फिर वो मुझे इतना प्यार करे,
जिसे देख जले ये जग सारा।।

फिर बाँह पकड़ मुझे ले जाये,
परियां जहां पर रहती हैं।
वहां प्रेम है फैला चारो तरफ,
मेरी सखियाँ कहती हैं।।

है प्रेम रचा उपवन सारा,
और प्रेम की सरिता बहती है।
है प्रेम रचा उपवन सारा,
और प्रेम की सरिता बहती है।।

मैं पंख लगाकर उड़ती फिरूँ,
और नाप चलूँ ये नभ सारा।
चाँद जले मुख से मेरे,
श्रीहीन बने जलता तारा।।

कोई ऐसा हो जग में
मैं प्यार जिसे देदूँ सारा।
फिर वो मुझे इतना प्यार करे,
जिसे देख जले ये जग सारा।।

हम दूर चलें किसी उपवन में,
जहां फूल हजारों खिलते हों।
जहाँ जन्मो-जनम से आ-आ कर,
प्रेमी सारे मिलते हों।।

जहाँ बांह पकड़ कर एक दूजे का,
पेड़ों के साखे डुलते हों।
जहाँ बाँह पकड़ कर एक दूजे का,
पेड़ों के साखे डुलते हों।।

जहाँ पर्वत से आ-आ कर,
गिरता हो झरना प्यारा।
जिसे देख के हम भूलें विसरें,
अपने जीवन का दुख सारा।।

कोई ऐसा हो जग में
मैं प्यार जिसे देदूँ सारा,
फिर वो मुझे इतना प्यार करे,
जिसे देख जले ये जग सारा।।

पर डरती हूँ की प्यार में तेरे,
ऐसा कहीं न हो जाये।
एक आस जगाकर मन में मेरे,
कही दुनिया में न खो जाये।।

मेरे मन का कोमल पौधा,
बिन प्रेम के ही मुरझा जाये।
मेरे मन का कोमल पौधा,
बिन प्रेम के ही मुरझा जाये।।

मैं प्रेम नदी तट से सुखी,
तू सावन है प्यारा-प्यारा।
मुझे छोड़ कही जाकर बरसे,
तू हो न बादल आवारा।।

कोई ऐसा हो जग में
मैं प्यार जिसे देदूँ सारा।
फिर वो मुझे इतना प्यार करे,
जिसे देख जले ये जग सारा।।
...राकेश पांडेय,





तुम गीत मेरी, तुम बोल मेरी,
तुम ही तो हो मधुर आवाज मेरी।
सरगम तुम हो ,लय ताल तुम्ही।
तुम से ही है ,वीणा की झंकार मेरी।
सुख भी तुम हो दुख भी तुम हो,
मेरी इस नैया की पतवार भी तुम हो।
तुम बिन नहीं कोई वजूद मेरा,
मेरे चेहरे की मुस्कान भी तुम हो।
सावन की पहली फुहार हो तुम,
मेरे अधरों का मधुर गान हो तुम।
गर्मी में शीतल मंद बयार हो तुम,
मेरा तो संसार हो तुम।
तुम से ही जीवन पूरा है,
तुम बिन यह वत्स अधुरा है।
उषा की पहली लाली हो,
तुम बिन यह जीवन कोरा है।
तुम बिन यह जीवन कोरा है।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित




इक नयन हीन सौन्दर्यगान कर पायेगा कैसे,ये हमसब मान रहे, 
मन की सुदंरता का स्पर्श करेगा वही,हमको ये भी ध्यान रहे, 
है बात सही ये दीपक जग में, सूरज कैसे हो सकता है, 
जो सतत आलोकित रहता है, वो दीपक ही तो होता है, 
नारी तो कोमल होती हैं, हम अबला उसको कहते हैं, 
लेकिन दुर्गावती लक्ष्मीबाई को, हम वीरांगना भी कहते हैं, 
है बात सही इस दुनियाँ में, बेटा कभी बेटी नहीं हो सकती है, 
लेकिन माँ बाबा की जरूरत को, अब बेटियां ही तो समझतीं हैं, 
है बात ये सच बल से ज्यादा बलबान बुध्दि ही होती है 
नीत यहां पर चाणक्य, चन्द्रबरदाई की , हमको यही बताती है, 
आचरण गलत हो सकता है, आत्मा मलिन नहीं होती है, 
इसीलिए हाथों से वाल्मीकि के, रचना रामायण की होती है ,
हर चमकने वाली चीज कभी, क्या दुनियाँ में सोना ही होती है ,
जब हीरे को तराशा जाता है, तब उसकी चमक बढ़ जाती है |
स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश,




"दीदार"
तेरी चाहतों ने दिल पर मेरे
तेरा ही नाम लिख दिया

धड़कनों ने भी ये पैगाम 
सरेआम बाजार कर दिया

दिल 💛की गलियों में
मुझे बदनाम कर दिया

इन हालातों ने आँसुओं को
मेहरबान कर दिया

होंठों ने मुस्कानों में
गमों का नाम लिख दिया

मेरी नीन्दों को चुराकर
तूने कत्लेआम कर दिया

महफ़िल की शमां-ए-श़ाम
को भी तेरे नाम कर दिया

जिन्दगी की नज़्मों को मैंने
यूँ ही बर्बाद कर दिया

जलते चाँद में मैंने ऐ ख़ुदा
रातों को तेरा दीदार कर लिया

स्वरचित पूर्णिमा साह




मुसलसल चलता रहा गमों का दौर 
हम सोचते रहे वक्त आने दो और ।।
बस इसी के चलते हुये आज मायूस
वक्त चला जाता फिर कौन करता गौर ।।

वक्त बदला हालात बदले नजरें बदल गईं
बीतें लम्हे पाने को यह आँखें मचल गईं ।।
काश कुछ पल हम और वो बच्चे हो जाते
न जाने क्यों यह उम्मीदें घर कर गईं ।।

उम्मीदों न दामन छोड़ा ये कैसी चाहत
बन गई यह मानो आज एक इबादत ।।
ये मुहब्बत अब वो मुहब्बत नही ''शिवम"
लगता है रब की ही है ये कोई इनायत ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"



काव्य कलश सजाते मिलकर
हम भावों के मोती से
गद्य पद्य हर विधा में लिखते
कलश भरें नव ज्योति से
भिन्न भिन्न बिंदु को लेकर
हम साहित्य रोज़ सजाते
बहिन भाई सब मिलकर के
ज्ञान ज्योति रोज़ जगाते
वीणा वादिनी माँ शारदे
नये नये भावों को देती
वह् अज्ञानी के मानस में
ज्ञान ज्योति से भर लेती
चमक रहे भावों के मोती
दमक रँहे भावों के मोती
काव्य सृजन करते मिलकर हम
जग में जलती जगमग ज्योति
असहाय को मिले सहारा
सहितं भाव साहित्य जागे
माँ देवी की प्रिय कृपा से
काव्य गुण शोभनीय लागे
भावों का इक इक मोती
कोहिनूर सा वह् चमकता
प्रशंसकों के स्नेह सुधा से
सर्वत्र ही फलता फूलता
आशीर्वचन हमें दो माता
तिमिर्ज्योति हम जला दें
माँ भारती की चादर पर
सुधा ज्ञान सरिता बहा दें
स्व0 रचित
गोविंद प्रसाद गौतम





ऐ मेरे अहदे चमन गुल और गुलफाम भी
आपकी बस इक नजर मे खूबसूरत हो गये।

शाख से टूटे वो पत्ते खाक मे यूं जा मिले।
रूह मे माटी कि जा कर बस इबादत हो गये।

बागबा वो था चमन का और फूलों कि महेक।
जिस्म पर बिजली गिरी क्या वो नदारद हो गये।

फूल कि शोखी कहूँ या यूं कहूँ नजरे करम।
आपकी बस एक नजर नजरों कि मिलकत हो गये।

बाग मे खिलती ये कलीयाँऔर भवरों कि नजर।
गुनगुनाते गीत भी उनकी इबारत हो गये।

खूबसूरत ये फिजांऐ उस पे ये बरखा बहार।
ओस सी नमकिन बूँदे क्या कयामत हो गये।

दूर कोई राग फूटा, झर झर बही यूँ रागिनी। 
स्वर ये सारे सरगमों के,बस शरारत हो गये। 
🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺
स्वरचित:-रागिनी नरेंद्र शास्त्री





हे झांक रही चंचल चितवन,ज्यों अर्धचंद्र यूँ खिला हुआ
कजरारे का
रे नैनन की छवि,सरि कमल पुष्प यूँ हिला हुआ।


मृदुस्मितअधर,रक्तिमकपोल,लहराती नागिनसीअलकें,
सुश्मित वसन,कर वलय पुंज,पियु प्यास लिए शुचित पलकें।

सद्य परिणिता निलय कुँज मे,नित नूतन अभिसार लिए,
प्रियवर कि आहट मलय सुगंधित,पुनि सोलह श्रृंगार किए।

यूँ खिली हुई निर्झर सरिता,आंदोलित हियकी दिव्य द्युति,
सहमी सीमटी उर्मित रुपसी,अद्य विलोकित नवयुवति । 
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
स्वरचित:-रागिनी नरेंद्र शास्त्री




I शैतान न बदला....II 

अजब सा खेल है....
इंसान को पूजा....
वो पथ्थर बन गया....
तन और मन....
छील गया....
खून के आंसू से भी...
नहीं पिघला....

पथ्थर को पूजा....
वो देवता बन गया....
माथा रगड़ा....
लहू से अभिषेक हुआ...
पर उसका रंग न बदला...

इंसान बदल गया...
देवता बदल गया...
शैतान न बदला....

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 







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