Wednesday, January 30

"संत "29जनवरी2019


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             ब्लॉग संख्या :-283













"संत"हाइकु
(1)
संत विचार
जन-मन कल्याण
शांति विस्तार।।
(2)
संत संगति
संस्कारों में समृद्धि
सुख संतति।।
(3)
संतो से सजी
प्रयाग की नगरी
श्रद्धा विश्वास।।

वीणा शर्मा वशिष्ठ
स्वरचित,मौलिक


संतों की सतसंग से धुल जाते हैं पाप
जन्मों की मैली चादर हो जाती है साफ ।।
संतो को पहचानिये करिये मेल मिलाप
ये ऐसी दौलत जो मुफ्त में है अड़नाप ।।

जहाँ मिले दो ज्ञान की बात 
संतो का समझो वो साथ ।।
गरिमा गई गेरूआ वस्त्र की 
संभल कर पकड़ें कोई हाथ ।।

संत असंत सबमें समाया 
सूझबूझ सब काम बनाया ।।
श्रद्धा का तो वो चमत्कार 
एकलव्य ज्ञान मूरत में पाया ।।

अन्तस का संत पहचानें
दृढ़ हो उसकी बातें मानें ।।
महकेगा 'शिवम' जीवन 
सदा कदर सोच की जानें ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/01/2019



कभी संत का अंत न होता
गुंजा करती उसकी वाणी
परहित ही जीवन जीता वह्
जिव्हा बसे माँ कल्याणी
दुःख सुख धन वह् क्या जाने
काम वासना से कोसों दूर
गर्मी सर्दी वर्षा सहता वह् नित
पीता सदा रामामृत भरपूर
काम क्रोध लोभ न छूता
जीवन उसका है एकांकी
संत सुधामय प्याला पीता
जीवन उसका है बैरागी
संत सूर थे संत कबीरा
अक्खड़पन से रहे फकीरा
महाकवि तुलसी की वाणी
जपे जगत में श्री रघुवीरा
सच्चे पक्के भक्त संत है
दुनियांदारी वे क्या जाने
जब भी भीर पड़े भक्तों पे
तब कर देते हैं वारे न्यारे
संत अमोलक हीरा होता
जनहित वह् बीजों को बोता
सुमन हँसी अधरों पर रहती
वह् जीवन मे कभी न रोता
संत आस्था बस ईश्वर में
निराकार सुनसान जपे
साधक बनकर करे साधना
रब खातिर वह् खपे तपे।।
स्व0 रचित
गोविंद प्रसाद गौतम
कोटा,राजस्थान।





सद् जिसका अंत है,
वह असल संत है।
जिसकी वाणी उपदेश है,
वह असल संत है।
जिसका परमार्थ अनंत है,
वह असल संत है।
जिसमें निहित संस्कृतियां,
वह असल संत है।
जिसके संस्कार हो पुज्यनीय,
वह असल संत है।
सेवाभाव हो प्रखर जिसका,
वह असल संत है।
सत्संग जिसका मोक्षमार्ग,
वह असल संत है।
लोभ,मोह,माया से ढका,
जो प्राणी जगत में,
वह असल में असंत है।




सन्तों का संग करो।
शुद्ध विचार होगा।
मन होगा पवित्र।
और जीवन सफल होगा।

सन्तों की वाणी को।
चित्त में उतारो।
सन्तों की परिभाषा को।
जीवन में उतारो।

फिर होगा सफल तेरा।
जीवन का हर काम।
जो करोगे सत्संग उनका।
तेरे बनेंगे सारे काम।।
💐💐💐💐💐💐💐💐
स्वरचित
वीणा झा
बोकारो स्टील सिटी





(1)
भक्तिकालीन
रहस्यवादी कवि
संत कबीर

(2)
अमृत वाणी
समाज सुधारक
संत कबीर

(3)
संत प्रवृत्ति 
मानवता के गुरू
थे रविदास

(4)
संत जीवन
करते चमत्कार
शिर्डी के साईं

(5)
थे सिक्ख गुरू
गुरू नानक देव
प्रसिद्ध संत

(6)
संत संदेश
मानवता ही धर्म 
है सच्चा कर्म

स्वरचित *संगीता कुकरेती
*





(1)जप से तप
काया कर निर्मल 
बनते संत
🌹🌹🌹
(2)संत के मुख
बहती ज्ञान गंगा 
नहाते श्रोता 
🌹🌹🌹
(3)है पूजनीय 
सभी धर्मों के संत
करे वंदन 
🌹🌹🌹
(4)नंगा बदन
करते विचरण
नागा जो संत
🌹🌹🌹
(5)संतों के आज
खुल रहे है राज
कैसे विश्वास 
🌹🌹🌹
(6)त्याग के सब
धरा पे खड़ा मौन
दरख्त संत
🌹🌹🌹
(7)कुछ लुटेरे 
रख संत का रूप
करते लुट
🌹🌹🌹
(8)वही है संत
रखे निस्वार्थ भाव 
देते न घाव
🌹🌹🌹

स्वरचित 
मुकेश भद्रावले




संत तराशे
मानव कच्चा घड़ा
आकार पाता।

इंसा किरण
संत रूपी सूरज
प्रकाश फैला।

संत की कृपा
इहलोक सुधरा
जीव बदला।

संत चरण
बड़भागी मानव
पड़े आँगन।

प्रभु की कृपा
संत का समागम
आत्म-उद्धार।

जीवन नाव
भव पार लगाये
संत खिवैया।

मन में द्वंद्व
संत का आशीर्वाद
हरता पीड़ा।

संत कलम
मन कोरा कागज
चित्र उकेरे।

संत दर्शन
भावनाओ की कुँजी
खोलता भाग्य।

मानते लौहा
प्राचीन संतवाणी
विज्ञान युग।
@सारिका विजयवर्गीय "वीणा"




मनसा वाचा कर्मणा , जो पावन हो जाय
सद्गुण जीवन में धरे, सन्त वही कहलाय

कुम्भ नुमाइश सज गई ,बारह बरसों बाद
सन्त सभी आकर जुटे ,चखने भक्ति स्वाद

कुम्भ नहाने को यहां ,उमड़ा सन्त समाज
पण्डे बैठे घाट पे , आसन मारे आज

काशी नगरी सज गई ,सज गए सारे घाट
सन्त समागम हो गया , बड़े निराले ठाठ

मीलों पैदल आ गए , चले रास्ते नाप
गंगा में डुबकी लगे धुल जायें सब पाप

कुम्भ पर्व के लिए यहां , उमड़ी भारी भीड़ 
पहले हम पायें जगह , छोड़ दिये सब नीड़

दीन हीन जग जो मिले ,सब में बांटें प्यार
सन्तों की सेवा करें , मेवा मिले अपार

सन्त सभी होते नहीं,उन्हें परखिये आप
वेश बदल कर घूमते , कुछ दो मुँहे सांप

सरिता गर्ग 





विधःःःकाव्य ःमुक्तक
संत असंत यहां मिलते हैं।

संत सुसंगति से मिलते हैं।
पहचान करें कैसे हम सब,
संत समाज में ही मिलते हैं।

मनमंदिर में संत छिपा है।
ढूँढें इसको कहीं लुपा है।
अंतस में झांका जब मैने, 
संत कहां ये पता चला है।

संत सद्व्यवहार करते हैं।
संत सदा सदाचार करते हैं।
कर पुरूषार्थ मान पाते सब,
उनका चरण स्पर्श करते हैं।

संत समागम होता रहता है।
हमें सदानंन्द होता रहता है।
संत अहिंसक दया के सागर,
संत सत्यप्रेम बोता रहता है।

तुलसी संत कबीर सूरदासजी
मीराबाई अहिल्या अनुसुइया।
जन्में संत अनेक भारतभू पर
संत बताऐं जग भूल भुलइया।

प्रवचण सुनें साधुसंतों के हम।
हृदयांगम करें सदविचार हम।
संतों की जीवनशैली से सीखें,
कितने धर्मज्ञान पा सकते हम।

स्वरचितःःः ः
इंजी. शंम्भूसिंह रघुवंशी अजेय





 संत असंत
चोला एक रंगाये
सब भ्रमित।।


संतो की वाणी
बरसता अमृत
पियो छक के।।

संत उद्घोष
ईश वाणी समान
करो सम्मान।।

संत महंत
घूमें दिग दिगंत
आदि न अंत।।

असली संत
माया मोह विहीन
तलाशें मोक्ष।।
भावुक





संत

जिसके उर में बहती हो,
अजश्र करुणा की धारा।
मानवता के हित जिसने हो,
अपना सारा जीवन वारा।

"परदारेषु मातृवत" को,
जिसने अपने हृदय धरा हो।
सृष्टि के कण - कण से,
नेह का जिसके भाव भरा हो।

पर हित के लिए ही जिसकी,
साँसें अविरल चलती हो।
आँखों में ममता हो और,
हृदय में पावन गंगा बहती हो।

जो सोंचे नहीं स्वप्न में भी,
औरों का हृदय दुखाना।
न्योछावर करता सर्वस्व हो,
स्वयं स्वार्थ से हो बेगाना।

काम, क्रोध, मोह और लोभ का,
सहर्ष जिसने त्याग किया हो।
महत्वाकांक्षा को छोड़ पीछे,
हँसकर थोड़े में तुष्ट हुआ हो।

जिसकी लघुता में प्रभुता बसती हो,
उसको गगन भी शीश झुकाता है।
इस पुण्य धरा पर सिर्फ वही,
निर्विवाद संत कहलाता है।

उषा किरण




"संत"
पहनावे से ही होते नहीं
कोई संत है....
व्यवहार और विचारों 
से ही बनते संत है..
संतो का होता नहीं
कभी अंत है...
अपने सत्कर्मों में
वो जीवित हैं..

केवल मठों में ही...
नहीं संतों का वास है
घरों में भी रहते
बहुत से संत हैं
धर्म गृहस्थी का 
पालन करते..
गृह को ही मानते
आश्रम हैं

मुश्किल से मिलता
संतों का संग है..
जिनके संस्कारों के
अनुगामी हम हैं..
हे !संत पुरुष आपके चरणों में
मेरा शत-शत नमन है।

स्वरचित पूर्णिमा साह




विधा:पिरामिड
1
हैं
सन्त
चन्दन
दयावान
करें भजन
ज्ञान की गठरी
मानवता के प्रहरी
2
ये
सन्त
सज्जन
प्रतिमूर्ति
ज्ञान प्रकाश
उच्च विचारक
समाज सुधारक

मनीष श्री




संत समागम हो रहा,
संगम तट के पास।
बारह वर्षो बाद लगा,
महाकुंम्भ प्रयाग।
🍁
दिव्य घाट अदभुद छंटा,
संगम नगरी का।
नागाओ का ऐसा संगम,
दिखता और कहाँ।
🍁
दूर-दूर से धर्मधिकारी,
आते रहे यहाँ।
जन प्रतिनीधियो का भी,
डेरा यहाँ लगा।
🍁
भारत की पहचान सदा ही,
संत समाज रहा।
शेर कहे कुछ को छोडो तो,
धर्म है संत समाज।
🍁

स्वरचित .. Sher Singh Sarraf




1)
संत समाज
ईश्वरीय संदेश 
परोपकार 
2)
उत्कर्ष भाव 
ईश्वर विशिष्टता 
संत के गुण
3)
वेद पुराण 
संत निर्देशन में 
जीवन कला 
4)
मायावी कर्म 
बाहरी आडंबर
संतत्व हीन
****

स्वरचित
अनिता सुधीर श्रीवास्तव





संत-असंत भेद है भारी,
संत सदा रहे सदाचारी।
निर्मल पावन उनका साथ,
सदा गहो संत का हाथ।
संत विचार हैं चंदन जैसे
वातावरण करें सुवासित ऐसे।
संत रहें सदा परोपकारी,
संत समाज सुधारक भारी।
संत का जीवन सीधा-साधा,
संत न करें कभी कोई दिखावा।
परमार्थ परहित धर्म अपनाएं,
भजन-भक्ति में ध्यान लगाएं।
मोह-माया के बंधन अति भारी,
मार्ग दिखावे संत हितकारी।
संत-वाणी अमृत की बर्षा,
सुनते ही जन-मन हरषा।
संत समाज के हैं उद्धारक,
पीड़ित जन के हैं तारक।
सच्चे संत न होवें विकारी,
सद्गुण,सद्भाव जगत संचारी।
सदा करो संतों की संगति
दूर होंगी जीवन की विकृति।
भोग-विलास के हो जो आदी,
मन से जो हों सदा प्रमादी।
ऐसे संतों से सदा बचिए,
अंधविश्वास में कभी न पड़िए।

अभिलाषा चौहान


संत
संत विनोबा
रसायन विज्ञान
प्रिय गणित
दर्शन के विद्वान
चिंतन लीन
अध्यात्म में प्रवीण
माता की साध
गीता का अनुवाद
सत्य की खोज
हिमालय प्रस्थान
भाव व्यापक
राष्ट्रीय अध्यापक 
अभंग गान
आंदोलन भूदान
अहिंसावाद
गाँधी का आशीर्वाद
मन अध्यात्म
नागरी लिपि संगम
मानव धर्म
देशप्रेम का मर्म
भारत रत्न 
पुरस्कार रेमन
वीतरागी जीवन
-©नवल किशोर सिंह
स्वरचित




'संत"

बड़ा कठिन पहचानना आज के युग में संत 
दिगभ्रमित करदें कहाँ मिले न दुख का अंत ।।

बदल गया है वक्त अब बदलो मेरे भाई 
क्यों न अब तक अंतस की ज्योत जगाई ।।

हाथ पकड़ कर चलने की छोड़ो आदत 
संत बनकर रच दे कोई और क़वायद ।।

कितने किस्से रोज ही रोज हम पढ़ते हैं
संत तो आज अब वायुयान में उड़ते हैं ।।

फाइव स्टार में रूकने वाले संत नही 
क्यों न इन बातों पर 'शिवम' तुझे यकीं ।।

हरि शंकर चाैरसिया''शिवम्"
स्वरचित 29/01/2019




संतों की वाणी 
शीतल है चंदन 
श्रद्धा वंदन 


गृहस्थ संत 
जीवन की तपस्या 
विदेह मनु 


संत जीवन 
प्रेरणा का संसार 
ईश्वर रूप 


आदित्य संत 
सींचता प्राण पुष्प 
धरा आभारी 



संत ह्रदय 
बहती ज्ञान गंगा 
धोते है पाप 


संत संगति 
कुरूपता विलीन 
सुंदर मन 


श्रद्धा में सेंध 
बहुरूपिया संत 
करें कुकर्म 


संत सानिध्य 
प्रेरणा बने पथ 
दिव्य मित्रता 



संत वचन 
ज्योतिर्मय हो मन 
दूर तिमिर 

(स्वरचित )सुलोचना सिंह 
भिलाई (दुर्ग )




विधा:: दोहे 

सरल सरस सुन्दर कथन, सात्विक मन से होय...
मिल जाए ऐसा पुरुष, संत जानिए सोय....

कृष्णा वृन्दावन मिलें, काशी में शिव धाम 
यहां समागम संत हो, संगम है सव धाम...

महिमा पावन संत की, मुख से कर अविराम....
निर्मल मन हो जायगा, दरस मिलें हरि-राम...

वाणी ऐसी बोलिये, संतहि रूप सुभाय...
आपण को निर्मल करे, औरों को कर जाय.... 

पूजो ऐसे संत को, जो प्रभ जोत जलाय....
आप तरे सो तो तरे, तुझे संग ले जाय.... 

II स्वरचित - सी.एम्.शर्मा II 
२९.०१.२०१९

C.P. Sharma
1. संत चरित्र 
पवित्र तन-मन
निर्लोभी त्यागी 
2. संत ह्रदय 
नवनीत समाना 
होत सुजाना 
3. 
ज्ञानाचरण
सदाचरण भी हैं 
भक्ति -मुक्ति हैं 
4. 
वेश सादगी 
देशाटन सांराश
स्वधर्म सीख 
5. 
ज्ञान पिपासा
निर्लोभी उपासक
ज्ञान अलख 
स्वरचित -चन्द्र प्रकाश शर्मा 'निश्छल',



संत सहें पर पीर को, अपनी पीड़ा भूल ।
कपट न जिनके मन पले, पर धन माने धूल ॥1॥

संत वचन अमृत सदा, देते मिश्री घोल 
कड़वे वचनों से बचें, बोलें मीठे बोल ॥2॥

संत चलें सत मार्ग में, चाहे राह कठोर ।
झूठ कभी न ये चुनें, थामें सच की डोर ॥3॥

संत समंदर ज्ञान का, गहरा है विस्तार ।
जो डूबे इस सिंधु में, वो उतरेगा पार ॥4॥

संत न उनको मानिए, वो तो हैं शैतान ।
स्वांग धरें जो संत का, करते हैं अपमान ॥5॥

संत गुणों की खान है, जिनकी नहीं मिसाल ।
कैसे वरणे 'आरज़ू', संत हृदय का हाल ॥6॥

रचना तिथि 29/01//2019




सच्चा संत तो बस वो है
जिसको न हो अभिमान।
क्रोध, काम, माया अरु लोभ,
फटकें ना जिसके पास।
दिल पावन जिसका गंगा जल सा,
मन शीतल हो चांदनी जैसा।
संत वही बस है अच्छा,
जिसका मन भेद न करता है।
दुख आएं चाहे जीतने,
वह तनिक नहीं घबराता है।
अपने हिस्से के सुख देकर,
जो मन ही मन हर्षाता ।
वह मोह न करता जीवन का,
सेवा करता बस इश्वर की।
ऐसा सुन्दर मन रखता जो,
बस संत वही कहलाता है।
बाकी के सब बस ढोंगी हैं,
जो नित बाजार सजाते हैं।
अपने छल कपट के बल,
जनता का शोषण करते हैं।
ऐसे लोगों के कारण ही,
पृथ्वी पर विपदा आती है।
लेकिन मैं यह भी कहता हूँ,
संतो से है दुनिया कायम।
उनके पुन्य कर्मो से ही,
अब तक है यह धरा कायम।
(अशोक राय वत्स) स्वरचित

(1)
माया संसार 
संतो का अनुभव 
जीवन सार 
(2)
जल के सम 
संतो की संगत में 
मन कंचन 
(3)
एक समान 
वाणी औ व्यवहार 
संत आचार 
(4)
संत बनना 
दिखना और होना 
फर्क है बड़ा 
(5) 
गृहस्थ संत 
कर्तव्यों की साधना
संघर्ष मंत्र 
(6)
जाग्रत वाणी 
संत है उद्धारक 
जग कल्याणी 

स्वरचित 
ऋतुराज दवे

विधा :-पद्य 

संत बनाना तन को है सरल ,
पर मन तो संत नहीं बनता है ।
मन भीतर बैठे कुसंत का ,
अक्सर द्वन्द्व युद्ध ठनता है ।

ज्ञानयोगी और सिद्ध संन्यासी , 
मिल जाते हैं गेरुआ पहने ।
नयन माताओं के वक्ष देखते , 
सजे हुए जहाँ स्वर्णिम गहने ।

दमन नहीं होती इच्छाएँ , 
केवल दबी रहती हैं मन में ।
अधमरी कामेच्छाओं के फण, 
उठ -उठ जगते रहते तन में ।

साधु ज्ञानी त्यागी महात्मा , 
आचरण रखता है सदाचारी ।
चोले भगवे का दम्भ छोड कर ,
होता संत केवल परोपकारी ।

शुद्ध अस्तित्व का बोध कराए ,
सहजे संत करिए स्वीकार ।
मन आत्मा से जो न विपन्न हो , 
ऐसा संत हो अंगीकार ।

स्वरचित :-
✍️ऊषा सेठी 
सिरसा 125055 ( हरियाणा )

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"खेल"24मई 2019

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