Wednesday, January 23

"कलम "22जनवरी2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |
             ब्लॉग संख्या :-276










(1)
सत्य क
हानी
कलम की जुबानी
पृष्ठों पे रची।।
(2)
कलम धार
तलवार बेजान
मन से चली।।
(3)
लेखनी सजी
भावों के मोती बन
पृष्ठ पे खिली।।
(4)
कलम शक्ति
निरंकुश तंत्र में
जगती भक्ति।।
(5)
शिक्षा गूँजन
जुगनू सी लेखनी
तम भंजन।।
(6)
ज्योतिर्गमय
कलम स्वच्छ राहें
सुखी जीवन।।



ये कलम मेरी दीवानी 
कब क्या लिखे कहानी 
ऐसी अल्हड़ ऐसी सानी ....

कब इसमें क्रोध की ज्वाला
कब इसमें प्रेम का प्याला 
बेझिझक इसकी बानी.....

सत्य की है ये परम सहेली
लगे कभी दुल्हन नई नवेली
हर रूप में कहलाये नूरानी...

सोते सोते यह उठा दे 
चलते चलते ये लिखा दे
महिमा जग ने है जानी....

जब से हुई है इससे प्रीत
सताये न गर्मी न शीत 
भूली चोट कई पुरानी.....

थे दर्द कई हजार
सताये थे कई विकार 
वो सूरत सब भुलानी....

प्रभु को पाने से आसार
आयेगी कभी वो बहार
अलग अहसास औ रवानी...

हर दौलत लगे है फीकी
एक कलम की नजदीकी 
जब से ''शिवम" पहचानी.....

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्" 





            










सत्य की जंग
कलम तलवार

असत्य काटे

कवि की जान
कलम दे सत्कार
भाव अक्षर

पृष्ठ की भूमि
भावनाओं के बीज
कलम बोती

मन सागर
कलम पतवार
जीवन पार

******

स्वरचित-रेखा रविदत्त 





वरद पुत्र हैं मात शारदे के
सदा कृपा कलम पर होती
भक्तिभावमय वाणी से नित
जगमग जीवन को करती
सुदृष्टि से रत्नाकर भी
वाल्मीकि कवि बन जाता
जग मूर्ख कहलाने वाला
कालिदास जग कहलाता
कलमकार कला का प्रेमी
त्रिवेणी का अद्भुत संगम
गद्य पद्य और चित्रों से वह्
रच देता है दृश्य विहंगम
कलम रचती इतिहासों को
कलम चलती महाकाव्य पर
कलम लिखती बही खातों को
कलम चलती है सम्भाव्य पर
जंहा न पहुँचे रवि रश्मि भी
वँहा पंहुचती सदा कलम
मङ्गल गान सदा करती वह्
मार्ग बताती अति शुभम
सहितं भाव सद साहित्य को
कलमकार की कलम लिखे
लाखों विपदा आती फिर भी
सदा कलम असत्य न निरखे
महाशक्ति कलम की होती
तूफानों से वह् न डरती है
आग उगलती अमृतमय वह्
जग सुखमय सदा करती है
चारवेद ऋचाएं लिखती
वह् है सद कर्मो की गीता
सौरभता जीवन मे लाती
भरती भाव सदा संगीता
जगजीवन दर्पण को लिखती
तमसोमाज्योतिर्ग मय करती
सत्यं शिवम सुन्दर भावों से
चित्र कला जग हित मे रचती
कलम रवि है कलम शशि है
कलम सदा कवि कर शौभा
कलम की मस्ती कवि ही जाने
चिकित्सक कलम हरती रोगा।।


स्व0 रचित
गोविन्द प्रसाद गौतम 


  





ग्रन्थ पुरातन रच दिये , भोजपत्र लिया हाथ
मोरपंख था लेखनी , रच डाला इतिहास

कलमकार की कलम को, कहते हैं तलवार
खंजर सी दिल पर लगे, करती तीखा वार

जादूगर थे कलम के , एक से बढ़के एक
बाबू धनपतराय के , सानी नही अनेक

कवि दिनकर की कलम से ,बही वीर रस धार
रनभेरी जब बज उठी, चमक उठी तलवार

हास्य कवि की लेखनी करती बड़ा कमाल
हँसा - हँसा कर जान ले , कर डाले बेहाल

भावों की गंगा बहे , कलम हमारे हाथ
रच डालें संसार सब,हम सब मिलकर साथ


सरिता गर्ग
स्व रचित 


  
(रचना =कलम)
चले कलम सदा ही ऐसी,
अंधियारा ही मिट जाये।
फैला दो प्रकाश सदा तुम,
कोहरा जिससे छंट जाये।
सत्य पथ पर रहें अडिग हम,
साहस से सदा ही डट जायें।
चले कलम सदा ही ऐसी,
अंधियारा ही मिट जाये।।.......
सच्ची लेखनी के प्रभाव से ,
सिंहासन भी हिल जाये।
बिनते कूड़ा नन्हे हाथों को,
बस्ता कलम भी मिल जाये।
प्रहार बुराई पर कर दो,
खोया बचपन भी मिल जाये।
चले कलम सदा ही ऐसी,
अंधियारा ही मिट जाये।।......
राजा रंक का भेद यहां पर,
लेखनी से भी कट जाये।
डिगे न पग विपदा में कभी भी,
साहस सदा ही मिल जाये।
रहे न कोई भूखा प्यासा,
सबको छत भी मिल जाये।
चले कलम सदा ही ऐसी,
अंधियारा ही मिट जाये।।...
जाति - धर्म का भेद न हो,
ऊंच नीच की हो न भावना।
सदा आपसी भाईचारे की ,
एकता को हम दिखलायें।
चले कलम सदा ही ऐसी,
अंधियारा ही मिट जाये।।
.......

..........भुवन बिष्ट 
  

 गिरा बडा है वकार, जब जब झुकी कलम है। 
कहाँ बचा है मयार, जब जब बिकी कलम है।


हौसलो के हर्फो में, हिम्मत की लिखावट है। 
थके थके हम यार, जब जब थकी कलम है।

तहरीर ने लिखे है यहां, तहरीक के अन्जाम। 
रुके हैं सिलसिले के जब जब रुकी कलम है। 

लिखे हैं दर्द भरे जाने, ये कितने ही अफसाने। 
हंसी की बरसात हुई ,जब जब हंसी कलम है।

इसकी कुर्बानियों के सिलसिलो की हद नहीं। 
फूंक दी जान वतन मे जब जब फुंकी कलम है। 

विपिन सोहल  

पहली बार जब थामा था तुम्हें
प्यार से ऊंगलियों मे सजाया था ,
अपना नया दोस्त बना तुम्हें
चूम कर रिश्ते को सजाया था ।

मेरा दोस्त मेरी कलम अब 
पल पल मेरे साथ रहे,
अहसासों को शब्दों की माला 
में पिरो मन का रीतापन भरे ।

कोरे कागज को खूबसूरत रंगों
से सजा मन को अभिव्यक्त करे,
लेख मेरे ,लेखनी के माध्यम से
नित कल्पना की नई उड़ान भरे।

जब संवेदनशीलता शब्दों में ढले 
कलम निर्भीक धाराप्रवाह चले,
स्वयं को स्वयं से परिचित करा
जीवन को नई दृष्टि नये लक्ष्य मिले।

लेखन से मिला विस्तार मुझे
सीखा नई विधाओं का अद्भुत संसार
आप सब ने पढ़ कर मुझे 
दिया रिश्तों का अनुपम उपहार।

स्वरचित
अनिता सुधीर


छूट गया है कलम मेरा,
इस मोबाइल के चक्कर मे।
अब तो मै लिखता हूँ बस,
कलम नही अगुँठे से।
🍁
कागज के पन्नो ने अब तो,
शौर्य ही अपना ।
मनभावो का दर्पण बन,
मोबाइल ही अब उभरा।
🍁
पर मै तो हूँ कलमकार ही,
कलम से अपना नाता है।
शेर की रचना पन्नो पे हो,
मन को ये ही भाता है



स्वरचित ... Sher Singh Sarraf 



जब से लगाई प्रीत तुमसे
मैं, बावरी हो गई,
हर-पल कुछ गढ़ती रहती
ऐ कलम, मैं तुम्हारी दिवानी हो गई ।
साथ पाकर तेरा ही
मैं गुलशन को महका पाती हूँ,
अपनी भावनाओं के हर शब्द को
कोरे कागज पर उतार पाती हूँ ।
बिखर जाता है
शब्दों का जाल
और मैं, बेचैन हो जाती हूँ
जब अपनी व्यस्तता के कारण
तुझे नहीं छू पाती हूँ ।
साथ रहना यूँहीं साथ मेरे
ताकि मैं, जन-जन का आवाज बनूँ,
दबें-कुचलें सबके लिए
एक अच्छी मिशाल बनूँ ।



स्वरचित: -मुन्नी कामत । 
  
  
(1)चली कलम 
करे नव निर्माण
बने सुजान 
🌹🌹🌹
(2)लिखे कलम
सुख दुःख की पाती
भाग्य अपना
🌹🌹🌹
(3)कलम रेल 
स्याही भरे ईधन 
शब्द है यात्री
🌹🌹🌹 
(4)फांसी की सजा 
सुना खुद हो जाती
कलम फ़ना
🌹🌹🌹
(5)है कहावत 
कलम लिखा सत्य 
कहा असत्य 
🌹🌹🌹


स्वरचित 
मुकेश भद्रावले 



कौन कहता है कि मैं,फूलों को तोड़ नहीं सकता
कौन कहता है कि मैं,कलियों को मसल नहीं सकता
कौन कहता है कि मैं,कांटों पे चल नहीं सकता
सामने तो लाओ यार,मैं तुम्हारे चेहरे पे कालिख-
क्या पोत नहीं सकता ?

कौन कहता है कि मैं,एक असहिष्णु को मार नहीं सकता
कौन कहता है कि मैं,किसी को ढेर नहीं कर सकता
निहत्था हूँ मैं-यह सच है,क्या बार नहीं कर सकता
सामने तो आओ यार,मैं अपनी कलम की धार से-
क्या सीना फाड़ नहीं सकता ?

माना कि मैं हूँ सहिष्णु ,भारी खंजर उठा नहीं सकता
दौलत के नाम पर हूँ कंगाल,भारी धन लुटा नहीं सकता
खुश हूँ इसीलिये कि, कोई चोर डाका डाल नहीं सकता
आजमा के तो देखो यार,कितना चौड़ा है सीना तुम्हारा
क्या लेखनी से उसे काट नहीं सकता?

💐

(मेरे कविता संग्रह की कविता " कलम की धार " )
डॉ.स्वर्ण सिंह रघुवंशी,  


कर्म योद्धा 
शूरवीर की कहानी 
मेरे कलम की जुबानी ।
मशाल ऐ हिंद 
हिंद की मशाल 
जलती हुई रवानी 
मेरे कलम की जुबानी ।

कली ऐ कश्मीर 
कश्मीर की जवानी 
मेरे कलम की जुबानी ।

दूरदर्शन से 
'सत्यम शिवम सुंदरम'
जो हटा दे 
भारतीय मुद्रा से 
'सत्यमेव जयते' 
जो हटा दें 
उनकी कारस्तानी 
मेरे कलम की जुबानी ।

जो करे वंदे मातरम के अपमान 
जो करे हिंद हिंदी हिंदू 
हिंदुस्तान की अपमान 
उनकी दगाबाजी की निशानी 
मेरे कलम के जुबानी ।।

स्वरचित एवं मौलिक 

मनोज शाह मानस  




ऐ कलम सरल, सरस लिख 
जीवन को प्रसन्न, सफल लिख 
सतत, संघर्ष लिख 

ऐ कलम दृढ़ संकल्प, सच्ची लगन लिख 
जीवन को आशा, आत्मविश्वास लिख
एकाग्रता, जिज्ञासा लिख 

ऐ कलम निर्भय,निर्मल लिख 
जीवन को साहस, निष्ठा लिख 
उदार, श्रेष्ठता लिख 

ऐ कलम सुख, शांति लिख 
जीवन को प्रसन्न, संतोष लिख 
प्रगति, यश लिख 

ऐ कलम सजग, समृद्धि लिख 
जीवन को सचेतन, विशिष्ट लिख 
सुगंध, सुवास लिख 
@राधे श्याम 

स्वरचित  
  



कलम तेरी तो है बात निराली...
कब..कैसे...किसपे चल जाए...
कभी मधुर बजती बाँसुरिया सी...
कभी तलवार चमक दिखलाये...
कब...कैसे...किसपे चल जाए..

कभी चले ठुम्मक ठुम्मक...
पैंजनियां छनकाये...
तुलसी के छंदों में मीठी...
राम धुन सुनाये....
बच्चों की किलकारिओं सी...
मिश्री कर्ण घुल जाए....
कभी बारिश में भीगी... 
कागज़ पे...
नाव चलती जाए....
बच्चों की हठखेलियों से तू...
सब मन मोह ले जाए......
बिलकुल नटखट बच्चे जैसे तू...
न जाने कब क्या कर जाए....
कलम तेरी है बात निराली...
कब...कैसे...किसपे चल जाए..

जवाँ दिलों की धड़कन में तू ...
धक् धक् कर रह जाए....
बन आवाज़ खामोश दिलों की...
दिल को दे समझाए....
कभी टूटे जो दिल किसी का....
मरहम दे है लगाए....
दर्द में जब कोई डूबे आशिक़...
तू सैलाब ले कर आये....
डुबोकर समंदर अश्कों में...
तू चमत्कार दिखलाये....

उड़े चुनरिया गोरी की तो...
पवन ठहर जाए....
गाल पे काला तिल गोरी का...
तू पहरेदार बनाये....
जब लहराए पवन मस्त सी, तू...
ज़ुल्फ़ गोरी की लहराए....
कंगना...बिंदिया चमकी जब...
तू बिजली बन गिर जाए...
कभी गाल गुलाबी बनाती...
कभी पंखुड़ी से होंठ बनाये...
कितने रूप हैं तेरे कलम जी....
कैसे कोई बतलाये....

आती जब ठहरे हाथों में, तो...
नया सृजन कर जाए....
ज़िन्दगी के हर सफ़े को तू....
खोल खोल समझाए.....
पर बेशर्म हाथों का खिलौना बन...
विध्वंस रचती जाए....
हर गली..मोड़..हर बाग़ में बैठी...
तू अपने गीत सुनाये....
कभी दुहाई देती उम्र..जज़्बों की...
कभी देह चिल्लाये....
पर नासमझ ये दुनिया ऐसी....
तेरी बोली समझ न आये....

जात पात न धर्म लिहाज तुझे है....
तू सबके ताज सजाये.....
गीत गोबिंद बने तुझसे, कभी...
गीता राह दिखलाये....
बन कबीर तू दिल को खोजा....
नहीं बहरा खुदा बतलाये....
पहुंची जब सूरदास हाथ में...
कान्हां की मूरत दे दिखलाये.....
जग दंग देख रह जाए.....
कभी रसखान कभी मीरा में...
तू प्रेम सुधा बरसाए...
जग प्रेममय हो जाए....

कभी बन लक्ष्मी बाई तू...
देश की आन बचाये....
कभी वीरों के चरण कमलों में....
तू फूल बन बिछ जाए.....
कभी हिमालय पे ललकारे...
तो कभी सियाचिन जाए....
ज़िन्दगी और मौत का सच तू....
आँखों से दिखलाये....
जब माँ के जांबाज़ों के आगे...
कृतज्ञता से झुक जाए...
तेरे अश्रुओं से सब की ही...
रूह पिघल बह जाये.....
जब ललकारे देश के दुश्मन...
तू बन शमशीर चमक जाए....
किस विद करून मैं तेरा वर्णन....
मुझे समझ न आये....
जब मांगू मैं सुकून खुदा से...
तू माँ की लोरी सुनाये....
जब लगूं कभी मैं गिरने तो...
बाजू पिता की तू बन आये....

बन जीवन संगिनी मेरी तू....
हर मोड़ पे साथ निभाए....
जैसे भाव उमड़ें मन मेरे...
तू वैसे ही बहती जाए....

कलम तेरी तो है बात निराली...
कब...कैसे...किसपे चल जाए..

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II   



वो तूफानी ताकत है,कलम ये मेरी यारों !
दिल की ये इबादत है,कलम ये मेरी यारो !

क्या बिगाड़ पायेगा,कोई भी यहां मेरा,
दुश्मनो की आफत है,कलम ये मेरी यारो !

दुश्मनों के आगे से,बेखौफ ये गुजरती है,
यारों की ये मन्नत है,कलम ये मेरी यारों !

ललकारती है कलम मेरी,आ खड़ी समर में यूं,
बरसों की शहादत है ,कलम ये मेरी यारों !

चलती ऐसे जैसे कोई ,तलवार चलती धारी है,
"नील"प्यारी आदत है ,कलम ये मेरी यारों !

********************************




कलम के बल से डोल उठते हैं सिंहासन
रणभेरी सी गुंजित होते शब्द-रूप हुंकार
अनीति-अन्याय के प्रति सजग जन-मन
जोश,रोष भर दे,कलम की ऐसी ललकार

सच का उद्बोधन बहुत कठिन डगर है
पग-पग फनियों की फैली विषैली फुँकार
कर शपथ,अविचल पथ,चल पाये मन्मथ 
वनराज सरीखे,बचे वो कितने कलमकार

सिक्कों की खन-खन,सर पर टंगे तलवार
संगीनों के साये में है,कुंद कलम की धार
अर्थ का शोधन या सत्ता का है सम्मोहन
चारण बन मन करता आज जय जयकार

-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित  



माँ सरस्वती की कर
वंदना
नमन करूँ शीश नाए
फिर ले कलम हाथ में 
लेखन करूँ शुरूआए

विचारों पर 
सीधा प्रहार करें 
कलम ऐसा हथियार
देश समाज में 
लाए क्रान्ति 
कलम ऐसा हथियार

कलम है साथी ऐसा
नन्हे हाथों हर्षाए
जीवन-यापन का 
साधन बने 
परिवार सहित 
मन हर्षाये

"सरफरोशी
की तमन्ना 
अब हमारे 
दिल में है "
कलम की
इसी आवाज ने
झौक दी ताकत
वीर जवानों में 

कलम ने रच डाले
रामायण ,
गीता ओ कुरआन

कलम तूझे है नमन
माँ शादरे तूझे नमन



स्वलिखित लेखक संतोष श्रीवास्तव 


चार दीवारी में बंद मासूम है
चौराहे में भी सन्नाटा है
बच्चों की सिमटती दुनिया है
लेखन शिल्प का घाटा है
कलम को मिला टाटा है

कम्प्यूटर का चढ़ा बुखार है
नाचती अब ऊँगलियाँ है
लेखन का सुधार बेकार है
कलम से छूट रहा नाता है

अपनो के संग दूरी है
रिश्ते भी तंगहाल हैं
आधुनिकता की मजबूरी है
कलम की भी खामोशी है

प्रेम भाव किसके पास है
घर में भी पड़ी दरार है
यह देख मन हैरान है
आज कलम भी बेजुबां है

स्वरचित पूर्णिमा साह





शब्द साधना,
प्रभु की उपासना,
चिर साधना,

कागज औ कलम,

मन है अनु रागी,।।  
शब्द साधना,
प्रभु की उपासना,

मनोकामना,
मधु मय चिंतन,

प्रभु नाम सेप्रीति,।। 



मेरी कलम..
है हौसला मेरा..
पल पल देती साथ मेरा..
मेरी कल्पनाओं को,
कर आत्मसात..
बढ़ाती सदा मान मेरा..
मेरी कलम..
है अभिमान मेरा..
चलती जब भी..
वीरों का गुणगान करती...
मातृभूमि के वीरों का..
सदा सम्मान करती..
मेरी कलम...
चलती जब भी..
प्रकृति का गुणगान करती
कलकल करती सरिता सी
प्रकृति का सदा श्रृंगार करती
मेरी कलम..
है संकल्प मेरा..
भरती सदा संस्कार मुझमें..
करती बखान संस्कृतियों का..
है यही जीवन आधार मेरा...
मेरी कलम..
है साया मेरा..
चले सांस जब तक..
रहे बस साथ तब तक..
यही है बस आस मेरी..
बने यही आवाज मेरी..



स्वरचित :- मुकेश राठौड़ 



कविता लिखतीं हूँ
कहानी लिखतीं हूँ
यह सब मैं कलम की
जुबानी लिखती हूँ
माँ की ममता लिखतीं हूँ
सजनी की प्रीत लिखतीं हूँ
दुश्मन का करों संहार
वीरों की हुंकार लिखतीं हूँ
यह सब मैं कलम की
जुबानी लिखतीं हूँ
यह कलम नहीं तलवार है
वीरों की ललकार है
आजादी का नारा है
विजय का जयकारा है
जो काम न हो बरछी भालों से
वो होता कलम की ताकत से
जनता की आवाज़ बने
जनमानस की आग बने
शहीदों के चरणों में
शत् शत् प्रणाम लिखतीं हूँ
यह सब मैं कलम की
जुबानी लिखतीं हूँ

***अनुराधा चौहान***मेरी स्वरचित 


मैं हूँ कलम, 
कागज से है मेरा याराना, 
चलती हूँ इस पर बेहिसाब, 
कर देती हूँ सबको खबरदार |

न है मेरी जाति न कोई धर्म,
बस मैं तो करती हूँ अपना कर्म, 
कागज पर लिखती हूँ अल्फ़ाज, 
बस यही है मेरा चलने का अंदाज |

दर्द कोई बयां करे गर अपना, 
दास्तान-ए-दर्द लिख देती हूँ, 
खुशी की बात गर हो जाये तो, 
बधाई लिखकर माहौल बना देती हूँ |

वीरों की गथाएं लिखकर मैं, 
जोश सबमें खूब भर देती हूँ, 
अत्याचार हो रहा हो कहीं तो, 
उसे उजागर मैं कर देती हूँ |

कलम में शक्ति होती है अपार, 
वक्त अाने पर बन जाती तलवार, 
लिखने से हीे बनती है इसकी धार,
हम कवि करते इससे बेहद प्यार |



स्वरचित *संगीता कुकरेती* 


1
मै हूँ लेखनी 
नाचे है पृष्ठ पर 
कवि संगिनी 
2
पृष्ठ है दूल्हा 
लेखनी है दुल्हन 
शब्द बाराती 
3
पृष्ठ आकाश 
तारे बने अक्षर 
गुरु लेखनी 
4
शब्द संसार 
लेखनी कलाकार 
कवि उद्धार 
5
दिल के पृष्ठ 
भावो की है कलम 
कवि लिखते 
कुसुम पंत उत्साही 

स्वरचित  


1)कोरा कागज
कलम की कटार
खोलती राज

2)मन की बात
कलम की ताकत
निभाती साथ

3)कलम मित्र
भावनाओं का इत्र
उकेरे चित्र

4)कलम बाण
सफल तीरदांज
निशाना साधे

5)कलम झूला
भावना का हिंडोला
बुनता ख़्वाब

6)कलम नाव
भावना का सागर
बिखरे मोती

7)कलम वोट
चुनाव का माहौल 
माँगते नेता

8)देता दस्तक
कलम मेहमान
दिल के द्वार

9)कलम बेटी
पढ़ती अंतर्मन
लिखती हाल

10)कलम जादू
उकेरती ये जख्म
दर्द की दवा



@सारिका विजयवर्गीय "वीणा" 


कलम से न करो कोई घाव
बल्कि कलम से तो करो बचाव।

कलम विचारों का अनुसरण करती
शब्दों को पन्ने पर संग्रहण करती
और इस तरह लेख एक तैय्यार होता
जब वह स्याही का परिवहन करती।

कलम उन्मुक्त होनी चाहिये
अच्छी तरह प्रयुक्त होनी चाहिये
सारगर्भित भाषा में सधी हुई
सदा भय मुक्त होनी चाहिये।

कलम हवा को मोड़ती है
कलम दिशा को जोड़ती है
कलम सही ओर जब दौड़ती है
षणयन्त्री मनसूबों को तोड़ती है।

हर बात नहीं सुलझेगी हथियारों से
हर दिन के अत्याचारों से
खून के धब्बे यदि हटाने हैं

तो सम्बन्ध निभाओ कलमकारों से। 

  
कलम हूँ,लिखती रहीै गीत नया
कभी साँसों का स्पंदन 
करूँ ईश का मन वन्दन
मातृभूमि से प्रेम करूँ
जिसकी रज लगती है चन्दन
वक्त जो गुजरा बीत गया।

कभी लिखूँ तुझको मनमीत
बना तुम्हें जीवन संगीत
प्रेम भरी मनुहार लिखूँ मैं
बस तुझसे है मेरी प्रीत।
कागज पर बन पैगाम नया।

खुशियों की बधाई देती हूँ
पन्नों में स्वप्न संजोती हूँ
आँसुओ की बन कर मैं हरदम
दर्द शब्दों में पिरोती हूँ।
सुख ,दुःख,करुणा दया।

धर्म जाति से नही मतलब
अहसास लिखूँ मेरा मकसद
देशभक्ति के भाव जगाऊँ
कवि लिखता है अजब गजब
प्रिय हूँ जैसे अपनी तनया।
कलम हूँ, लिखती रही गीत नया। 


स्वरचित
गीता गुप्ता 'मन' 
   

कलम तू मेरी ताकत बन
तुम हो मेरा एकांत का साथी
तुमसे सुख दुःख बाते करती
तुम हो मेरी सच्ची सहेली

तुम देना इतना साथ मेरा 
अनवरत चलती रहे लेखनी मेरी
डर कर नही ,डपट कर नही
विनम्रता से लिखू बात मैं अपनी

इतनी ताकत भर दो मेरे अंदर
सत्य पर मैं रहूँ डटे
निर्धन गर कलम के धनी
बन जाते सबसे धनी

संहारक नही,पालक हो तुम
विध्वंसक नही निर्माता हो तुम
प्रश्न भी तुमसे, उत्तर भी तुमसे
सरल भी तुम,कठिन भी तुम

तुमसे हो पहचान मेरी
है मेरी कामना यही
मेरी कलम मेरी ताकत
मै रखूँ सदा मान तेरी

स्वरचित -आरती -श्रीवास्तव। 


  
महाकवि श्री गोपाल सिंह नेपाली जी की प्रसिद्ध कविता “मेरा धन है स्वाधीन कलम” की तर्ज पर
एक कोशिश आज के परिप्रेक्ष्य में--


आज कहाँ स्वाधीन कलम
राजा बैठे सिंहासन पर
कदमों में आसीन कलम
आँखों पर गांधारी-पट्टी
शकुनि के पराधीन कलम
चाटते तलवे दुर्योधन के
धंधे मे धनाधीन कलम
दुःशाशन दोस्त बना बैठा
पॉकेट में लिए रंगीन कलम
भाषा-भाव भंग पिये से
कौरव-कुल-सा मतिहीन कलम 
जाति,धर्म में विभाजित
निरर्थ-अर्थ में बस लीन कलम
हीरे-पन्ने की होड़ अछूते
बिकते कौड़ी के तीन कलम
विदुर-बोध का जो पथगामी
स्व-अंतस में गमगीन कलम
गीता-वाणी भी अज्ञानी-सी
पार्थ-यथार्थ में क्षीण कलम
फिर प्रकट हो तू मोहन
दे दो एक समीचीन कलम
आज कहाँ स्वाधीन कलम

-©नवल किशोर सिंह

स्वरचित 

  
कलम शब्द एक है लेकिन 
कलम अनेको काम आती है 
कलम मन की बात बताती है 
तो कभी यह आत्मविश्वास बढाती है
कलम सभी को प्यार से रहना सिखाती है 
और चारों दिशाओं में भाईचारे का सन्देश पहुँचाती है 
कलम कभी लोगो को भावुक कर जाती है 
तो कभी लोगो को गुदगुदाती है 
कलम लोगो को उनके हक़ के बारे में बताती है 
और लोगो को स्वतंत्रता से जीना सिखाती है 
कलम लोगो को गलत कार्य से हटाती है 
और लोगो को अच्छाई का मार्ग बतलाती है
कलम लोगो में अच्छे गुणों को विकसित कराती है 
और सबसे बड़ा कार्य कलम का यह है की 
यह मनुष्य को विद्वान बनाती है 
स्वरचित :

''जनार्धन भारद्वाज ''
श्री गंगानगर (राजस्थान) 


कविता 
मैं कलम हूँ 
चिंतन, चेतना
जागृति, क्रांति 
सभी मुझसे हैं।
सुख -दुख 
दया-धर्म 
सभी मेरी देन हैं।
नियुक्ति आभार आमंत्रण 
साहित्य सम्मेलन 
कहानी , कथा महाकाव्य, 
गीत, कविता और भजन
सभी मेरी घुड़दौड़ हैं।
अच्छे -बुरे सभी मेरे सहचर हैं।
कभी जज के हाथ से 
खुशखबरी 
तो दंड स्वरूप रिकवरी ! 
उम्र कैद या मृत्यु दंड 
सभी में सहायक हूँ
निर्दोश के लिए पायक हूँ।
कहीं आँख का आँसू , 
तो कहीं हँसी की किलकारी
किसी की चित्रकारी हूँ।
किसी को कष्ट कारक तो
किसी के आदेश से हितकारी हूँ।
शिक्षित के लिए आज्ञाकारी 
किसी के लिए जिम्मेदारी 
अनपढ़ के लिए बैकारी 
जनमत की कलम सरकारी हूँ ! 
बिकती कलम कभी दबाव से
रोंद दी , कुचल जाती पाँव से ।
दिनकर सी कलम तेज तरार हूँ।
वीर रस से अरि के करती दरार हूँ।
मैं लेखक की ताकत सबल हूँ।
मैं बुद्धिजीवी के हाथ की कलम हूँ।

स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 'निश्छल', 

  
है
तेज
कलम
करे वार
खड्ग सम
दूर अंधकार
जगत का उद्धार।

है
सत्य
समक्ष
करे वार
कलम तेज
बदलते युग
गूंजते क्रांति स्वर


अभिलाषा चौहान
स्वरचित 

  
होता नहीं कलम कभी भी आतंक या सत्ता का गुलाम ।
लिखती है वही केवल, आता है जो समाज के ही काम ।।

दास प्रथा को भी रोक ही पायी थी, लेखक की कलम ।
देख कर होता जुल्म दासों पर, चल पड़ी उनकी कलम ।।

विरुध्द इस प्रथा के, उस समय जो भी था सिर उठाता ।
बिना मौत के ही वह बेचारा, था निश्चित मारा जाता ।।

देख तथा सुन कर उन्होंने, दासों की दर्द भरी सिसकियां ।
लिखी कलम से अपने लेखक ने, पंचतन्त्र की कहानियां ।।

है प्राप्त अब तो, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार ।
रुक नहीं सकता कलम लेखक का, अब किसी भी प्रकार ।।

होते है बहुत विषयों पर, बुध्दिमानों के विभिन्न विचार ।
कहते हैं पर कुछ सिर फिरे, लिखो कहें हम जिस प्रकार।। 

लिखोगे नहीं हमारी पसंद का, फिर मारे ही तुम जाओगे ।
मरने के पश्चात तुम,फिर कुछ भी लिख ही नहीं पाओगे ।।

लेखक तो किन्तु दबाव में किसी के, मिथ्या नहीं लिखता ।
लिखता तो फिर, वैज्ञानिक गैलीलियो मारा ही क्यों जाता ।।

मगर बहुत से मतकटे तो, आज भी केवल ऐसा है करते ।
कहना उनका नहीं मानने पर,लेखक को ही हैं मार डालते।।

किन्तु लेखक तो कभी मरने से, किंचित भी नहीं है डरता ।
वह तो केवल मत अपना ही,लेखनी से सदा रहेगा लिखता ।।

उठाते हो श्रीमान आप भी क्यों, कलम के विरुध्द तलवार ।
बिगड़ गये हैं क्या जनाब आपके,समस्त ही उत्तम संस्कार ।।

आता नहीं क्या आपको किंचित भी कलम चलाना सरकार ।
पढ लेते तो आ जाता शायद आपको भी कलम चलाना य़ार ।।

अपनी पूरी शक्ति भर ही करेंगे, हर अत्याचार का प्रतिकार ।
डालेगा हीं लेखक झूठ लिखने के लिये कभी अपने हथियार ।।

लेखकों के बारे में होनी नहीं चाहिये, कभी भी कोई भ्रान्ति ।
लाता है लेखक समाज में ,लेखनी से अपनी समग्र क्रान्ति ।।

होते नहीं लेखक, तो रहते जनाब, हम अंग्रेजों के ही दास ।
विरुघ्द उनके उठाने का सिर,होता ही नहीं किसी में साहस ।।

सुनता है लेखक तो केवल,अपनी अन्तर आत्मा की आवाज़ ।
करने से लेखनी बध्द आवाज़ को,आता ही नहीं है वह बाज़ ।।

दिखाता है लेखक ही तो,समस्त समाज को सच का आईना ।
खाता नहीं भय किसी से वह, चाहे अमेरिका हो या चाईना ।

ऐसे सिरफिरों के कारण ही, इतिहास को भी बिगाड़ा जाता ।
सदियों बाद कठिनाई से, फिर लिखा सत्य है लिखा जाता ।।

कर सकता नहीं लेखक तो कभी भी,झूठा किसी का गुणगान। 
करता हो अगर कोई तो,उसको लेखक नहीं तू भाट ही जान ।।

होता नहीं है बाज़ीगर कलम का, कभी किसी का भी गुलाम ।
कर दे कोई भी अत्याचारी चाहे, उसका काम ही पूरा तमाम।

कहता है व्यथित हृदय तुम भी तो कुछ कलम चलाना सीखो।
उत्तर कलम का तुम तब केवल ,कलम चला कर देना सीखो ।।
डा0 सुरेन्द्र सिंह यादव
व्यथित हृदय मुरादाबादी

स्वरचित 


"कलम न कभी रूकने पाये"
हे इश्वर मदद करो इतनी
मैंने अब कलम उठाई है।
ताकत भर दो इसमे इतनी,
कर्तव्य मार्ग से डिगे नहीं।
आएं चाहे संकट जितने,
यह सत्य मार्ग से हटे नहीं।
अंधियारे घोर निराशा में भी,
अबला की लाठी बनी रहे।
मेरी कविता तलवार बने,
जो हर अबला की रक्षार्थ उठे।
इसमें भर दो शक्ति इतनी,
हर निर्बल की यह ढाल बने।
हे इश्वर शक्ति दो इतनी,
यह कलम निरंतर चले योंहीं ।
आएं संकट चाहे जितने,
यह कर्तव्य मार्ग पर डटी रहे।
निज प्राणों की बलि देकर भी,
यह सत्य मार्ग पर डटी रहे।
हे इश्वर शक्ति दो इतनी,
यह कलम न कभी रुकने पाए।
यह कलम न कभी रुकने पाए।।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित

जयपुर  


रात शाम सपने में आकर
मेरी कलम मुझ से बोली,
खोया था सपनों की दुनिया में
एकाएक मैंने आँखें खोली,

बोली कलम, क्यों खपा हो मुझसे
क्यों तूने नाता तोड़ लिया,
पकड़ मेरा हाथ चला था
क्यों बीच मझधार छोड़ दिया,

चलती नहीं लेखनी अब तेरी
क्या तूं भी पैसों में बिक गया,
या भर गया मन तेरा अब
या लिख-लिख कर थक गया,

सुन कलम की बात, बोला
लिखूं तो मैं क्या लिखूं,
बोली कलम - तूं ऐसा लिख
जो पढ़े तो बस मैं ही दिखूं,

लिख किसान का दुःख-दर्द
पुकार आबरू लुटती बेटियों की,
लिख क्यों सोई पड़ी है सरकार
लिख जहाँ जवान मरते घाटियों की,

कर माँ भारती का बखान तूं
सीमा पर सैनिक का प्रहार लिख,
माँ की ममता, पिता का दुलार
दुल्हन का सौंदर्य श्रृंगार लिख,

लिख सामाजिक बुराइयों पर
लिख बढ़ते भ्रष्टाचार पर,
लिख प्रकृति के सौंदर्य को
लिख प्रकृति के संहार पर,

सच को सच झूठ को झूठ
ऐ कलम ! वादा हैं जरूर लिखूंगा,
रुकना नहीं तुम भी थककर
आज भी, कल भी जरूर लिखूंगा,

स्वरचित

बलबीर सिंह वर्मा 
  

कलम उठ तलवार बन 
संस्कृति का पतवार बन

होड़ मची है कौन हो आगे
पथ विस्मृत सब भागे भागे 
ठहर जरा तू सोच पल भर
सत्य पथ का रफ्तार बन 
कलम---

ले सूरज की तपिश चल 
वर्षा की तरलता धर
चाँद की रोशनी लेकर 
तिमिर पथ उजियार बन
कलम--
नव स्वप्न नवल ज्योति जला
वीरों सा तू कदम बढा
पोंछकर निराशा के अश्रु
अटल विश्वास की ढाल बन 
कलम--

बन बेबसी का तू संबल
अवलंबन पीड़ितों का आँचल 
श्रॄंगार कर जीवन मुल्यों का 
प्यार की रसधार बन
कलम--

तोड़ मूर्छा जवानी का
गीत गा जिंदगानी का
जग को दे नव संदेश 
रश्मि उज्जवल संस्कार बन 
कलम-- 

नहीं तू निर्बल कभी 
नहीं तू अचल कभी
बाँध समय प्रवाह को
संगीत का सुर ताल बन 
कलम--

अविचल बढ़कर पथ
कर स्वाहा हैवानियत का पग
शीतल कर दग्ध हृदय को
सुमधुर सुरभित कंठहार बन
कलम--



सुधा शर्मा  

लिखना मेरे खून में नहीं हैं 
बस मन की गहराई से कलम से लिखने का जूनून हैं 
कलम से इन्सान दुनियाँ के रंग बदल लेता हैं 
बस सच्चे मन से लिखने की चाहत होनी चाहिये.

कलम मेरी चलती हैं तो दिल का दर्द लिखती हूँ 
कभी मन की ख़ुशी कभी मन के गम लिखती हूँ 
जिंदगी की हर दिन एक नया कदम लिखती हूँ 
अल्फाजों की कलम मन के अरमान लिखती हूँ .

जिंदगी के ख्वाब कलम से कागज पर लिख दिये हैं 
कुछ अभी बाकी कलम से लिखने बाकी हैं 
कुछ बातें कलम से लिखी पन्नों में महक रही हैं 
कुछ बातें वक्त की स्याही में धूमिल हो गई हैं .

कलम से लिखने हर पल एक नई ख्वाहिश हैं 
दिल में हर वक्त एक नई आजमाहिश हैं 
खामोश हूँ दिल से मगर कलम से लिखने की चाह हैं 
कलम से लिखना अब मेरी एक नई पहचान हैं .

स्वरचित:- रीता बिष्ट 


1)
लाख की बात
कलम साथ रहे
भावनाओं मे
बहा मन उद्गार
अडिग रहे जन

2)
मनो भाव है
कलम से हमेशा
उत्थान रहे
भटके न जनता
विकास करें जन

स्वरचित



नीलम शर्मा#नीलू


है कलम सा कोई साथी नहीं, बडी बेजोड़ है यह संगिनी, 

है हथियार भी यह गुलजार भी,हो औलाद की पूरी कमी, 

है श्रृंगार यही उत्साह यही, विरहा यही, वात्सल्य यही ,

शांति रस की यही प्रवाहक, बनी भक्ति की धारा यही ,

ज्ञान की यह गंगा जमुना, है डुगडुगी जागरण की यही, 

वक्त की जो बदल दे जो धारा, है सूर्य किरण ऐसी यही ,

कलम का सदुपयोग हो तो, नहीं इससे बड़ा कोई धनी ,

दुरुपयोग हो जब कलम का,यहाँ इससे बड़ी लज्जा नहीं 

कलम गहना है जो समझो, कोई हो इसमें मिलावट नहीं ,

होगा खालिस जब ये गहना, चमकेगी तब ही तो ये जमीं |

स्वरचित, मीना शर्मा, मध्यप्रदेश, 







No comments:

"खेल"24मई 2019

ब्लॉग की रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं बिना लेखक की स्वीकृति के रचना को कहीं भी साझा नहीं करें |                                     ब्...